Sunday, September 30, 2012

रणथंभौर वाले गणेश जी ने बुलाया (31)


( चंबल- 31) 
मध्य प्रदेश के चंबल घाटी में साक्षरता मिशन खत्म होने के बाद हमें रणथंभौर वाले गणेश जी का बुलाया आ गया। वो कैसे। गांव में प्रवास के दौरान, श्योपुर जिले के गांव या यों कहें बसावट, कीर का झोपड़ा गांव के लोग पूछते थे मास्टर तुम कौन से गांव से आए हो...अगर मैं बिहार बताऊं तो वे नहीं जानते थे। दिग्विजय सिंह यूपी बताएं तो वे नहीं जानते थे। जानते भी भला कैसे क्योंकि गांव के लोगों ने तो कभी ग्वालियर और श्योपुर के अलावा किसी शहर का नाम भी नहीं सुना था। हां वे चंबल के उस पार राजस्थान के शहरों के बारे में जरूर जानते थे। तब हम उन्हें अपनी यूनिवर्सिटी का नाम बताते थे। हमने बताया कि हम काशी जी से आए हैं।

गांव के लोगों ने काशी का नाम सुन रखा है। हम काशी के नाम पर गांव में और पूज्य हो जाते थे। हमारा सम्मान बढ जाता था। गांव के लोग खुश किस्मत मानते थेकि उनके गांव में काशी से कोई आया है। हमारे एक गांधीवादी साथी ने कहा कि आप कीर के झोपड़ा जैसे गांव में दो देवदूत की तरह हो। लेकिन हम हकीकत जानते थे। हम गांव में साक्षरता के सिपाही बनकर आए थे लेकिन हम तो खुद की इस गांव में लोगों से कुछ सीखने की कोशिश कर रहे थे। हमने गांव में रहकर गांव के भोले-भाले लोगों से भी काफी कुछ सीखा। जीवन का संघर्ष और भोगा हुआ सच।

अब हमारी चला-चली की वेला थी। हमें पता चला कि चंबल नदी के उस पार है सवाई माधोपुर। सवाई माधोपुर में है रणथंभौर का अभ्यारण्य और रणथंभौर का किला। गांव के लोगों में रणथंभौर के गणेश जी को लेकर बहुत आस्था है। गांव के कई लोग वहां जा चुके है।

तो हमने भी तय किया कि गांव छोड़ने के बाद हम भी रणथंभौर के गणेश जी का दर्शन करने के बाद ही अपने शहर के लिए जाएंगे। और यही हुआ। गणेश जी ने हमें बुला लिया। गांव से निकल कर हमलोग श्योपुर पहुंचे। महात्मा गांधी आश्रम में रिपोर्ट किया। हमने आश्रम से अपने कामकाज का प्रमाण पत्र लिया। उसके बाद का नाव से चंबल नदी पार की। हमारे साथ बगदिया गांव के जय सिंह जी के भाई भी थे। अब श्योपुर से सवाई माधोपुर जाना हो तो चंबल नदी पर पुल बन गया है। लेकिन 1992 में कोई पुल नहीं था। चंबल नदी को नाव से पुल पार करने के बाद सवाई माधोपुर तक का सफर बस से शुरू हुआ।

ये हमारा राजस्थान की धरती पर पहला प्रवेश था। हमने यहां की मिट्टी को नमन किया, क्योंकि हमारे पुरखे इसी धरती से गए थे। रात को सवाई माधोपुर में रेलवे स्टेशन के पास ही एक धर्मशाला में हमने ठिकाना बनाया। अगले दिन सुबह हम रणथंभौर के किले के लिए चल पड़े। जून के महीने में गरमी भीषण थी। पर किला देखने और गणेश जी से आशीर्वाद लेने की इच्छा मन में थी। इस यात्रा में हमारे साथ दिग्विजय नाथ सिंह के अलावा महाराष्ट्र के दो साथी ( नितिन एलमुले के साथ और मित्र ) भी थे, जिनका साथ गुजारे वक्त यादगार रहेंगे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - हमें लिखें - vidyutp@gmail.com 
(लेखक पेशे से पत्रकार हैं, घूमना उनका शौक है ) 

( RANTHAMBHORE, GANESHA, CHAMBAL, DIGVIJAYNATH, NITIN YELMULE ) 

Saturday, September 29, 2012

आ अब लौट चलें (30)

( चंबल 30) 
समय पूरा हो गया थ..हमें हमारी यूनिवर्सिटी बुला रही थी। गांव वालों का इतना स्नेह था कि गांव छोडने की इच्छा नहीं हो रही थी लेकिन हमlतो महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा  के एक प्रोजेक्ट के तहत गांव पहुंचे थे। एक दिन वापस तो आना ही था। एक सुबह हमने गांव में अपनी आखिरी कक्षा लगाई। गांव के लोगों को सलाह दी कि वे आगे स्वाध्याय से अपनी पढ़ाई जारी रखें।

 गांव के सारे लोगों से हमने विदा ली। गांव से बस स्टाप आठ से दस किलोमीटर की दूरी पर था। हमलोग बस स्टाप के रास्ते पर निकल पड़े। एक ऐसे गांव को छोड़कर जहां बिजली नहीं थी। पानी नहीं था। खाने में भी मिलता था रूखा सूखा सा। कई बार गर्मी की चिलचिलाती दोपहरी में इच्छा होती थी कहां आ गए इस साक्षरता प्रोजेक्ट में। चलो अभी गांव छोड़कर चलते हैं। हमारे बीएचयू के हास्टल में तो कभी बिजली नहीं जाती थी। यहां हम दिन भर पंखा झल रहे हैं। लेकिन देखते देकते वक्त गुजर गया। लेकिन ये क्या जाने के दिन गांव छोड़ने में दुख हो रहा था। अब गांव छोड़कर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। रहते रहते गांव से, गांव के लोगों से लगाव हो गया था। मानो हम उसी दुनिया में ढल चुके थे।
 मैं और दिग्विजय नाथ सिंह धीरे धीरे रास्ता काटते जा रहे थे। तभी पीछे से किसी ने पुकारा। वो रामकरण की आवाज थी। सारे गांव के लोग हमसे अंतिम बार मिल चुके थे। वह कहीं दूर था। हमारे कदम रुक गए। रामकरण करीब आया। वह रूआंसा हो गया। हमने कहा फिर मुलाकात होगी। रामकरण बोला मास्टर झूठी दिलासा मत दिलाओ। फिर वह बोलता रहा।
 दो कुएं एक ही गांव में रहते हैं लेकिन आपस में कभी नहीं मिलते। तुम पता नहीं किस देश से आए और हमसे मिले। हमारा मिलना ईश्वर की इच्छा से हुआ है। 
 हां सचमुच हम ईश्वर की इच्छा से ही तो पहुंच पाए थे कीर का झोपड़ा में। 
-    
-- विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, September 28, 2012

