Tuesday, July 17, 2012

लाल बाग का रुमानी सफर और जूड़े में गजरा

बिहार की प्रस्तुति - राधा ना बोले रे....
पैलेस ग्राउंड बेंगलुरू में हमारे दस दिन गुजरे। देश भर से आए थे 1200 युवाओं के साथ रेलवे के दो सौ कर्मचारी भी हमारे साथ घुलमिल गए थे इस आध्यात्मिक युवा शिविर में। यह पैलेस ग्राउंड शहर के ऐतिहासिक बेंगलुरु पैलेस से लगा हुआ है। इस विशाल मैदान में अक्सर बड़े बड़े आयोजन हुआ करते हैं। 

बंगलुरू शिविर में बिहार से आए हमारे साथियों का नारा होता था- आए हम बिहार से नफरत मिटाने प्यार से।

शिविर के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम में हमने एक दिन बिहार की टीम की ओर होली पेश किया। इसकी पंक्तियां थी - हो मधुबन में...खेलत रंग गुजरिया हो मधुबन में। इसके आखिरी पंक्तियों में हम सभी मंच पर खड़े होकर रंग गुलाल उड़ाने लगे। खूब रंग जमा। 
राधा ना बोले, ना बोले रे...

एक दिन बिहार के मुजफ्फरपुर से आई टीम ने सुंदर नृत्य गीत की प्रस्तुति दी। बोल थे राधा ना बोले,, ना बोले.. ना बोले रे...इसमें कामाक्षी बनी थी कान्हा तो स्निग्धा बनी थी राधा की सहेली और प्रियंका बनी थी राधा। यह आयोजन रात को बेंगलुरू के किसी और कोने में हुआ था। इस आयोजन के बाद में चलने को हुआ तो मेरा चप्पल चोरी हो गया था। फिर मैंने बाजार से एक कोल्हापुरी चप्पल खरीदा जिसने अगले कुछ दिनों तक मेरा साथ निभाया। शिविर के दौरान एक दिन के सांस्कृतिक आयोजन के दौरान बिहार की टीम ने तय किया कि अगर हमारे कार्यक्रम में ढोल बज जाए तो अच्छा होगा। एक दूसरे राज्य की टीम में ढोल वाला था हमने उससे आग्रह किया। पर हमें तब झ़टका लगा जब उसने ढोल बजाने के लिए दो सौ रुपये की मांग कर दी। खैर हमारा कार्यक्रम बिना ढोल के ही हुआ। 
बेंगलुरू शिविर में बिहार के मुजफ्फरपुर और हाजीपुर की टीम के साथी। 
खूब याद आते हैं यश शर्मा -  इस शिविर में कश्मीर से डोगरी के साहित्यकार यश शर्मा भी पहुंचे थे। उन्हे अगले साल साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। कश्मीर दूरदर्शन पर खबरें भी पढ़ते थे। मुलाकात और परिचय होते ही पूछा- बिहार से आए हो तो क्या फणीश्वरनाथ रेणु को पढ़ा है। हमने कहा हां पढ़ा है तो काफी खुश हुए। यश शर्मा को डोगरी साहित्य का प्रिंस कहा जाता था। उनकी बेटी सीमा सहगल जानी मानी सूफी गायिका हैं। 1993 में जम्मू जाने पर हमारी उनसे दुबारा मुलाकात हुई थी।  ( इस प्रकरण को यहां पढ़ें)  5 सितंबर 2011 को 82 साल की आयु में उनका जम्मू में निधन हो गया।

