Tuesday, July 31, 2012

नीलांचल यानी पुरी का समुद्र तट

सितंबर 1991 का जुलाई का महीना। तय हुआ की इस बार पिताजी की बैंक की एलटीसी में कोलकाता और जगन्नाथ पुरी भ्रमण का आनंद उठाया जाए। पटना से पुरी के लिए तब सीधी ट्रेन नहीं थी। दानापुर एक्सप्रेस के एसी 2 क्लास से हमलोग सपरिवार हावड़ा के लिए सवार हुए। शाम को ट्रेन खुली। सुबह नींद खुली तो ट्रेन डानकुनी जंक्सन क्रास कर रही थी। थोड़ी देर बाद खिड़की से स्टेशन दिखाई दिया लिलुआ। और इसके तुरंत बाद हावड़ा आ गया। ये क्या ट्रेन में सफर का पूरा मजा भी नहीं आया। हावड़ा स्टेशन का नजारा कुछ अलग ही था। यहां प्लेटफार्म तक कारें चली आती हैं सरपट। तब कंप्यूटरीकृत रेल आरक्षण तो शुरू हो गया था पर पूरा देश लिंक से जुड़ा नहीं था। हमने अपने पुरी तक के टिकट को पहले ही किसी मित्र की मदद से हावड़ा से पूरी जाने वाली ट्रेन में भी आरक्षण करा लिया था। आगे का सफर शाम को श्री जगन्नाथ एक्सप्रेस से आरंभ हुआ। पुरी से पहले खुर्दा रोड से ही ट्रेन में पंडे आने लगे। हमारे खानदान के बारे में पूछताछ शुरू हो गई। पर हमने पुरी में कहां जाकर रूकना है पहले से ही तय कर रखा था। लिहाजा पंडों के चक्कर में नहीं पड़े। 

कहते हैं मनुष्य को अकेलेपन का वक्त काटना हो तो समंदर से बढ़िया कोई साथी नहीं हो सकता। वह भी अगर ओडिशा के पुरी का समुद्र तट हो तो बात ही क्या। पुरी का समुद्र तट यानी नीलांचल। इस समुद्र तट की बात बाकी समुद्र तटों से काफी अलग है। पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से दो किलोमीटर आगे है पुरी का समुद्र तट। 

हिन्दुस्तान में वैसे तो मुंबई, गुजरात, केरल चेन्नई, कन्याकुमारी तमाम जगह समुद्र तट हैं। किसी को कोई भी समुद्र तट सुंदर लग सकता है लेकिन पुरी के नीलांचल की बात कुछ अलग है। नीलांचल का मतलब ही पुरी है। तभी तो दिल्ली से पुरी जाने वाली ट्रेन का नाम ही नीलांचल एक्सप्रेस रखा गया है।
साल 1991 में पूरी के समंदर में. पिताजी और भाई बहनों के साथ। 
 यहां बैठकर जब आप समुद्र को निहारते हैं तो आसमान के फलक और समुद्र के मिलन के बीच एक खास तरह का सानिध्य का एहसास नजर आता है। नीले रंग के इस समुद्र को आप घंटों निहारते रहें लेकिन आप को अकेलापन नहीं खलेगा। समंदर का संगीत जो है साथ में।

पुरी के समुद्र तट किनारे कई किलोमीटर में फैले होटल हैं। एक श्रंखला में सौ से ज्यादा होटल। अगर आप सी बीच पर किसी होटल में ठहरते हैं तो होटल के कमरे से भी समंदर की अटखेलियों का आनंद उठा सकते हैं। साथ ही आप समंदर के तट के साथ टहलते हुए कई किलोमीटर तक आगे बढ़ते जा सकते हैं। जब थक जाएं तो अपने होटल को वापस लौट आएं।
पुरी होटल के सामने। ( 1991) 
 आप समंदर में नहाने का खूब मजा ले सकते हैं। लेकिन आपको पता ही होगा कि समंदर में नहाने के बाद फिर से आकर होटल के कमरे में साफ पानी में नहाना पड़ता है।

भगवान जगन्नाथ के शहर पुरी में छुट्टियां मनाना बाकी शहरों से सस्ता है। बस रथयात्रा का एक महीना ( जून जुलाई ) यहां का पीक सीजन होता है। साल के बाकी महीनों में यहां आना बेहतर है अगर आप समंदर की लहरों के साथ खेलना का पूरा आनंद उठाना चाहते हैं तो।

अगर आप पुरी जाएं तो समुद्र तट पर पुरी होटल में ठहर सकते हैं। ये एक मध्यवर्गीय सुविधाजनक होटल है। पुरी रेलवे स्टेशन से पुरी होटल के लिए होटल की ओर से फ्री बस सेवा भी उपलब्ध रहती है। पुरी होटल की खिड़की से आप देर रात तक समुद्र की लहरों का नजारा कर सकते हैं। वैसे पुरी में समुद्र तट के किनारे पंक्ति में 100 से ज्यादा होटल हैं। पुरी होटल की अपनी विरासत और आतिथ्य की परंपरा है। देश आजाद होने वाले साल में ही 1947 में ये होटल तीन कमरोें के साथ शुरू हुआ था।  

-  -   विद्युत प्रकाश मौर्य Email -vidyutp@gmail.com
(NILANCHAL, BLUE SEA, PURI, ODISHA, PURI HOTEL ) 

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