Saturday, December 16, 2017

कारवार से गोकर्ण वाया अंकोला बस से

कर्नाटक के शहर कारवार बस स्टैंड से हमने अगली बस ली है अंकोला के लिए। यह कर्नाटक रोडवेज की बस है। गोकर्ण पहुंचने का एक तरीका है कोंकण रेल से गोकर्ण रोड रेलवे स्टेशन उतरें, वहां से गोकर्ण के लिए आटो रिक्शा लें। रेलवे स्टेशन से गोकर्ण बाजार 8 किलोमीटर है।

अगर सड़क मार्ग से जा रहे हैं तो कुमटा से गोकर्ण के लिए सीधी बसें हैं, या फिर अंकोला से। कुमटा से गोकर्ण के लिए हर आधे घंटे पर बस है। इसलिए सुगम यह है रेल से भी जाना हो तो कुमटा उतर कर बस ली जाए।

कारवार से अंकोला की दूरी 35 किलोमीटर है। बस सह्याद्रि की पर्वतमाला को काटकर बनाई गई सड़क से गुजर रही है। एक तरफ समंदर है तो दूसरे तरफ पहाड़। कारवार शहर के बाहर कई किलोमीटर तक नौ सेना का इलाका साथ चलता रहा। हरे भरे धान के खेत, नारियल के पेड़, केले के पेड़ दिखाई दे रहे हैं। एक घंटे बाद हमलोग अंकोला शहर में पहुंच गए हैं। अंकोला उत्तर कन्नडा जिले का एक तालुका है। यह आम और काजू के लिए प्रसिद्ध है। 13 अप्रैल 1930 को एमपी नादकर्णी की अगुवाई में 40 हजार लोगों ने अंकोला मे गांधी जी के आह्वान पर नमक कानून तोड़ा था।
कारवार में ट्रक पर जा रहा रेलवे का लोकोमोटिव (इंजन ) 


संयोग से हम कारवार से अंकोला के लिए जिस बस में सवार हुए हैं वह कुमटा तक जाने वाली है। सहयात्रियों की सलाह पर हमने इसमें मदनगिरी तक का टिकट ले लिया है। लोगों ने बताया आप मदनगिरी पेट्रोल पंप के स्टाप पर उतर जाएं। वहां से कुमटा से गोकर्ण आने वाली बस मिल जाएगी। इससे आप जल्दी गोकर्ण पहुंच जाएंगे. वहीं आपको अंकोला से गोकर्ण वाली बस का इंतजार देर तक करना पड़ सकता है। अगर कोई बस अंकोला से चलेगी तो वह भी मदनगिरी पेट्रोल पंप के मोड़ से ही गोकर्ण के लिए मुड़ेगी।

अंकोला के बाद एनएच 66 पर पहाड़ों  काटते हुए सुंदर रास्ते पर हम चल रहे हैं। गंगावली नदी के पुल के बाद अचानक मदनगिरी में भारत पेट्रोलियम का पेट्रोल पंप आ जाता है। हमलोग चौकन्ने थे, उतर गए बस से। यहां तो बायीं तरफ एक पेट्रोल पंप है। दाहिनी तरफ एक ग्रामीण सड़क दिखाई दे रही है। तिराहे पर एक छोटी सी दुकान है। कोई पथ संकेतक बोर्ड नहीं लगा है गोकर्ण के लिए। पर दुकानदार ने बताया कि यहीं पर बस आएगी। तो हमलोग भी उनकी बात मानकर बस का इंतजार करने लगे। इसी इंतजार के दौरान हमलोग दुकानदार भाई से थोडी बातें करते हैं।
मदनगिरी मोड पर गोकर्ण के लिे बस का इंतजार। 
हमलोग दुकान से केले खरीदकर भी खा लेते हैं। थोड़े इंतजार के बाद कर्नाटक रोडवेज की कुमटा से चली बस आती है। हमलोग फटाफट बस में बैठ जाते हैं। बस में महिला कंडक्टर हैं। हम उनसे तीन टिकट खरीदते हैं। बस आधी खाली है, सो आराम से सीट मिल गई। मदनगिरी मोड़ से गोकर्ण 9 किलोमीटर है। 15 मिनट बाद हमलोग गोकर्ण के बस स्टैंड में हैं।

मांजागुनी से फेरी का रास्ता - हमें रास्ते में एक सज्जन ने बताया था कि आप अंकोला से मांजागुनी की बस लें। वहां से फेरी से गंगावाली नदी पार करके गोकर्ण पहुंच सकते हैं। इस मार्ग से दूरी 15 किलोमीटर है। जबकि मदनगिरी मार्ग से 26 किलोमीटर। पर हमें मांजागुनी मार्ग अनजाना लगा और बसों का बारंबारता का भी पता नहीं था इसलिए इस मार्ग को नहीं चुना। पर बाद में गूगल मैप देखकर लगा कि मांजागुनी मार्ग भी रोमांचक हो सकता था।