तब सी.के. जाफरशरीफ केंद्र में रेल मंत्री थे। युवा शिविर के संचालन में उनकी बड़ी भूमिका थी। रोज आते थे शिविर में हाल चाल लेने। वे कांग्रेस सेवा दल के जमाने में सुब्बराव जी के पुराने शिष्य रहे। बताते थे
, कांग्रेस सेवा दल में उनसे काफी कुछ सीखा था। इस शिविर में मेरे दर्जनों नए दोस्त बने।
 रक्तदान और रोटियां
 बंगलुरू शिविर में मैंने पहली बार रक्तदान किया। शिविर के दौरान दो दिन रक्तदान कैंप लगाया गया था। शिविर में सब कुछ ठीक था लेकिन यहां उत्तर भारत के लोगों को खाने में रोटी नहीं मिलती थी। लिहाजा रोटी के लिए किचेन हेल्प में ड्यूटी लगती थी और रोटियां हमें खुद बनानी पड़ती थीं। ऐसी ही एक ड्यूटी के दौरान जॉन राजेश्वर कुजुर ने अकेले 200 रोटियां बनाईं। हमारे समूह की रोटियां बनाने की ड्यूटी जिस दिन लगी उस दिन मैंने रक्तदान किया था लिहाजा मैं चूल्हे के पास बैठकर काम नहीं कर सकता था। पर जॉन ने कहा, काम करो या मत करो पर हमारे लीडर का हमारे पास होना जरूरी है। लिहाजा मैं उनके पास ही बैठा रहा। बंगलोर यात्रा के दौरान हम चिन्ना स्वामी स्टेडियम भी गए। यहां अक्सर इंटरनेशनल क्रिकेट मैच हुआ करते हैं।


चांदनी रात में लालबाग की सैर

बेंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम में राजीव और दिग्विजय के साथ
अगर आप बेंगलुरू जाएं तो लाल बाग की सैर करने जरूर जाएं। ये  अद्भुत उद्यान है। चांदनी रातों में लाल बाग की खूबसूरती और बढ़ जाती है। एक शाम हमलोग लालबाग की सैर करने गए। हमारे साथ चल रही कामाक्षी और स्निग्धा ने लाल बाग से निकलने के बाद कहा कि हम बालों में गजरा लगाएंगे। हमलोग जल्दी शिविर पहुंचना चाहते थे। दक्षिण की महिलाओं में बालों में गजरा लगाने का शौक है। गजरा लगाने के बाद प्रफुल्लित स्निग्धा बोल उठी- तुम क्या जानो विद्युत कि बालों में गजरा लगाने के बाद कैसी सुखद अनुभूति होती है। मुझे शिवमंगल सिंह सुमन की कविता की पंक्तियां याद आ गईं - तुम जुड़े में गजरा मत बांधो मेरा गीत भटक जाएगा। 


कुमार गंधर्व के निधन की खबर - 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती है। इसी दिन दोपहर में शिविर का भव्य औपचारिक उदघाटन हुआ। शाम को छह बजे रोज की तरह होने वाली प्रार्थना सभा में सुब्बराव जी ने जानकारी दी की कुमार गंधर्व नहीं रहे। महान शास्त्रीय गायक का 67 साल की उम्र में निधन हो गया। वे मूल रूप से कर्नाटक के थे लेकिन देवास मध्य प्रदेश में रहते थे। उन्होंने खास तौर पर कबीर के भजन शास्त्रीय सुर में गाए। कुमार गंधर्व को श्रद्धांजलि देते हुए सुब्बराव जी ने उनका प्रिय भजन गाकर सुनाया – अवधूता हम युगानाम योगी....
टैलेंट एक्सचेंज क्लास – शिविर में हर रोज दो घंटे टैलेंट एक्सचेंज की क्लास होती है। इसमें या तो आप किसी दूसरे राज्य की भाषा सीखें सिखाएं या फिर किसी दूसरे राज्य की नृत्य सीखें। कुछ और भी चीजें जैसे योगा आदि सीखा जा सकता है। मैंने बेंगलुरू शिविर में पंजाबी नृत्य भंगड़ा सीखने की क्लास में हिस्सा लिया। कुछ दिन में मालूम हुआ कि भंगड़ा कितना मुश्किल है। बहुत अभ्यास चाहिए। मैं ज्यादा भंगड़ा तो नहीं सीख पाया पर साथी राजीव असमिया बीहू काफी हद तक सीख गए।
वह मैसूर में दोपहर का खाना

शिविर के दौरान हमलोग एक दिन मैसूर घूमने गए। यहां पर दोपहर का खाना हमें अपनी जेब से खर्च करके खाना था। पूछताछ करते हुए हमलोग एक भोजनालय में गए। 14 रुपये में भरपेट खाना। हमारे साथ कुछ लोग बड़े खुश हुए। बिहार के भाई राकेश पाठक ने जब छक कर खाना शुरू किया तो रेस्टोरेंट के वेटरों का चेहरा देखने लायक था। खाना सुस्वादु तो था ही। हमें चेन्नई के होटल मुरादी भागीरथी के शानदार खाने की याद आ गई।


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

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