Saturday, November 18, 2017

एशिया की विशालतम चर्च है सी-कैथेड्रल

बॉम बेसेलिका चर्च के दर्शन के बाद हमारी अगली मंजिल है सी कैथेड्रल। पर थोड़ा रुकिए भूख लग गई है अनादि को और हमें भी। तो दोपहर में पेट पूजा के लिए ओल्ड गोवा में बॉम बेसेलिका के सामने एक ही विकल्प नजर आता है। विशाल रेस्टोरेंट है रत्न सागर। वेज एंड नॉन वेज, बार एंड रेस्टोरेंट। तो वहीं हमलोग दक्षिण भारतीय शाकाहारी व्यंजन का आनंद लेेते हैं। इसके बाद चल पड़ते हैं सी कैथेड्रल की ओर।
ओल्ड गोवा में बॉम बेसेलिका के ठीक सामने सड़क के उस पर सफेद रंग का विशाल चर्च है। इसका नाम सी कैथड्रल है। सी कैथड्रल मतलब प्रधान गिरिजिघर। इसे एशिया का सबसे बड़ा चर्च माना जाता है। ओल्ड गोवा में स्थित सी कैथड्रल नामक यह चर्च कैथरीन ऑफ एलेक्जेन्ड्रिया को समर्पित है। इस चर्च की लंबाई है 250 फीट और चौड़ाई 181 फीट है। वहीं सामने के हिस्से की उंचार्इ है 115 फीट है।

सी कैथड्रल की वास्तु शैली पुर्तगाली और मैनुइलार्इन है। बाहरी हिस्सा टस्कन का है और भीतरी हिस्सा कोरिनथियन शैली में बना है। इस चर्च को पुर्तगालियों ने मुसलमानों की सेना पर अपनी विजय के बाद बनवाया था। इस चर्च का निर्माण कार्य साल 1562 में डोम सीबेसिटआयो के शासन काल में शुरू हुआ। पर यह बनकर साल 1619 में तैयार हुआ। साल 1640 में इसे धर्मार्थ समर्पित किया गया। देखा जाए तो इसका निर्माण तकरीबन 80 साल तक चलता रहा।

पर इस चर्च का एक टावर वर्ष 1776 में गिर गया, लेकिन इसका दोबारा निर्माण नहीं कराया जा सका।
सी कैथेड्रल में कई पुरानी पेंटिंग्स हैं, जो निहारने लायक हैं। यहां कुल छह मुख्य पैनल है, जिस पर सेंट कैथरीन के जीवन की घटनाओं का चित्र देखे जा सकते हैं। इसमें बनी सोने के परतयुक्त सूची संत के आत्मबलिदान को दिखाती है। चर्च के मध्य भाग में संत पाल और संत पीटर की लकड़ी की बनीं मूर्तियां भी हैं। चर्च का बाहरी परिसर विशाल और हरा भरा है।

सेंट फ्रांसिस असीसी चर्च गोवा। 
सेंट आगस्टीन चर्च - ओल्ड गोवा में बना 46 मीटर ऊंचा यह सेंट आगस्टीन चर्च अपने आप में अनोखा है।  इस चर्च का निर्माण सन 1602 में किया गया था। 1842 में उपेक्षा के कारण चर्च का बड़ा हिस्सा ढह गया। 1931 में इसका एक और हिस्सा गिर गया।

सेंट फ्रांसिस असीसी चर्च - 

सेंट फ्रांसिस असीसी चर्च का निर्माण 1517 में हुआ। इसके बाद इसका दो बार पुनर्निर्माण भी हुआ। पहली बार 1521 में तो दूसरी बार 1661 में। यह चर्च सी केथेड्रल के ठीक पीछे उसी परिसर में स्थित है। इसका निर्माण लेटेराइट पत्थरों से किया गया है। इसमें चूने के पत्थरों का भी इस्तेमाल किया गया है।

इस गिरिजाघर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है। अंदर मुख्य वेदी के साथ पूजा सामग्री घर और गायन कक्ष बने हैं। मुख्य वेदी में सेंट फ्रांसिस की आवक्ष प्रतिमा और बड़ा क्रॉस हैं। तीन प्रमुख वेदियां बरोक्यू और कोरिंथियन शैली को प्रदर्शित करती हैं। 

यहां लकड़ी के बने आधार चित्र भी हैं जो सेंट फ्रांसिस के जीवन काल को दर्शाते हैं। इसके साथ एक विशाल मठ भी बनाया गया था, जिसे अब भारत सरकार के पुरातत्व संग्रहालय का रुप दे दिया गया है।


