Monday, May 19, 2014

वैशाली - यहां बजते थे कभी आम्रपाली के घुंघरू


बिहार में वैशाली यानी लोकतंत्र की जन्मभूमि, भगवान बुद्ध की कर्मभूमि और नृत्यांगना आम्रपाली की रंगभूमि। वैशाली नाम कहते हैं राजा विशाल की नगरी के नाम पर पड़ा। वाल्मिकी रामायण में भी वैशाली का जिक्र आता है। अब वैशाली जैसा कोई बड़ा नगर नहीं है यहां। बैसोढ़ नाम का गांव है।

एक सैलानी या इतिहास में रूचि रखने वाले व्यक्ति के रुप में भी आप वैशाली घूमने जाना चाहें तो काफी कुछ देखने लायक है यहां। संयोग से मेरी 10 साल की स्कूली पढ़ाई का ज्यादातर हिस्सा वैशाली जिले के ही अलग अलग स्कूलों में गुजरा। इस दौरान कई बार वैशाली जाना हुआ। हर बार कुछ नया सा नजर आता है वैशाली। 

हर साल वैशाली महोत्सव- वैशाली के ऐतिहासिक स्मृति चिन्हों के बीच हर साल अप्रैल महीने में वैशाली महोत्सव का आयोजन होता है। ऐसे ही एक वैशाली महोत्सव में जाना हुआ। वैशाली के पुराने गौरव को याद करने के लिए आईसीएस और लेखक जगदीशचंद्र माथुर ने वैशाली महोत्सव की शुरूआत  कराई थी।

वैशाली में विशाल गजेंद्र पुष्करिणी ( सरोवर ) के साथ बना है विश्वशांति स्तूप। ये विशाल शांति स्तूप को जापान सरकार ने सहयोग देकर बनवाया है। भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के 12 साल वैशाली में गुजारे। यहीं पर आम्रपाली उनकी शिष्या बनी। कहते हैं बौद्ध भिक्षुणी बनने से पहले वह वैशाली की सबसे महंगी गणिका थी। आचार्य चतुरसेन का उपन्यास वैशाली की नगर वधु तो रामवृक्ष बेनीपुरी ने भी लिखा अंबपाली। आम्रपाली एक फिल्म भी बनी थी। इसमें सुनील दत्त बने अजातशत्रु तो वैजंतीमाला बनीं थीं आम्रपाली।


यूं पहुंची आम्रपाली बुद्ध के शरण में
कोल्हुआ में अशोक स्तंभ। 
राजनर्तकी आम्रपाली ने राह में एक युवा संन्यासी को देखा। वह उसके आकर्षण में बंधकर उसके पीछे चलने लगी। थोड़ी देर बाद संन्यासी एक वृक्ष की छाया में बैठ गया। आम्रपाली भी बैठ गई। उसने संन्यासी से प्रश्न किया, 'आपने युवावस्था में ही संन्यास क्यों ग्रहण किया?' संन्यासी ने उत्तर दिया, 'सत्य की खोज में।' आम्रपाली ने कहा, 'उस सत्य का क्या लाभ, जिसे पाने में आपका यौवन ही खत्म हो जाए।' संन्यासी ने कहा, 'पूर्ण आनंद तो साधु जीवन में ही है। और तुम जिसे सुख समझ रही हो वह तो क्षणिक है।' इस पर आम्रपाली बोली, 'आपका यह विश्वास असत्य सिद्ध होगा। आप कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें, जिसके लिए राजकुमार भी लालायित रहते हैं।' संन्यासी ने कुछ सोचकर कहा, 'यदि मेरे गुरु ने इसकी अनुमति दे दी तो मैं आऊंगा।' यह कहकर संन्यासी ने अपने झोले से एक आम निकालकर आम्रपाली को दिया और कहा, 'इसे संभालकर रखना। जब तक मैं आऊं यह खराब न हो।'

संन्यासी ने सारी घटना बुद्ध को बताई। बुद्ध ने संन्यासी को आम्रपाली का अतिथि बनने की अनुमति दे दी। इस पर कुछ अन्य शिष्यों ने आपत्ति व्यक्त की। बुद्ध ने उनकी शंका का निवारण करते हुए कहा, 'इसकी आंखों में थोड़ी भी तृष्णा या वासना नहीं है। यदि मैं मना कर देता तो भी यह मेरी बात अवश्य मानता।' इस बीच आम्रपाली आम को ताजा रखने का प्रयत्न करती रही लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों बाद संन्यासी उसके पास पहुंचा और उसने वह आम मांगा। लेकिन वह सड़ गया था, उसमें कीड़े पड़ गए थे।

