Monday, July 30, 2012

आस्था की यात्रा- बोलबम, सुलतानगंज से देवघर

सुलतानगंज में गंगा नदी का विस्तार 
हर साल सावन में उमड़ता है शिवभक्ति सैलाब। देश भर में शिव की पूजा के अलग अलग रंग देखने को मिलते हैं।जम्मू में अमरनाथ यात्रा तो हरिद्वार में कावड़ यात्रा। पश्चिम बंगाल में शिवभक्त तारकेश्वर नाथ जलाभिषेक करने जाते हैं। लेकिन बिहार और झारखंड में सुल्तानगंज से देवघर की 119 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा अनूठी है। बिहार में सुल्तानगंज में उत्तरायणी गंगा से जल लेकर श्रद्धालु बोलबम के नारे लगाते चल पड़ते हैं देवघर की ओर। बोलबम का नारा है बाबा एक सहारा है। लाखों श्रद्धालु तो हर साल जाते हैं बोलबम।
आस्था की इस अनूठी यात्रा का सहभागी बनने का मौका मिला था मुझे  साल 1990 में। इंटर पास करने के बाद बीएचयू में एडमिशन लेने की प्रक्रिया में था। इसी दौरान पिता जी के बैंक के कुछ पारिवारिक मित्रों की मंडली बनी और हम निकल पड़े।

पहला दिन - भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से शुक्रवार की सुबह हम सबने एक साथ जल उठाया। जल उठाने से पहले गंगा में स्नान कांवर की पूजा। इसके बाद के लंबे पैदल सफर की शुरुआत। नंगे पांव। हाथी ना घोड़ा ना कौनो सवारी...पैदल ही पैदल अइनी हम भोला तोहरे दुआरी... 119 किलोमीटर के सफर में पहले सड़क भी कच्ची रास्ता, फिर नदी, पहाड़, जंगल सबकुछ आता है। सुलतानगंज से तारापुर तक का रास्ता पक्की सड़क के साथ साथ चलता है। उसके बाद नहर पकड़ कर कच्ची सड़क पर कुछ किलोमीटर का रास्ता। हमारा पहला पडाव था 36 किलोमीटर की पदयात्रा करने के बाद कमरसार धर्मशाला में। दिन की यात्रा में हमारी पूरी मंडली साथ रही। रात को हमलोग एक साथ ही रूके। पहला दिन अच्छा रहा। पिताजी के दोस्त आईडीएन सिंह और आरबी राय के बेटे साथ थे। वे मेरी उम्र के थे। उनके साथ हंसी खुशी में सफर कट गया।

दूसरा दिन -  अगले दिन से कमरसार से हमलोग सुबह सुबह चल पड़े। पापा के मित्र आरबी राय के बोलबम कहने और उत्साह बढ़ाने का अंदाज निराला था। पर कुछ घंटे चलने के बाद सबकी गति अलग अलग हो गई। कोई  तेज चल रहा था तो कोई धीरे-धीरे। यानी सब आगे पीछे चलने लगे। थोड़ी देर बाद मैं और पिता जी ही साथ चल रहे थे। बाकी सब लोग अलग हो चुके थे।

जब मैं पड़ गया अकेला - इस दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब मैं अपनी मंडली से अकेला पड़ गया।  कई किलोमीटर तो मैं पिता जी से भी बिछुड़ गया। मेरे जेब में ज्यादा रुपये भी नहीं थे। अगर देवघर पहुंच भी जाउं तो पिता जी और उनकी बाकी मंडली से आस्था के महाकुंभ में मुलाकात कैसे होगी। पहली यात्रा थी। कहां रुकना है ये भी मालूम नहीं था। मैं अपना कांवर एक जगह स्टैंड पर रखकर एक यात्रा द्वार के पास बैठ गया। कुछ घंटे बाद अचानक पिता जी ने मुझे देख लिया।

बोलबम के सारे रास्ते में मेले सा माहौल रहता है। लेकिन रात्रि विश्राम के लिए जहां रुकते हैं वहां जगह को लेकर मारा मारी रहती है। दूसरे दिन दोपहर के बाद मैं पिता जी के साथ काफी उत्साह से चलता रहा। रात को रुकने के बजाए सफर तेजी से तय करते रहे। पर जब चलते चलते रात को भूख लगी तो आसपास कोई भोजनालय नहीं मिला। कुछ किलोमीटर और चले। तब जाकर खाना नसीब हुआ। लेकिन क्या मिला, सिर्फ भात दाल और चोखा। खैर भूख लगी थी तो उसमें भी बहुत स्वाद लगा। दूसरी रात सोने की जगह नहीं मिली। बारिश भी हो रही थी। भींगते हुए किसी तरह नींद ली और किसी तरह रात गुजारी।

