Monday, July 16, 2012

आध्यात्मिक युवा शिविर बेंगलुरु में दस दिन

वह दस जनवरी 1992 की शाम थी। चेन्नई से दोपहर में चलकर हमलोग बेंगलुरु एक्सप्रेस बेंगलुरु पहुंचे तो पहले कैंट रेलवे स्टेशन आया। इससे पहले वाराणसी से चेन्नई का सफर हमने गंगा कावेरी एक्सप्रेस से किया था।
 बेंगलुरु कैंट में हमारे शिविर का स्वागत काउंटर बने होने की सूचना थी। सो हमलोग यहीं उतर गए। कोई रात आठ बज चुके थे। यहां पर हमारा स्वागत राष्ट्रीय युवा योजना के स्थानीय स्वयंसेवकों ने किया। उसमे एक लड़की तो कर्नाटक के एक अस्पताल में नर्स थी, वो मेरी बाद में दोस्त बन गई। हमलोग स्टेशन से मेटाडोर से रात नौ बजे कैंप साइट पर पहुंचे। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के दौरान कुछ पुराने साथियों से मुलाकात हुई तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बिहार से मीनाक्षी के साथ उनकी बहन कामाक्षी, स्निग्धा ठाकुर, प्रियंका, राकेश सुमन, शशिभूषण, मनोज आदि लोग आए थे। शिविर का विधिवत आरंभ 11 जनवरी से होना था।


देश के 22 राज्यों से 1000 से ज्यादा युवा। आध्यात्मिक युवा शिविर में पहुंच चुके हैं। वाराणसी से दिग्विजय नाथ सिंह, जॉन राजेश्वर कुजुर, राजीव कुमार सिंह, संदीप कुमार, अमिताभ सिंह, आदित्य जैसे साथी तो पटना से पुराने सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कुमार सेवक के साथ संगीतकार अनिल कुमार रश्मि और उनके साथी। हमारे हाजीपुर इकाई से भाई पंकज कुमार, नवीन झा, मनीष चंद्र गांधी, राकेश पाठक पहुंच चुके हैं। दस दिन दोस्तो के साथ खूब जमी शिविर में। 
बिहार की टीम कव्वाली पेश करती हुई- तराना देश का...

सभी लोगों के लिए शिविर में रहने के लिए तंबूओं में इंतजाम था। इन तंबूओं को अलग नाम दिए गए थे। मैं एक 60 लोगों के तंबू का प्रभारी बनाया गया। ग्राउंड में ही अस्थायी शौचालय बनवाए गए थे। पानी का इंतजाम टैंकरों से होता था। यानी पूरी तरह से कैंप जीवन था।

आ रही हैं झूमती नौजवान टोलियां
सुबह सुबह साढ़े चार बजे ही आनंद भाई और उनके साथी माइक पर  आ रही हैं झूमती नौजवान टोलियां, उठो तुम्हें जगा रही हैं प्रभात फेरियां... गाना शुरू कर देते थे। इससे हमारी नींद खुल जाती थी। पांच बजे जगने की सिटी बजती। हम सब लोग दौड़ कर पोस्ट पर पहुंचते। एक लाइन में 20 लोग चारों तरफ 50 लंबी लाइनें लग जाती थीं तुरंत पूरे अनुशासन में। नौजवान आओ रे नौजवान गाओ रे गीत खत्म होने के बाद सुब्बराव जी दिन भर के आयोजन के बारे में बताते। पर विसर्जन से पहले आनंद भाई मंच पर अवतरित होते और हम सब मिलकर एक और गीत गाते – आ गया... आ गया... जागने का वक्त आ गया। गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग जहां भी आनंद भाई को देखते – आ गया आ गया.. चिल्लाना शुरू कर देते।

जैसा कि शिविर का नाम आध्यात्मिक युवा शिविर था। इसलिए इसमें आध्यात्म की बातें ज्यादा होनी थी। हर रोज दोपहर में कोई स्पिरिचुअल धर्म गुरू आते। अपनी बात रखते। सुब्बराव जी कहते हैं – भारत को सिर्फ हिंदू राष्ट्र कहना उचित नहीं है। यहां दुनिया के चार धर्मो का उदय हुआ। जैन धर्म, बौद्ध धर्म सिक्ख धर्म यहां से पूरी दुनिया में फैले। हमें सभी धर्मो की अच्छी बातों का सम्मान करना चाहिए। सर्व धर्म समभाव के साथ ही आज हमें सर्व धर्म मम भाव जैसे विचार की जरूरत है। अगले दस दिनों में हमलोग बंगलुरू के मल्लेश्वरम, मैजेस्टिक, कब्बन पार्क, विधानसभा, लाल बाग जैसे तमाम इलाकों में गए। दस दिन के शिविर के दौरान शहर के कई इलाकों से रूबरू होने का मौका मिला। हर रोज नए इलाके में रैलियां और कार्यक्रम होते थे।