संन्यासी ने उसकी गुठली निकाल ली और बाकी का हिस्सा फेंक दिया। उसने आम्रपाली से कहा, 'इस गुठली का कुछ नहीं बिगड़ा। इसमें अब भी पुन: उगने की शक्ति है। उसी तरह शरीर गल या सड़ जाएगा लेकिन आत्मा बची रहेगी। आत्मा का ध्यान करो।' यह सुनकर आम्रपाली ने भी बुद्ध की शरण में जाने का फैसला किया। 
( श्याम विलास के सौजन्य से )

कोल्हुआ गांव में अशोक की लाट- वैशाली के पास कोल्हुआ गांव में अशोक की लाट। इसी तरह का एक अशोक स्तंभ पश्चिम चंपारण जिले के लौरिया में भी है। खेतों के बीच स्थित इस अशोक की लाट की तस्वीर हमारे स्कूल के दिन में हर कॉपी पर होती थी। किसी जमाने में बिहार में बहुत लोकप्रिय थी वैशाली कॉपी। अब पता नहीं आती है या नहीं।

शांति स्तूप के पास संग्रहालय -  वैशाली में शांति स्तूप के बगल में एक बड़ा म्यूजिम भी है। म्यूजिम में ऐतिहासिक सामग्री देखी जा सकती है। हालांकि आजादी के सात दशक बाद भी वैशाली गांव जैसा ही है। यहां एक प्राकृत जैन संस्थान नामक शैक्षणिक केंद्र भी है। हरियाणा के नीलोखेड़ी गांव के रहने वाले महान समाजसेवी केडी दीवान ने वैशाली को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उनके पुनीत कार्यों के लिए उन्हें पद्मश्री भी मिला। भले ही हरियाणा में लोग दीवान साहब को नहीं जानते लेकिन वैशाली जिले में वे पूजे जाते हैं।

कैसे पहुंचे - बिहार की राजधानी पटना से हाजीपुर 20 किलोमीटर। हाजीपुर से लालगंज। और लालगंज से वैशाली। जिला मुख्यालय हाजीपुर से वैशाली तकरीबन 40 किलोमीटर है। आप हाजीपुर में रुकें और वहां से टैक्सी से वैशाली जाएं। दिन भर घूमकर शाम को वापस आ सकते हैं।

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

( VASHALI, BUDDHA, AMRAPALI, HAJIPUR ) 


5 comments:

  1. जहाँ कभी बस्ती थी खुशियाँ ,
    आज हैं मातम वहाँ
    वक़्त लाया था बहारे (हरियाली )
    वक़्त लाया है खिज़ा ( उजाड़ / पतझड़ ) _______
    वैशाली जैसे एतिहासिक शहर को मेरा सलाम __ जावेद शाह खजराना

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    1. शानदार लिखा आपने

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  2. सेक्शन
    शहर
    
    युवक के प्यार में पागल नगरवधू आम्रपाली ने यह क्या किया?
    Updated @ 12:59 PM IST

    बुद्ध अपने एक प्रवास में वैशाली आए। कहते हैं कि उनके साथ दस हजार शिष्य भी थे। सभी शिष्य प्रतिदिन भिक्षा मांगने जाते थे। वैशाली में ही आम्रपाली का महल भी था। वह वैशाली की सबसे सुंदर स्त्री और नगरवधू थी। एक दिन उसके द्वार पर एक भिक्षुक आया। उस भिक्षुक को देखते ही वह उसके प्रेम में पड़ गई।

    उसके पीछे-पीछे वह अपना दान स्वीकार करने का आग्रह करते हुए दौड़ी। भिक्षा देने के बाद उसने कहा, तीन दिन बाद वर्षाकाल प्रारंभ होनेवाला है। आप उस अवधि में मेरे महल में ही रहें। भिक्षु ने कहा कि मुझे तथागत अनुमति देंगे, तो मैं यहां रुक जाऊंगा। बाहर निकलने पर उसने अपने साथी भिक्षुओं से आम्रपाली के निवेदन के बारे में बताया।

    पढ़ें,सुहाग की निशानी न बन जाए सुहाग का दुश्मन

    उन्होंने बुद्ध को यह वृत्तांत बढ़ा-चढ़ाकर सुनाया। बुद्ध ने कुछ नहीं कहा। युवक भिक्षु आया और उसने बुद्ध के चरण स्पर्श कर सारी बात बताई। बुद्ध ने उसे कुछ पल देखा और आम्रपाली के महल में रहने की अनुमति दे दी। तीन दिन बाद युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में चला गया। अन्य भिक्षु नगर में उस भिक्षु के बारे में चल रही चर्चाएं सुनाने लगे।