ऐसा रहा सफर – कोलवा से मडगांव – 6 किमी, मडगांव से कारवार – 72 किमी, कारवार से अंकोला 35 किमी, कारवार से मदनगिरी 17 किमी, मदनगिरी से गोकर्ण 9 किमी – कुल – 139 किमी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

( KARWAR, ANKOLA, MADANGIRI, GOKARNA, GANGAVALI RIVER ) 
गोकर्ण से पहले गंगावली नदी का विस्तार। 

Thursday, December 14, 2017

कर्नाटक का कश्मीर है कारवार

हमलोग गोवा को अलविदा कहने वाले हैं। हमारी अगली मंजिल होगी कर्नाटक का गोकर्ण। सुबह नास्ते के बाद हमलोग लोकल बस से मडगांव बस स्टैंड पहुंचते हैं। 
कोलवा बीच से हर 20 मिनट पर एक बस चलती है मडगांव के लिए। मडगांव बस स्टैंड में जाने पर पता चला कि कारवार के लिए हर आधे घंटे पर बस मिलती है। ये बसें गोवा की कदंबा ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन भी होती हैं और कर्नाटक रोडवेज की भी। हमें गोवा वाली बस मिल गई, कारवार के लिए। हालांकि हम मडगांव से गोकर्ण रोड ट्रेन से भी जा सकते थे, पर ट्रेन का समय काफी सुबह में था। बस मडगांव शहर से निकलकर हरे भरे सड़क पर दौड़ रही है। रास्ते में कुछ सुंदर चर्च दिखाई देते हैं।  

मडगांव से कारवार की दूरी 72 किलोमीटर है। बस करीब ढाई घंटे लगाएगी। मडगांव शहर से बाहर निकलने पर बस नावेली से होकर गुजरी। नावेली मडगांव के बाहर नवविकसित कस्बा है।पर यहां कुछ पुराने चर्च हैं। हमें सड़क के किनारे एक सुंदर चर्च नजर आता है। आवर लेडी रोजरी चर्च यहां के लोगों का लोकप्रिय प्रार्थना स्थल है। 
इसके बाद कोनकोलिम में कस्बे में रुकी। यहां बस बस स्टैंड के अंदर गई, पर तुरंत वहां से बाहर निकल कर आगे चल पड़ी।

यहां छोटे कस्बे के बस स्टैंड भी कर्नाटक की तरह शानदार बने हुए हैं। वहां से अगला स्टाप आया पाडी। पाडी के बाद आया काणकोण। काणकोण रेलवे स्टेशन भी है। इसके बाद सघन वन क्षेत्र आरंभ हो गया।
हम गोवा के ही काठीगांव वाइल्ड लाइफ सेंचुरी से होकर गुजर रहे हैं। जहां तक नजर जा रही है, हरे भरे पेड़ नजर आ रहे हैं। रास्ता पहाड़ी है पर ज्यादा घुमावदार नहीं है। दोनों तरफ खुशबूओं के जंगल साथ साथ चल रहे हैं। दोपहर में भी मौसम सुहाना है। ये हरियाली की खुशबू है ना वह भी साथ साथ चल रही है। माधवी और अनादि दोनों सफर का आनंद ले रहे हैं। 

रास्ते में पोलियम ( POLLEM )  बीच के लिए ठहराव आया। यह दक्षिण गोवा का आखिरी समुद्र तट है। यहां भी कुछ बेहतरीन रिजार्ट बने हुए हैं। गोवा आने वाले सैलानी यहां तक आते हैं। पोलियम विदेशी सैलानियों की भी खास पसंद है। वे यहां आकर लंबा वक्त गुजारना पसंद करते हैं। ऐसे लोग जो खास तौर पर भीड़ भाड़ से दूर समंदर के किनारे रहना चाहते हैं उनके लिए पोलियम खास पसंद है। यह प्रदूषण से भी काफी दूर है।

आगे कसार नामक छोटा सा गांव आता है जो गोवा का आखिरी गांव है। इसके बाद बस कर्नाटक में प्रवेश कर जाती है। सीमा पर चेक पोस्ट आता है। पुलिस तैनात है। हम एक बार फिर कर्नाटक में हैं। इसी साल मार्च तो कर्नाटक आना हुआ था। कर्नाटक में पहला गांव आता है माजाली। इसके बाद हमलोग कारवार की सीमा में पहुंच चुके हैं। कारवार शहर से ठीक पहले काली नदी पर पुल आता है। इसके बाद शहर आरंभ हो जाता है। हमारी बस कारवार बस स्टैंड में जाकर रुकती है।