सरसों यानी पीला सोना (29)

( चंबल 29) 
पूरे चंबल इलाके में सरसों की खेती होती है। पीली पीली सरसों यानी पीला सोना। कहते हैं कि चंबल इलाके में देश की बेहतरीन किस्म की सरसों की खेती होती है। इसलिए मुरैना इलाके का सरसों का तेल काफी शुद्ध माना जाता है। सरसों इलाके की नकदी फसल है। पानी की कमी है इसलिए खेतों से कई फसलें उगा पाना मुश्किल है। इसलिए लोग दिल से सरसों की खेती करते हैं। बाकी समयमें गांव के लोगों के पास काम की कमी रहती है। गांव के लोगों के पास सरसों की खेती से नकदी आती है। गांव के लोग इसी नकदी से अपनी बाकी जरूरत की चीजें खरीदते हैं। खाने पीने जरूरत की चीजें पूरी हो गईं तो फिर खरीदते हैं अपने लिए सोना। यानी एक सोना (सरसों ) को बेचकर दूसरा सोना( गोल्ड)

मनोरंजन का साधन टेप रिकॉर्डर -  गांव के लोगों के मनोरंजन का साधन रेडियो और टेप रिकार्डर भी है। लेकिन मजे की बात कि गांव के लोगों को हिंदी फिल्मों के गाने पसंद नहीं आते। सभी गाने गाते हैं अपनी स्थानीय भाषा में। जब भी कोई हिंदी फिल्म का गाना हिट होता है तब उसका राजस्थानी में पैराडी गीत बन जाता है। जैसे ओ मेरी चांदनी चांदनी....की जगह बन गया गीत ओ मेरी जाटणी...जाटणी...


लोग गुनगुनाते हैं राजस्थान के पारंपरिक लोकगीत-मारो रे मंगेतर हरियाणे की अजमेर वाडो रे नवाब जोड़ी रा जवाब नहीं... दूसरा लोकगीत ओ मारो नस नस दूखे पेट....और राजस्थान का सबसे लोकप्रिय लोकगीत पल्लू लटके हो मारो पल्लू लटके...

इनके तमाम लोकगीतों में राजस्थान के शहरों के नाम आते हैं। जैसे कोटा बूंदी बीकानेर सांगनेर आदि। हिंदी फिल्मों को एक और हिट गीत- तू जब जब मुझको पुकारे...मैं चली आउं नदिया किनारे...लेकिन अब यहां के युवक इस गीत को कुछ इस अंदाज में गाते हैं... तू जब जब मुझको पुकारे...मैं चली आउं बोर किनारे....( बोर यानी बोरिंग जहां पानी आता है.. )

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

Thursday, September 27, 2012

पानी और पलायन का दारुण दर्द (28)

(चंबल 28)
चंबल नदी के आसपास रहने वालों के लिए पानी का बहुत बड़ा संकट है। खासकर फरवरी मार्च अप्रैल मई और जून के महीने मुश्किल भरे होते हैं। मानसून की बारिश के बाद कुएं तालाब भर जाते हैं। खंडेदे (नदी से अलग होकर बना तालाब) में पानी आ जाता है। लेकिन हेमंत ऋतु के खत्म होते और ग्रीष्म ऋतु के आने के साथ ही पानी धीरे धीरे खत्म होने लगता है। कुएं और तालाब सूखने लगते हैं। जो गांव चंबल नदी के किनारे हैं वहां के लोगों का काम चंबल मैया से चल जाता है। लेकिन दूर गां के लोगों की परेशानी बढ़ जाती है।
एक एक कर कुएं सूख जाते हैं। पानी के सारे स्रोत खत्म होने के बाद गांव के लोगों के सामने विकल्प होता है दूर गांव से पानी लाने का। कई गांव के लोग आठ किलोमीटर दूर से पानी लेकर आते हैं। जब गांव के आसपास के भी पानी के स्रोत खत्म होने लगते हैं तब गांव के लोगों के सामने एक ही रास्ता बचता है पलायन का। 
गांव के लोग अपने किसी रिश्तेदारी के गांव में पलायन करते हैं। या फिर किसी शहर का रूख करते हैं। लेकिन इस पलायन का दर्द बड़ा दारुण होता है। लोग देर तक अपने गांव को छोड़ना नहीं चाहते हैं। लेकिन कठिन घड़ियों में गांव छोड़ने का फैसला लेना पड़ता है। इसमें कई बार लोग प्यास से तड़प कर जान भी गवां बैठते हैं।

प्यास से तड़प कर मौत -  जल संकट पर चर्चा करते हुए महात्मा गांधी सेवा आश्रम के सचिव रण सिंह परमार भाई बताते हैं कि चंबल के कई गांवों पिछले दिनों 40 से ज्यादा बच्चे प्यास से तड़प कर अपनी जान गंवा चुके हैं। सरकार की ओर से हैंडपंप लगवाने और बावड़ियों को दुबारा से जीवित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन चंबल के आंचल में रहने वाले लोगों का जल संकट से जूझना हर साल की नीयती बन चुकी है। लोग आसमानकी ओर देखते हैं कि जल्दी से मानसून आए और धरती की प्यास बुझाए। 


Wednesday, September 26, 2012

जीप आती देख सारा गांव फरार हुआ ( 27)

श्योपुर की हरी भरी वादियां, बारिश के दिनों में
(चंबल 27) 
रात के दस बजे थे। सारा गांव सो चुका था। हमलोग भी खुले आसमान के नीचे अपनी खाट पर सो रहे थे, तभी अचानक गांव के किसी व्यक्ति ने हमें जगाया और कहा,  हुरे मास्टर जागो और गांव छोड़कर भागो। हमने देखा आधे किलोमीटर दूर एक खुली जीप की रोशनी दिखाई दे रही थी। जीप गांव की ओर आती हुई दीख रही थी। सारे गांव के लोग इस जीप की रोशनी को देखकर अपने अपने घर छोड़कर भाग चुके थे। वे हमें भी सलाह दे रहे थे कि तुम लोग भी चलो हमारे साथ बीहड़ में छिप जाओ।

