Sunday, November 17, 2013

दूर दूर तक मशहूर है सिलाव का खाजा


बिहार में राजगीर के रास्ते में पड़ता है छोटा सा कस्बा सिलाव। सिलाव नामक ये छोटा सा कस्बा खाजा के लिए जाना जाता है। खाजा यानी जमकर खा और जा। खाजा बिहार की वह मिठाई है जिसके बिना कोई शादी पूरी नहीं होती। शादी के बाद नवेली दुल्हन के पांव जब ससुराल में पड़ते हैं तो वह कई झंपोली ( डिब्बे ) खाजा अपने साथ लाती है। और ये खाजा गांव मुहल्ले में कई दिनों तक बांटा जाता है। शादी का सम्मान इसी बात से बढ़ता है कि खाजा की कितनी झंपोलियां ससुराल से आईं।

वैसे खाजा बहुत पुरानी मिठाई है। तभी तो सैकड़ों साल पहले ये कहावत बनी थी- अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा। खाजा रसगुल्ले से तो पुराना है ही। वैसे बिलग्रामी और शक्करपारे और लकठो भी पुरानी मिठाइयां हैं। खाजा की खासियत है ये कई दिनों तक खराब नहीं होता। और सिलाव में बने खाजे की तो बात ही क्या है।
सिलाव जैसा स्वाद कहीं और के खाजे में नहीं आ पाता। खाजे के बेहतरीन होने की अपनी पहचान है। पारखी अलग अलग तरीके से पहचानते हैं। अब सिलाव के खाजा का स्वाद दिल्ली  के प्रगति मैदान तक पहुंच चुका है। हर साल व्यापार मेले में खाजा का स्टाल आता है। आप राजगीर पहुंच गए हैं तो सिलाव के खाजा का आनंद लिए बगैर वापस नहीं जाएं। सिलाव के मुख्य बाजार में ही खाजा की कई दुकाने हैं। खाजा खाएं और साथ में पैक करा कर भी ले जाएं। क्योंकि ये हफ्तों रखा जा सकता है। 
 बाकी मिठाइयों की तुलना में खाजा अभी भी सस्ता है। सिलाव में खाजा का भाव 80 रुपये किलो से लेकर 100 रुपये किलो तक है। हल्का होने के कारण एक किलो खाजा ढेर सारी जगह घेरता है। एक बार आपने खाजा खरीदा तो कई दिनों तक मजे लेकर खाते रहें। अगर आप सिलाव से होकर गुजर रहे हैं तो यहां के बस स्टाप के ठीक सामने कुशवाहा खाजा भंडार से खाजा खरीद सकते हैं। 
-    कुशवाहा खाजा भंडार ( कामेश्वर सिंह कुशवाहाप्रो शिवशंकर प्रसाद मौर्य - 9430250202)
सिलाव शहर में कई परिवार खाजा बनाने का कारोबार से कई पीढ़ियों से जुड़े हुए हैं। इनमें काली शाह और कोकिल शाह के नाम प्रमुख हैं। वैसे नालंदा और पावापुरी रोड रेलवे स्टेशन पर रूकने वाली हर ट्रेन के साथ खाजा बेचने वाले हॉकर रेलगाड़ी के हर कोच तक पहुंचते हैं। 
खाजा के मार्केटिंग की तैयारी -  साल 2015 में बिहार सरकार की ओर से सिलाव के इस प्रसिद्ध खाजा को विकसित एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने को लेकर उद्योग का दर्जा दिया गया। इसे मुख्यमंत्री कलस्टर विकास योजना में जोड़ा गया है। तैयारी है कि अब मशीन से खाजा बनाया जाएगा। जिसकी गुणवत्ता करीब छह महीने तक बरकरार रहेगी। इसके बाद खाजा का एक-एक किलो का पैकेट बनाया जाएगा। जिसे विदेशों में भेजने में सुविधा होगी और मानव श्रम में भी कमी आएगी।
-- विद्युत प्रकाश मौर्य

( BIHAR, RAJGIR, KHAJA, SILAO, NALANDA )

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