कारवार ( कर्नाटक)  का समुद्र तट 
लेकिन इसके पहले हमें कारवार का सुंदर समुद्र तट दिखाई देता है। यहां सुंदर मरीन ड्राईव बना है। समंदर के किनारे बेंच पर बैठे हुए लोग धूप सेंकते दिखाई देते हैं। अब कुछ बातें कारवार के बारे में। कारवार उत्तर कन्नडा जिले का प्रमुख शहर है। यह समुद्र तटीय शहर नौ सेना का प्रमुख केंद्र है। शहर का कई किलोमीटर समुद्र तटीय इलाका नौ सेना के हवाले है। यह कोंकण रेलवे का प्रमुख रेलवे स्टेशन भी है।

कारवार कर्नाटक के उत्तर कनारा जिले का मुख्यालय भी है। शहर के एक तरफ सह्याद्रि पर्वत माला है तो दूसरी तरफ उछाल मारता अरब सागर। शहर के उत्तर में सुंदर काली नदी है। इस नदी में बोटिंग करने के इंतजाम दिखाई देते हैं। यह देश के ग्रीन सिटी में शुमार है जहां इको टूरिज्म की पर्याप्त संभावनाएं हैं।



कारवार में है रविंद्र नाथ टैगोर बीच
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने इसे कर्नाटक का कश्मीर कहा था। गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने कारवार के समुद्र  तट पर अपने पहले नाटक की रचना यहीं पर की थी। गुरुदेव 1822 में यहां आए थे। उनके भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर यहां जिला जज के तौर पर पदस्थापित थे।कारवार के मुख्य समुद्र तट नाम टैगोर के सम्मान में रविंद्र नाथ टैगोर बीच रखा गया है। 
कारवार शहर की आबादी 1.5 लाख के पास है। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने कारवार शहर का निर्माण एक सैन्य शहर के तौर पर किया था। हालांकि यह कर्नाटक का शहर है, पर यहां मराठी और कोंकणी भाषा का काफी प्रभाव है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
कारवार शहर का चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा। 

Tuesday, December 12, 2017

गोवा का सबसे प्राचीन मंदिर – महादेव मंदिर तांबड़ी सुर्ल

गोवा में पुर्तगाली आक्रमण से पहले सैकड़ों प्रसिद्ध मंदिर हुआ करते थे। यह एक हिंदू बहुल इलाका हुआ करता था। पर पुर्तगाली शासन में ज्यादातर मंदिरों पर पुर्तगालियों का कहर बरपा। इनमें से ज्यादातर मंदिरों को नष्ट कर डाला गया। पर गोवा के कुछ मंदिर अभी भी मूल रूप में सुरक्षित हैं। अगर गोवा राज्य के सबसे पुराने मंदिर की बात करें तो यह 12वीं सदी का है। यह महादेव  शिव का यह मंदिर तांबड़ी सुर्ल गांव में स्थित है। यह मंदिर कदंबा और देवगिरी के यादव शासन काल के वास्तुकला का सुंदर नमूना है। तांबड़ी सुर्ल-शिव मंदिर अपने कलात्मक शिल्प एवं वैभव के कारण जाना जाता है। चौदहवीं शताब्दी में कदंब राजाओं के समय इसका निर्माण हुआ।

कैसे पहुंचे – तांबदी सुर्ल की दूरी गोवा की राजधानी पणजी से 65 किलोमीटर है। वहीं मोलेम से 12 किलोमीटर की दूरी पर है। यह मंदिर सघन वन क्षेत्र में है। सतारी तालुक के वालपोई से इसकी दूरी 22 किलोमीटर है।
जैन शैली में निर्माण -  इस मंदिर का निर्माण जैन शैली की छाप दिखाई देती है। मंदिर का निर्माण ऐसे जगह पर हुआ है जहां पहुंचना आसान नहीं था। वहीं यह मंदिर गोवा के बाकी मंदिरों की तुलना में आकार में भी छोटा है। मंदिर को देखकर यह प्रतीत होता है कि इसका गुंबद का निर्माण पूरा नहीं हो सका था। इस मंदिर के निर्माण की शैली कर्नाटक के बादामी के पास मंदिरों के गांव एहोल की निर्माण शैली से मिलती जुलती है।

यह गोवा का एक मात्र मंदिर है जो मुस्लिम आक्रमण और पुर्तगाली आक्रमण के बाद भी सुरक्षित रहा। यह गोवा में कदंबा और यादव काल के शासन की एकमात्र निशानी है। इसके निर्माण में बेहतरीन किस्म के बेसाल्ट चट्टानों का इस्तेमाल किया गया है। मंदिर में छोटा सा मंडप बना है। यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतिमाएं निर्मित की गई हैं। मंदिर परिसर में शिव के सवारी नंदी की भी प्रतिमा बनाई गई है।
कदंबा राजतंत्र के प्रतीक चिन्ह हाथी का भी चित्रण मंदिर में किया गया है। मंदिर के पास ही सर्ल नदी बहती है। सालों भर मंदिर को देखने कम ही श्रद्धालु पहुंचते हैं पर महाशिवरात्रि के समय यहां लघु मेला लग जाता है। आइए अब एक और मंदिर की बात करते हैं...