हमने माजरा समझने की कोशिश की। हालांकि अब चंबल के गांव में डाकू नहीं आते लेकिन इस गांव में पहले कभी कोई जीप नहीं आई। गांव के लोगों शक था पक्का इस जीप से डाकू ही आ रहे हैं। दिग्विजय भाई ने कहा तुम लोग जाओ हम आने वाली जीप के लोगों से बात करेंगे। हम नहीं डरते।
मेरे मन में भी कुछ आशावादी विचार आए। हमलोग वहीं रहे। जीप हमारे पास पहुंची। जीप के आगे राष्ट्रीय युवा योजना लिखा था। दरअसल वह महात्मा गांधी सेवा आश्रम की जीप थी। गाड़ी में हमारे सचिव रणसिंह परमार, हमारे साथी जय सिंह जादोन और दूसरे गांधीवादी कार्यकर्ता थे। वे हमसे ही मिलने गांव पहुंचे थे। वे हमारे कामकाज की रिपोर्ट लेना चाहते थे। हमलोग बातें करने लगे। गांव में साक्षरता कार्यक्रम के अपने अनुभव बताए। रणसिंह जी ने पूछा गांव के सारे लोग कहां हैं। मैंने कहा अभी पता चल जाएगा। थोड़ा इंतजार करें।
रण सिंह परमार, सचिव, राष्ट्रीय युवा योजना।
इस बीच हमने गांव के लोगों को दूर जाकर आवाज दी..ये डाकू नहीं हैं बल्कि हमारे साथी लोग है जिनकी वजह से हम आपके गांव में पहुंचे हैं। तब जाकर धीरे धीरे गांव के सारे लोग वापस आने लगे। जब रणसिंह परमार भाई साहब को पता  चला कि सारे गांव के लोग जीप आती देख कर डर कर दूर भाग गए थे..तब खूब हंसी हुई। दो घंटे हमारे साथ रहने और हमारे अभियान पर चर्चा के बाद रणसिंह भाई साहब रात में ही अगले पड़ाव के लिए प्रस्थान कर गए।

- vidyutp@gmail.com ( CHAMBAL, SHEOPUR, KIR )

Tuesday, September 25, 2012

हैंडपंप की मरम्मत हुई- गांव में खुशी छाई (26)


(चंबल 26) 
चंबल के बीहड़ों में भू जल स्तर काफी नीचे है। कहीं 300 फीट तो कहीं 400 फीट। इसलिए गांव के लोगों के लिए अपने बूते पर हैंडपंप लगवाना आसान नहीं है। जाहिर है हर घर में हैंडपंप नहीं होता। सरकार बोरिंग करके गांव में एक हैंडपंप लगवा देती है। सारा गांव उसी से पानी निकाल कर अपनी सारी जरूरतें पूरी करता है। 


हमारे कीर का झोपड़ा में भी एक हैंडपंप था लेकिन वह महीनों से खराब पड़ा था। गांव के लोगों ने ठीक कराने के लिए शिकायत दर्ज करा रखी थी। इंतजार की घड़ियां खत्म हुई और एक दिन हैंडपंप रिपेयर करने वाला मिस्त्री गांव में पहुंच भी गया। वह गांव के लोगों के लिए सबसे बड़ा मेहमान था। पहले तो उसके आते ही उसकी खूब खातिर हुई। कुछ घंटे की मेहनत के बाद उसने हैंडपंप ठीक कर दिया। गांव के हैंडपंप से पानी निकल पड़ा। गांव में इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती थी। भला  किलोमीटर दूर से रोज पानी नहीं लाना पड़ेगा। चायना

रज्जो, मांगी लाल, गांव की बहू बेटियां सबके चेहरे पर खुशी की लहर। बच्चे किलकारियां भर रहे थे। महिलाएं हैंडपंप के पास गीत गा रही थीं। हैंडपंप का मैकेनिक सूटेड बूटेड था। नाम कोई रावत था। उसके लिए गांव में भोज का इंतजाम किया गया। गांव के लोगों ने उसे शिकार बनाकर खिलाया। शायद जंगली खरगोश का शिकार। इतना ही नहीं, हैंडंपप का मैकेनिक दिन भर रहा। उसके लिए खट्टे पाणी का भी इंतजाम किया गया। जब वह शाम को जाने लगा तब उसके लिए सारे गांव ने दक्षिणा का इंतजाम किया।

हर घर से कुछ न कुछ नकदी का चढ़ावा हैंडपंप के मेकेनिक के लिए निकाला गया। जाहिर है मैकेनिक गांव से खुश होकर गया। लेकिन गांव के लोगों के साथ खुशियां ज्यादा देर तक टीक कर नहीं रह सकीं। क्योंकि हैंडपंप से पानी निकलना एक दिन बाद भी बंद हो गया। इसके बाद क्या...फिर वही चंबल मैया का आसरा। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

Monday, September 24, 2012

जब गांव में आया एक मेहमान (25)

( चंबल 25)
एक दिन नदी से नहाकर हमलोग लौट रहे थे तभी एक अजीब नजारा देखा। गांव के दो लोग एक व्यक्ति को लेकर आ रहे हैं। सफेद धोती अच्छा सा कुरता पहने चश्मा लगाए व्यक्ति कुछ अलग वेशभूषा में था। गांव के लोग उसे राजसी अंदाज में स्वागत करते हुए ला रहे थे। गांव में आते ही उसके लिए आसंदी लगा दी गई।


पूछने पर पता चला कि वह किसी दूर गांव से आया है। खुद को वह कीरों की बिरादरी का बता रहा था। गांव के लोग उसे बहुत सम्मान की नजर से देख रहे थे। उसके पांव धोए गए। उसके लिए खाने के लिए इंतजाम किया गया।

रात को वह शख्श गांव में ही रुका। सारा गांव उसकी खातिर करता रहा। गांव के लोगों ने बताया कि वह हमारी रिश्तेदारी के गांव का है। उस मेहमान ने गांव के लोगों को जो बताया था उसके मुताबिक बगल के एक कीरों के गांव में एक लड़की देवी मां बन गई है। यानी गांव के ही किसी की बिटिया ने देवी का रूप धर लिया है।

