Tuesday, October 16, 2012

जयपुर - गुलाबी शहर का अदभुत नजारा

किसी के लिए घूमना नशे की तरह है तो किसी के लिए संगीत की तरह...आजकल छोटी-मोटी छुट्टियों का दौर चला है....ऐसे में मार्च 2008 में दिल्ली की भागमभाग भरी जिंदगी से निजात पाने के लिए कुछ दिन छुट्टी मनाने की सोची तो जयपुर जाने का दिल हुआ...

जयपुर में अब वैसे तो दिल्ली जैसी भीड़भाड़ हो गई है...पर जयपुर शहर की अलग संस्कृति है और वहां घूमने का भी अपना एक अलग मजा है...सो अपनी पत्नी माधवी और ढाई साल के बेटे वंश के साथ मैं जयपुर के लिए चला गया...। पुरानी रेलवे स्टेशन के पार्किंग में बाइक लगा दी। दिल्ली से पूजा एक्सप्रेस का तेज सफर...जयपुर मे एक होटल में कमरा लेने के बाद हमलोग निकले चांदपोल गेट की तऱफ....मैं एक बार पहले भी जयपुर घूम चुका था...वह साल 1998 का फरवरी महीना था। तब जयपुर प्रवास में मैं चांदपोल इलाके के एक होटल में रुका था। इस दौरान राजस्थान पत्रिका के दफ्तर गया था, और बालहंस के संपादक अनंत कुशवाहा जी से मुलाकात की थी।

पर साल 2008 में भले मैं जयपुर दूसरी बार गया था पर पत्नी और तीन साल के बेटे के लिए सब कुछ नया था.. गुलाबी शहर में....चांद पोल गेट से जयपुर शहर की कई किलोमीटर सड़कें आप नंगी आंखों से देख सकते हैं....सभी दुकाने गुलाबी रंग कीं....समकोण पर काटते चौराहे...दुनिया के तीन सबसे खूबसूरत शहरों में शुमार जयपुर खासियत है...( बाकी दो शहर हैं फ्रांस का पेरिस और इटली का वेनिस)

जयपुर की सैर घोड़ागाड़ी से ( मार्च 2008 ) 
 कई सौ साल पुराना शहर अपने मूल स्वरूप में आज भी दिखाई देता है....अंदर भले मोबाइल और कंप्यूटर की दुकाने खुल गई हों पर बाहर लुक वही पुराना है....सारी दुकानों के साइन बोर्ड एक ही जैसे हैं....हां बाजार में थोडी भीड़ जरूर बढ़ गई है....

हमने तय किया कि गुलाबी शहर को हम बग्घी पर बैठकर देखेंगे...एक बग्घी वाले से मोलजोल की....मेरे राजकुमार यानी ढाई साल के वंश आगे बैठे और मैं और मेरी माधवी पीछे...और घोड़ा सड़क पर टिकटिक टिक टिक दौड़ता रहा....सचमुच धीरे-धीरे चलती घोड़ा गाड़ी पर पुराना जयपुर शहर देखने का मजा कुछ अलग था...वैसे भी अब बहुत कम ही शहरों में घोड़ागाडी दिखाई देती है....थोड़ी देर बाद हमारे घोड़ा गाड़ी वाले ने कहा कि हवा महल आ गया है...

पिछली बार टूरिस्ट बस वाले ने हवा महल को बाहर से ही दिखा दिया था..बस में चलते चलते...पर इस बार हम हवा महल में अंदर गए टिकट खऱीदकर ....रैंप पर चलते हुए हवा महल उपरी सिरे तक जाने का अनुभव बड़ा रोमांचक है...और जगह जगह हवा महल में बने झरोखे से जयपुर शहर का बाजार दिखाई देता है...कभी महारानियां इन्ही झरोखों से बाजार का नजारा करती थीं....आज हमने भी उसका लुत्फ उठाया...हवा महल के उपरी छत से पूरा जयपुर शहर दिखाई देता है....


हवा महल के बाद हमलोग शहर कई हिस्से घूमते रहे.... कुछ देर बाजार में खरीददारी की। शापिंग के लिए जयपुर आदर्श जगह है खासतौर पर महिलाओं के लिए। यहां आप चुन्नी, बंधेज के अलावा बेडशीट आदि भी खरीद सकते हैं।

उसके बाद अपने एक दोस्त को फोन किया जो राजस्थान पत्रिका में काम करते हैं...चंद्रभान ने बताया कि आप बिड़ला मंदिर भी देख लें...। तो हमलोग चल पड़े बिड़ला मंदिर की ओर।
 

बिडला परिवार ने देश कई शहरों में मंदिर बनवाया है...दिल्ली में बिड़ला मंदिर
हैदराबाद में बिड़ला मंदिर भोपाल में भी बिड़ला मंदिर...खैर जयपुर का बिड़ला मंदिर भी बड़ा खूबसूरत है...मोती डूंगरी फोर्ट के ठीक नीचे स्थित है बिड़ला मंदिर। मंदिर दर्शन के बाद थोड़ी थोड़ी भूख लग गई थी। 


 बिड़ला मंदिर के पास पाव-भाजी - अगर आप जयपुर जाएं तो बिडला मंदिर के निकट चौराहे पर पाव-भाजी खाना नहीं भूलें...एक साथ कई पाव-भाजी की दुकाने हैं....पाव भाजी इतनी अच्छी बनाते हैं कि आपका बार बार खाने को दिल करेगा। जयपुर शहर के अलग अलग कोने से पावभाजी खाने आते हैं यहां लोग। हालांकि जयपुर शहर का अपना खाना पानी तो दाल बाटी चूरमा है। राजस्थान का मशहूर कहावत है....दाल बाटी चूरमा...राजस्थानी सूरमा....पर बिड़ला मंदिर के पास पावभाजी खाने का भी अपना अलग आनंद है....

- विद्युत प्रकाश मौर्य


(JAIPUR, PINK CITY, RAJSTHAN, CHANDPOLE ) 

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