गोवा का सबसे प्राचीन संत कैथरीन चैपल ( 1510 ) 
सबसे प्राचीन - संत कैथरीन चैपल (प्रार्थनालय )
संत कैथरीन प्रार्थनालाय गोवा का सबसे पुराना चैपल है। इसे साल 1510 में अफांसो डी अलबाबुर्क ने संत कैथरीन दिवस के मौके पर बनवाया। यह गोवा में पुर्तगालियों के प्रवेश के स्मृति में निर्मित कराया गया था। बाद में इसका विस्तार राज्यपाल जार्ज केब्रल ने 1550 में कराया। हालांकि बाद में इसका हालात दयनीय हो गई थी, फिर 1952 में इसका पुनर्निर्माण कराया गया।

इसके अग्रभाग में दो बुर्ज बने हैं। जबकि भीतरी भाग में एक समान्य वेदी निर्मित है। यह पुरातत्व संग्रहालय के ठीक बगल में स्थित है। इसके आसपास पुर्तगाली इतिहास से जुड़ी तमाम सामग्री खुले आसमान में रखी दिखाई देती है।

इतिहास की दास्तां सुनाता - ओल्ड गोवा का संग्रहालय
जब आप ओल्ड गोवा में हैं तो पुरातत्व संग्रहालय देखने का वक्त जरूर निकालें। यह संग्रहालय सी केथेड्रल परिसर में ही सेंट फ्रांसिस आसिसी चर्च के बगल में है। यहां आप गोवा के अलग अलग कालखंड का इतिहास देख सकते हैं। साथ ही इसके सामुद्रिक दीर्घा में मैरीटाइम इतिहास से भी रुबरू हो सकते हैं। संग्रहालय में प्रवेश का टिकट 15 रुपये का है। बच्चों के लिए निःशुल्क प्रवेश है। अंदर पेयजल और शौचालय का भी बेहतर इंतजाम है। यहां पुस्तक और चित्र बिक्री काउंटर भी है। मैं यहां ओल्ड गोवा पर एक पुस्तक खरीद लेता हूं। अनादि घूमते घूमते थक गए थे, पर मैं उन्हें जबरदस्ती संग्रहालय देखने के लिए अंदर भेजता हूं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
गोवा - ओल्ड गोवा में पुर्तगालियों द्वारा लगाई गई बारुद बनाने की फैक्ट्री के अवशेष। आप देख सकते हैं कि बारुद बनाने में इस्तेमाल होने वाली चक्की के पत्थर यहां खुले आसमान में प्रदर्शित किए गए हैं। 
(OLD GOA, SE CATHEDRAL, CHURCH OF ST FRANCIS ASSISI, CHAPEL OF ST CATHERINE )
गोवा के संत कैथरीन चेपल का सामने से नजारा। 




Thursday, November 16, 2017

463 साल से सेंट फ्रांसिस की ममी संरक्षित है यहां

बॉम बेसेलिका गोवा का सबसे प्राचीनतम चर्च में से है। पर इसकी ख्याति इसलिए भी है कि यहां 1554 से ही महान संत फ्रांसिस जेवियर्स की ममी (रैलिक्स) या यों कहें कि शरीर को संरक्षित करके रखा गया है। साथ बॉम बेसेलिका यूनेस्को के विश्व विरासत के स्थलों की सूची में भी शुमार है।
बॉम जीसस यानी नेक या शिशू जीसस है। इस गिरजाघर का निर्माण 1594 में शुरू हुआ। इसका निर्माण 1605 में संपन्न हुआ जिसका जिक्र गिरिजाघर में लगे अभिलेख में भी है। 11 साल में इस लाल रंग के अदभुत गिरिजाघर का निर्माण पूरा हुआ। इसका अगला भाग तीन मंजिला है। दो छोटे और एक विशाल प्रवेश द्वार इसमें बनाया गया है।  पूरे गिरिजाघर के निर्माण में बेसाल्ट पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। शेष भाग में लेटराइट का इस्तेमाल हुआ है। चर्च के ऊपरी भाग में रोमन चिन्ह आईएचएस ग्रीक भाषा में लिखा गया है।

चर्च का प्रार्थना कक्ष विशाल है। प्रवेश करने पर आपको यहां कई गाइड मिलेंगे जो शुल्क लेकर चर्च के बारे में और गोवा में क्रिश्चियनिटी के आगमन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं। प्रार्थना कक्ष में अंदर बढ़ने पर दायीं तरफ सेंट एंथोनी की वेदी है। यहीं बाईं तरफ सेंट फ्रांसिस जेवियर की काष्ठ की विशाल मूर्ति है। वहीं मध्य भाग के उत्तरी दीवार पर गिरिजाघर के संरक्षक डोम जोरोनिमो मस्कार्नहास का समाधि लेख है। दक्षिणी दीवार पर लकड़ी का चंदोवा युक्त मंच बना है। मुख्य वेदी के पार्श्व में आवर लेडी ऑफ होप और संत माइकेल की वेदियां हैं।