सारे लोग उस देवी मां की पूजा में लगे हैं। वह गांव के लोगों के लिए देवी मां का आशीर्वाद लेकर आया था। इसलिए गांव के लोग उसकी खातिर में लगे थे।

जब हमने गांव के लोगों से जानना चाहा कि क्या आप लोग उस देवी मां के दर्शन करने जाएंगे। तब गांव के लोगों ने कहा नहीं हम जा तो नहीं पाएंगे। लेकिन हम अपने मेहमान को सारे घरों की ओर से चंदा देंगे जो गांव लोगों की ओर से ले जाकर देवी मां को चढ़ा देगा। तब हमने गांव के लोगों से पूछा भला कोई बिटिया देवी कैसे बन सकती है। हमें गांव के लोगों का अंधविश्वास खत्म करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। पर अंत में सफलता मिल गई।

काफी समझाने पर गांव के लोग मान गए कि ये शख्श इन लोगों को रिश्तेदारी के नाम पर बेवकूफ बनाने आया है। मजे की बात कि गांव के लोग उस शख्श को जानते नहीं थे। वह सिर्फ अपनी तरफ से ही रिश्तेदारी का हवाला दे रहा था। हमारे समझाने का असर पड़ा। गांव के लोगों से उस शख्श को कोई चंदा नहीं मिला। अगले दिन गांव के लोगों ने उस मेहमान को अलविदा कह दिया।


- विद्युत प्रकाश मौर्य
  -vidyutp@gmail.com
(GUEST IN VILLAGE, CHAMBAL, KIR KA JHOPDA ) 

Sunday, September 23, 2012

चंबल नदी में घड़ियाल (24)


जैसे गंगा में सोंस ( डॉल्फिन ) पाली गई है उसी तरह चंबल में घड़ियाल। बुंदेलखंड इलाके की धड़कन है चंबल नदी। जो महत्व यूपी बिहार में गंगा का है वही यहां चंबल का। कई इलाके चंबल के इस पार हैं या फिर उस पार। कई जगह चंबल मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा रेखा की तरह। लेकिन चंबल के इस पार और उस पार वालों की बोली और रहन सहन एक जैसा है। इसी चंबल के दोनों तरफ बीहड़ हैं। नदी के दोनों तरफ रहने वाले हजारों गांव के लोगों की जीवन रेखा है चंबल। इसी पानी से नहाना, खाना और पीना। 

बारिश के दिनों में चंबल अपना रौद्र रुप दिखाती है बाकि साल भर लोगों का पालन पोषण करती है। ठीक उसी तरह जैसे मां अपने बेटे को पालती है। जैसे गंगा मैया, नर्मदा मैया वैसे ही चंबल भी मैया।

पूरा बीहड़ चंबल के नाम पर ही जाना जाता है। कभी इन्ही बीहड़ों में डाकू रहते थे। चंबल के डाकू समस्या पर कई फिल्में बनी हैं। चंबल की कसम। चंबल के डाकू आदि। चंबल के डाकू में तो खुद सरेंडर करने वाले डकैत माधो और मोहर सिंह दिखाई दिए थे। 1992 में माधो सिंह इस दुनिया से कूच कर चुके थे पर मोहर सिंह जीवित थे। जौरा आश्रम में मैंने मोहर सिंह को देखा था। बात चंबल नदी की कर रहा था। 


जुलाई अगस्त महीने में चंबल नदी का विस्तार।  फोटो - विद्युत प्रकाश 

तो सरकार ने आजकल चंबल नदी में घड़ियाल पालने का प्रोजेक्ट शुरू कर रखा है। नदी के पानी में घड़ियाल बढ़ गए हैं। सरकारी आदेश है घड़ियालों के शिकार पर पूरी तरह रोक है। चंबल नदी के साफ पानी में कलरव करते हुए घड़ियाल बहुत प्यारे लगते हैं। चंबल नदी के गांव के आसपास के लोग भी इसको लेकर काफी अनुशासित हैं। वे घड़ियाल का शिकार नहीं करते। साथ ही दूसरे लोगों को भी ऐसा करने से रोकते हैं।
चंबल नदी के 435 किलोमीटर के क्षेत्र में घड़ियालमगरमच्छ,  डॉल्फिन और दुलर्भ प्रजाति के कछुए हैं। भिंड जिले में सेंक्चुरी का कुल एरिया करीब 100 किलोमीटर और मुरैना जिले में 200 किलोमीटर का एरिया है जहां घड़ियाल संरक्षित किए गए हैं। 


-विद्युत प्रकाश मौर्य    
((CROCODILE, CHAMBAL RIVER, MADHYA PRADESH ) 

Saturday, September 22, 2012

लडू बवंडर और तरबूज (23)

( चंबल 23) 
लडू बवंडर। यही नाम गांव के लोगों ने हमें उसका बताया था। लडू के साथ बवंडर क्यों। शायद वह जब भी आते हैं वबंडर की तरह। वे चंबल के उस पार राजस्थान में रहते हैं। लडु रामनाथ के साले हैं। शायद इसलिए गांव के लोग मजाक में उनके साथ बवंडर शब्द जोड़ देते हों। हमारे कीर का झोपड़ा प्रवास के दौरान उनका आना हुआ। पहली बार हमें पता चला कि गांव में कोई कुछ बेचने आया है।

जब चिलचिलाती दुपहरिया में हमलोग नहा कर लौटे तो गांव के लोगोंने बताया कि लडू आए हैं। लडु अपने साथ लेकर आए थे ढेर सारे तरबूज। चंबल नदी के किनारे उस पार होने वाली तरबूज। बड़ी सी राजस्थानी पगड़ी बांधे लडु खाट पर बैठे थे। गांव के बच्चे सौदा कर उनसे तरबूज खरीद कर खा रहे थे। ये कोई रुपये देकर खरीद नहीं हो रही थी। बल्कि बाटर सिस्टम था। यानी तरबूज के बदले में सरसों।


हमने भी एक तरबूज खऱीदी। नकद पैसे देकर और जमकर खाया। 44 डिग्री के तापमान पर न बिजली न पंखे...और अगर ऐसे में तरबूज खाने को मिल जाए तो इससे बड़ी राहत और क्या हो सकती है। खाने के बाद लडु से पूछा ये तरबूज लेकर आए कैसे। उन्होंने बताया कि वे चंबल दरिया में इन तरबूजों को एक दूसरे से बांध कर पानी में तैरा देते हैं। इसके बाद सारे तरबूजों को धक्का देते हुए उस पार से इस पार लेकर आ जाते हैं।

