Monday, August 20, 2012

और हम विद्या अध्ययन के लिए निकल पड़े काशी

बचपन में जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो पुरोहित बालक पूछता है- कहां जा रहे हो तो वह बोलता है काशी...काशी क्यों तो पढ़ाई करने....काशी यानी विद्या अध्ययन का पर्याय....विद्वानों की नगरी...

संयोग कुछ ऐसा बना की इंटर की परीक्षा पास करने के बाद मेरी भी इच्छा बनारस में पढ़ाई करने की हुई...मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए मन बनाया...

मार्च का महीना था...प्रवेश की तारीखों के बारे में कुछ नहीं पता था। यह 1990 का साल था। महीना था जून का। मैं और मेरे मित्र विष्णु वैभव दोनों एक शाम सोनपुर से वाराणसी पैसेंजर में सवार हुए... यह मीटर गेज रेलवे लाइन थी। सुबह चार बजे ट्रेन छोटे छोटे दर्जनों स्टेशनों को पार करती हुई बनारस पहुंच गई...तब वाराणसी सोनपुर के बीच छोटी लाइन थी जो अब ब्राड गेज में बदल चुकी है। बनारस रेलवे स्टेशन का आकार भी बाहर से मंदिर जैसा ही है....

हमारे पास संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का पता था। वे वहां बीएड विभाग के हेड थे...कुछ नाम था शायद वाचस्पति द्विदेदी....संपूर्णानंद यूनीवर्सिटी वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास ही है। सुबह सुबह हमने उनका दरवाजा खटखटाया...

उन्होंने समान्य शिष्टाचार के बाद सलाह दी... पहली बार बनारस आए हो तो दोनों यहां से सीधे दश्वाश्वमेध घाट चले जाओ वहां गंगा जी में स्नान कर लेना उसके बाद वहीं से बीएचयू चले जाना...तब तक नौ बज जाएंगे और यूनीवर्सिटी खुल भी जाएगी....हमने विद्वान पुरूष की राय पर अमल किया...
हमलोग सुबह सुबह दशाश्वमेध घाट पहुंच गए... वहां देखा हजारों लोग गंगा स्नान कर रहे हैं। गंगा जी बनारस में उत्तर-दक्षिण बहती हैं। इसलिए सुबह के सूरज की पहली किरण दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर आकर पड़ती है। उसके बाद वाराणसी के घाटों का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाता है। तभी बनारस की सुबह का कई कविओं ने अपने अपने तरीके से गुणगान किया है।



 बनारस में गंगा स्नान करने के बाद हमने बाबा विश्वनाथ के दर्शन की सोची... बाहर निकल कर एक गली में घुस गए...कई घंटे चक्कर लगाने के बाद भी भोले बाबा का दरबार नहीं मिला...तब जाकर याद आया कि बनारस की गलियों के बारे में भी कितने तरह के किस्से मशहूर हैं। खैर हमने किसी से बाहर सड़क पर निकलने का रास्ता पूछा और आटो रिक्शा पर बैठकर पहुंच गए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गेट पर....


विशाल सिंह द्वार और उसके बाहर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की विशाल मूर्ति....खैर हम गेट के अंदर घुसे... हमारे पास बीएचयू के मेडिकल कालेज की कैंटीन में काम करने वाले बीएन तिवारी जी का पता था...

मेडिकल कालेज की तीसरी मंजिल पर स्थित कैंटीन में तिवारी जी मिले...उन्होंने बातें करने से पहले चाय नास्ता कराया....फिर हमने उन्हें अपने आने का उद्देश्य बताया....उन्होंने सेंट्रल आफिस जाने को कहा... 

इस दौरान हमें बीएचयू के भव्य परिसर का साक्षात्कार हुआ। फार्म खरीदने के साथ तय किया किसी भी तरह यहीं पढ़ाई करने आना है। इसके बाद अगले दो दिन हमलोग महामनापुरी कालोनी में अपने पिताजी के एक मित्र गजेंद्रनाथ शुक्ला के घर रुके। शुक्ला जी वैशाली जिले के कन्हौली एस्टेट परिवार से आते हैं। वे बीएचयू में कर्मचारी के तौर पर कार्यरत थे।



प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन करने के बाद हमने लंका पर आकर बीएचयू प्रवेश परीक्षा की गाइड खरीदी...दुबारा प्रवेश परीक्षा देने बनारस आना हुआ...। मेरा परीक्षा केंद्र सांख्यिकी विभाग में था। 
प्रवेश परीक्षा यानी इंट्रेस के रिजल्ट में 1990 में मैं सेकेंड टाप पोजीशन पर आया था....इसके बाद में सामाजिक विज्ञान संकाय में इतिहास (प्रतिष्ठा) में नामांकन लिया। उसके बाद पांच साल बीएचयू कैंपस में गुजारे। जिसके सैकड़ो खट्टे-मीठे अनुभव हैं। कभी मौका मिला तो सुनाउंगा। 


-विद्युत प्रकाश मौर्य  

( BHU, VARANASI, UTTAR PRADESH, RAIL, DASHASHWAMEDH GHAT  ) 

No comments:

Post a Comment