आकर्षक ढंग से सजाई गई वेदियों में शीशू यीशू, संत इग्नेश लोयला की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। गोलाकार फलक के ऊपर परमेश्वर फादर, पुत्र और पवित्र आत्मा चित्रित है। बॉम बेसेलिका के गलियारों में घूमते समय लोगों से पूरी तरह शांति बनाए रखने की उम्मीद की जाती है।

संत फ्रांसिस जेवियर की ममी यहां
बॉम बेसेलिका का संबंध महान संत फ्रांसिस जेवियर से भी है। यहां पर संत फ्रांसिस जेवियर के पवित्र शारीरिक अवेशेषों को संरक्षित करके रखा गया है। इसके पास ही संत के जीवन के दृश्यों को देखा जा सकता है। यहां पर लकड़ी का बना वो ताबूत भी देखा जा सकता है जिसमें संत फ्रांसिस जेवियर के शरीर को लंबे समय तक रखा गया था। यह सुंदर नक्काशीदार ताबूत है।
इस ताबूत का निर्माण 1744 में किया गया था। यह पाइनवुड का बना हुआ है। इसके बाहरी हिस्से में चांदी का काम किया गया है। इसमें 1952-1953 तक संत फ्रांसिस की अस्थियां रखी गई थीं। पर बाद में इसे क्रिस्टल के बने दूसरे कैफीन में स्थानांतरित कर दिया गया। यहां पर आप दोनों कैफीन के दर्शन कर सकते हैं।

1698 में यहां संत फ्रांसिस जेवियर की अस्थियों के लिए संगमरर का चबूतरा तस्कनी के ड्यूक कासमास 3 के आदेश पर बनवाया गया। चर्च के बाहर एक छोटा सा स्मृति स्थल है जहां लोग संत फ्रांसिस जेवियर की याद में मोमबत्तियां जलाते और प्रार्थना करते हुए दिखाई दे जाते हैं। 


ओल्ड गोवा के बेसिलिका ऑव बोम चर्च में रखे संत फ्रांसिस जेवियर के मृत शारीर की बात करें तो यह जानकर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि यह शव पिछले 463 वर्षों से बिना किसी लेप या मसाले के आज भी एकदम तरोताजा है। फ्रांसिस ज़ेवियर का जन्म 1505 में नवारे (पुर्तगाल) में हुआ था। 

पुर्तगाल के सम्राट जोमामो (त्रितीय) की प्रेरणा और पोप की सहमति से जेवियर 6 मई, 1542 को को लिस्बन से गोवा आ गए। इस यात्रा के दौरान वे  मोजांबिक, मालिंदी (केन्या), सोक्रेता होते हुए गोवा पहुंचे थे। ओल्ड गोवा को अपना स्थायी निवास स्थान बनाकर काफी समय तक आसपास के क्षेत्रों में धर्म प्रचार किया। 

सेंट फ्रांसिस ने यहीं से जापान और चीन की भी यात्राएं की। चीन के क्वान्तुंग तट के पास एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु  3 दिसंबर 1552 को हो गई।

फरवरी 1553 में पुर्तगालियों ने उसके शव को कब्र से निकाल कर 14 मई 1554 को गोवा लेकर आए। इसके बाद शव को ममी बनाकर लोगों के दर्शनार्थ रखा गया है। फ्रांसिस जेवियर को मृत्यु  के 108 साल बाद रोम ने उसे उसकी 'सेवाओं' के लिए 'संत' कि उपाधि प्रदान की।

बॉम बेसेलिका का परिसर काफी विशाल और हराभरा है। चर्च के बगल में एक ऊपर सीढ़ियां चढ़कर एक सुंदर संग्रहालय भी है। इसके साथ ही यहां एक ध्वनि और प्रकाश का शो भी होता है। चर्च के अंदर पुस्तकें और स्मृति चिन्ह बिक्रय का काउंटर भी बना हुआ है।    

गोवा के चर्च में ड्रेस कोड -  गोवा के सभी चर्च में प्रवेश के लिए ड्रेस कोड देखने को मिलता है। खास तौर पर महिलाएं कम कपड़ो में प्रवेश नहीं कर सकतीं। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे मिनी स्कर्ट या स्लिवलेस कपड़ों में इन चर्चों के अंदर प्रवेश ना करें। हमने कई जगह सही तरीके से दुपट्टा नहीं रखने पर भी सुरक्षाकर्मियों को महिलाओं को हिदायत देते हुए देखा।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        (ST FRANCIS XAVIER , OLD GOA, BASILICA OF  BOM JESUS)