तरबूजों के साथ वे भी चंबल नदी को पार कर जाते हैं। तब हमें पता चला कि सालों भर चंबल नदी में पानी ज्यादा नहीं होता। बारिश के बाद के दिनों में पानी कमर तक ही होता है। कई जगह नदी को पैदल पार किया जा सकता है। तो इस तरह तरबूज पहुंचे थे हमारे गांव तक। हालांकि लडू बवंडर ने बताया कि चंबल को पार करने में घड़ियाल का खतरा है, क्योंकि चंबल नदी में घड़ियाल पाले गए हैं।

-    -----  विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
(  ( WATERMELON, CHAMBAL, RIVER, LADDOO BAWANDAR)  
(

चंबल का सफरनामा शुरुआत से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 

Friday, September 21, 2012

रामनाथ की बनाई मछली का यादगार स्वाद (22)

( चंबल 22) 
एक दिन कीर का झोपड़ा गांव में हमें मछली खाने को मिली। वह हमारे लिए यादगार दिन था। गांव में सबसे अच्छी मछली रामनाथ बनाते हैं। गोया गांव की औरतें तो शाकाहारी हैं। वे मछली नहीं बनातीं। घर की रसोई में भी नहीं बनती। घर के बाहर मांसाहारी चूल्हा जलता है। रामनाथ खुद चंबल नदी गए और नदी में जाल फेंक कर मछली पकड़कर लाए। इसके बाद मछली को काटने से लेकर मसाले तैयार करने और आगे का सारा काम रामनाथ ने खुद अंजाम दिया। वो कौन सी मछली थी मुझे याद नहीं। लेकिन उस दिन हमने और दिग्विजय ने छक कर मछली को उदरस्थ किया। खाने के बाद मैंने मछली बनाने की तारीफ की। वाकई वैसी सुस्वादु मछली मैंने पहले कभी नहीं खाई थी। आगे भी कभी नहीं मिली।
रामनाथ ने मछली की तारीफ सुनकर कहा, हां मास्टर मछली तो अच्छी बननी ही थी। मैंने उसमें आधा किलो सरसों तेल जो पटका था। इस इलाके में सरसों की खेती होती है। सो गांव में शुद्ध सरसों का तेल उपलब्ध है। तो लोग तेल पटकने में कोताही नहीं बरतते।

हर रोज की नमक रोटी से हटकर एक दिन कुछ अलग खाने को मिला। एक दिन की और बात है। रामकरण हमारे पास आया बोला मास्टर हमारे घर चावल बना है खाओगे। हमने कहा हां खा लेंगे। चवाल बनाना उन लोगों के लिए किसी शाही भोजन की तरह था।
बाबा देवपुरी के स्थान पर मिल्क केक की दुकानें। ( मुरैना-धौलपुर रोड) 


जब हमारे पास एक कटोरी में चावल आया तो उसमें चीनी और दूध भी डाल दिया था। वह खाने में कुछ अजीब सा हो गया था। लेकिन गांव के लोग कभी कभी चावल खाते हैं तो वे उसके कुछ लक्जरी वाले तरीके से खाते हैं। ये खीर नहीं है लेकिन कुछ कुछ खीर से मिलता जुलता भी है। कीर का झोपड़ा में दो शाम मछली और चावल बदलाव के दिन थे। बाकी दिन तो फिर से हमारा वही मीनू था। और क्या नमक रोटी और करील का अचार जिंदाबाद।
  

Thursday, September 20, 2012

रामकरण की वो बहकी बहकी बातें (21)

( चंबल 21)
गांव का सबसे रोमांटिक चरित्र है रामकरण। लेकिन कोई उसे असली नाम से नहीं बुलाता। गांव लोग उसे करना कहकर बुलाते हैं। गांव का सबसे मस्त आदमी। जबभी हमसे मिलता है बहकी बहकी बातें करता है। नारी सौंदर्य की और उनके साहचर्य की बातें सुनाता है। अपनी लुगाई के साथ बीते नीशीथ वेला में हुए काम केलि के प्रसंगों को स्थानीय भाषा में रस लेकर हमें सुनाता है। इसके बाद हमें सलाह देता है। क्यों पढ़ाने लिखाने में लगे हो तुम भी शादी कर लो और मौज करो।

हम भोलेपन से कहते हैं तुम्ही करा दो हमारी शादी। तब वह कहता है हमारी जात नहीं है तुम्हारी उमर की कोई कुआंरी लड़की। तुम्हारे लिए तो मीणाओं में या बनजारों की बस्ती से कोई लड़की ढूंढनी पड़ेगी। वहीं कोई सुघर लड़की देखी जाएगी।

करना अक्सर कहेगा। हमारे साथ चलो बनजारों की बस्ती में। वहां तुम्हें देशी दारू पिलाएंगे। हम पूछते हैं तुम दारू क्यों पीते हो। वह बोलता है साब दारू पीने के बाद खूब आनंद आवे है। उसके बाद हम घर जाकर अपनी लुगाई को खूब पीटे हैं...करना तुम दारू पीकर अपनी लुगाई को पीटते हो...हम किसको पीटेंगे...तब करना कहता है देखो मास्टर अगली बार गांव आना तो अपनी लुगाई को भी अपने साथ लेकर ही आना।

खट्टा पाणी मतलब क्या... गांव के लोग दारू को खट्टा पाणी कहते हैं। एक बार गांव के एक बुजुर्ग ने मुझसे पूछ दिया खट्टो पाणी पीते हो...हमने समझा इसका मतलब होता होगा नींबू पानी। मैंने ना समझी में हां कर दी। बाद में जब हमें और दिग्विजय भाई को इसका मतलब समझ में आया तब हमने अपनी गलती सुधारी। हमने कहां नहीं हम तो इसके खिलाफ लोगों को समझाने की कोशिश में लगे हैं कि शराब बुरी चीज होती है। यह पूरा घर बरबाद कर देती है। लेकिन गांव के लोगों को इतने कम समय में हम शराब के खिलाफ कम ही समझा सके।

-    ----  विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
(( CHAMBAL, RAMKARAN, WINE, DIGVIJAY SINGH )