चंदेश्वर भूतनाथ संस्थान – मडगांव से क्वेपे के मार्ग पर पर्वत परोडा में चंदेश्वर भूतनाथ संस्थान का सुंदर मंदिर नजर आता है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर मडगांव से 14 किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर में प्रवेश के लिए आपको कोई 350 मीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। यह शिव को समर्पित मंदिर है। इस मंदिर को भोज राज तंत्र से जोड़कर देखा जाता है। उनके शासनकाल में ही गोवा के चंद्रपुर को राजधानी बनाया गया था। इस मंदिर के पार्श्व से सूर्यास्त का नजारा बड़ा सुंदर दिखाई देता है।

शांता दुर्गा मंदिर – मंगेशी के रास्ते में थोड़ा आगे जाने पर शांता दुर्गा मंदिर स्थित है। यह गोवा के सुंदर मंदिरों में से एक है। शांता दुर्गा गोवा निवासियों की ख़ास देवी हैं। कहते हैं कि बंगाल की क्षुब्धा दुर्गा गोवा में आकर शांत हो गईं और शांता दुर्गा के नाम से पूजी जाने लगीं।

श्री मल्लिकार्जुन का मंदिर – गोवा में मडगांव से 40 किलोमीटर दूर कारवार के रास्ते में कोणकोण गांव में श्री मल्लिकार्जुन का सुंदर मंदिर है। सघन वन और हरीतिमा के बीच चतुर्दिक पहाड़ियों से घिरे इस मंदिर को देखने जो भी यात्री आता हैवह इसके प्राकृतिक सौंदर्य को देख मुग्ध होकर वहीं का हो जाता है। 
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( TEMPLE, GOA, CHANDRESHWAR BHOOTNATH, SHANTA DURGA ) 

Monday, December 11, 2017

दक्षिण गोवा का अदभुत दामोदर मंदिर

आज भले ही गोवा को चर्चों के लिए जाना जाता हो पर किसी जमाने में गोवा में सैकड़ों मंदिर हुआ करते थे। आज भी गोवा के ग्रामीण इलाकों में कई सुंदर मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। इनमें से प्रमुख है जांबावली स्थित दामोदर मंदिर। दामोदर मतलब महादेव शिव का मंदिर।

मंदिर परिसर बड़ा ही भव्य और खूबसूरत है। मंदिर में शिव के अलावा रामनाथ, महेश, चामुंडेश्वरी और महाकाली की प्रतिमाएं हैं। मंदिर के श्रद्धालु ज्यादातर गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार के लोग हैं। देस भर में फैले हुए गौड़ सारस्वत ब्राह्मण लोग दामोदर मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं और मंदिर को सालों भर दान भी भेजते हैं। अपने बनावट और वास्तुकला के लिहाज से यह गोवा के सुंदरतम मंदिरों में गिना जाता है।

कभी मडगांव में था दामोदर मंदिर - यह वास्तव में गोवा के अति प्राचीन दामोदर मंदिर का पुनर्निर्माण है। कहा जाता है कि दामोदर मंदिर मूल रूप से मडगांव में वहां स्थित था जहां आजकल होली स्पिरिट चर्च है। गोवा में पुर्तगाली शासन आरंभ होने के बाद पुर्तगालियों द्वारा बड़ी संख्या में मंदिरों को नष्ट करने का उपक्रम चलाया गया। साथ ही हिंदू आबादी को उनके पर्व त्योहार मनाने और पूजा पाठ करने पर भी बंदिशें लगा दी गईं। 1565 ई में दामोदर मंदिर को भी ध्वस्त करके वहां चर्च का निर्माण करा दिया गया।

बाद में हिंदू श्रद्धालुओं ने दामोदर मंदिर का निर्माण जांबावली (जांबोलियम) गांव  में कराया। इस मंदिर का परिसर भी भव्य है। यह मंदिर कुशावती नदी के तट पर बना हुआ  है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुशावती नदी में स्नान करने के बाद दामोदर देव के दर्शन करते हैं। गोवा के हिंदुओं में कुशावती नदी को रोग दुख दूर करने वाला माना गया है।