Tuesday, November 14, 2017

ओल्ड गोवा के ऐतिहासिक चर्चों की ओर

ओल्ड गोवा, पोंडा, बेलगावी की ओर जाता हाईवे...
हमलोग ओल्ड गोवा की ओर चल पड़े हैं। यहां गोवा की पुरानी ऐतिहासिक विरासत के दर्शन होंगे। राजधानी पणजी से ओल्ड गोवा की दूरी 12 किलोमीटर है। यह पोंडा, बेलगाम , हुबली (कर्नाटक) की ओर जा रहे नेशनल हाईवे नंबर 4 ए पर है। यह सड़क बहुत अच्छी बनी है। इस पर कई जगह सर्विस रोड भी है। हमारी एक्टिवा तेज गति से रास्ता नाप रही है। हम ओल्ड गोवा पहुंच चुके हैं। चौराहे पर गांधी जी की प्रतिमा नजर आती है। बापू एक बच्चे को दुलार करते हुए नजर आ रहे हैं। गांधी सर्किल से बायीं तरफ मुड़ने पर हम ओल्ड गोवा के पुराने चर्चों को देखेंगे। वैसे आप ओल्ड गोवा पणजी से चलने वाली नियमित बसों से भी पहुंच सकते हैं।
ओल्ड गोवा का गांधी सर्किल। यहां भी हैं बापू...
ओल्ड गोवा का नाम वेल्हा भी है। ओल्ड गोवा भी काफी समय तक गोवा की राजधानी रह चुका है। कदंबा राजतंत्र के शासन में 1050 से 1080 के बीच जयकेशी से शासन काल में राजधानी चंद्रपुर से स्थानांतरित होकर वेल्हा (ओल्ड गोवा ) में आ गई। इसका नाम गोवापुरी रखा गया। यह तब बड़े व्यापारिक शहर के तौर पर विकसित हुआ। कदंबा शासन काल में समुद्री व्यापार ने भी नई ऊंचाइयों को छुआ। कदंबा शासन काल के लोप होने के बाद गोवा देवगिरी के यादवों के शासन में आ गया। देवगिरी के यादव राजा रामचंद्र (1271) के शासन काल में गोवा में कई मंदिरों का भी निर्माण हुआ। इनमें तंबदी सुरला का महादेव मंदिर प्रमुख है। गोवा ने चंदोर पर मुहम्मद बिन तुगलक का आक्रमण भी देखा।


चौदहवीं सदी में गोवा विजय नगर सम्राज्य का हिस्सा बन गया। विजय नगर राजा यहां से अरबी घोड़ों की तिजारत करते थे। 1469 में गोवा गुलबर्ग के बहमनी सल्तनत का हिस्सा बना। 1488 में गोवा बीजापुर के अदिलशाही सल्तनत का हिस्सा बन गया। इस दौरान ओल्ड गोवा का वेल्हा बहुत ही प्रमुख शहर बन गया था। यह बीजापुर के बाद दूसरी राजधानी के तौर पर जाना जाता था।  1498 में वास्कोडिगामा के कालीकट आने के बाद पुर्तगालियों ने कोचीन में अपना व्यापारिक केंद्र बनाया।

1510 में पुर्तगाली अफांसो डे अलबुबर्क ने ओल्ड गोवा को आदिलशाही सल्तनत से अपने कब्जे में लिया। इस तरह से ओल्ड गोवा में पुर्तगाली कब्जे की शुरुआत हुई। हालांकि शिवाजी और संभाजी की पुर्तगालियों से लड़ाई हुई, पर आगे गोवा, दमन, दीव और दादरा नगर हवेली जैसे समुद्र तटीय इलाकों पर पुर्तगालियों का कब्जा बढ़ता गया। ये क्षेत्र ब्रिटेन से भारत की आजादी के बाद जाकर स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन सके।

हम अब ओल्ड गोवा के एक विश्व विरासत स्मारक के दर्शन के लिए आगे बढ़ रहे हैं। बॉम जीसस महागिरजाघर या बॉम जीसस बेसेलिका को यूनेस्को ने विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है। साल 1986 में चर्चेज एंड कानवेंट्स ऑफ गोवा को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया। इन चर्च में बॉम बेसेलिका प्रमुख है।

गोवा के ज्यादातर चर्च पुर्तगालियों द्वारा निर्मित हैं। आज पूरे गोवा की आबादी में 35 फीसदी क्रिस्चियन लोग हैं। पुर्तगालियों के आगमन के बाद गोवा में बड़ी संख्या में चर्चों का निर्माण हुआ। अब ये चर्च भारत की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन चुके हैं। ओल्ड गोवा के ये चर्च लोगों के दर्शन के लिए सुबह 8.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुले रहते हैं। इनमें प्रवेश का कोई टिकट नहीं है।
हालांकि संग्रहालय सुबह 10 से 5 बजे तक खुला रहता है। इसमें प्रवेश के लिए 15 रुपये का टिकट है। संग्रहालय के अंदर फोटोग्राफी वर्जित है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(OLD GOA, GANDHI CIRCLE, CHURCH ) 



आगे पढ़िए- ओल्ड गोवा की विश्व विरासत बॉम बेसेलिका के बारे में..

