Tuesday, September 4, 2012

मुझे पता है, मेरे गांव में क्यों आए हो... (6)

रायपुरा में हेमलता की छोटी बहन है विमला। पंद्रह साल की। साड़ी पहनती है, क्योंकि उसकी भी शादी हो गई है। विमला हेम से ज्यादा खूबसूरत है। गांव की बहुएं परदा करती हैं। लेकिन बेटियों पर कोई बंधन नहीं है। 

हमलोग भले ही गांव में साक्षरता कार्यक्रम के तहत गांव में स्वयंसेवक बनकर गए थे लेकिन विमला के विचार कुछ अलग ही थे। दो दिन की बातचीत में विमला ने कहा कि मुझे पता चल गया है कि तुमलोग मेरे गांव में क्यों आए हो। मैंने पूछा- क्यों.. विमला बोली-



पढ़ाने लिखाने की बात तो महज एक बहाना भर है। असल में तुम्हारे गांव में खाना खत्म हो गया है। इसलिए तुम लोग अब मेरे गांव में आ गए हो। मेरे गांव में खास कर मेरे बापू के घर खाने पीने की कोई कमी नहीं है। 
मेरा बापू बहुत अमीर है...रोज घी चुपड़ी बाटी और बेसन का लड्डू खाने में जो मिलता है। तुम लोग यहां महीनों रहकर छक कर खाओगे और फिर  मोटे होकर चले जाओगे।


विमला के ये सदविचार सुनकर मुझे झटका लगा। मैंने दिग्विजय से बात की। हमलोगों ने तय कुछ तय किया। वैसे भी इस गांव में की पढ़ने में ज्यादा रूचि नहीं है। हमें किसी अविकसित से गांव में चलना चाहिए, जहां पूरा गांव ही निरक्षर हो। हमने कैलाश भाई से बातचीत की। कैलाश भाई को तो हमारे जैसे लोग ही चाहिए थे। उनके पास ऐसे गांव तो कई थे जहां प्रोजेक्ट चलाया जाना था। उन्होंने तुरंत हमारे नए गांव में जाने का इंतजाम कर दिया।

लेकिन जाते जाते इस गांव की कई चीजें नहीं भूलती। हमारा अक्षर सैनिक राजू जो एक दलित बिरादरी से आता था। उसकी एक अनाम छोटी बहन। उससे मेरा कभी संवाद नहीं हुआ। लेकिन वह सांवली सलोनी हमारी ओर देखकर बड़ी आत्मीयता से मुस्कुराती थी। जाते-जाते वह मेरी ओर देखकर कुछ ऐसा बोल जाती है जिसे झेलना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। मैं कुछ कह नहीं पाता...बस झेंप जाता हूं।

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य



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