जांबावली मंदिर परिसर के पास कुछ दुकानें और एक भोजनालय भी है। मंदिर की ओर से अतिथि आवास का भी निर्माण कराया गया है। महाशिवरात्रि और खास खास मौकों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

मंदिर खुलने का समय - दामोदर मंदिर सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। 

कैसे पहुंचे - दामोदर मंदिर मडगांव से 22 किलोमीटर दूर और उपनगर क्वेपे से 5 किलोमीटर आगे जांबावली गांव में स्थित है। मडगांव से निजी वाहन से यहां सुगमता पहुंचा जा सकता है। हालांकि क्वेपे से कुछ बसें भी चलती हैं। पर उनका समय काफी अंतराल पर है।
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(DAMODAR TEMPLE, SOUTH GOA, SHIVA ) 






Sunday, December 10, 2017

एक मंदिर जहां चांदी दान करते हैं भक्त – विमलेश्वर मंदिर गोवा

दक्षिण गोवा के रिवणा गांव में स्थित विमलेश्वर मंदिर शिव का भव्य और अति प्राचीन मंदिर है। गोवा के श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस मंदिर के शिवलिंगम स्वयंभू शिव हैं। विमल का मतलब पवित्र और ईश्वर का मतलब भगवान। मंदिर का वर्तमान भवन 1920 का बना हुआ है। पर इस मंदिर के जीर्णोद्धार का प्रमाण 11 वीं सदी में कदंबा सम्राज्य में और उससे पहले छठी सदी में चालुक्य सम्राज्य के दौरान का भी मिलता है। मंदिर परिसर में विमलेश्वर महादेव के अलावा, कमलेश्वर, महाकाली और मारुतिनंदन की भी मूर्तियां स्थापित की गई हैं।
विमलेश्वर के स्वंभू शिवलिंगम के बारे में माना जाता है कि यह सैकडों साल पहले इलाके के निवास कोल समुदाय के लोगों द्वारा स्थापित किया गया था। यह गोकर्ण के महाबलेश्वर के सदृश प्राचीन है। पर बाद में बाढ़ के दौरान शिवलिंगम कहीं खो गया था। कई सालों बाद इसे ढूंढ कर फिर से स्थापित किया गया।
खेती दौरान मिला विलुप्त हुआ शिवलिंगम
कहा जाता है कि रिवणा गांव में किसी जमाने में कई ऋषियों के आश्रम हुआ करते थे। सघन वन और साफ पानी के झरनों के कारण इस क्षेत्र को ऋषि लोग काफी पसंद करते थे। इसी कारण से रिवणा को ऋषिवन भी कहते थे। गोवा का नाम महाभारत काल में गोमंत मिलता है।

कालांतर में रिवणा गांव में कुनबी नाम से जानी जाने वाली जनजाति ने गाय पालना और खेती बाड़ी की शुरुआत की। यहां श्रम करके जंगलों को काट कर उन्होंने खेत तैयार किए। इसी खेती के दौरान लंबे समय से विलुप्त हुआ पुराना शिवलिंगम प्राप्त हो गया। यह गांव के लोगों के लिए अत्यंत प्रसन्नता का समय था।

एकादशी के दिन प्रकट हुए महादेव
वह एकादशी का दिन था जब एक कुनबी किसान को खेतों से शिवलिंगम प्राप्त हुआ। विमलेश्वर मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंगम में कुनबी किसान द्वारा हल चलाने के दौरान शिवलिंगम हल के लगे निशान आज भी दिखाई देते हैं। गांव के लोगों ने शिवलिंगम प्राप्त होने पर पहले एक छोटा सा मंदिर बनाकर स्थापित किया। पर  अब मंदिर भव्य रूप ले चुका है। विमलेश्वर भगवान के सम्मान में आज रिवणा के किसान एकादशी के दिन खेतों में हल नहीं चलाते।  

एक और खास बात है कि महादेव शिव के इस मंदिर में भक्त गण चांदी दान करते हैं। मंदिर में लगे बोर्ड पर लिखा है किस भक्त ने कितने किलोग्राम चांदी दान की। किसी भक्त ने किलो में तो किसी भक्त ने कुछ ग्राम में चांदी दान की है। हर साल चांदी दान करने वालों की सूची लंबी होती जा रही है। बाद में इस चांदी से प्राप्त धन को मंदिर परिसर के विकास में लगाया जाता है।

इस मंदिर के श्रद्धालु रेवणेकर उपाधि लिखने वाले गौड़ सारस्वत ब्राह्मण लोग हैं जो विमलेश्वर महादेव को अपना कुल देवता मानते हैं। कदाचित रेवणेकर उपाधि रिवणा गांव के नाम से ही निकली है।

