Thursday, August 9, 2012

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे- 17 स्टेशनों का सफर ((02 ))

तीनधारा रोगंटांग के बीच गुजरती डीएचआर। 
दार्जिलिंग हिमालयन रेल का सफर शुरू होता है न्यू जलपाईगुडी शहर से। तो चलें आगे के सफर पर...
1. न्यू जलपाइगुड़ी बड़ी लाइन का बड़ा रेलवे स्टेशन है। पहले खिलौना ट्रेन का सफऱ सिलीगुड़ी टाउन तक ही था लेकिन टॉय ट्रेन को बड़ी लाइन से जोडने के लिए 1964 में छह किलोमीटर लाइन का विस्तार एनजेपी स्टेशन तक किया गया। इससे नई दिल्ली और असम से आने वाली ट्रेनों का टॉय ट्रेन से संपर्क जुड़ गया।  न्यू जलपाईगुड़ी वह स्टेशन है जहां ब्राडगेज और नैरोगेज ( 2 फीट) की लाइनों को एक साथ देखा जा सकता है।

2. सिलुगुडी टाउन – अब खिलौना ट्रेन का दूसरा स्टेशन है।  एनजेपी तक विस्तार से पहले तक ये पहला रेलवे स्टेशन हुआ करता था।
3. सिलिगुडी़ जंक्शन – तीसरा रेलवे स्टेशन मैदान इलाके में ही यहां रहती है खिलौना ट्रेन।
4. सुकना – 161 मीटर की ऊंचाई पर दार्जिंलिंग जिले की सीमा आरंभ होने के साथ ही यहां से पहाड़ी सफर की शुरूआत हो जाती है। हरे भरे चाय के बगानों के साथ मौसम बदलने लगता है।

5. रोंगटांग – 440 मीटर की ऊंचाई पर सुकना के बाद स्टेशन जहां आपको ट्रेन पहाड़ों के साथ अटखेलियां करती नजर आती है।
6. तीनधारा  –  1880 में तीन धारा तक डीएचआर का नेटवर्क पहुंच चुका था। मार्च 1880 में गवर्नर जनरल लार्ड लिटन ने तीनधारा तक रेलवे संचालन का उदघाटन किया था। यहां पर डीएचआर का वर्कशाप है। यहां डीएचआर के लोको ( इंजनों) की मरम्मत की जाती है। यहां एक बड़ा लोको शेड बनाया गया है। साथ ही इंजन बदले की भी सुविधा है। डीएचआर के खराब हुए इंजनों की तीनधारा वर्कशाप में मरम्मत भी की जाती है। साथ ही रेलवे इंजीनियरिंग विभाग का दफ्तर है।
7. गया बाड़ी – 38वें किलोमीटर पर 1040 मीटर की ऊंचाई पर है ये रेलवे स्टेशन। गयाबाड़ी दार्जिलिंग जिले के अंतर्गत आता है। यहां कई चाय के बगान हैं।
8. महानदी – 44.5 किलोमीटर का सफर हुआ पूरा। 1252 मीटर की ऊंचाई पर है रेलवे स्टेशन। यहां महानदी वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी स्थित है। काफी सैलानी यहां जंगल सफारी के लिए आते हैं।  1989 में इस रेलवे स्टेशन के भवन को दुबारा बनाया गया। पहले भू स्खल में ये स्टेशन भवन तबाह हो गया था। 

9. कर्सिंयांग 51.5 किलोमीटर पर स्थित कर्सियांग स्टेशन में ट्रेन मार्ग सड़क मार्ग को क्रास करती है। यहां ठहराव ज्यादा देर का होता है यात्रीगण यहां हल्का नास्ता ले सकते हैं। यह डीएचआर का मध्यवर्ती स्टेशन है। साथ ही यह एनजेपी से दार्जिलिंग के बीच का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन भी है। कर्सियांग व्यस्त बाजार है। इस छोटे से ऐतिहासिक शहर में कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आगमन हुआ था। आजकल कर्सियांग के आसपास कई नामी-गिरामी पब्लिक स्कूल और चाय के बगान हैं।   
10. तुंग 1728 मीटर की ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं आप। 58 किलोमीटर का सफर हो चुका है पूरा। और धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगती है। स्वेटर जैकेट निकाल लिजिए।
घूम स्टेशन, यहां डीएचआर का म्यूजियम भी है। 
11. सोनादा सोनादा एक छोटा सा बाजार है जहां एक बार फिर एनएच- 55 के साथ रेलगाड़ीकी पटरियां मिलती हैं।          
12. जोरबंग्ला – किसी जमाने में जोरबांग्ला चाय के लिए स्टोर करने वाला स्थल हुआ करता था। यहां दार्जिलिंग शहर की सीमा की शुरूआत भी मानी जाती है।
15. घूम 2258 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह डीएचआर रेल मार्ग का सबसे ऊंचाई पर स्थित रेलवे स्टेशन है। यह दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन है। यहां पर टॉय ट्रेन का संग्रहालय भी है। यहां प्रसिद्ध बौद्ध मठ भी है।      
16. बतासिया लूप – दार्जिलिंग से 5 किलोमीटर पहले आता है बतासिया लूप। यहां कोई स्टेशन नहीं है पर ट्रेन बलखाती हुई घुमाव लेती है जिसका नजारा देखने लायक होता है। यहां पर देश की आजादी के लिए जान गंवाने वाले गोरखा फौजियों का मेमोरियल भी बनाया गया है। इस मेमोरियल को ट्रेन के यात्री देख सकें इसलिए यहां ट्रेन धीमी हो जाती है। यहां दार्जिलिंग शहर का विहंगम नजारा के साथ ही कंचनजंगा पर्वत की चोटी भी देखी जा सकती है।
17. दार्जिलिंग – (DJ) और चलते चलते ट्रेन पहुंच जाती है अपनी मंजिल पर यानी आखिरी रेलवे स्टेशन। दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन का छोटा सा सुंदर सा भवन 1891 का बना हुआ है।

दार्जिलिंग बाजार - 1886 डीएचआर को तकरीबन आधा किलोमीटर का विस्तार दिया गया और दार्जिलिंग बाजार तक पटरियां बिछाई गईं। ये पटरियां खास तौर पर सामान पहुंचाने के लिए बिछाई गई थीं। पर अब आप सिर्फ पटरियां देख सकते हैं। इन पर अब ट्रेन नहीं चलती। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( डीएचआर 2)  पहली कड़ी यहां पढ़ें.


 ( DHR, DARJEELING HIMALAYAN RAILWAY )

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