Sunday, November 12, 2017

1843 में पणजी बना गोवा की राजधानी

पणजी का बस केंद्रीय बस अड्डा। 
गोवा शहर के तकरीबन बीच में स्थित पणजी शहर गोवा की राजधानी है। यह शहर मंडोवी नदी के तट पर बसा है। अगर गोवा के मानचित्र में देखें तो यह काफी हद तक बीचों बीच स्थित है। गोवा की राजधानी पणजी को पंजीम नाम से भी जाना जाता है। पणजी पश्चिमी भारत में मांडवी नदी के तट पर स्थित है। 18वीं शताब्दी के मध्य तक यह छोटा सा गांव था। प्लेग के लगातार प्रकोप के कारण पुर्तगालियों के वेलहा गोवा (पुराना गोवा या इला) को मजबूरन छोड़ना पड़ा। फिर उन्होंने 1843 में पणजी को राजधानी बनाना तय किया।

 आबादी के लिहाज से पणजी गोवा में वास्कोडिगामा और मडगांव से छोटा शहर है। आजकल इसकी आबादी 60 हजार के आसपास है। पर पणजी चाकचिक्य भरा शहर है। नदी समंदर के बीच महानगरों जैसा लुक मिलता है। अब शहर में शापिंग मॉल बन चुके हैं। आबादी का बोझ बढ़ रहा है तो ट्रैफिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए लंबे फ्लाई ओवर का निर्माण जारी है।

पणजी से नार्थ गोवा की ओर जाने में मंडोवी नदी पर विशाल पुल नजर आता है। इस पुल के आसपास कई बड़े बड़े जहाज नदी में तैरते दिखाई देते हैं। वास्तव में ये जहाज भी गोवा में मनोरंजन का केंद्र हैं। शाम को इन जहाज में लाइव संगीत और खाने पीने का कार्यक्रम होता है। अगर आपके पास समय है तो इसमें भी जरूर हिस्सा लिजिए।

कालांगुट में गोवा के पहले मुख्यमंत्री दयानंद वी बांदोडकर की प्रतिमा। 
पणजी गोवा का बड़ा व्यापारिक केंद्र होने के साथ राजधानी भी है, इसलिए यहां भी रहने के लिए कई अच्छे होटल हैं। हालांकि ज्यादातर सैलानी समंदर तट पर बने होटलों में रहना पसंद करते हैं। पणजी से आपको गोवा के हर हिस्से में जाने के लिए बसें मिल जाएंगी। पणजी का कदंबा बस स्टैंड शहर के बाहरी इलाके  में बाइपास चौराहे पर स्थित है। यहां से स्थानीय बसें और इंटरस्टेट बसें मिलती हैं। खासतौर पर मडगांव और वास्कोडिगामा के लिए अच्छी नान स्टाप बसें चलती हैं। इनसे सफर करना टैक्सी में सफर करने से अच्छा है। गोवा की सरकारी बस सेवा का नाम कदंबा बस सर्विस है।हालांकि तमाम रुट पर यहां निजी बसें भी चलती हैं।

आपको पणजी से कंडोलियम, कालांगुट, बागा आदि बीच जाने के लिए लगातार चलने वाली लोकल बसें मिल जाएंगी। इन बसों में महिला कंडक्टर भी सेवारत मिलती हैं। बसों में लगेज रखने का भी बेहतर इंतजाम है। भीड़ ज्यादा नहीं होती इसलिए आप सैलानी के तौर पर भी इसमें सफर करके अपने टैक्सी का खर्च बचा सकते हैं। गोवा में आमतौर पर टैक्सी का किराया महंगा है। यहां ओला-उबर जैसी सेवाएं अभी नहीं चलती हैं।
पणजी में दुर्गा पूजा का सजा पंडाल

 कई समुद्र तट पास होने के कारण पणजी में सैलानी रुकना पसंद करते हैं। राजधानी पणजी में यूपी और बिहार के लोग भी बड़ी संख्या में आपको मिल जाएंगे।
हमें पणजी बस स्टैंड के पास हमें नवरात्र पर मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की गई पंडाल दिखाई दे जाती है। अपने उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाई बंधु लोग हैं। बड़ी श्रद्धा और मनोयोग से माता का पंडाल सजाया है और दुर्गापूजा की तैयारी कर रहे हैं। हम माता के दर्शन करने पंडाल में पहुंचते हैं। हमें वहां नवरात्र के पहले दिन का प्रसाद मिलता है और हम आगे की यात्रा पर चल पड़ते हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(PANJIM, GOA CAPITAL ) 

पणजी में मंडोवी नदी पर पुल। 


Friday, November 10, 2017

गोवा का मतलब है मछली... और क्या...

