Tuesday, October 17, 2017

किला राय पिथौरा कभी कहलाता था लालकोट


दिल्ली के मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन के पास दिल्ली की एक प्राचीन विरासत है। यहां कम लोग पहुंचते हैं। पर इतिहास के पन्नों में इसका खास महत्व है। हम बात कर रहे हैं किला राय पिथौरा की। हालांकि अब किले के नाम पर यहा कुछ खास मौजूद नहीं है। पर यह हमें दिल्ली के स्वर्णिम अतीत की स्मृतियों में ले जाता है।

किला राय पिथौरा का निर्माण पृथ्वीराज चौहान ने कराया था। कुछ लोग उन्हें दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक के तौर पर देखते हैं। उन्हें राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता था। भारतीय इतिहास के पन्नों पर पृथ्वीराज चौहान का नाम मुस्लिम अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध हिन्दू प्रतिरोध की कथाओं के प्रसिद्ध नायक के रुप में है किला राय पिथौरा के परिसर में घोड़े पर सवार पृथ्वीराज चौहान की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।
जहां अभी किला राय पिथौरा है वहां पहले लालकोट नामक प्राचीन नगर हुआ करता था। इसे तोमर वंश के राजाओं ने बसाया था। तोमर राजा, अनंगपाल ने दिल्ली में संभवत पहला नियमित रक्षा संबंधी कार्य किया था। उनके नाम पर हरियाणा में फरीदाबाद के पास अनंगपुर नामक गांव है। अनंगपाल ने जो शहर बसाया उसे लालकोट नाम दिया गया था।

लाल कोट अर्थात लाल रंग का किला, जो कि वर्तमान दिल्ली क्षेत्र का प्रथम निर्मित नगर था। इसकी स्थापना तोमर शासक राजा अनंगपाल द्वितीय ने 1060 में की थी। तोमर वंश ने दक्षिण दिल्ली क्षेत्र में सूरजकुण्ड के पास से राजधानी बनाकर शासन किया। तोमरवंश का इतिहास 700 ईस्वी से आरम्भ होता है। फिर चौहान राजा, पृथ्वीराज चौहान ने 12वीं सदी में लालकोट को अपने अधिकार में ले लिया और उस नगर एवं किले का नाम किला राय पिथौरा रखा।

पृथ्वीराज चौहान ने 1191  में मुहम्मद गोरी को तराइन ( थानेशर, हरियाणा) के प्रथम युद्ध में हरा कर दिल्ली पर कब्जा किया था। इसके बाद पृथ्वीराज ने किला राय पिथौरा को विशाल नगर में तब्दील किया। लेकिन दिल्ली की तख्त पर चौहान का कब्जा ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाया। एक साल बाद 1192 में वह कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथों हार गया और ये नगर मुस्लिम शासकों के कब्जे में आ गया।

राय पिथौरा के अवशेष अभी भी दिल्ली के साकेत,  महरौली, किशनगढ़ और वसंत कुंज क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं। इस किले की प्राचीरों के खंडहर अभी भी कुतुब मीनार के आसपास के क्षेत्र में आंशिक रूप से देखे जा सकते हैं।
किला राय पिथौरा यानी लालकोट दिल्ली के सात प्राचीन नगरों में से एक है। इस किला में कुल 28 बुर्ज हुआ करते थे। इसके बुर्ज बिल्कुल नष्ट प्राय हो चुके हैं। अब इसमें किला के नाम पर कुछ बुर्ज और दीवारें ही बची हैं। इस किले में बुर्ज नंबर 15 सबसे बड़ा बुर्ज है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने इसका संरक्षण किया है।

आजकल महरौली बदरपुर रोड (एमबी रोड ) कुतुबमीनार से अधचीनी के बीच इस किले को काटती हुई जाती है। इस किले का विस्तार जितने हिस्से में था उसमें अब दक्षिण दिल्ली की तमाम नई नई कालोनियां बस चुकी हैं। इसलिए अब किले का पूरा घेरा अब पुनर्स्थापित करना मुश्किल है। पर इसमें किसी जमाने में कुल 13 दरवाजे हुआ करते थे।

दिल्ली के प्राचीन शहरों में से एक जहांपनाह की एक दीवार किला राय पिथौरा से मिलती है। इस दीवार को संरक्षित किया गया है। मुहम्मद बिन तुगलक ने सीरी और किला राय पिथौरा के बीच जहांपनाह नामक नगर बसाया था।

कैसे पहुंचे – आप मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन से उतरने के बाद मालवीय नगर थाने की तरफ बढ़े। यानी साकेत मॉल की उल्टी तरफ गीतांजलि कालोनी के सामने किला राय पिथौरा का परिसर है। बस नंबर 680 और 534 किला राय पिथौरा से होकर गुजरती है। परिसर के अंदर एक सुंदर पैदल चलने के लिए ट्रैक बनाया गया है। बीचों बीच एक छोटा सा संग्रहालय और चित्र प्रदर्शनी है, जहां दिल्ली के इतिहास से रुबरू हुआ जा सकता है। इस इमारत के ऊपर ही पृथ्वीराज चौहान की प्रतिमा स्थापित की गई है।


06 मीटर चौड़ी दीवार हुआ करती थी किला राय पिथौरा की
18 मीटर तक ऊंचाई थी कई जगह किले की दीवार की
13 दरवाजे हुआ करते थे किला राय पिथौरा में प्रवेश के लिए। 


 -vidyutp@gmail.com  

( QUILA RAI PITHAURA, DELHI, LALKOT  ) 



Sunday, October 15, 2017

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे...

