Friday, August 31, 2012

सौ साल पुरानी स्पेशल गेज पर सफर (2)

क्या करें मजबूरी है..जाना जरूरी है...
साक्षरता कार्यक्रम के लिए हमें पहुंचना था श्योपुर। जौरा के महात्मा गांधी सेवा आश्रम से मैं और दिग्विजय भाई अपने अगले सफर के लिए चल पड़े। साल 1992 में श्योपुर तब एक तहसील हुआ करता था, मुरैना जिले का, पर अब जिला बन चुका है। ग्वालियर से 200 किलोमीटर से ज्यादा दूर। ग्वालियर से श्योपुर के बीच चलती है छोटी लाइन की ट्रेन। ये ट्रेन मीटर गेज नहीं, नैरो गेज नहीं बल्कि स्पेशल गेज की है।
पटरियों के बीच चौड़ाई 61 सेंटीमीटर (610 एमएम) यानी कालका शिमला से भी छोटे हैं इसके डिब्बे। ट्रेन ग्वालियर से चलती है लेकिन हमने इसमें सफर शुरू किया जौरा अलापुर रेलवे स्टेशन से। ग्वालियर से श्योपुर कलां तक का रेल मार्ग 198 किलोमीटर लंबा है। अपने स्पेशल गेज में ये दुनिया की सबसे लंबी और सबसे पुरानी रेल सेवा है जो चालू है। 


ग्वालियर श्योपुर मार्ग पर जौरा रेलवे स्टेशन। 
ग्वालियर के महाराजा माधव राव सिंधिया ने इस रेल परियोजना पर काम 1879 में शुरू कराया था। 1904 में इस रेल सेवा को ग्वालियर लाइट रेलवे के नाम से शुरू कराया था। ग्वालियर से जौरा तक का मार्ग 1904 में चालू हो गया था। इसका श्योपुर कलां तक पूरा मार्ग 1909 में आरंभ हो सका।

 यानी सौ साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी है ये रेल। ग्वालियर से चल कर 28 स्टेशनों से होकर गुजरने वाली ये ट्रेन इलाके 250 से ज्यादा गांवों के लिए लाइफलाइन है। यानी चंबल घाटी के लोगों के लिए ये ट्रेन कोई टॉय ट्रेन नहीं है। जंगल और गांव से होकर इस ट्रेन से सफर करना लोगों की मजबूरी भी है। कई इस ट्रेन के छत पर भी लोग सफर करते दिख जाते हैं।


कभी भाप इंजन चलता था। 
ग्वालियर से सुबह छह बजे खुलने वाली पहली ट्रेन शाम चार बजे श्योपुर पहुंचाती है। अब ट्रेन में डीजल इंजन लग गया है। अधिकतम स्पीड 50 किलोमीटर घंटा है। इंजन डिब्बे सब कुछ अलग हैं। कई बार बिगड़ जाए या पटरी से उतर जाए तो रेल मार्ग बंद भी जाता है।
भले ही इसके मार्ग में 28 स्टेशन हैं लेकिन कई बार गांव के लोगों के आग्रह पर जरूरत पड़ने पर इस ट्रेन को ग्रामीण कहीं भी रोकवा लेते हैं। कई दशकों से इस लाइट रेलवे को बड़ी लाइन में बदलवाने की मांग चल रही है। सुबह-सुबह जौरा रेलवे स्टेशन पर हम टिकट लेकर श्योपुर कलां जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। पर ट्रेन आई तो पहले से ही खचाखच भरी हुई थी।



vidyutp@gmail.com

Thursday, August 30, 2012

चंबल के आंचल में (1)

मई और जून 1992 का महीना। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ग्रीष्मावकाश की घोषणा होने के साथ हमने तय किया कि इस बार घर नहीं जाकर कहीं घूमने जाना है। इसी दौरान हमारे पास महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा मुरैना से संपूर्ण साक्षरता अभियान में बतौर शिक्षक पढ़ाने का आमंत्रण आया। हमने एक महीने से कुछ ज्यादा वक्त वहां बीताने का तय किया। वाराणसी से बुंदेलखंड एक्सप्रेस में मैं और दिग्विजय नाथ सिंह सवार हुए। हमारी ट्रेन, इलाहाबाद के बाद चित्रकूट, बांदा, कालांजर, महोबाओरछाझांसी होती हुई ग्वालियर पहुंची। ग्वालियर में हम युवा साथी आनंद पंडित से उनके घर जाकर मिले। ग्वालियर का जय विलास पैलेस किला देखा। उसके बाद हम ग्वालियर से बस से महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा पहुंचे।

ये वही आश्रम है जहां 1972  में  जय प्रकाश नारायण के सानिध्य में चंबल के डाकूओं के सरेंडर हुए। ये आश्रम अब डाकूओं के परिवारों के पुनर्वास के लिए कई तरह के प्रोजेक्ट चलाता है। जौरा आश्रम में कई तरह के खादी ग्रामोद्योग की वस्तुओं का उत्पादन होता है लेकिन आश्रम की बनी हुई दरी उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली मानी जाती है। 

जाने माने गांधीवादी कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल ने इस आश्रम में लंबा वक्त गुजारा है। यहां के लोग उन्हें बड़े सम्मान से राजू भाई के नाम से याद करते हैं। इस आश्रम में मैं लगातार कई बार जा चुका हूं। राजू भाई के बाद अब रणसिंह परमार इस आश्रम की व्यवस्था देखते हैं। राष्ट्रीय युवा योजना के निदेशक एस एन सुब्बराव ने 1970 में इस आश्रम की स्थापना की थी।


चंबल नदी पर मुरैना और धौलपुर के मध्य पुल। 

सालों इस इलाके में रहकर डाकुओं से संपर्क कर उन्हें सरेंडर के लिए तैयार करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। कभी चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे ये डाकू सरेंडर के बाद इस आश्रम को अपना घर मानते है। वे साल में कई बार होने वाले कार्यक्रमों में इस आश्रम में आते भी हैं। जौरा और आसपास के गांवों में लोगों में जागरूकता लाने के लिए सुब्बराव जी ने 20 से ज्यादा शिविर 70 के दशक में लगाए जिसमें देश के कोने कोने से युवाओं ने आकर श्रमदान किया। ऐसा ही एक गांव है बागचीनी जहां कई शिविर लगाए गए।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

(CHAMBAL, JOURA, MORENA, MP, SHEOPUR, SUBBARAO, DIGVIJAY NATH ) 

Wednesday, August 29, 2012

लुंबिनी पार्क में हैदराबाद की एक शाम

हैदराबाद के लुंबिनी पार्क में  ( 2007 )
हैदराबाद के हुसैन सागर लेक के एक हिस्से में बना है लुंबिनी पार्क। लुंबिनी पार्क हैदराबाद के लोगों की शाम गुजारने की हसीन जगह है। इटिंग आउट झरने, झूले सब कुछ हैं यहां। 

लुंबिनी पार्क हैदराबाद का एक हैपनिंग सेंटर है। तभी दहशत गर्दों ने जब हैदराबाद शहर में सीरियल ब्लॉस्ट किए तब उसमें लुंबिनी को भी चुना था। लेकिन वक्त सबसे बड़ा मरहम है काफी कुछ भुला देता है। जिंदगी फिर उसी रफ्तार से चल पड़ती है।

लुंबिनी के बगल में ही स्थित है एनटीआर गार्डन। इसे आंध्र के लोकप्रिय मुख्यमंत्री एनटीरमाराव की याद में बनवाया गया है। एनटीआर गार्डन के मुक्ताकाश मंच पर अक्सर कोई रंगारंग आयोजन भी चलता रहता है। 