मैं और अनादि अगोडा फोर्ट से नीचे उतर रहे हैं। सामने मंडोवी नदी के तट पर सुबह सुबह जाल फेंकते मछुआरे नजर आते हैं। हमलोग रुक जाते हैं। दर्जनों मछुआरो को मछली पकड़ते हुए देखना अच्छा लगता है। कुछ देर तक हमलोग उनका श्रम देखते हैं। वास्तव में मछली पकड़ना चाहे नदी में हो या समंदर में एक बड़ा ही श्रम साध्य कार्य है। सूरज उगने से पहले ही मछुआरों की टीम मछली पकड़ने के लिए पूरी तैयारी से निकल पड़ती है। इनके साथ होती है एक नाव और महाजाल।

जाल फेंकने के बाद काफी देर तक टोह लेने का काम चलता है। इसके बाद जाल को खींचा जाता है। जब जाल किनारे आता है तो  इसमें फंस जाती हैं काफी मछलियां। पर इन मछलियों के साथ इसमें कई और जलीय जीव भी आ जाते हैं। ये जलीय जीव कई बार जहरीले भी होते हैं। मछुआरों के जाल में कई बार सांप भी आ जाते हैं। मछलियों की पहचान रखने वाले मछुआरे मछलियों को अलग करते हैं। फिर जलीय जीवों को वापस समंदर में फेंकने जाते हैं। यह सब कुछ मछुआरों के लिए रोज का रुटीन बन गया है।

मंडोवी नदी के अलावा मुझे दक्षिण गोवा के कोलवा बीच पर भी मछुआरे बड़े मनोयोग से मछली पकड़ने में लगे हुए दिखाई देते हैं। जब मछलियां पकड़ने का काम पूरा हो जाता है तब वे अपनी नाव को किनारे लगा देते हैं। फिर मछलियों का बंटवारा कर चल पड़ते हैं घर की ओर।

गोवा देश में शीर्ष समुद्र तटीय पर्यटन स्थलों में से एक है। राज्य के भारतीय-पुर्तगाली भोजन, विशेष रूप से समुद्री भोजन यहां आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण है। खास तौर पर यहां आने वाले लोग गोवान फिश करी खाना पसंद करते हैं। इसे यहां खास तौर पर येलो मस्टर्ड बेस पर तैयार किया जाता है।
मछली उत्पादन में कमी आई -

गोवा को भले ही मछली के लिए जाना जाता हो पर हाल के सालों में यहां मछली उत्पादन में कमी आई है। समुद्री मछली के उत्पादन में जुलाई 2015 से जून 2016 के दौरान कमी देखने को मिली है। इस कमी का मुख्य कारण सार्डिन मछली के पकड़ने में आई कमी है।

मछली पालन मंत्रालय द्वारा गोवा विधानसभा के पटल पर रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में कुल 80,849 टन सार्डिन मछली पकड़ी गई थी। वहीं, 2015 में यह घटकर 57,270 टन रह गई। जबकि साल 2016 में अब तक 6,481 टन सार्डिन पकड़ी गई है। मछली पकड़ने में आई कमी का मुख्य कारण एलईडी लाइटों के साथ मछली पकड़ने पर लगाई गई रोक है। गोवा के मत्स्य पालन विभाग ने केंद्रीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) से मछली संसाधनों पर एलईडी लाइट के पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करने को कहा है। गोवा के जल क्षेत्र में एलईडी लाइटों के प्रयोग पर रोक लगाने का आदेश 12 मई, 2016 को जारी किया गया था।

अब मछली खरीदने पर सब्सिडी - उत्पादन कम होने के कारण गोवा में मछली महंगी होती जा रही है। पर साल 2017 में गोवा सरकार ने मछली खाने के शौकीनों के लिए बड़ा ऐलान किया है। राज्य सरकार बहुत जल्द ही मछली सब्सिडी रेट पर उपलब्ध कराएगी। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( FISH, GOA, FISHING, SNAKE )
( आगे पढ़िए -पणजी गोवा की राजधानी  के बारे में ) 
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Wednesday, November 8, 2017