विमलेश्वर मंदिर परिसर को भव्य बनाने मे दावणगेरे (कर्नाटक), कारवार और बेलगाम  के भक्तों ने काफी राशि दान की है। दशहरा और शिवरात्रि के समय इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। साल के बाकी दिनों में यहां कम श्रद्धालु दिखाई देते हैं।

रिवणा जाते समय दाहिनी तरफ पड़ने वाले इस मंदिर का परिसर विशाल है। परिसर में एक सरोवर भी है। यहां वाहनों के लिए पार्किंग का इंतजाम है। मंदिर परिसर में एक छोटी सी कैंटीन भी है।
आप मडगांव से क्वेपे होते हुए रिवणा के विमलेश्वर मंदिर तक पहुंच सकते हैं। मडगांव से मंदिर की दूरी 25किलोमीटर है।

श्री संस्थान गोकर्ण पुर्तगाली जीवोत्तम मठ - रिवणा में हमें गुफा के पास श्री संस्थान गोकर्ण जीवोत्तम मठ नजर आता है। यह मठ मंदिर गुफा नंबर दो के पास है। इस सुंदर मठ में मारुति यानी हनुमान जी का मंदिर है। मंदिर में अतिथियों के रहने का इंतजाम भी है। मंदिर परिसर में एक श्री रामचंद्र तीर्थ सभागृह का भी निर्माण हुआ है। जीवोत्तम मठ की शांति और सुंदरता ऐसे ही किसी आश्रम की याद दिलाती है।

महालक्ष्मी का मंदिर  रिवणा यानी ऋषिवन में कई सुंदर मंदिर हैं। इन्ही मंदिरों में धन धान्य की देवी महालक्ष्मी का भी एक मंदिर है। हमें गांव में एक सुंदर महालक्ष्मी मंदिर के भी दर्शन करने का मौका मिलता है। मुख्य सड़क पर स्थित यह मंदिर भी अत्यंत सुंदर है। पीले रंग का मंदिर हरित परिसर में बना हुआ है। रिवणा जाते समय महालक्ष्मी मंदिर बायीं तरफ दिखाई देगा। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( VIMLESWAR TEMPLE, SOUTH GOA, RIVONA ) 

Friday, December 8, 2017

दक्षिण गोवा में रिवणा की बौद्ध गुफाएं

गोवा में बुद्धकालीन गुफाएं भी हैं। बेटे अनादि ने ये रिसर्च कर डाला था। तो अब हमारी मंजिल थी रिवणा पहुंचना और उन ऐतिहासिक गुफाओं को देखना। हालांकि गोवा आने वाले बहुत कम लोग वहां जाते हैं। पर इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए ये कौतूहल भरा अनुभव है।

हमलोग चांदोर (चंद्रपुर ) से रिवणा के लिए जाना चाहते हैं। चांदोर के ब्रिगेंजा हाउस के बाहर एक सज्जन ने रास्ता बता दिया। सीधे जाइए नदी का पुल पार करें तिलामोल से आगे रास्ता पूछते हुए जंबावली होते हुए जाएं। हमलोग चल पड़े। रास्ते मे कुशावती नदी का पुल आया। नदी इतनी प्यारी लगी की हमलोग रुक गए, कुछ तस्वीरों के लिए। नदी के दोनों पाट नारियल के पेड़ से आच्छादित थे। मानो वे नदी के मोहपाश में बंधकर झुक गए हों। ऐसा प्रेम भला कहां देखने को मिलता है।


हरियाली से लदी-फदी नदियां गोवा, कर्नाटक, केरल में ही देखने को मिल सकती हैं। नदी के उस पार सड़क के किनारे कुछ युवक मछलियां बेच रहे थे। ये मछलियां नदीं से निकाली गई थीं। हरा भरा सुंदर रास्ता है। असोलाडा से रास्ता बदलना पड़ा।

थोड़ी दूर चलने पर तिलामोल आ गया। तिलामोल एक छोटा सा बाजार है। यहां चौराहे पर रस्सी पर संतुलन बनाने वाला खेल देखने को मिला। हमने गांव में ऐसे खेल देखे थे, अनादि के लिए वह नया था। वहां से आगे बढ़े जांबोलिम नामक छोटा सा गांव आया। यहां प्रसिद्ध दामोदर मंदिर है। उनके दर्शन लौटते हुए करेंगे। यहां एक गन्ने के जूस वाला स्टाल नजर आया। गन्ना का जूस निकालने वाले इलाहाबाद के हैं। इस जूस स्टाल पर एक महिला मिली जो अपनी बिटिया को एक्टिवा से स्कूल से लेकर आ रही थीं। उन्होंने भी बताया कि हम सही रास्ते पर हैं। वहां हमलोग रुक कर जूस पीकर आगे बढ़े।
रिवणा की गुफा नंबर एक। चारों तरफ घास उग आई है....