लुंबिनी पार्क में प्रवेश के लिए टिकट 10 रुपये का है। बच्चों के लिए टिकट 5 रुपये का है। यह हैदराबाद के आम आदमी के मनोरंजन के लिए सबसे सस्ती जगह है। इस टिकट में बच्चों के लिए कई झूले तो मुफ्त में उपलब्ध हैं। वहीं कई झूलों के लिए टिकट लेना पड़ता है। एक बार लुंबिनी पार्क पहुंचने के बाद बच्चे वहां से वापस जाने का नाम ही नहीं लेते। पार्क में पानी का एक सुंदर झरना है। इस झरने के अंदर से होकर आप आर पार गुजर सकते हैं। आपके आगे से पानी गिरता रहता है और अंदर के बरामदे से पानी के छिंटे के साथ इस पार से उस पार हो जाते हैं। पर बच्चों का तो मन नहीं मानता।
वे गिरते हुए पानी में नहाने के लिए कूद पड़ते हैं। बच्चों के लिए नहाने की यहां पर छूट है। बड़ों के लिए मनाही है। पार्क में बच्चों के लिए छोटी सी रेलगाड़ी भी है। अगर घूमते हुए थक गए हैं तो खाने पीने का भी शानदार इंतजाम है यहां पर। 


इसके अलावा लुंबिनी पार्क से स्टीमर लांच पर सफर के और भी कई पैकेज हैं। ठहरे हुए पानी में हलचल मचाती लांच और उसपर चलता धीमा संगीत। साथ में कुछ खाना पीना भी। भला इससे अच्छी शाम क्या हो सकती है। रामोजी फिल्म सिटी में नौकरी के दौरान नन्हें अनादि को लेकर हमलोग कई बार लुंबिनी पार्क के इलाके मे गए। नन्हें अनादि को लुंबिनी नाम जुंबा पर चढ़ गया था। 

-    विद्युत प्रकाश  मौर्य 
( HYDRABAD, HUSAIN SAGAR LAKE, BUDDHA, LUMBINI PARK ) 

Tuesday, August 28, 2012

हैदराबाद की हुसैन सागर झील में बुद्ध

देश की सबसे बड़ी झील है हुसैन सागर, इस मायने में कि ये इंसान की बनवाई हुई है। प्राकृतिक नहीं है। इस झील के बीचों बीच खडे हैं विशाल गौतम बुद्ध। यह देश की सबसे बड़ी अखंड बुद्ध प्रतिमा है। इसकी स्थापना इस झील में एक दिसंबर 1992 को की गई थी। इस 200 शिल्पियों ने गणपति सतपथी की अगुवाई में तकरीबन दो साल के समय में तैयार किया था। 

इस प्रतिमा को हैदराबाद से 60 किलोमीटर दूर रायगीर की पहाड़ियों के पास निर्मित किया गया था। प्रतिमा की ऊंचाई 17 मीटर है और इसका वजन 320 टन है। इसे रायगीर से यहां तक लाने के लिए बड़ी जुगत लगाई गई थी। कुल 192 पहियों वाले विशेष वाहन से इसे रायगीर से यहां तक लाया गया था। रात में इस बुद्ध प्रतिमा को देखने का अपना अलग आनंद है। रोशनी में नहाई बुद्ध प्रतिमा और भी सुंदर लगती है।  बुद्ध प्रतिमा के पास बुद्ध वंदना और त्रिशरण मंत्र लिखे गए हैं। यहां आने वाले सैलानी बुद्ध को हर कोण से निहार लेना चाहते हैं। 


सबसे बड़ी मानव निर्मित झील -  हुसैन सागर झील का निर्माण एक समय में जल संकट के दौरान शहर को पानी उपलब्ध कराने के लिए कराया गया था। 1562 में इस झील का निर्माण हजरत हुसैन शाह वली ने करवाया था। झील का विस्तार 5.7 वर्ग किलोमीटर में है। वहीं झील की गहराई 32 फीट तक है। इसमें मूसी नदी से नहर बनाकर पानी लाने के इंतजाम किया गया था। तब यह जल संरक्षण का अदभुत नमूना था। अब इस झील के किनारे से होकर खूबसूरत सी सड़क गुजरती है। इस वलयाकार सड़क को नेकलेस रोड कहते हैं जिसका सौंदर्य रात में निखर उठता है। ये नेकलेस रोड मुंबई के मरीन ड्राइव की याद दिलाती है लेकिन कई बार उससे भी ज्यादा खूबसूरत है। ये सड़क हैदराबाद और सिकंदराबाद शहर को जोड़ती भी है।

हुसैन सागर थोड़ी दूरी पर ही हैदराबाद का प्रसिद्ध बिड़ला मंदिर है। इस मंदिर से शहर का बड़ा ही खूबसूरत नजारा दिखता है। कुछ साम्यता हैदराबाद और भोपाल में नजर आती हैं। वहां भी ऊंचाई पर बिड़ला मंदिर और ताल तलैया है। भोपाल की बड़ी झील में हाल में राजा भोज की विशाल प्रतिमा लगी है। तो हैदराबाद के हुसैन सागर लेक में बीचों बीच गौतम बुद्ध की ग्रेनाइट की बनी विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।


कैसे पहुंचे - हुसैन सागर झील में स्थित  गौतम बुद्ध की इस प्रतिमा तक जाने के लिए लुंबिनी पार्क से मोटर बोट, स्टीमर लाउंज चलते हैं। इसमें आप आने और जाने का एक साथ टिकट लेकर बुद्ध मूर्ति तक जा सकते हैं। तेलंगाना टूरिज्म की ओर से गौतम बुद्ध प्रतिमा तक आने और जाने का टिकट 55 रुपये का है। इसमें आप प्रतिमा के पास अपनी मन मुताबिक समय तक ठहर सकते हैं। आने जाने के लिए लगातार फेरी सेवा चलती रहती है। वहां पर फोटोग्राफर प्रतिमा के साथ आपकी इंस्टैंट तस्वीर भी उतारने के लिए प्रस्तुत रहते हैं। आप चाहें तो यादगारी फोटो भी बनवा सकते है।
- vidyutp@gmail.com
( HYDRABAD, HUSAIN SAGAR LAKE, BUDDHA, LUMBINI PARK ) 

Monday, August 27, 2012

देश का सबसे पुराना मॉल एबिड्स

अलबर्ट एबिड (सौ नरेंद्र लूथर की पुस्तक)
देश के तमाम महानगरों में तेजी से शापिंग माल्स खुल रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि हैदराबाद शहर में काफी पहले से एक व्यवस्थित शापिंग माल मौजूद है। हैदराबाद के लोग इसे एबिड्स के नाम से जानते हैं। ये नामपल्ली रेलवे स्टेशन के पास ही है।
एबिड्स का मतलब है हैदराबाद का दिल। एबिड्स का नाम अलबर्ट एबिड के नाम पर है। हैदराबाद के छठे निजाम के समय जेविश मूल के अलबर्ट एबिड ने यहां पहली दुकान खोली। कहा जाता है जेविश धर्म भारत में बाहर से आने वाले सबसे पुराने धर्मों में से एक है। अलबर्ट एबिड छठे निजाम महबूब अली शाह आसफ जह (1869-1911) का खास सेवक और प्रबंधक था। अलबर्ट एबिड ने एनी इवान्स से विवाह किया था जो निजाम के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती थी। शादी के बाद उसने अपना नाम अलबर्ट एबिड इवान्स रख लिया था। यानी पत्नी का नाम अपने नाम के  साथ जोड़ा। भारत में अक्सर पत्नियां जोड़ती हैं पति का नाम। बाद में दोनों ब्रिटेन चले गए थे। कहा जाता है कि कई शहरों के शोध के बाद यहां एबिड्स में ऐसे अनूठे बाजार का निर्माण कराया गया जहां एक ही छत के नीचे सब कुछ मिलता हो। यह था देश का पहला डिपार्टमेंटल स्टोर।