पुर्तगाली किला -आगुडा फोर्ट और लाइट हाउस

मैं और बेटा अनादि सुबह सुबह एक्टिवा से चल पड़े हैं। हमारी मंजिल है आगुडा फोर्ट। कालंगुट से कंडोलियम वाले रास्ते पर आगे बढ़ने के बाद बायीं तरफ सड़क पर चढ़ाई बढ़ने लगती है। हम ऊंचाई की ओर बढ़ते जा रहे हैं। पर सड़क काफी अच्छी है। सुबह की शीतल बयार के संग सफर सुहाना है। आगुडा फोर्ट से पहले एक नगरपालिका द्वारा निर्मित बच्चों का सुंदर उद्यान नजर आता है। पर वहां फिलहाल ताला लगा हुआ है। लो हम पहुंच गए हैं आगुडा फोर्ट के पृष्ठभूमि में। कुछ अस्थायी दुकानें बनी हैं यहां पर। पर सुबह सुबह ये दुकानें खुली नहीं हैं। हमें सामने 17वीं सदी का विशाल किला नजर आ रहा है।


आगुडा फोर्ट गोवा के प्रमुख ऐतिहासिक विरासत के स्थलों में से है। यह पणजी के करीब और सिंक्वेरियम बीच के काफी पास है। यहां पहुंचने का आसान रास्ता कालांगुट से कैंडोलियम होकर है। समंदर के किनारे ऊंचाई पर स्थित यह किला पुर्तगालियों द्वारा बनवाया गया था।
इस किले का निर्माण 1612 में डच और मराठा आक्रमणकारियों पर नजर रखने के लिए कराया गया था। इस विंदू से अरब सागर में यूरोप की ओर से आते हुए जहाज भी नजर आ जाते थे।  किले के निर्माण में ऊंचे स्थल का चयन सामरिक दृष्टि से सोच समझकर किया गया था। किले के दूसरे हिस्से में मंडोवी नदी का तट है। किले को देखकर याद आया कि हमें बस में दिखाई गई फिल्म सिंह इस ब्लिंग में इसकी शूटिंग नजर आई थी।

किले का पास ही सिंक्वेरियम बीच के पास टाटा समूह द्वारा प्रबंधित पांच सितारा होटल भी है। आगुडा फोर्ट में कभी एक मीठे पानी का झरना हुआ करता था जिससे आने वाले जहाजों को पीने का पानी दिया जाता था। अब ये झरना नहीं है। किले का नाम आगुडा है जिसका मतलब ही पानी होता है। कभी यहां से गुजरते हुए जहाज पीने का पानी स्टोर करने के लिए ही यहां रुकते थे।

आगुडा फोर्ट में कुल 79 तोप तैनात करने का इंतजाम था। इस किले की विशाल मोटी दीवारें आज भी सलामत दिखाई देती हैं। किले के अंदर ताजा पानी स्टोर करने के लिए विशाल टैंक बना हुआ था। यह दो हिस्सों में बना है। ऊपरी हिस्से का पानी किले में इस्तेमाल के लिए होता था तो नीचे के हिस्से का पानी आने जाने वाले जहाजों के लिए।
अति प्राचीन लाइट हाउस - किले के पास ही पुर्तगालियों द्वारा बनवाया हुआ चार मंजिला लाइट हाउस है। यह लाइट हाउस 1864 का बना हुआ है। अपने तरह का यह एशिया का प्राचीनतम लाइट हाउस है। लाइट हाउस में शुरुआत में हर सात मिनट पर रोशनी देने का इंतजाम था। बाद में इसे घटाकर 1843 में 30 सेकेंड पर कर दिया गया। हालांकि 1976 से यह लाइट हाउस बंद है।
लाइट हाउस के पीछे पैदल चलकर जाने पर हरे भरे जंगलों के बीच व्यू प्वाइंट आता है। यहां से अरब सागर का नजारा सुंदर दिखाई देता है। सुबह सुबह भी कुछ युवतियां यहां घूमती नजर आईं।
लाइट हाउस और आगुडा फोर्ट के खुलने का समय सुबह नौ बजे से है। प्रवेश के लिए मामूली सी टिकट राशि है। हालांकि फोर्ट को आप बाहर से भी घूम कर देख सकते हैं।   
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(AGUADA FORT, GOA, LIGHT HOUSE ) 
( आगे पढ़िए- गोवा का मतलब मछली और क्या .... )  

Monday, November 6, 2017

गोवा में समंदर – सिंक्वेरियम-कंडोलियम-कालांगुट-बागा-अंजुना बीच

गोवा के कंडोलियम बीच पर सुबह सुबह 
सुबह सुबह होटल से बाहर निकलते हैं हमने एक्टिवा किराये पर ले ली है। गोवा घूमने का सबसे किफायती तरीका है बाइक या स्कूटी किराये पर लेना। हर इलाके में आपको स्कूटी आसानी से किराये पर मिल जाती है। दरें 250 से 350 रुपये प्रतिदिन तक हो सकती हैं। नार्थ गोवा में किराया कम है, साउथ गोवा में थोड़ा ज्यादा। हमें ओसबोर्न होटल के ठीक बगल में जीको रेस्टोरेंट में एक महिला से एक्टिवा किराये पर मिल गई। अपना आधार कार्ड उन्हें अमानत के तौर पर जमा किया और एक्टिवा अगले दो दिनों के लिए हमारी हुई।