एक दिन सबको बस से मैसूर और श्रीरंगपट्टनम घुमाने ले जाया गया। शिविर के आखिरी दिन हमें प्रमाण पत्र मिला उसमें सुब्बराव जी के साथ तत्कालीन रेल मंत्री सीके जाफरशरीफ के भी हस्ताक्षर थे।  

आखिरी दिन बेंगलुरू दर्शन 
शिविर के आखिरी दिन हमारे पास पूरा खाली समय था। हमारी वापसी की ट्रेन रात को थी। हम सबने आज बेंगलुरू शहर घुमने का तय किया। सबसे पहले पहुंचे मैजेस्टिक। बेंगलुरु शहर का दिल धड़कता है मैजेस्टिक में। सिटी रेलवे स्टेशन के पास मैजेस्टिक वहां का चाकचिक्य वाला बाजार है। थोड़ी देर बाजार में घूमने के बाद तय किया गया कि ह्वाईट फील्ड साईं बाबा के आश्रम चलते हैं।

सत साईं बाबा के आश्रम की ओर


मैजेस्टिक से हमलोग लोगों से रास्ता पूछते हुए बसें बदलते हुए ह्वाईट फील्ड की तरफ चल पड़े। सीधी बस नहीं मिली। कुछ देर में हमलोग शहर के बाहर थे। अब पैदल सफर। आसपास में हरे भरे खेत थे। एक जगह एक अमरूद वाले से हमने कुछ अमरूद लेकर खाए। पर भाषा की समस्या आ गई। हमें कन्नड़ नहीं आती थी और अमरुद वाला हिंदी नहीं जानता था। खैर किसी तरह उसे पैसे देकर हमलोग आगे बढ़े। अगली बस से ह्वाईट फील्ड पहुंचे। यह एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है। आश्रम में जाने पर पता चला कि साईं बाबा थोड़ी देर में बाहर से आने वाले हैं। बाकी श्रद्धालुओं की तरह हमलोग बैठ गए इंतजार में। 
थोड़ी देर में साईं बाबा आए और हमें उनके दर्शन हुए। वहां देश भर के कई राज्यों के श्रद्धालु उनके दर्शन के इंतजार कर रहे थे। उनके दो आश्रम है एक सत साईं निलयम पुट्टवर्ती में और दूसरा ह्वाईट फील्ड बेंगलुरू में। बाबा आए उनके गाड़ी में बैठे हुए श्रद्धालुओं को दर्शन हुए लोग अपने निहाल समझने लगे। हम भी उस भीड़ में शामिल थे। ( 24 अप्रैल 2011 को सत साईं बाबा का निधन हो गया, उन्होंने दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक सामाजिक कार्य किए थे।)  
बेंगलुरु से घर वापसी - 
उसके बाद वापसी रेलवे स्टेशन की ओर।
जब हम रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो हमारे हाजीपुर के साथी मिल गए। थोड़े परेशान थे। क्योंकि उन्हें वापसी का आरक्षण नहीं मिल पा रहा था। शिविर के दौरान रेलवे का काउंटर कैंप साइट में ही लगा था जहां हमने आरक्षण करा लिया था जो रेल मंत्री की अनुकंपा से कन्फर्म भी हो गया था साथ ही हमसे कोई रिजर्वेशन चार्ज में रास्ते में नहीं लिया गया। पर पंकज भाई और उनके साथियों ने इस सुविधा का लाभ नहीं उठाया था। रात होने पर भूख लगी तो स्टेशन के पास खाने के लिए होटल ढूंढने निकले। ज्यादातर होटल मंहगे लगे। अभी तक हमलोग कैंप में खाना खा रहे थे। अंत में एक बेसमेंट में स्थित रेस्टोरेंट में सांबर चावल खाकर भूख मिटाई। खैर रात की ट्रेन से मैं वाराणसी और पटना के साथियों के संग चेन्नई के लिए रवाना हो गया।   
-    विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com

( BANGALURU, SPIRITUAL YOUTH CAMP , 1992, PALACE GROUNDS) 


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