एबिड्स से पहले ये जगह मुस्तफा बाजार के नाम से जानी जाती थी। छठे निजाम की मुलाकात एबिड से कोलकाता में हुई। उनके आमंत्रण पर वह हैदराबाद आया और उसने अपना स्टोर खोला।
एक ऐसा मार्केटिंग कांप्लेक्स जहां जूते  चप्पल, गहने, कपड़े, खानेपीने से लेकर और वह सब कुछ जो आप ढूंढने निकले हों मिलता है। आजादी से पहले से हैदराबाद के लोगों का महत्वपूर्ण शापिंग प्वाइंट रहा है एबिड्स।

एबिड्स के पास ही स्थित है हैदराबाद का आइकोनिक ताजमहल होटल जो 1903 में बना था। यहां स्थित है 1867 का बना प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों का सेंट जार्ज चर्च। एबिड्स में आज भी हर तरह का बाजार है। हैदराबाद की सबसे प्रसिद्ध जी पुल्ला रेड्डी की मिठाइयों की दुकान भी है।  हालांकि बदलते वक्त के साथ अब एबिड्स भी बदल रहा है। यहां बिग बाजार खुल गया है। ब्रांड फैक्ट्री भी खुल गई है। भीड़ बढ़ गई है पार्किंग की समस्या होने लगी है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( ABIDS, HYDRABAD, MALL) 


Sunday, August 26, 2012

हैदराबाद का मोतियों वाला बाजार

चारमीनार की मुंडेर पर, पीछे मक्का मस्जिद। 
गले में खूबसूरत मोतियों की माला भला किसे अच्छी नहीं लगती। हैदराबाद में लंबा सा बाजार है मोतियों वाला। ये बाजार पुराने हैदराबाद में ऐतिहासिक चारमीनार से शुरू होता है। वही चार मीनार जो हैदराबाद शहर का लैंडमार्क माना जाता है। इस चार मीनार के पीछे है मक्का मस्जिद और सामने है मोतियों का बाजार। जब कभी आप हैदराबाद जाएं तो चारमीनार जरूर देखना चाहेंगे। भले आप दिल्ली के कुतुबमीनार पर नहीं चढ़ सकते हों लेकिन हैदराबाद में चारमीनार पर चढ़ सकते हैं। चढ़ने के लिए अलग सीढ़ियां हैं तो उतरने के लिए अलग। चार मीनार की मुंडेर से दिखाई देती है ऐतिहासिक मक्का मस्जिद।
 जब चार मीनार से उतरे तो वहां से मदीना बिल्डिंग तक एक किलोमीटर लंबा बाजार है इसमें कई सौ दुकानें है मोतियों की। यहां आप एक मोती से लेकर किस्म किस्म की मोतियों की माला, टाप्स, झुमके और दूसरे गहने खरीद सकते हैं। हैदराबाद में मोतियों का लंबा चौड़ा कारोबार है। यहां से खरीदे गए मोतियों के गहने बाकी शहरों से 50 फीसदी तक सस्ते हो सकते है।
हालांकि हैदराबाद के इस मोतियों के बाजार में तमाम दुकानदार सरकार से मान्यता प्राप्त होने का दावा करते हैं तो कई पुराने दुकानदार निजाम के ज्वेलर होने का दावा करते हैं। चारमीनार के आसपास आपको मोतियों की दुकान  तक पहुंचाने वाले दलाल भी मिल सकते हैं। थोड़ा सा मोल भाव करके आप यहां से अच्छे और सस्ते में मोतियों के गहने खरीद सकते हैं। 


मोतियों के खरीदने में ये सावधानी जरुर बरतें कि मोती जितना अधिक गोल होगा और आकार उसका जितना बड़ा होगा उतना ही अच्छा माना जाता है। तरासे जाने के आधार पर मोतियों की ग्रेडिंग होती है। ए, ए ए और ए ए ए। हमारे हैदराबाद प्रवास में हमारी पसंदीदा दुकान थी मोतीलाल ज्वेलर्स, मदीना बिल्डिंग के पास। जहां से हमने वाजिब कीमत पर मोतियों की माला खरीदी। पूरे देश में हैदराबादी मोती के नाम पर मोतियों का कारोबार होता है लेकिन हैदराबाद तो मोतियों का शहर ही है।
निजाम के शाही ज्वेलर -  असफ जहा राजवंश के निजाम को मोतियों से बहुत प्यार था। इसलिए चारमीनार के आसपास मोतियों का बाजार विकसित हुआ। मोतियों से पहले हैदराबाद हीरों का बड़ा केंद्र था। किसी जमाने में विश्व प्रसिद्ध कोहीनूर हीरा गोलकुंडा के खदानों से ही निकला था। साल 1906 में रामदत्त मल ने हैदराबाद में मोतियों की पहली दुकान खोली। तब रामदत्त मल को निजाम ने अपने शाही ज्वेलर का दर्जा दिया। हालांकि हैदराबाद में मोतियों का उत्पादन नहीं होता, पर यह बिक्री का बड़ा केंद्र बन गया है। बाजार में आने वाले मोती श्रीलंका, चीन और जापान से आता है। हालांकि कई जगह भारत में भी कल्चर्ड मोतियों का निर्माण होने लगा है। 
-   ----  विद्युत प्रकाश मौर्य

((HYDRABAD, PEARL MARKET, MADINA BUILDING, CHARMINAR, NIZAM )

Motilal Jewellers & Pearls, Shop.No.22-7-195, Opposite Madina Building,, Charminar, Hyderabad, Telangana 500002 Tel.: 040 2456 5211

Saturday, August 25, 2012

अलग स्वाद है हैदराबादी बिरयानी का..

बिरयानी मतलब हैदराबाद की। वैसे तो बिरयानी पूरे देश में मिलती है लेकिन जो स्वाद, सफाई, वेराइटी खाने का अंदाज हैदराबाद में वह कहीं नहीं। बिरयानी हैदराबाद की संस्कृति में रची बसी है। न सिर्फ हैदराबाद आने वाले सैलानी बल्कि यहां के लोग भी बिरयानी खूब खाते हैं।

मजे की बात की हैदराबाद की बिरयानी सबसे सस्ती भी है। दिल्ली में हैदरबादी बिरयानी के नाम पर वहां से तीन गुने कीमत पर बिरयानी बेची जाती है। हैदराबाद में सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन पर उतरते ही आपको रेलवे के कैफेटेरिया में भी बिरयानी मिल जाएगी।

वैसे आप पूरे हैदराबाद में बिरयानी कहीं भी खाएं रेट करीब करीब एक ही जैसा है। एक प्लेट बिरयानी मतलब 800 ग्राम राइस, चिकेन के कुछ टुकड़े और उसके साथ खाने के लिए मसाले और चटनी आदि। एक बिरयानी दो लोग आराम से खा सकते हैं। अगर आपकी डायट कम है तो तीन लोग भी खा सकते हैं।

पाराडाइज की बिरयानी है मशहूर 

वैसे आप हैदराबाद में हैं तो बिरयानी का मतलब है पाराडाइज की बिरयानी। पाराडाइज सिकंदराबाद के कंप्यूटर हब में एक बड़े रेस्टोरेंट का नाम है। लेकिन यह इतना प्रसिद्ध हो चुका है पाराडाइज के नाम से ये चौराहा, बस स्टॉप और इलाका जाना जाता है। आप हैदराबाद में कहीं से पूछ सकते हैं कि मुझे पाराडाइज जाना है लोग रास्ता बता देंगे।

