Thursday, September 6, 2012

हम रायपुरा को छोड़ चले बगदिया की ओर (8)

हमारा सफर शुरू हुआ एक नए गांव की ओर। जय सिंह जादोन भाई साहब ने बताया था कि ये सफर आपको चांद पर यात्रा समान प्रतीत होगा। जब हम श्योपुर से बस से चले तब इसका एहसास हुआ। 40 किलोमीटर का बस का सफर सचमुच चांद पर यात्रा जैसा ही था। सड़क को ना पक्की कहना सही था ना ही कच्ची। लेकिन इलाके लोगों के लिए यही सड़क जीवन रेखा है और यही उनकी बस, नाव, हवाई जहाज, यानी सब कुछ है।

हमारा नया पड़ाव था गांव बगदिया। हमारे पुराने साथी जय सिंह जादोन का गांव है। जय सिंह भाई एक संयुक्त परिवार में रहते हैं। पांच सौ बीघे जमीन है। मतलब इलाके के जमींदार जैसे हैं। पर परिवार में एक समाजसेवक पैदा हो गया है। बाकी भाई खेती बाड़ी देखते हैं।
खेती से अच्छी खासी आमदनी होती है। बच्चे गांव से बाहर जयपुर, सवाई माधोपुर, ग्वालियर जाकर पढ़ते हैं। खेत सोना उगलते हैं लेकिन बैंक बैलेंस नहीं बनता है। क्योंकि परिवार के बड़े-बुजुर्ग हर शाम खट्टा पाणी पीने के शौकीन है। मुझे यहीं पता चला शराब को स्थानीय भाषा में इसी नाम से बुलाते हैं। 

पूरे गांव में खट्टा पाणी का रिवाज है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता इसके खिलाफ भी लोगों को जागरूक करने में जुटे हैं। जादोन परिवार की महिलाओं ने बताया कि बड़े तो एक ट्रैक्टर की कीमत के बराबर हर साल तरल पदार्थ गले के नीचे उतार लेते हैं।
सालों बाद दिल्ली में जय सिंह भाई से मुलाकात हुई। 

गांव के सारे घर ऊंचे ड्योढ़ी वाले हैं। बच्चे और बड़े कहीं भी घूमें लेकिन घर की बहुएं चौखट से बाहर नहीं निकलती हैं। दूसरे गांव के नीची बिरादरी के लोगों से बातें नहीं करतीं। जब शादी ब्याह हो तब एक घर से दूसरे घर गांव की गली से नहीं बल्कि पिछवाड़े के रास्ते ही आती जाती हैं। मैंने जादोन परिवार में भाभी से पूछा आपका पूजा घर किधर है। भाभी जी भावुक होकर बोलीं- राक्षसों के घर में पूजा घर पूछते हो भाई। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(BAGADIA, CHAMBAL, SHEOPUR, JAI SINGH JADON )


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