-     चंबल संस्मरण को शुरुआत से पढ़ने के लिए यहां पहुंचे। 

Wednesday, September 19, 2012

अगले साल होगी रज्जो की शादी (20)

( चंबल 20)  रज्जो चायना के उम्र की ही है। चायना की प्रिय सहेली है लेकिन आजकल कुछ अनबन चल रही है। उम्र दस साल की है लेकिन रज्जो की शादी तय हो गई है। गांव के ही 12 साल के बच्चे मांगी से। अगले साल रज्जो की शादी होगी। फिर तीन या पांच साल बाद गवना भी हो जाएगा। तभी जब कभी मांगी नजर आता है रज्जो उससे थोड़ा दूर ही रहती है। अपने होने वाले पति से शर्माती जो है... मुझे अपनी यूनिवर्सिटी याद आती है जहां एमए में पढ़ने वाली लड़कियां बेतकल्लुफ होकर आइसक्रीम खाते हुए प्लान बनाती हैं चलो कोई मूवी देख आते हैं। इस उम्र में आते आते यहां की लड़कियां तो कई बच्चों की मां बन जाती हैं। शरत के उपन्यास के पात्रों की तरह गांव की लड़कियां 13 से 14 साल की होते होते सिर्फ चूल्हा चौका ही नहीं पूरा घर संभालने लगती हैं। गांव की लड़कियों में बचपना नहीं नजर आता। अभी उम्र खेलने कूदने की है लेकिन इस उम्र में वे घर की जिम्मेवारी में हाथ बंटाने लगती हैं। वे अपना दायित्व खूब समझती हैं।


चंबल नदी की ओर आते जाते गांव की औरते मुझसे पूछती हैं..हुरे मास्टर तुम्हारी उमर का होवेगी..मैं कहता हूं 19 साल । दिग्विजय नाथ से भी पूछती हैं वे बताते हैं 22 साल। तुम्हारी शादी हो गई...हम जवाब देते हैं नहीं। तब वे कहतीं हैं तो अभी तक तुम रंडुवे ढोल हो....कब होवेगी तुम्हारी शादी...हम बताते हैं कि यही कोई पांच सात साल बाद। तब वे बोलती हैं कि हुरे मां...तब तक तो तुम लोग बूढ़े हो जाओगे। गांव में 20 साल का हो जाने पर शादी नहीं होना अचरज की बात है।

वास्तव में गांव का सबसे उम्र दराज बैचलर काडु ही है। काडु की उम्र 18 साल  हो गई है। गांव के लोगों के मुताबिक उसकी शादी कब की हो जानी चाहिए थी। इसलिए गांव की सारी भाभियां काडु को चिढ़ाती हैं। वैसे पूरी तैयारी है, अगले लगन में काडु के भी फेरे लग ही जाएंगे।

-  ------  विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
(( KIR KA JHOPDA, BAGADIA, CHAMBAL, RAJJOO, SHADI ) 
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Tuesday, September 18, 2012

मांगीलाल की पांच गज की पगड़ी (19)

( चंबल 19) 
एक दिन मांगीलाल से मैंने पूछा इतनी गर्मी में आप लोग सिर पर पांच गज की पगड़ी कैसे बांधे रहते हो। उसने तुरंत सवाल किया तुम कुरता क्यों पहनते हो। बाद में हमे एहसास हुआ पगड़ी उनकी प्रतिष्ठा का सूचक है। चिलचिलाती गर्मी हो, भले ही बदन पर कोई कपड़ा न हो...पांव में कोई चप्पल या जूते न हो...लेकिन सिर पर पांच गज की रंग-बिरंगी पगड़ी जरूर होती है। ये पगड़ी न सिर्फ आचार व्यवहार संस्कारों से जुड़ी है बल्कि ये गर्मी से बचाती भी है। संकट में कई और काम भी आ सकती है। भले ही ये इलाका मध्य प्रदेश में पड़ता है पर कीर के झोपड़ा में रहने वालों पर प्रभाव है राजस्थानी संस्कृति का।

गांव के सारे बुजुर्ग लोग पगड़ी जरुर पहनते हैं। बच्चे थोड़े बड़े होते ही धोती बांधने लग जाते हैं। तो महिलाएं साडी पहनती हैं। वे गांव में घूंघट नहीं काढ़तीं। लड़कियां ज्यादा तरह लहंगा, कब्जा ( चोली) और चुनरी में दिखाई देती हैं।

दांतों में लगाते हैं सोना 
गांव की महिलाओं को सोने से गजब का लगाव है। सोने से लगाव पुरूषों को भी है। लेकिन गांव के लोग सोने के गहने कम ही बनवाते हैं। सरसों बेचने के बाद नकदी मिलती है। इस नकदी से सोना लगवाते हैं दांतों में। जी हां दांतों में सोना। सुनार खास किस्म के सोने के तार तैयार करता है और उन्हें दांतों में टांक देता है। 

गांव के लोगों को तर्क है कि दांत में सोना लगवाने से कोई उन्हे चुरा नहीं सकता। ये सोना हमेशा हमारे साथ रहता है। गांव की तमाम महिलाओं के अलावा कई पुरूष भी सोना लगवाए दिखाई दिए दांतो में। क्या दांतों में सोना लगवाने से दांतों की सफाई में कोई परेशानी नहीं होती। गांव वालों का तर्क था कोई परेशानी नहीं होती। जब किसी का देहांत होता है तब क्या करते हैं। क्या दांतों में लगा हुआ सोना निकाल लेते हैं। हां इतना महंगा सोना निकाल ही लेते होंगे।
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---- विद्युत प्रकाश मौर्य   
(( CHAMBAL, MANGILAL, TURBAN, GOLD ) 

Monday, September 17, 2012

चायना के पिता मांगीलाल (18)

( चंबल 18) 
मांगीलाल चायना के पिता हैं वे गांव के एकमात्र साक्षर हैं। इतने साक्षर की उनके सामने हमारी पढ़ाई जीरो। मांगीलाल ने मुंह से आवाज निकाली कुछ इस तरह ट्टटटटट...इसको लिखकर दिखाओ। ठीक ठीक इसे शब्दों में लिखना मुश्किल था। मैंने कहा हां ये लिखना तो मुश्किल ही है।