पाराडाइज की बिरयानी बैठ कर खाएं या पैक कराएं। अगर आप पार्सल लेना चाहते हैं तो एक काउंटर पर पैसे दें और दूसरे काउंटर पर रसीद दिखाकर बिरयानी ले जाएं। इतनी तेज डिलेवरी की सर्विस कहीं नहीं दिखी। है भी इसलिए क्योंकि बिक्री काफी तेज है। वैसे अब पाराडाइज का अपना बहुत बड़ा रेस्टोरेंट भी है और आप वहां दर्जनों तरह की बिरयानी का लुत्फ उठा सकते हैं। चिकेन, एग, मटन या फिर शाकाहारी बिरयानी जैसी हो पसंद आपकी।


दम बिरयानी -  वैसे तो बिरयानी लखनऊ की भी प्रसिद्ध है लेकिन दोनों शहरों के बनाने के तौर तरीके अलग-अलग हैं। हैदराबादी बिरयानी चावल को मेरीनेट करके बनाई जाती है यानी दम बिरयानी। इसमें चिकेन के छोटे छोटे पीस डाले जाते हैं जिन्हें अच्छी तरह मसालों के साथ पकाया जाता है।इसलिए इसका स्वाद नवाबों के शहर के बिरयानी से अलग होता है।

सचिन और शोएब भी आ चुके हैं यहां - पाराडाइज की मशहूर बिरयानी का स्वाद लेने के लिए बड़ी बड़ी हस्तियां पहुंचती हैं। सचिन तेंदुलकर और शोएब अख्तर जैसे क्रिकेटर भी यहां आ चुके हैं। सानिया मिर्जा का तो शहर ही है हैदराबाद। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी यहां की बिरयानी का स्वाद ले चुके हैंं। पाराडाइज बिरयानी की वेबसाइट पर जाएं-www.paradisefoodcourt.com

ऐसे हुआ हैदराबादी बिरयानी का आविष्कार - 
हैदराबाद के शासक निज़ाम के जमाने में जब फ़ौज लडाई या किसी अभियान पर कूच करती थी तो हज़ारों फ़ौज़ियों का खाना बनाने के लिए रसोइयों की फ़ौज भी साथ चलती थी। ढेर सारे बरतन लेकर चलना पड़ता था। फ़ौज का कुछ हिस्सा तो रसोईयों और खाने के सामान के हिफ़ाजत में ही लगे रहते थे। एक बार दुश्मनों ने निज़ाम फ़ौज पर जबरदस्त धावा बोल दिया। अचानक हमले से घबराए फ़ौज़ियों ने रसोइयों को जान बचाने के लिए जंगल में भाग जाने को कहा, जल्दबाज़ी में रसोइयों ने सारी खाद्य सामग्री चूल्हे पर चढ़े बरतन में डाल दी।

निज़ाम की फ़ौज द्वारा शाम तक दुश्मन को मार भगाने के बाद जब रसोइयों ने वापस आ कर देखा तो रसोई से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी, थके फ़ौज़ियों को रसोइयों ने वही चावल परोसे। उन्हें यह नया व्यंजन बड़ा लज़ीज़ लगा। इसकी खबर निज़ाम तक भी गई। जब निज़ाम ने इसे खाया तो उन्हें इतना पसन्द आया की उसने तुरंत हुक्म दिया की आज से यह शाही बिरयानी फ़ौज़ियों के लिए पकायी जाएगी। इसमें बहुत बरतन और ढेर सारे खानसामों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इस तरह हो गया हैदराबादी बिरयानी का आविष्कार जिसकी खुशबू दुनिया भर में फैली है। 

हैदराबादी चिकन बिरयानी
वास्तव में हैदराबादी बिरयानी एक रिच डाइट है। चिकेन मे बहुत ज्यादा कैलोरी होती है। यदि आपको डिनर में बिरयानी खानी हो तो सोने से कम से कम दो घंटे पहले खाएं ताकि यह आसानी से पच सके।
ऐसे बनाएं चिकन बिरयानी
सामग्री- चिकन 1 किलो चावल 2 किलो
बड़ी इलायची 2 कटा हुआ धनिया पत्ता 2 चम्मच
दालचीनी 2 लौंग और हरी इलायची   2-2
ज़ीरा और धनिया पत्ता         आधा चम्मच
लहसुन (कटा हुआ) 2 चम्मच अदरक (कटा हुआ) 2 चम्मच
हरी मिर्च2 जावित्री 1 चम्मच,  नींबू का रस 1 चम्मच, 
प्याज़ (कटा हुआ) 4 घी 2 चम्मच
ब्राउन प्याज़ 2 बड़ा पुदीना (कटा हुआ) 2 चम्मच
साबुत काली मिर्च 6 जाफरान आधा चम्मच
नमक और हल्दी - स्वादानुसार, दही 2 कप

बनाने का तरीका
एक बर्तन में चिकन लें और अदरक लहसुन पेस्ट, पुदीना, दही, हरी मिर्च, धनिया पत्ता,  काली मिर्च, ज़ीरा, हरी मिर्च, हल्दी, नमक, धनिया पाउडर और साबुत गरम मसाला,  पीसा हुआ प्याज़ और तेल डालकर अच्छे से सबको मिलाएं। चावल में पानी और नमक डालकर पकाएं। चावल के लगभग आधा गल जाने के बाद पानी निकाल लें। अब एक बड़े बर्तन में मैरिनेटेड चिकन को फैला दें और आधा पका चावल डालें उपर से पुदीना पत्ता, फ्राई किया हुआ प्याज़ और ज़ाफरान डालें और धीमी आंच पर लगभग दो घंटे के लिए पकने छोड़ दें।

- vidyutp@gmail.com  
 ( DUM BIRYANI, HYDRABAD, PARADISE ) 

Friday, August 24, 2012

कई नामों से जाने जाते हैं ये शहर

एक शहर के नए पुराने दो नाम को लेकर काफी लोग भ्रम में रहते हैं। कई बार एक शहर में कई प्रमुख रेलवे स्टेशन के कारण भी भ्रम की स्थिति बनती है। तो आइए बात करते हैं कुछ ऐसे ही शहरों की।

हैदराबाद और सिकंदराबाद यानी टिवन सिटी। दोनों रेलवे स्टेशन के बीच की दूरी 10 किलोमीटर है। वैसे हैदराबाद के लोग हैदराबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन के नामपल्ली नाम से बुलाते हैं तो सिकंदराबाद का कोई और नाम नहीं है। वैसे हैदराबाद में एक और रेलवे स्टेशन है काचीगुडा जहां कई लंबी दूरी की ट्रेनें रुकती हैं।

केरल में पुराने ऐतिहासिक कालीकट शहर का नया नाम है कोझिकोड। इसी तरह कोचीन का नाम है कोच्चि। लेकिन एरनाकुलम और कोच्चि करीब करीब एक ही शहर हैं। यहां रेलवे स्टेशन का नाम एरनाकुलम साउथ और एरनाकुलम नार्थ है। कोचीन नाम का कोई रेलवे स्टेशन नहीं है। इसी तरह त्रिवेंद्रम का नया नाम थिरुवनंतपुरम है। साथ कोचिवेली रेलवे स्टेशन भी इसी शहर का हिस्सा है। इसी तरह कन्याकुमारी और नगरकोइल आसपास के शहर हैं।

तमिलनाडु के लोकप्रिय पर्यटन स्थल उटी का एक और नाम उदघमंडलम भी है। मद्रास का नया नाम चेन्नई हो गया है। पर तमाम लोग अभी भी मद्रास ही बोलते हैं। कई रेलगाड़ियां चेन्नई के इगमोर स्टेशन से खुलती हैं।