तीन किलोमीटर आगे चलने पर हमलोग रिवणा गांव में हैं। यहां सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की शाखा नजर आती है। अब हम रिवणा की गुफाओं की तलाश में हैं। बाजार से थोड़ा आगे जाकर दाहिनी तरफ नीचे कच्चे रास्ते पर उतरने के बाद एक जगह जाकर रास्ता बंद हो गया। हमलोग स्कूटी वहीं पार्क कर पैदल चल पड़े। जंगलों के बीच। पर कहीं गुफाएं नहीं दिखीं। थोड़ी दूर जाने पर एक परिवार मिला। उसने बताया कि गुफाएं पीछे ही हैं। हमलोग उसके मार्गदर्शन में वापस आए।

हमें जंगल के बीच अति प्राचीन गुफा नजर आई। पक्की गुफा के चारों तरफ इतनी हरी हरी घास उग आई है कि आते जाते एकबारगी ये गुफा नजर नहीं आती। इन गुफाओं के बारे में कहा जाता है कि ये छठी सातवीं सदी की बनी हुई हैं। इनमें कभी बौद्ध भिक्षु तपस्या किया करते थे। इस तरह की गुफाएं देश के दूसरे स्थानों पर भी मिलती हैं। पर गोवा में इन्हें देखना सुखद है।
दक्षिण गोवा - रिवणा की गुफा नंबर 2 में ....

मौर्य सम्राज्य के दौरान गोवा में आया बौद्ध धर्म -  तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में गोवा मौर्य सम्राज्य का हिस्सा बन चुका था। इस दौरान गोवा में बौद्ध धर्म का काफी प्रचार प्रसार हुआ। गोवा के निवासी पूर्णमैत्रेयणी सारनाथ गए थे, जहां से लौटकर उन्होंने गोवा में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। रिवणा की गुफाओं में पीठ नजर आता है। इससे प्रतीत होता है कि इन गुफाओं में गुरु बैठकर शिष्यों को धर्म की शिक्षा देते थे।
गोवा  वास्तव रिवणा में दो बौद्ध गुफाएं हैं। वापस लौटकर सड़क के बायीं तरफ 50 मीटर चलने के बाद बायीं तरफ दूसरी गुफा है। इस गुफा की बनावट बेहतर है। इसमें अंदर जाने की सीढ़ियां है। नीचे जाकर दूसरी तरफ से बाहर निकलने का रास्ता भी है। बाहर एक कूप भी बना हुआ है। यहां लोगों ने बाद में कुछ देवी प्रतिमाएं भी रख दी हैं। इस गुफा के पास हमें प्राकृतिक पानी का सोता भी नजर आया।

कुछ लोग रिवणा की गुफाओं को पांडव कालीन कहते हैं। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां रुके थे। पर इतिहासकार इन्हें बौद्ध गुफाएं मानते हैं। लेटेराइट की बनी इन गुफाओं के बारे में माना जाता है कि ये बौद्ध पीठ थे। यहां गुरु शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे।

हमारे लिए लंबी और रास्ता पूछ-पूछ कर सफर के बाद रिवणा पहुंचना और गुफाएं देखना सार्थक रहा। यूं कहें कि गोवा भ्रमण की सबसे बेहतर अनुभूति रही।
रिवणा की गुफा नंबर 2 में - ये गुफा कौतूहल भरी है...

कैसे पहुंचे  – मडगांव से रिवणा की दूरी  25 किलोमीटर है। आप मडगांव से क्वेपे  होकर चलें। वहां तिलामोल – जंबावली होते हुए रिवणा पहुंच सकते हैं। अपना वाहन हो तो अच्छा है। बसें बहुत कम चलती हैं इस मार्ग  पर। आप हमारी तरह वाया चांदोर होकर भी रिवणा जा सकते हैं।
 - vidyutp@gmail.com
MADGAON- QUEPEM- TILAMOL- ZAMBAULIM- RIVONA CAVES, BUDDHA ) 
रिवणा की गुफा नंबर 2 के पास नीचे रखीं मूर्तियां...