गोवा में पेट्रोल का भाव 64 रुपये लीटर है, पर हर जगह पंप नहीं हैं तो जगह जगह बोतल में पेट्रोल बेचने वाले सड़क के किनारे मिल जाते हैं। वे 80 रुपये में एक लीटर तेल देते हैं। हां यहां हेलमेट पहनना और गाड़ी चलाते समय ट्रैफिक नियमों का पालन जरूरी है।

तो हमलोग चल पड़े हैं कैंडोलियम बीच की ओर। रास्ते में फैब इंडिया का शोरुम दिखाई देता है। सुबह में कैंडोलियम काफी शांत है।  यह नार्थ गोवा का कम भीड़ भाड़ वाला बीच है। इसके थोड़ा आगे सिंक्वेरियम बीच है। सिंक्वेरियम, कैंडोलियम, कालांगुट, बागा, अंजुना ये सभी बीच एक क्रम में हैं। सभी जगह वही अरब सागर दिखाई देता है।आप शाम या सुबह जहां अच्छा लगे गुजारें। बार बार गोवा आने वाले लोगों की कुछ खास बीच पसंद बन जाती है।

अंजुना बीच पर कोई खास सौंदर्य नहीं है। वहां बड़े बड़े पत्थर हैं जो खतरनाक भी हो सकते हैं। कुछ लोग अंजुना बीच को हाउंटेड (भुतहा) मानते हैं। हमें लौटते हुए एक परिवार मिला मुरादाबाद का, उस परिवार की एक लड़की अंजुना बीच से दुःस्वप्न लेकर जा रही थी। वह अंजुना में गहरे गड्ढे में गिर कर घायल हो गई थी। उसे लोगों ने काफी डरा दिया था कि ये बीच भुतहा है।

साउथ गोवा में सबसे चहल पहल वाला बीच कोलवा है। पर इसके आसपास बेनालियम और कुछ और भी सुंदर समुद्र तट हैं, जहां सैलानियों की लगातार आमद रहती है। पणजी के पास एक मीरा मार बीच भी जहां शाम को सैलानी पहुंचते हैं।

अब कुछ बातें गोवा के बारे में। वर्तमान में गोवा महाराष्ट्र के सावंतवाड़ी और केरल के उत्तर कनारा के बीच का समुद्र तटीय इलाका है। गोवा 3702 वर्ग किलोमीटर के दायर में फैला हुआ सुंदर राज्य है। 1961 में गोवा पुर्तगालियों के कब्जे से आजाद हुआ। देश की आजादी के बाद गोवा की आजादी के लिए अलग से लंबी लड़ाई लड़ी गई। मुक्ति के बाद गोवा को दमन और दीव के साथ केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। दमन और दीव अलग होकर अब भी केंद्र शासित प्रदेश हैं पर गोवा को 30 मई 1987 को राजीव गांधी के शासन काल में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। यह देश का 25वां राज्य बना। यहां दो राजस्व जिले हैं नार्थ गोवा और साउथ गोवा। मुंबई से गोवा की दूरी 594 किलोमीटर है। प्रति व्यक्ति आय में गोवा देश के सभी राज्यों में सबसे ऊपर है। पणजी गोवा की राजधानी है, पर वास्कोडिगामा राज्य का सबसे बड़ा शहर है।

गोवा का इतिहास काफी पुराना है। ईसा पूर्व काल में गोवा का क्षेत्र मौर्य शासन का हिस्सा हुआ करता था। गोवा नाम महाभारत के भीष्मपर्व में गोमंत शब्द से आया है। दूसरी सदी में आए यूनानी यात्री टोलेमी ने गोवा का जिक्र किया है। गोवा में दो प्रमुख नदियां बहती हैं, मंडोवी और जुआरी। दोनों नदियां अरब सागर में मिल जाती हैं।

चौथी शताब्दी में गोवा भोज राजतंत्र का हिस्सा रहा। सन 580 से 750 के बीच यह बादामी के चालुक्य राजाओं के अधीन रहा। पर सबसे लंबे समय तक गोवा कदंबा राजतंत्र के अधीन रहा। आठवीं से 13वीं सदी तक यहां कदंबा वंश का शासन रहा। इस दौरान इसकी राजधानी चंद्रपुर (चांदोर ) में थी। गोवा के रोचक इतिहास के बारे में हम आगे भी बात करेंगे।
( आगे पढ़िए - गोवा का पुर्तगाली किला आगुटा फोर्ट और लाइट हाउस ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( GOA, SEA BEACH, BAGA, ANJUNA, CALANGUTE, CANDOLIM, SINQUERIM )