गुजरात में अहमदाबाद और गांधीनगर आसपास के शहर हैं। दोनों शहरों के बीच में 40 किलोमीटर की दूरी है जो लगातार बन रही कालोनियों के कारण खत्म हो चुकी है। इसी तरह गुजरात के लोकप्रिय शहर बड़ौदा का नया नाम वडोदरा है।

बंबई का नाम मुंबई हो गया। जैसे दिल्ली में कनाट प्लेस का नया नाम राजीव चौक है लेकिन काफी लोग उसे संक्षेप में अभी भी सीपी बोलते हैं। चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली बिल्कुल मिले हुए शहर हैं। पंजाब में वाघा बार्डर और अटारी एक ही बात है।

गोवा में मडगांव ओर मरगाओ एक ही शहर के नाम हैं। राजधानी दिल्ली से आपको ट्रेन पकड़ी हो तो नई दिल्ली, दिल्ली, सराय रोहिल्ला, हजरत निजामुद्दीन, आनंद विहार जैसे चार टर्मिनल हैं जहां से अलग अलग दिशाओं की ट्रेन खुलती है। यूपी की राजधानी लखनऊ। यहां का रेलवे स्टेशन है लखनऊ जंक्शन पर यहां लोक इसे चार बाग कहते हैं। किसी जमाने में लखनऊ जंक्शन के पास खूबसूरत चारबाग हुआ करता था। अब उसकी स्मृति मात्र है। 

बिहार की राजधानी पटना में पटना जंक्शन, राजेंद्रनगर, दानापुर, पटना साहिब जैसे स्टेशन हैं तो अब आने वाले दिनों में पाटलिपुत्र नामक नया रेलवे स्टेशन बन रहा है जो उत्तर बिहार के लिए बनने वाले रेल पुल से जुड़ेगा। उत्तर बिहार के प्रसिद्ध सोनपुर रेलवे स्टेशन और हाजीपुर के बीच महज छह किलोमीटर का ही अंतर है। अंत में वरुणा और असी नदियों के बीच बसे शहर वाराणसी का नाम तो लेना ही चाहिए जिसे काशी नाम से भी जाना जाता है।
आंध्र प्रदेश के शहर विशाखापत्तनम को अंग्रेजी में वाइजेग बोलते हैं। वहीं यहां वाल्टेयर नामक रेलवे स्टेशन और इसी नाम से रेलवे का एक डिविजन भी है।

-    ---विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, August 22, 2012

याद आती है रामोजी फिल्म सिटी की कैंटीन

जब में ईटीवी में साक्षात्कार दे रहा था, तो आखिरी चरण में वहां मिलने वाले कम वेतन पर मैंने थोड़ा संकोच जताया। तपाक से बोर्ड में मौजूद प्रसेनजीत जी ने कहा, हम आपको यहां कैंटीन में इतना सस्ता खाना खिलाते हैं। जो खाना हम 12.50 में खिलाते हैं वह बाजार में 50 रुपये में भी नहीं मिलता। वाकई गेस्ट हाउस में रुक कर दो दिन से मैं उनकी कैंटीन का सुस्वादु भोजन खा रहा था, इसलिए बातो में आ ही गया। इसके बाद जितने समय मैंने  रामोजी फिल्म सिटी स्थित ईटीवी के मध्य प्रदेश चैनल में नौकरी की दोपहर या रात का एक बार खाना हमेशा कैंटीन में ही खाया। 2007 में यहां खाने की प्लेट का रेट 12 रुपये 50 पैसे था। खाने की थाली में मिलती थी 10 से ज्यादा वेराइटी। तो मैं अपनी पत्नी से कहता था घर से टिफिन लेकर जाने की भला जरूरत ही क्या है।

चपाती, तीन सब्जियां, दो दाल, सांबर, रस्म, दही, तीन किस्म की चटनी, दही, चीनी, कई बार मिठाई। आरएफसी कैंटीन की थाली वास्तव में दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय खाने का मिश्रण है। बड़ी संख्या उत्तर भारतीय स्टाफ की मांग पर यहां चपाती भी बनती है। चपाती बनाने के लिए गुरुद्वारों की तरह मशीने लगाई गई हैं। हर  रोज खाने में जो तीन तरह की चटनी बनती है उसके लिए भी बड़ी बड़ी मशीने लगाई गई हैं। खास मौकों पर थाली में विशेष डिश भी खाने को मिल जाती है।
ईटीवी की कैंटीन ( फोटो सौ - शाहबाज अंसारी) 
स्टाफ कैंटीन में खाने के लिए रुपये देने की जरूरत नहीं है। आप अपने आई कार्ड पर प्रीपेड कार्ड की तरह रिचार्ज करा लिजिए। इस राशि से हर बार स्वैप कर कूपन निकालें और राशि आपके खाते से कम होती जाती है। यानी पैसे देने के लिए हाईटेक इंतजाम। लंच, डिनर और नास्ता का समय तय है। जब 12.50 का खाना था तब नास्ता महज 4.50 रुपये में मिलता था। नास्ते में डोसा, इडली, पराठा या समोसा का विकल्प रहता था।

दक्षिण भारत के साथ चावल जमकर खाते तो उत्तर भारत के लोग रोटी। दुबारा तिबारा चाहे जितना भी लेकर खाओ कोई रोट टोक नहीं। हमारे कई साथी कैंटीन का खाना जमकर खाते थे। इतना खाते थे कि खाने के बाद नींद आने लगती। कई बार काम करने की इच्छा नहीं होती। लेकिन काम तो करना ही है। कई लोगों का इस कैंटीन का खाना खाने के बाद वजन बढ़ जाता था।

जो लोग रामोजी फिल्म सिटी छोड़ चुके हैं उन्हें भी यहां की कैंटीन बार बार याद आती है। विशाल डायनिंग हाल में एक साथ 400 लोगों के बैठने का इंतजाम है। सर्विस काउंटर इतने ज्यादा होते थे कि कभी भीड़ का सामना नहीं करना पड़ा। एक साथ 11 टीवी चैनलों का स्टाफ जब यहां खाने के लिए पहुंचता है तो हिंदुस्तान कई राज्यों के लोग एक साथ होते हैं। उड़िया, बंगाली, गुजराती, कन्नड, आंध्रा, बिहारी और यूपी वाले सभी साथ। यानी लघु भारत। कैंटीन दो हिस्सों में बंटा  है। अधिकारियों का डायनिंग हाल अलग है और आम कर्मचारियों का अलग। पर किचेन और दरें एक जैसी ही हैं।

समय समय पर कैंटीन के खाने की क्वालिटी में सुधार के लिए लोगों से फीडबैक भी लिया जाता है। एक कर्मचारी खास तौर पर काउंटर खोल कर बैठता और बड़े मुस्कुराते हुए अपना फीडबैक देने का आग्रह करता। मैंने कई बार रोटी की गुणवत्ता सुधारने के लिए फीडबैक दिया। पर रोटी तो मशीन से बनती है। वैसी ही बनेगी ना। फिर भी उस कैंटीन के खाने का स्वाद बार बार याद आता है।
-vidyutp@gmail.com