Wednesday, December 6, 2017

ब्रिगैंजा हाउस – पुर्तगाली अतीत की स्मृतियां

चांदूर में ब्रिगेंजा हाउस की तलाश करते हुए हमलोग इसके रहस्यमय दरवाजे पर दस्तक देते हैं। यह एक पुर्तगाली परिवार का निजी संग्रहालय है। हमारे हिन्दुस्तान के खेल पत्रकार सौरभ अग्रवाल जो अक्सर गोवा जाते रहते हैं उन्होंने हमें ब्रिगैंजा हाउस जरूर देखने की सलाह दी थी। उनकी सलाह पर हम यहां पहुंच गए थे। पर ब्रिगैंजा हाउस का दरवाजा अंदर से बंद था। थोड़ी कोशिश करने पर एक सहायक आया। उसने जाकर मालकिन को सूचना दी। फिर मालकिन नेे आकर दरवाजा खुला। मिसेज परेरा ने हमारा स्वागत किया और हमलोग ब्रिगेंजा हाउस का मुआयना करने लगे।

हालांकि बाहर से ब्रिगेंजा हाउस देखने में कुछ खास प्रतीत नहीं हो रहा था। एक विशाल पुराना घर नजर आता है बाहर से। पर अंदर एक अलग दुनिया है। अंदर एक एक कमरे में संग्रह देखने के बाद उत्सुकता बढ़ती गई।
ब्रिगैंजा हाउस 17वीं सदी का बना हुआ एक पुर्तगाली परिवार का निजी घर था, जिसे अब निजी संग्रहालय में बदल दिया गया है। एक विशाल भवन में दो अलग अलग परिवारों के घर हैं, जिनका प्रवेश द्वार मध्य में एक ही है।

चैपल में संरक्षित हैं संत फ्रांसिस का नाखून - 

ब्रिगैंजा हाउस के पूर्वी भाग का स्वामित्व परेरा परिवार के पास है। इस विशाल घर में एक छोटा सा चैपल (प्रार्थना गृह) भी है। इस प्रार्थना गृह की कुछ खास बात है। इसमें संत फ्रांसिस जेवियर के नाखून को संभाल कर रखा गया है। यह नाखून ब्रिगैंजा परिवार के पास कैसे आया ये राज का विषय है। जैसा कि आपको पता ही है कि संत फ्रांसिस जेवियर की ममी 400 से ज्यादा सालों से ओल्ड गोवा के चर्च बॉम बेसेलिका में संरक्षित करके रखी गई है।

विशाल हॉल में लकड़ी के एंटिक फर्नीचर - 
इस घर में चार विशाल हॉल हैं जिसमें लकड़ी के फर्नीचर, झूमर समेत कई आकर्षक संग्रह आप यहां देख सकते हैं। हमें एक ऐसा सोफा सेट दिखाई दिया जिसमें दो लोग बातें करते हुए एक दूसरे से मुखातिब होकर बैठ सकते हैं।
किरासन तेल से चलने वाला फ्रिज -  आगे एक ऐसा फ्रिज दिखाया गया जो बिजली के बजाय किरासन तेल से चलाया जाता था। इसे देखना अपने आप में अनूठा अनुभव था। यहां संग्रह में प्रदर्शित वस्तुएं ब्रिगेंजा परिवार के ऐश्वर्य की कहानी सुनाती प्रतीत होती हैं। विशाल बॉल रुम देखते ही बनता है जिसके निर्माण में इटैलियन मार्बल का इस्तेमाल किया गया है।
अनूठा सोफा - इसमें दो लोग बैठकर एक दूसरे से बातें कर सकते हैं ...


यहां हाथी दांत से बनी कई तरह की सामग्री भी देख सकते हैं। लकड़ी की बनी राजा महाराजाओं जैसी कई पालकी का भी संग्रह यहां देखा जा सकता है।
एक कमरे में ब्रिगैंजा परिवार की लाइब्रेरी भी है। इसमें 5000 से ज्यादा किताबें हैं। काफी किताबें पुर्तगाली भाषा में भी हैं। इसके अलावा इसमें फ्रेंज और अंग्रेजी की भी पुस्तकें मौजूद हैं। यह गोवा की पहली निजी लाइब्रेरी हुआ करती थी।
यह संग्रह इस परिवार के लुइस डी मेनेजेज ब्रिगेंजा (1878-1938) का है। वे एक जाने माने पत्रकार रहे हैं, उनकी गोवा के मुक्ति संग्राम में भी सार्थक भूमिका रही थी। कुल मिलाकर यहां आप 17वीं और 18वीं सदी के किसी रईस परिवार के जीवन के ऐशोआराम की झलक बखूबी देख सकते हैं।

प्रवेश के लिए डोनेशन की मांग - हालांकि ब्रिगैंजा हाउस में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। पर जब आप हाउस देखकर निकलने लगते हैं तो आपको डोनेशन बाक्स में दान राशि रखने को कहा जाता है। उनकी ये उम्मीद होती है कि प्रति व्यक्ति कम से कम सौ रुपये दान किया जाए। केयर टेकर का कहना है कि इसी राशि से हम इस घर का रखरखाव कर पाते हैं। हालांकि केयर टेकर आपको साथ साथ पूरा हाउस दिखाती हैं, और यहां प्रदर्शित संग्रह के बारे में बताती भी हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(BARAGANZA HOUSE, CHANDOR, GOA )