    पढ़ें,इस तरह आत्माएं हमसे संपर्क बना लेती हैं

    बुद्ध ने कहा कि तुम सब अपनी चर्या का पालन करो। मुझे उस शिष्य पर विश्वास है। यदि उसका धर्म अटल है, तो आम्रपाली भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। बस चार महीनों तक प्रतीक्षा कर लो। भिक्षुओं को बुद्ध की बात पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन वे कुछ कर भी नहीं सकते थे।

    चार महीने बाद युवक भिक्षु लौट आया। पीछे-पीछे आम्रपाली भी आ गई। उसने बुद्ध से भिक्षुणी संघ में प्रवेश देने की आज्ञा मांगी। उसने कहा कि मैंने भिक्षु को पाने के हर संभव प्रयास किए, पर मैं हार गई। उसके आचरण ने बता दिया क�

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  3. कहानी आम्रपाली की, जिसे उसकी खूबसूरती ने बना दिया था नगरवधू
    यह कहानी है भारतीय इतिहास की सबसे खूबसूरत महिला के नाम से विख्यात 'आम्रपाली' की, जिसे अपनी खूबसूरती की कीमत वेश्या बनकर चुकानी पड़ी। वह किसी की पत्नी तो नहीं बन सकी लेकिन संपूर्ण नगर की नगरवधू जरूर बन गई। आम्रपाली ने अपने लिए ये जीवन स्वयं नहीं चुना था, बल्कि वैशाली में शांति बनाए रखने, गणराज्य की अखंडता बरकरार रखने के लिए उसे किसी एक की पत्नी बनाकर नगर को सौंप दिया गया।उसने सालो तक वैशाली के धनवान लोगों का मनोरंजन किया लेकिन जब वह तथागत बुद्ध के संपर्क में आई तो सबकुछ छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन गई।

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    1. राजनर्तकी आम्रपाली ने राह में एक युवा संन्यासी को देखा। वह उसके आकर्षण में बंधकर उसके पीछे चलने लगी। थोड़ी देर बाद संन्यासी एक वृक्ष की छाया में बैठ गया। आम्रपाली भी बैठ गई। उसने संन्यासी से प्रश्न किया, 'आपने युवावस्था में ही संन्यास क्यों ग्रहण किया?' संन्यासी ने उत्तर दिया, 'सत्य की खोज में।' आम्रपाली ने कहा, 'उस सत्य का क्या लाभ, जिसे पाने में आपका यौवन ही खत्म हो जाए।' संन्यासी ने कहा, 'पूर्ण आनंद तो साधु जीवन में ही है। और तुम जिसे सुख समझ रही हो वह तो क्षणिक है।' इस पर आम्रपाली बोली, 'आपका यह विश्वास असत्य सिद्ध होगा। आप कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें, जिसके लिए राजकुमार भी लालायित रहते हैं।' संन्यासी ने कुछ सोचकर कहा, 'यदि मेरे गुरु ने इसकी अनुमति दे दी तो मैं आऊंगा।' यह कहकर संन्यासी ने अपने झोले से एक आम निकालकर आम्रपाली को दिया और कहा, 'इसे संभालकर रखना। जब तक मैं आऊं यह खराब न हो।'

      संन्यासी ने सारी घटना बुद्ध को बताई। बुद्ध ने संन्यासी को आम्रपाली का अतिथि बनने की अनुमति दे दी। इस पर कुछ अन्य शिष्यों ने आपत्ति व्यक्त की। बुद्ध ने उनकी शंका का निवारण करते हुए कहा, 'इसकी आंखों में थोड़ी भी तृष्णा या वासना नहीं है। यदि मैं मना कर देता तो भी यह मेरी बात अवश्य मानता।' इस बीच आम्रपाली आम को ताजा रखने का प्रयत्न करती रही लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों बाद संन्यासी उसके पास पहुंचा और उसने वह आम मांगा। लेकिन वह सड़ गया था, उसमें कीड़े पड़ गए थे।

      संन्यासी ने उसकी गुठली निकाल ली और बाकी का हिस्सा फेंक दिया। उसने आम्रपाली से कहा, 'इस गुठली का कुछ नहीं बिगड़ा। इसमें अब भी पुन: उगने की शक्ति है। उसी तरह शरीर गल या सड़ जाएगा लेकिन आत्मा बची रहेगी। आत्मा का ध्यान करो।' यह सुनकर आम्रपाली ने भी बुद्ध की शरण में जाने का फैसला किया।

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