Tuesday, August 21, 2012

हैदराबाद में वनस्थलीपुरम के वे दिन


जनवरी 2007 के आखिरी दिन थे। पानीपत छोड़कर मैं हैदराबाद जा रहा था, ईटीवी की नौकरी ज्वाएन करने। एक माह पहले इंटरव्यू देकर आया था। राजीव गुप्ता अमर उजाला छोड़कर आ रहे थे और मैं दैनिक भास्कर। तय हुआ था कि हमलोग सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन पर मिलेंगे। हम दोनों की ट्रेन सुबह सुबह पहुंचने वाली थी। तो यहीं मुलाकात हुई। सिकंदराबाद स्टेशन से रामोजी फिल्म सिटी के लिए हमने एक आटो मिलकर बुक किया। इंटरव्यू देने आए थे तब तो गाड़ी लेने आई थी। हमलोगों ने रामोजी फिल्म सिटी के गेट पर रिपोर्ट किया। हमारी चिट्ठी देखने के बाद हमें ईटीवी के प्रशासनिक भवन में एचआर डिपार्टमेंट तक जाने का इंतजाम किया गया। बतादूं कि विजयवाड़ा हाईवे से ईटीवी का मुख्यद्वार कोई आठ किलोमीटर अंदर है। मुख्यद्वार से टीवी चैनल के दफ्तर दो किलोमीटर और अंदर। सभी गेटों पर कड़ी सुरक्षा रहती है। एक घंटे की औपचारिकता के बाद हम ईटीवी के सदस्य बन चुके थे। हमें मध्य प्रदेश चैनल में भेजा गया। एक दो घंटे डेस्क पर गुजारने के बाद हम अपने सामान के साथ वहां चले जहां हमारे ठहरने का इंतजाम था। यूके गुडा गेस्टहाउस। यह ईटीवी के प्रवेश द्वार से पांच किलोमीटर पहले एक गांव है। यहां ईटीवी ने अपने स्टाफ के लिए कुछ फ्लैट और अतिथिगृह बनवा रखा है। यहां हमें एक हफ्ते रहने की मोहलत थी।
वनस्थलीपुरम का साईं मंदिर 
खैर हफ्ते भर बाद हमने वनस्थली पुरम में अपने लिए घर तलाश लिया था। पर इस यूके गुडा की भी कुछ यादें हैं। यहीं पर ईटीवी के वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा परिवार के साथ रहते थे। यूकेगुडा गांव में कुछ गिनी चुनी दुकानें थीं। रामोजी फिल्म सिटी की तब हैदराबाद के बाहरी इलाके हयात नगर से भी दूरी 10 किलोमीटर थी। यूकेगुडा के फ्लैट ईटीवी के वरिष्ठ पत्रकारों के लिए उपलब्ध थे। पर गांव होने के कारण वहां कोई रहना नहीं चाहता था।
हमलोगों ने दौड़भाग कर वनस्थलीपुरम में अपने लिए एक घर ढूंढ लिया।अच्छी बात थी कि यहां किराये मकान तलाशने के लिए दिल्ली या लुधियाना की तरह किसी प्रापर्टी डीलर के शरण में नहीं जाना पड़ा। जन संपर्क से मकान मिल गया। वनस्थलीपुरम इलाके में रहने वाले सभी ईटीवी के साथी नए लोगों को मकान तलाशने में एक दूसरे की मदद करते थे। इन्ही संपर्क सूत्र से हम साईं मंदिर के पास प्रशांतनगर में एक मकान में पहुंचे।

मकान मालकिन हिंदी नहीं समझ पा रही थीं और हम तेलगु। पर उनके पास मौजूद एक बिहारी मजदूर ने काम आसान किया। पता चला फ्लैट खाली जरूर है पर आप शाम को आएं तो गृह स्वामी आपसे मिलकर अंतिम निर्णय करेंगे। शाम को हमलोग पहुंच गए, बातचीत हुई। मकानमालिक रत्नाराव जी ने हमारे आईकार्ड देखे। उन्होंने पड़ोस के रहने वाले अपने एक रामोजी फिल्म सिटी में काम करने वाले मित्र को बुलाया। उसने तस्दीक की कि हम ठीक ठाक लोग हैं। मकान मिल गया। इसके बाद रत्नाराव जी के घर में आठ माह रहना हुआ। पर उनसे ऐसे रिश्ते बन गए कि हैदराबाद हमारा दूसरा घर बन गया, हमेशा के लिए।
वनस्थलीपुरम से ईटीवी दफ्तर जाने के लिए बसें मिलती थीं। हर शिफ्ट के समय के हिसाब से बसें मिलती थीं। रामोजी फिल्म सिटी का ट्रांसपोर्ट सिस्टम कुछ ऐसा था जो हैदराबाद के हर इलाके से स्टाफ को लेकर फिल्म सिटी आता था। क्या मजाल की कोई बस कभी 2 मिनट भी लेट चलती हो। हर बस में एक बस लीडर होता था। वह हमारे स्टाफ के बीच का व्यक्ति होता था। वह बस के अनुशासन का ख्याल रखता था। एक दो बार ऐसा हुआ कि बस में लड़ाई भी हो गई। अनुशासन समिति तक शिकायत गई। लड़ने वालों को मीठी चेतावनी दी गई। उसे बस लीडर के नेता कुछ मासिक मानदेय अलग से मिलता था। खास तौर पर रात को बस से दफ्तर का काम खत्म कर आते समय बस के अंदर गीत संगीत का माहौल बनता था। वो भी क्या दिन थे।
वनस्थलीपुरम में एक लघु भारत बसता था। ईटीवी गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, ओडिया के स्टाफ यहां रहते थे तो हिंदी पट्टी से राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, यूपी, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ के लोग भी रहते थे। शाम को वनस्थलीपुरम के बाजार में टहलते हुए जाने पहचाने ईटीवीयन चेहरे दिखाई दे जाते थे।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(RAMOJI FILM CITY, HYDRABAD, UKGUDA, VANASTHALIPURAM ) 


Monday, August 20, 2012

रामोजी फिल्म सिटी की सपनीली दुनिया..

रामोजी फिल्म सिटी एक सपनीली दुनिया है, हालांकि मुझे यहां ज्यादा समय रहने का मौका नहीं मिल सका। पर वे दिन बड़े आनंद के थे। वह 2007 का साल था। मैं दैनिक भास्कर पानीपत में काम करता था सीनियर सब एडीटर के पद पर। तभी एक दिन फोन आया कि आपका ईटीवी हैदराबाद में इंटरव्यू है। आने जाने का एसी 3 का किराया दिया जाएग। मैंने सोचा जब आने जाने का किराया मिल ही रहा तो जाने में क्या दिक्कत। मैं तैयार हो गया, इंटरव्यू देने जाने के लिए। दस साल प्रिंट मीडिया में काम करने के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया में जाने के बारे में सोचता भी था...आईआईएमसी से निकला था तो बहुत से दोस्त तुरंत ही इलेक्ट्रानिक मीडिया में चले गए थे..पर मैं दस साल से प्रिंट मीडिया में काम कर रहा था।

खैर वह जनवरी की बड़ी ही सर्द सुबह थी जब मैं दक्षिण के शहर हैदराबाद के लिए चला। दिल्ली से मेरी ट्रेन थी निजामुद्दीन स्टेशन से। आंध्र संपर्क क्रांति एक्सप्रेस। पानीपत दफ्तर में रात 2 बजे काम खत्म करके बस से दिल्ली के निकल पड़ा। पानीपत में मेरा आवास बस स्टैंड के ठीक पीछे तहसील कैंप में हुआ करता था। सो दिन हो या रात कभी भी दिल्ली की बस पकड़ने में असुविधा नहीं होती थी। साल 1992 में बेंगलुरू के बाद दक्षिण भारत की दूसरी बार यात्रा थी। एक नया स्ट्राली बैग ले लिया था। एसी 3 में यात्रा बडे मजे से कट गई। सुबह नौ बजे सिकंदराबाद स्टेशन पर पहुंच गया।

