Sunday, May 18, 2014

एक बार फिर काशी की धरती पर..

छह साल बाद बनारस जाना हुआ। वही बनारस जहां मैंने छह साल पढ़ाई की। जिंदगी का अब तक का सबसे लंबा वक्त गुजारा है। वैसे तो बनारस वह शहर है जिसपर 300 से ज्यादा किताबें लिखी गई हैं। लेकिन बनारस की फिंजा में कुछ ऐसी मस्ती घुली है कि वहां बार बार जाने का जी करता है। बार बार में सोचता हूं कि जिंदगी आखिरी वक्त मैं वहीं गुजारूंगा। उन्ही बनारस की गलियों में। शादी के बाद से पत्नी को बार बार कहता था कि कभी हम बनारस चलेंगे लेकिन पूरा देश घूमते घूमते कभी बनारस जाने का सुयोग ही नहीं बन रहा था। सो इस बार तय किया कि बार बार सीधे पटना चले जाते हैं। इस बार तो बनारस रूकने के बाद ही आगे की यात्रा होगी। 

दिल्ली से वाराणसी का हमारा सफर शुरू ही नई ट्रेन दिल्ली वाराणसी गरीब रथ के साथ। वाराणसी गरीब रथ दूसरी गरीब रथ से भी एडवांस है। इसके हर कोच में इलेक्ट्रानिक डिस्पले लगा है जो रेलगाडी की स्पीड आने वाले स्टेशन का नाम, स्टेशन की कितनी दूरी रह गई है। सब कुछ बताता है। यानी यात्रियों की सारी जिज्ञासा शांत करता है। आपको बार बार खिड़की से बाहर देखने की जरूरत नहीं कि कौन सा स्टेशन आ गया या आने वाला है। यह एक नई व्वस्था है जो बड़ी अच्छी लगी।

दशाश्वमेध घाट पर साधु बाबा 
खैर गरीब रथ वाराणसी में सुबह नौ बजे पहुंचती है। मैं पहली बार वाराणसी में एक टूरिस्ट के रूप में था। वैसे टूरिस्ट के रूप में जो छह साल वहां गुजार चुका है। फर्क इतना है कि वाराणसी जो भी पहली बार जाए उसके ठगे जाने की प्रबल संभावना रहती है। लेकिन मुझे वाराणसी के भूगोल का खूब पता था। समय कम था इसलिए मैं अपने दोस्तों से शहर में नहीं मिल कर, सिर्फ अपने चार साल के बेटे को शहर दिखाना चाहता था। सो हम स्टेशन से सीधे गोदौलिया चौराहा गए। यहां पर है जैयपरिया निवास अतिथि गृह। पर वहां नो रूम के हालात थे। पास में होटल मिला आराम। बड़ादेव में। स्नानादि से निवृत होने के बाद सबसे पहले हमलोग विश्ननाथ मंदिर की ओर चले।
बताते चलें कि वाराणसी में दो विश्वनाथ मंदिर हैं एक नया एक पुराना। पुराना मंदिर गंगा तट के पास दशाश्वमेध घाट के निकट है। आतंकी हमले के बाद अब काशी विश्ननाथ मंदिर के आसपास सुरक्षा बहुत बढ गई है। 



पुराने विश्वनाथ मंदिर का प्रवेश द्वार 
गोदौलिया चौराहा से जब आप दशाश्वमेध घाट की ओर बढ़ते हैं तो विश्ननाथ मंदिर का गेट आता है। प्रशासन ने अब यहां पर एक द्वार बनवा दिया है और यहीं से शुरू हो जाती है मंदिर की सुरक्षा चेकिंग। विश्ननाथ गली में बहुत अच्छा सा बाजार है। जो देश भऱ से आने वाले लोगो को लुभाता है। अब मंदिर में मोबाइल फोन ले जाने पर भी पाबंदी है। दुकानदार लाकरों में मोबाइल जमा हो जाता है। विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए सालों भर भीड़ होती है। यहां देश के हर कोने से श्रद्धालु आते हैं लेकिन दक्षिण भारत के लोग कुछ ज्यादा ही आते हैं। आजकल विश्वनाथ मंदिर के आंतरिक सौंदर्यीकरण का काम तेजी से चल रहा है। कई बार पहले भी मैं विश्वनाथ मंदिर गया हूं। लेकिन मैंने पाया कि यहां उत्तर से ज्यादा दक्षिण भारत के लोग आ रहे हैं। 
विश्वनाथ मंदिर के ठीक बगल में मां अन्नपूर्णा का मंदिर है। कहा जाता है कि काशी में मां अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से कोई भी भूखा नहीं सोता है। मां अन्नपूर्णा के मंदिर में दक्षिण भारत के लोग अन्न क्षेत्र भी चलाते हैं। यहां आप लंगर जीम सकते हैं। दश्वाश्वमेध घाट के पास रहने का एक खास कारण था। बनारस की सुबह को निहारने की इच्छा। अगले दिन सुबह सुबह सुबह हमलोग दशाश्मेध घाट पर गए। काशी में गंगाजी उत्तरायण बहती हैं। सो सूरज की पहली किरण आकर घाट पर पड़ती है। स्नान करने वालों की भीड़। मुंडन कराने वाले श्रद्धालु। छतरियां लगाए पंडा। दशाश्वमेध घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, प्रह्ललाद घाट, मीर घाट ये सब मिल कर बनारस की सुबह की एक अनुपम छटा बनाते हैं। 


