Thursday, September 13, 2012

खाने में नमक रोटी और अचार (14)

सुबह हो या शाम कीर के झोपड़ा में हमारे रोज के खाने का एक ही मीनू होता था। सूखी रोटी उसके साथ नमक या फिर करील का अचार। और कोई विकल्प ही नहीं था जो मिले उसे भगवान के नाम पर जीमना था। गांव में हरी सब्जियों की खेती नहीं होती थी। बाजार बहुत दूर था। सारे गांव के लोगों का यही खाना था। हम सुबह दो रोटियां खाते थे शाम को भी दो रोटियां। बस इतने से ही पेट भर जाता था। हां महज दो रोटियां। भाई रोटियां मोटी-मोटी होती थीं।

गेहूं, चना और जौ की रोटियां - एक दो दिन खाने के बाद हमने जानना चाहा कि ये रोटियां बनती कैसे हैं। दरअसल ये रोटियां तवे में नहीं बनती थीं। इन्हें पकाया जाता था लोहे की कड़ाही में। रोटी का आटा तैयार होता था गेहूं, चना और जौ के आटे के बराबर बराबर मिश्रण से। इसलिए बाद में पता चला कि ये रोटी खाना पौष्टिकता के लिहाज से तो सही है। तभी तो एक महीने बाद जब मैं गांव से निकला तो वाराणसी पहुंचने के बाद पता चला कि मेरा वजन घटने के बजाय दो किलो बढ़ चुका था। हां 54 किलो से हम बढ़कर 56 किलोग्राम के हो गए थे। दोस्तों ने कहा कि यह गांव वालों से मिले प्रेम और आपकी संतुष्टि का परिणाम है।

तो रोटियों के साथ खाने के लिए सब्जी नहीं होती थी। इसके साथ स्वाद के लिए मिलता था नमक। सिर्फ नमक और रोटी। निवाला गटकना थोड़ा मुश्किल जरूर होता था लेकिन धीरे धीरे आदत सी पड़ गई। हां कभी कभी इसके साथ अचार मिल जाता था। वह अचार होता था करील का। करील को एक तीखा फल माना जाता था। पर तब हमें वह भी काफी भला लगता था स्वाद में। 

कभी कभी रोटी के साथ कोई घर वाला अचार भी दे देता था। ये अचार होता था करील का। चंबल में पाया जाने वाला एक जंगली फल। पहले से ही थोड़ा कड़वा होता है। ग्वालियर से छपने वाले एक समाचार पत्र ने हमारे बारे में चार कालम खबर छापी- चंबल की वादियों में नमक और रोटी खाकर शिक्षा का अलख जगा रहे हैं दो नौजवान...विद्युत प्रकाश मौर्य और दिग्विजय नाथ सिंह। हमें ये खबर पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ।
 विद्युत प्रकाश मौर्य
(CHAMBAL, ROTI, SALT, BREAD, KIR KA JHOPDA ) 

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