मांगीलाल ने पहले दिन हमें बाटी और दाल बनाकर खिलाई। खाना बनाने में उसकी दस साल की बेटी चायना मदद करती है। चायना रोज जंगल जाती है लाकड़ी ( लकड़ी) काट कर लाने के लिए। इसी लकड़ी से जलता है घर का चूल्हा। नहाने जाती है तब खड़ेदे में कुशल तैराक की तरह तैरती है। उसका बड़ा भाई उसे बिना बात के पिटता है। तब हम बड़े भाई को पकड़कर पानी में डुबोने की कोशिश करते हैं। चायना भाई के लिए भाव विह्वल होकर कहती है...छोड़ दो..मर जाएगा।


बीहड़ के उबड़ खाबड़ रास्ते में जहां मुझे ठीक से चलने में परेशानी होती है। चायना सिर पर मिट्टी के पानी भरे तीन घड़ेभरकर गुनगुनाती हुई घर की राह पर चल पड़ती है। हम मजाक में कहते हैं कि हमलोग चायना को अपने साथ ले जाएंगे। ये बात सुनकर हमेशा हमारे आसपास रहने वाली चायना हमसे दूर भागने लगती है। उसे शक होता है कि हम सचमुच उसे शहर ले जाएंगे। मांगीलाल जल्द ही अपनी दस साल की सलोनी बेटी की शादी की बात सोच रहा है। परंतु चायना अपने पिता को छोड़कर जाना नहीं चाहती।

एक दिन बड़ी प्रसन्नता से चायना हमें बक्सा खोलकर गोट पट्टा लगी हुई चुनरी दिखाती है। इस चुनरी को वह खास मौकों पर डालती है। क्या पता चायना ऐसी ही चुनरी में कुछ महीनों बाद दुल्हन बन जाएगी।
 हमारे गांव जाने के दिन चायना हमारे सामने नहीं आई। उसे डर था कि कहीं फिर हम उसे शहर ले जाने की बात न कर दें। या फिर उसे हमारे गांव छोड़ने का दुख था...

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------विद्युत प्रकाश मौर्य   
((KIR KA JHOPDA, BAGADIA, CHAMBAL, MP ) 
  

Sunday, September 16, 2012

लुगाइयां पढ़ गई तो रोटी कौन बनाएगा ( 17)


कीर का झोपड़ा में हमारी क्लास में सिर्फ मर्द की पढ़ने आते हैं। हमने काफी कोशिश की, गांव की महिलाएं भी पढ़े। आते-जाते गांव की महिलाएं हमसे बात करतीं. वे चाहतीथीं कि उनकी भी पढ़ाई हो। लेकिन गांव के मर्दों का उनपर दबाव था। वे कहते थे..लुगाइयां पढ़ गईं तो रोटी कौन बनाएगा। हमने उनको काफी समझाने की कोशिश की। आजकल दुनिया में महिलाएं कहां से कहां पहुंच गई हैं लेकिन इसका गांव वालों में कोई असर नहीं पड़ा।

हालांकि गांव के लोग इतने गरीब नहीं हैं कि भूखमरी का संकट हो लेकिन। गांव में किसी का बैंक खाता नहीं है। गांव के लोगों ने पोस्टआफिस का लाल डिब्बा नहीं देखा। गांव में कभी कोई खत नहीं आता। दिल्ली तो दूर गांव के कुछ ही लोगों ने ग्वालियर का नाम सुन रखा है। आसपास के राजस्थान के कुछ शहरों का नाम जरूर जानते हैं। गांव का कोई आदमी कभी किसी बड़े शहर नहीं गया। पास के कस्बाई बाजार से अपनी जरूरत की सारी चीजें खरीद लाते हैं। यानी एक ऐसा गांव जो बाकी दुनिया से काफी अलग है। इनकी अपनी अलग ही दुनिया है। कई मायनो में ये अच्छा भी हो सकता है। लेकिन हमारे जेहन में आता है कि हिंदुस्तान में कीर का झोपड़ा जैसे हजारों गांव होंगे।
गांव के लोग थानेदार वकील और कलेक्टर के अलावा किसी सरकारी महकमे के अधिकारी को नहीं जानते। हमने सुना गांव में कभी कोई नेता वोट मांगने भी नहीं पहुंचा। स्थानीय नेता जिस चुनाव चिन्ह पर वोट डालने को कहते ये लोग वहीं मुहर लगा देते हैं। जाहिर हैं सरकार भले ही विकास के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही हो लेकिन गांव में विकास की किरण नहीं पहुंची।
कवि दुश्यंत याद आते हैं –
यहां आते आते सूख जाती हैं सब नदियां..
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।
हालांकि इस गांव के लोगों को सरकार से कोई शिकायत नहीं है।

- vidyutp@gmail.com

(CHAMBAL, FOOD, BREAD, FEMALE EDUCATION ) 

Saturday, September 15, 2012

और शुरू हो गई हमारी क्लास (16)


गांव में पहुंचने के अगले दिन से ही हमारी क्लास लगनी शुरू हो गई। सुबह आठ बजे से 10 बजे तक दो घंटे की क्लास। इसके बाद सूर्य भगवान का कोप बढ़ जाता था और हम चल पड़ते थे चंबल नदी में नहाने। लौटने के बाद रोटी खाना। उसके बाद कुछ घंटे आराम। पेड़ के नीचे बिना बेडशीट वाली खाट पर सोना। शाम को तीन बजते ही फिर शुरू हो जाती थी हमारी दो घंटे की क्लास। क्लास के बाद गांव के लोगों के लिए नए नए तरह के खेल। इसके बाद एक बार फिर नहाने के लिए चंबल नदी में प्रस्थान। गांव में बिजली नहीं है इसलिए रात में क्लास लगाना मुश्किल था। जल्दी से शाम का खाना खाना और चांदनी रात में आसमान के नीचे खाट लगाकर सो जाना।

संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम लोगों को अक्षर ज्ञान कराने के लिए हमें साक्षरता कीट प्रदान की गई थी। पढ़ाने की तकनीक बहुत वैज्ञानिक थी। छोटे समय में निरक्षर लोगों को अक्षर ज्ञान कराया जा सकता है। उन्हें मामूली पढ़ना। हस्ताक्षर करना और गिनती आदि सिखाई जा सकती है।