तीसरा दिन - तीसरे दिन पांव थकने लगे थे। लेकिन देवघर नजदीक आता जा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो को चुंबकीय शक्ति हमें खींच रही थी अब। भुल भुलैया, गोरियारी, पटनिया, कलकतिया में छोटी छोटी नदियां आती हैं, इन्हें नंगे पांव पार करने में आनंद आता है। बाबाधाम नजदीक आने पर कई राहत और सेवा शिविर भी रास्ते में आते हैं। यहां थके पांव में बाम और आयोडेक्स लगाने का इंतजाम रहता है। एक जगह हमने भी गर्म पानी में पांव डाल कर राहत महसूस करने की कोशिश की। दर्शनिया वह जगह है जहां से बाबा मंदिर के दर्शन हो जाते हैं। देवघर से पहले दर्शनिया में ही हम अपने पंडा रत्नेश्वर मठपति झा के घर में रुके। उनका घर हिंदी विद्यापीठ गेट के पास था। शायद अब वे इस दुनिया में नहीं होंगे क्योंकि वे काफी बुजुर्ग हो चुके थे। उनके बेटे अपने पुरोहितों का ख्याल रखते होंगे। वह रविवार की शाम थी। हमने सोमवार का इंतजार नहीं किया श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए। रविवार की शाम को ही जलाभिषेक करने का फैसला किया। कहते हैं आप बाबाधाम तभी पहुंचते हैं जब आपको बाबा बुलाते हैं। तभी तो भक्त कहते हैं.. चलो बुलावा आया है... बाबा ने बुलाया है। तो ...चल रे कांवरिया शिव के नगरिया...


बोलबम का यात्रा मार्ग   

- बाबा अजगैबी नाथ मंदिर (सुल्तानगंज) से कामराय 6 किमी
- कामराय से मासूमगंज 2 किमी 
- मासूमगंज से असरगंज 5 किमी
- असरगंज से रणगांव 5 किमी
- रणगांव से तारापुर 3 किमी
- तारापुर से माधोडीह 2 किमी
- माधोडीह से रामपुर 5 किमी
- रामपुर से कुमारसार 8 किमी
- कुमारसार से विश्वकर्मा टोला 4 किमी
- विश्वकर्मा टोला से महादेव नगर 3 किमी
- महादेव नगर से चंदन नगर 3 किमी
- चंदननगर से जिलेबिया मोड 8 किमी
- जिलेबिया मोड से तागेश्वरनाथ 5 किमी 
- तागेश्वरनात से सूईया पहाड़ 3 किमी
- सुईया से शिवलोक 2 किमी
- शिवलोक से अबरखिया 6 किमी
- अबरखिया से कटोरिया 8 किमी
- कटोरिया से लक्ष्मण झूला 8 किमी
- लक्ष्मण झूला से इनरावरण 8 किमी
- इनरावरण से भूलभुलैया नदी 3 किमी
- भूलभुलैया नदी से गोरियारी 5 किमी
- गोरियारी से पटनिया 5 किमी
- पटनिया से कलकतिया 3 किमी
- कलकतिया से भूतबंगला 5 किमी
- भूतबंगला से दर्शनिया 1 किमी
- दर्शनिया से बाबा वैद्यनाथ मंदिर 1 किमी


सूईया पहाड़ -  मार्ग में सूइया पहाड़ नामक स्थान पर दुर्गम पहाड़ी रास्ता है। इसे पार करते समय शिव-भक्तों के पांवों में नुकीले पत्थर चुभते हैं, पर बाबा के मतवाले भक्त इसे हंसते खेलते पार कर जाते हैं। कहते हैं इस पहाड़ से गुजरना कुछ कुछ एक्यूप्रेशर चिकित्सा की तरह है।
दर्शनिया - बाबा मंदिर से एक किलोमीटर पहले आता है। यह वैद्यनाथ देवघर शहर का बाहरी इलाका है। यहां से बाबा मंदिर के दर्शन हो जाते हैं इसलिए इसका नाम है दर्शनिया। अगर सीधे देवघर पहुंचना चाहते हैं दिल्ली हावड़ा लाइन पर जैसीडीह नामक रेलवे स्टेशन से वैद्यनाथ देवघर की दूरी 6 किलोमीटर है। हालांकि देवघर तक भी सीधी रेलवे सेवा है।   


-vidyutp@gmail.com

(DEVGHAR, DEOGHAR, SULTANGANJ, BABADHAM, BOLBAM, SAWAN, SHIVA) 

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