तत्कालीन वीसी डा. आरपी रस्तोगी के साथ कोचीन हाउस में। ( 1992 )


वही बनारस की सुबह जिस पर कवियों साहित्यकारों ने काफी कुछ लिखा है। लेकिन मुझे तो दशाश्वमेध घाट की शाम भी खूब भाती है। जब मैं अनिर्णयकी स्थिति में होता हूं तो इन्हीं घाटों पर बैठकर घंटो सोचता हूं। उसके बाद जो अंदर आवाज आती है वही फैसला ले लेता हूं। फैसला हमेशा सही होता है। मई मे गर्मी बुहत थी। सो दशाश्वमेध घाट पर देर रात तक बैठने का भी अपना अलग आनंद है। छिटकती चांदनी आकर इन घाटों पर पड़ती है। नाव वाले आकर नौका विहार करने के लिए मनुहार करते हैं। बनारस में गंगा नदी में बैठकर नाव से शहर को निहारने का अपना अलग आनंद है। लेकिन हमारे चार साल वंश वर्धन ने नाव पर जाने से साफ इनकार कर दिया। सो हमें भी नौका विहार का इरादा त्यागना पड़ा। 
पुराने विश्वनाथ मंदिर के आसपास दक्षिण भारतीय खाना खूब मिलता है। वही दक्षिण की तरह ही सस्ता । यानी की पांच रूपये मे दो इडली। पंद्रह रूपये में मशाला डोसा। कदाचित यह दक्षिण भारतीय सैलानियों क ज्यादा आगमन के कारण हो। 



खैर वाराणसी में एक नया विश्वनाथ मंदिर भी है। यह काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में हैं। 25 एकड़ में फैले मंदिर का गुंबद 252 फीट ऊंचा है। न सिर्फ बीएचयू में पढ़ने वाले छात्र बल्कि देश भर से आने वाले सैलानियों को भी यह मंदिर खूब पसंद आता है। मंदिर के बाहर एक दुकान है समोसे की। यहां आज भी दो रूपये में समोसा मिलता है। बनारस की दूसरी प्रसिद्ध मिठाई है लौंगलता जो हर चौक चौराहे पर मिलती है। कई साल बाद मैंने फिर से समोसा और लौंगलता का लुत्फ उठाया। 
बीएचयू के सामजिक विज्ञान संकाय में आखिरी दिनों की एक तस्वीर। ( 1995 )

बीएचयू की सड़कों पर घूमते हुए मैंने अपने चार साल के नौनिहाल को यह बताया कि यही वह स्कूल है जहां मैंने पांच साल पढ़ाई की। बेटा बोला- वाह, पापा आपका स्कूल तो बहुत सुंदर है। यहां तो हरियाली भी खूब है। शाम ढल रही थी सारे विभाग बंद थे, लेकिन एक बार फिर मैं उस समाजिक विज्ञान संकाय के चौखट तक गया जहां पांच साल की सैकड़ो खट्टी मीठी स्मृतियां जुड़ी हैं। मैत्री जलपान गृह की वह टेबल जहां कभी मैं अपने से दो साल सीनियर रहे मनोज तिवारी जो अब भोजपुरी फिल्मों के बड़े स्टार और गायक हैं, से आग्रह कर गीत सुना करता था। सब कुछ वैसा ही था। हमारी उम्र धीरे-धीरे बढती जा रही है। जवानी की उच्चश्रंखलताएं कम होती जा रही हैं, लेकिन ऐसा लगता है मानो बीएचयू अभी उसी तरह जवान है।
 वो पुल वो पुलिया.. वो मधुबन..वो कैफेटेरिया की टेबलें उसी तरह जवान है। बस वहां चेहरे हर साल बदल जाते हैं। पीढ़ियां बदल जाती हैं। 4फरवरी 1916 को स्थापित इस ज्ञान के मंदिर में हर साल कुछ नया जुड़ता है लेकिन पुरानी चीजें सब कुछ वैसी ही हैं....

-विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com  ( 2009 में वाराणसी में)
UTTAR PRADESH, BHU, VISHWANTH TEMPLE, MADHUBAN, SOCIAL SCIENCE )

No comments:

Post a Comment