सिकंदराबाद स्टेशन पर रामोजी फिल्म सिटी( आरएफसी) की गाड़ी हमारा इंतजार कर रही थी। रेलवे स्टेशन पर ही राजीव गुप्ता से मुलाकात हो गई। वे अमर उजाला दिल्ली से आए थे। आरएफसी में गया तो शांति निकेतन गेस्ट हाउस में ठहराया गया। यह नकली एयरपोर्ट के साथ लगा हुआ है।

इंटरव्यू के दौरान ही तीन दिनों तक रामोजी फिल्म सिटी के गेस्ट हाउस में रहा।इसी दौरान इंटरव्यू भी हुआ। एचआर के एक सज्जन इन तीन दिनों तक हमारे स्वागत और मार्गदर्शन के लिए साथ रहे। इस दौरान कई लोगों से दोस्ती हुई। इस प्रवास के दौरान हम लोग ईटीवी के और रामोजी फिल्म सिटी के चकाचौंध में फंस गए। ईटीवी के एमपी चैनल में मेरा मिड्ल लेवल जर्नलिस्ट के पद पर चयन हो गया।
हमारे बोर्ड में प्रसेनजीत और नरेंद्र जी थे, उन्होंने पूछा कब से ज्वाएन करेंगे , मैंने कहा पहले ऑफर लेटर भेजिए, अपने संस्थान को नोटिस दूंगा उसके बाद आउंगा। पर हमने सोचा हैदराबाद आना हुआ है तो अच्छी तरह घूम लिया जाए। तो हमने रामोजी फिल्म सिटी के नजारे देख लेना तय किया।


रामोजी फिल्म सिटी की जिसे दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म सिटी होने का गौरव प्राप्त है...हैदराबाद शहर से बाहर विजयवाड़ा रोड पर इसका विशाल कैंपस है....हर रोज कई हजार टूरिस्ट इस फिल्म सिटी को देखने आते हैं...यहां दर्जनों हिंदी फिल्मों की भी शूटिंग हुई है। इसमें नाचे मयूरी, अमिताभ बच्चन की सूर्यवंशम आदि प्रमुख है। यहां हमने वह घर देखा जो सूर्यवंशम में अमिताभ का घर दिखाया गया है।
फिल्म सूर्यवंशम में अमिताभ बच्चन का घर ( रामोजी फिल्म सिटी)

रामोजी फिल्म सिटी में ही ईटीवी समूह के 12 भारतीय भाषाओं के चैनलों के हेड आफिस हैं...इनमें से चार हिंदी के चैनल भी हैं...इसका मतलब की पत्रकारों की एक बड़ी बिरादरी यहां काम करती है...ईटीवी इलेक्ट्रानिक मीडिया की बड़ी नर्सरी बन चुकी है...सभी बड़े चैनलों में भी ईटीवी के लोग पहुंच चुके हैं...

हरी भरी पहाड़ियों के बीच रामोजी फिल्म सिटी का नजारा बड़ा सुहावना है....विशाल दफ्तर...लंबी चौड़ी कैंटीन और संपन्न रेफरेंस लाइब्रेरी...ईटीवी की खास बातों में से एक है...ईटीवी में काम करने वाले कई लोग बहुत सी बातों को लेकर कुंठित भी रहते हैं पर मैं यहां उनकी चर्चा नहीं करना चाहूंगा.... एक अनुशासन है जिसके बदौलत रामोजी फिल्म सिटी में सारी व्यवस्था चलती है। 

कई दर्जन बसें रोज कर्मचारियों को लेकर फिल्म सिटी में आती हैं....फिर उन्हें छोड़ने के लिए घर भी जाती हैं....पहाड़ों के बीच जब सूरज की पहली किरण फिल्म सिटी में पड़ती है तो सुबह देखने लायक होती है....विशाल हरे भरे पार्क और एक से बढ़कर एक शूटिंग लोकेशन्स रामोजी फिल्म सिटी की विशेषता है....हमेशा यहां किसी न किसी फिल्म की शूटिंग चलती रहती है....रामोजी फिल्म सिटी के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप उनकी आफिशियल वेबसाइट पर जा सकते हैं....

पानीपत लौट आने पर औपचारिक बुलावा आ गया। उसके बाद आठ महीने मैंने ईटीवी में गुजारे। इसके मध्य प्रदेश चैनल में। हमारे चैनल के इंचार्ज योगेश जोशी और रुपेश श्रोती से सानिध्य में। आठ महीने के अनुभव बड़े अच्छे रहे। यहां आने पर पता चला कि यहां चार सौ हिंदी पत्रकारों की जमात रहती है। इसमें ज्यादातर लोग वनस्थलीपुरम में रहते हैं। ( इस पर फिर कभी बात करेंगे )

इनाडू समूह और रामोजी फिल्म सिटी - 

1974 में 10 अगस्त को इनाडू समूह रामोजी राव ने विशाखापट्टनम में इनाडू नाम से एक तेलुगु समाचारपत्र की शुरुआत की।

1975 मे 17 दिसम्बर को  इस समाचारपत्र के हैदराबाद संस्करण की शुरुआत से की गई।

1995 में रामोजीराव ने इनाडू टीवी (ई.टीवी) की शुरुआत की। यह एक तेलुगु भाषा का चैनल था।

1997 में 9 सितंबर को रामोजी राव ने हैदराबाद के निकट विजयवाड़ा हाईवे पर रंगारेड्डी जिले में लगभग 1000 एकड़ में फैली एक फिल्म सिटी का भी निर्माण शुरू किया। इसे रामोजी फिल्म सिटी के नाम से जाना जाता है। अब इसका दायरा 1700 एकड़ में है।

- रामोजी फिल्म सिटी संपर्क नंबर - 1800 4250 9999


-विद्युत प्रकाश मौर्य - Email - vidyutp@gmail.com 
( RAMOJI FILM CITY, HYDRABAD, TELNGANA, ANDHRA PRADESH, RANGA REDDY DISTRICT ) 

Sunday, August 19, 2012

और हम विद्या अध्ययन के लिए निकल पड़े काशी

बचपन में जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो पुरोहित बालक पूछता है- कहां जा रहे हो तो वह बोलता है काशी...काशी क्यों तो पढ़ाई करने....काशी यानी विद्या अध्ययन का पर्याय....विद्वानों की नगरी...

संयोग कुछ ऐसा बना की इंटर की परीक्षा पास करने के बाद मेरी भी इच्छा बनारस में पढ़ाई करने की हुई...मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए मन बनाया...

मार्च का महीना था...प्रवेश की तारीखों के बारे में कुछ नहीं पता था। यह 1990 का साल था। महीना था जून का। मैं और मेरे मित्र विष्णु वैभव दोनों एक शाम सोनपुर से वाराणसी पैसेंजर में सवार हुए... यह मीटर गेज रेलवे लाइन थी। सुबह चार बजे ट्रेन छोटे छोटे दर्जनों स्टेशनों को पार करती हुई बनारस पहुंच गई...तब वाराणसी सोनपुर के बीच छोटी लाइन थी जो अब ब्राड गेज में बदल चुकी है। बनारस रेलवे स्टेशन का आकार भी बाहर से मंदिर जैसा ही है....

हमारे पास संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का पता था। वे वहां बीएड विभाग के हेड थे...कुछ नाम था शायद वाचस्पति द्विदेदी....संपूर्णानंद यूनीवर्सिटी वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास ही है। सुबह सुबह हमने उनका दरवाजा खटखटाया...