हमारी क्लास में 10-12 साल के बच्चों से लेकर 60 साल के बुजुर्ग तक आ रहे थे। नौजवानों में पढ़ाई को लेकर खासा जोश था। वे बच्चों की तरह क्लास में चिल्ला चिल्ला कर अभ्यास करते थे। दूर खड़ी उनकी लुगाइयां क्लास देखकर हंसती थीं। लेकिन छात्रों में उत्साह था। कुछ नहीं समझ में आने पर वे तुरंत पूछते थे- हुरे मास्टर इ काईं हई....( मास्टर ये क्या है ) हम लोग भी अपनी क्लास से उत्साहित थे। दिग्विजय नाथ सिंह क्लास के बाद गीत कराते थे। साक्षरता गान में लोगों को पढ़ाई का महत्व समझाया जाता था।
भाई का प्यारा – पढ़ा लिखा
लुगाई का प्यारा – पढ़ा लिखा
पूरे गांव का प्यारा – पढ़ा लिखा।
गांव के लोग समझ गए कि अक्षर ज्ञान हो जाने के बहुत से फायदे हैं।

- - विद्युत प्रकाश मौर्य  ( KIR KA JHOPDA, CLASS, STUDY ) 

Friday, September 14, 2012

और नहीं मिली हमें चाय (15)

साक्षरता स्वंयसेवक के तौर पर ये तय था कि हमारे खाने पीने का इंतजाम गांव के लोग करेंगे और हम गांव में पढ़ाएंगे। पर कीर का झोपड़ा गांव के लोग काफी गरीब थे। इसलिए हमें कार्यक्रम समन्वयक की ओर से सलाह दी गई थी कि आप हर दिन अलग अलग घरों में भोजन करेंगे जिससे एक ही परिवार पर बोझ न पड़े। कीर का झोपड़ा गांव में कोई मुखिया नहीं था। हम पहले दिन काडु के घर मेहमान थे। दो दिन काडु के पिता मांगीलाल और उनकी बेटी चायना ही हमें रोटी खिलाते रहे।

 जब हमें इसका पता चला तो हमने समझाया कि हम पूरे गांव के अलग अलग घरों में खाएंगे। लेकिन मांगीलाल का हमसे ऐसा स्नेह था कि वह बोला – नहीं मास्टर हम ही तुम्हे महीने भर खिलाएंगे। तब हमने और दिग्विजय भाई ने मिलकर तय किया कि हमलोग खुद अलग अलग घरों में अपना भोजन तय करेंगे। हर रोज अपनी क्लास में हम अपने प्रौढ़ छात्रों से तय कर देते थे कि अगले दो दिन या एक दिन का खाना आपके घर होगा। और किसी दिन भूल गए तो किसी भी घर में हमारी रोटी नहीं बनी।

एक दिन गांव में राजेंद्र भाई आए। उन्होंने पूछा आप लोग शहर से आए हो तो रोजाना चाय पीने की आदत होगी। उन्होंने हमारे लिए दो किलो चीनी और चाय पत्ती भिजवा दी ताकि हमें चाय मिल सके। गांव में एक घर में चीनी रखवा दी गई। गांव में बकरी का दूध मिल जाता था। इसलिए चाय बनाना आसान था। दो दिन हमें चाय तो मिली। पर तीसरे दिन से चाय मिलनी बंद हो गई।
चीनी से मेहमानों के लिए खीर बना दी - तब हमने मेजबान से पूछा- भाई चाय क्यों नहीं बनी। मेजबान बोला- घर में मेहमान आ गए थे सो सारी चीनी उन्हें खीर बनाकर खिलाने में खत्म हो गई। इसके बाद के दिनों में हमारी चाय के लाले पड़ गए। खैर हम चाय के इतने तलबगार भी नहीं थे सो हमारा दिन आराम से गुजरता गया।

Thursday, September 13, 2012

खाने में नमक रोटी और अचार (14)

सुबह हो या शाम कीर के झोपड़ा में हमारे रोज के खाने का एक ही मीनू होता था। सूखी रोटी उसके साथ नमक या फिर करील का अचार। और कोई विकल्प ही नहीं था जो मिले उसे भगवान के नाम पर जीमना था। गांव में हरी सब्जियों की खेती नहीं होती थी। बाजार बहुत दूर था। सारे गांव के लोगों का यही खाना था। हम सुबह दो रोटियां खाते थे शाम को भी दो रोटियां। बस इतने से ही पेट भर जाता था। हां महज दो रोटियां। भाई रोटियां मोटी-मोटी होती थीं।

गेहूं, चना और जौ की रोटियां - एक दो दिन खाने के बाद हमने जानना चाहा कि ये रोटियां बनती कैसे हैं। दरअसल ये रोटियां तवे में नहीं बनती थीं। इन्हें पकाया जाता था लोहे की कड़ाही में। रोटी का आटा तैयार होता था गेहूं, चना और जौ के आटे के बराबर बराबर मिश्रण से। इसलिए बाद में पता चला कि ये रोटी खाना पौष्टिकता के लिहाज से तो सही है। तभी तो एक महीने बाद जब मैं गांव से निकला तो वाराणसी पहुंचने के बाद पता चला कि मेरा वजन घटने के बजाय दो किलो बढ़ चुका था। हां 54 किलो से हम बढ़कर 56 किलोग्राम के हो गए थे। दोस्तों ने कहा कि यह गांव वालों से मिले प्रेम और आपकी संतुष्टि का परिणाम है।

तो रोटियों के साथ खाने के लिए सब्जी नहीं होती थी। इसके साथ स्वाद के लिए मिलता था नमक। सिर्फ नमक और रोटी। निवाला गटकना थोड़ा मुश्किल जरूर होता था लेकिन धीरे धीरे आदत सी पड़ गई। हां कभी कभी इसके साथ अचार मिल जाता था। वह अचार होता था करील का। करील को एक तीखा फल माना जाता था। पर तब हमें वह भी काफी भला लगता था स्वाद में। 

कभी कभी रोटी के साथ कोई घर वाला अचार भी दे देता था। ये अचार होता था करील का। चंबल में पाया जाने वाला एक जंगली फल। पहले से ही थोड़ा कड़वा होता है। ग्वालियर से छपने वाले एक समाचार पत्र ने हमारे बारे में चार कालम खबर छापी- चंबल की वादियों में नमक और रोटी खाकर शिक्षा का अलख जगा रहे हैं दो नौजवान...विद्युत प्रकाश मौर्य और दिग्विजय नाथ सिंह। हमें ये खबर पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ।
 विद्युत प्रकाश मौर्य
(CHAMBAL, ROTI, SALT, BREAD, KIR KA JHOPDA ) 

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