उन्होंने समान्य शिष्टाचार के बाद सलाह दी... पहली बार बनारस आए हो तो दोनों यहां से सीधे दश्वाश्वमेध घाट चले जाओ वहां गंगा जी में स्नान कर लेना उसके बाद वहीं से बीएचयू चले जाना...तब तक नौ बज जाएंगे और यूनीवर्सिटी खुल भी जाएगी....हमने विद्वान पुरूष की राय पर अमल किया...
हमलोग सुबह सुबह दशाश्वमेध घाट पहुंच गए... वहां देखा हजारों लोग गंगा स्नान कर रहे हैं। गंगा जी बनारस में उत्तर-दक्षिण बहती हैं। इसलिए सुबह के सूरज की पहली किरण दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर आकर पड़ती है। उसके बाद वाराणसी के घाटों का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाता है। तभी बनारस की सुबह का कई कविओं ने अपने अपने तरीके से गुणगान किया है।



 बनारस में गंगा स्नान करने के बाद हमने बाबा विश्वनाथ के दर्शन की सोची... बाहर निकल कर एक गली में घुस गए...कई घंटे चक्कर लगाने के बाद भी भोले बाबा का दरबार नहीं मिला...तब जाकर याद आया कि बनारस की गलियों के बारे में भी कितने तरह के किस्से मशहूर हैं। खैर हमने किसी से बाहर सड़क पर निकलने का रास्ता पूछा और आटो रिक्शा पर बैठकर पहुंच गए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गेट पर....


विशाल सिंह द्वार और उसके बाहर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की विशाल मूर्ति....खैर हम गेट के अंदर घुसे... हमारे पास बीएचयू के मेडिकल कालेज की कैंटीन में काम करने वाले बीएन तिवारी जी का पता था...

मेडिकल कालेज की तीसरी मंजिल पर स्थित कैंटीन में तिवारी जी मिले...उन्होंने बातें करने से पहले चाय नास्ता कराया....फिर हमने उन्हें अपने आने का उद्देश्य बताया....उन्होंने सेंट्रल आफिस जाने को कहा... 

इस दौरान हमें बीएचयू के भव्य परिसर का साक्षात्कार हुआ। फार्म खरीदने के साथ तय किया किसी भी तरह यहीं पढ़ाई करने आना है। इसके बाद अगले दो दिन हमलोग महामनापुरी कालोनी में अपने पिताजी के एक मित्र गजेंद्रनाथ शुक्ला के घर रुके। शुक्ला जी वैशाली जिले के कन्हौली एस्टेट परिवार से आते हैं। वे बीएचयू में कर्मचारी के तौर पर कार्यरत थे।



प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन करने के बाद हमने लंका पर आकर बीएचयू प्रवेश परीक्षा की गाइड खरीदी...दुबारा प्रवेश परीक्षा देने बनारस आना हुआ...। मेरा परीक्षा केंद्र सांख्यिकी विभाग में था। 
प्रवेश परीक्षा यानी इंट्रेस के रिजल्ट में 1990 में मैं सेकेंड टाप पोजीशन पर आया था....इसके बाद में सामाजिक विज्ञान संकाय में इतिहास (प्रतिष्ठा) में नामांकन लिया। उसके बाद पांच साल बीएचयू कैंपस में गुजारे। जिसके सैकड़ो खट्टे-मीठे अनुभव हैं। कभी मौका मिला तो सुनाउंगा। 


-विद्युत प्रकाश मौर्य  

( BHU, VARANASI, UTTAR PRADESH, RAIL, DASHASHWAMEDH GHAT  ) 

Saturday, August 18, 2012

हरिद्वार- आखिर कौन है असली चोटीवाला

हर की पौड़ी के पास चोटीवाला बजाते हैं घंटी।
कई दशकों से जो लोग हरिद्वार या ऋषिकेश घूमने जा रहे हैं वे अक्सर चोटीवाला के रेस्टोरेंट में खाने जरूर जाते हैं। लेकिन हरिद्वार जाने के बाद यह समझ पाना मुश्किल है कि असली चोटीवाला कौन है। हरिद्वार में चोटीवाला नाम के तीन रेस्टोरेंट हैं और ऋषिकेश में दो।

ऋषिकेश से आगे बढ़ने पर मुनि की रेती में रामझूला या शिवानंद झूला को पार करके जैसे ही आप स्वर्गाश्रम की ओर बढ़ते हैं तो वहां चोटीवाला का शानदार रेस्टोरेंट दिखाई देता है। किसी जमाने में ढाबेनुमा रेस्टोरेंट अब हाई फाई रेस्टोरेंट की शक्ल ले चुका है। इसकी अपनी वेबसाइट भी है। चोटीवाला की खास बात है रेस्टोरेंट के बाहर एक लंबी चोटीवाला आदमी ग्राहकों का मुस्कुराकर स्वागत करता रहता है। चेहरे पर खास किस्म का पेंट लगाकर यह आदमी दिन भर बैठा रहता है। रेस्टोरेंट के साइनबोर्ड पोस्टर बैनर पर भी चोटीवाले को खास जगह दी गई है। हरिद्वार ऋषिकेश आने वाले लोग चोटीवाला जाकर जरूर जीमना चाहते हैं। पर मुश्किल है कि अब स्वर्गाश्रम में ही दो चोटीवाला हो गए हैं। बिल्कुल अगल बगल में। दोनों असली होने के दावा करते हैं।
हर की पौड़ी के पास चोटीवाला 

1958 में स्थापित ये रेस्टोरेंट देश भर में जाना जाता है अपने नाम से। नाम ही कुछ ऐसा है जो नहीं भूलता है। खाने की बात करें तो इसकी अलग पहचान है। जब बंगाल का कोई आदमी पहली बार हरिद्वार तीर्थ के लिए चलता है तो पिता पुत्र को कहता है कि चोटीवाला में जरूर खाकर आना। समय के अनुसार चोटीवाला ने अपना रंग ढंग भी बदला है। चोटीवाला के मेनू कार्ड में अब उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, बंगाली, गुजराती और चायनीज डिश भी हैं। इसके अलावा चोटीवाला का अपना स्पेशल मेनू भी है।

मैं पहली बार 1991 में ऋषिकेश गया था तब चोटीवाला में और अब डेकोर में काफी बदलाव आ चुका है। कहते हैं कि चोटीवाला की अगली पीढी़ आ गई है इसलिए यहां एक साथ दो चोटीवाला हो गए हैं। मजे की बात दोनों के आगे एक चोटीवाला आदमी ग्राहकों का स्वागत मुस्कान के साथ करता है। लोग उसके साथ फोटो खिंचवाते नजर आते हैं। स्वर्गाश्रम के चोटीवाला के आगे लिखा है कि हमारी हरिद्वार में कोई ब्रांच नहीं है। अब चोटीवाला का नाम बिकने लगा है यहां खाना पीना कुछ महंगा हो गया है...इसलिए रौनक कुछ कम हो गई है। ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली के चांदनी चौक में घंटेवाला की।
हर की पौड़ी के पास चोटीवाला 

खैर जब आप हरिद्वार हर की पौड़ी में जाएंगे तो वहां भी दो चोटीवाला के रेस्टोरेंट मिलते हैं। एक गंगा जी के घाट की तरफ है तो दूसरा बड़ा बाजार की गली में। दोनों ही असली चोटीवाला होने का दावा करते हैं। हालांकि इनके यहां कोई आदमी लंबी चुटिया लगाकर नहीं बैठा होता है लेकिन खाने पीने वालों की खूब भीड़ रहती है। यहां का मसाला डोसा या फिर पंजाबी खाना मस्त है। हरिद्वार मे रेलवे रोड पर एक और चोटीवाला नाम का रेस्टोरेंट है। हालांकि अगर आप चोटीवाला से अलग हटकर कुछ खाना चाहते हैं तो अपर रोड पर होशियारपुरी होटल में भी खाने जा सकते हैं।

असली चोटीवाला की वेबसाइट- 
http://www.chotiwalarestaurant.com

( HARIDWAR, RISHIKESH, CHOTIWALA)