सन 1853 में भारत में जब मुंबई से थाणे के बीच पहली बार रेल चली तो यह एक आश्चर्यजनक घटना थी। पर अगले दो दशक में देश के कई हिस्सों में रेल की सिटी पहुंच गई। न सिर्फ लोग रेलगाड़ियों के सफर का आनंद ले रहे थे, बल्कि लोकगीतों और गीतों रेलगाड़ियों की चर्चा सुनने को मिली। हिंदी और भोजपुरी में कई गीत और कविताएं रेलगाड़ियों पर लिखी और गाई गईं। तो आइए कुछ गीतों की चर्चा करते हैं।
हिंदी के महान कवि वाराणसी के भारतेंदु हरिश्चंद्र ने रेलवे के बारे में कुछ इस तरह लिखा।
धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल, मानो जादू किहिस दिखाइस खेल... ( भारतेंदु हरिश्चंद्र)
पैसे लेके पास भगावे, ले भागे मोहि खेले खेल, का सखि साजन,  ना सखि रेल।
तो अब भोजपुरी का एक और लोकगीत सुनिए। इस गीत को लखनऊ की मशहूर लोक गायिकी मालिनी अवस्थी ने अपनी मधुर आवाज में की बार गाया है।

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे,
रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे ।


जौन टिकसवा से बलम मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें,
पानी बरसे टिकस गल जाए रे, रेलिया बैरन ।।


जौने सहरिया को बलमा मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें,
आगी लागै सहर जल जाए रे, रेलिया बैरन ।।


जौन सहबवा के सैंया मोरे नौकर, रे बलमा मोरे नौकर,
गोली दागै घायल कर जाए रे, रेलिया बैरन ।।


जौन सवतिया पे बलमा मोरे रीझे, रे सजना मोरे रीझें,
खाए धतूरा सवत बौराए रे, रेलिया बैरन ।।


और अब एक कवि कविता जो रेल गाड़ी के पैसेंजर ट्रेन में भीड़ का चित्रण करते हैं। क्या शानदार शब्द चित्र खींचा है - इलाहाबाद के चर्चित कवि कैलाश गौतम ने – अमवसा के मेला कविता में रेल गाड़ी में भीड़ का चित्रण करते हैं।
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री-गर्रा ओहर लोली लोला
 बिच्चे में हउवै सराफत से बोला
चपायल  केहूदबायल हौ केहू
 घंटन से उप्पर टंगायल  केहू
केहू हक्का-बक्काकेहू लाल-पीयर
केहू फनफनात हउवै कीरा के नीयर
 बप्पा रे बप्पा दइया रे दइया
तनी हमें आगे बढ़े देत्या भइया
मगर केहू दर से टसकलै  टसकै
टसकलै  टसकैमसकले  मसकै
छिड़ल हौ हिताई-नताई  चरचा
पढ़ाई लिखाईकमाई  चरचा
दरोगा  बदली करावत हौ केहू
 लग्गी से पानी पियावत हौ केहू
अमावास के मेला अमावस  मेला
इहइ हउवै भइया अमावस  मेला।

एक भोजपुरी फिल्म आई थी लागी नाही छूटे रामा. उसके के गीत में रेल गाड़ी की चर्चा कुछ इस तरह से शुरू होती है।
छुक छुक गाडी,  धदे पइसा, चल कलकत्ता (लाही नाही छुटे रामा )
एक युवा कवि की कविता सुनिए....
कविता - लोहे के गाड़ी लोहे के पटरीजाए के बा टाटा नगरी
बचपन में स्कूली कोर्स में एक कविता थी
रेल हमारी, लिए सवारी, काशी जी से आई है।
भोजपुरी के गीतकार उमाकांत वर्मा फिल्म पिया के प्यारी में एक गीत लिखते हैं – आइल तूफान मेल गड़िया हो साढे तीन बजे रतिया....

अगर हिंदी फिल्मों की बात करें तो इसके कई गीत रेलगाड़ियों के आसपास घूमते हैं। साल 1974 की फिल्म दोस्त का गीत सुनिए - गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है, चलना ही जिन्दगी है, चलती ही जा रही है...इसे गाया था बड़े भाव से किशोर कुमार ने। ये फिल्म दुलाल गुहा ने बनाई थी।

एक और फिल्मी गीत देखिए - छुक छुक छुक छुक रेल चली . चुनू मुनू आए तो ये खेल चली ( 1959 में बनी फिल्म सोने की चिड़िया का ये गीत बच्चों की लोरी की शैली में है।

अशोक कुमार की फिल्म आशीर्वाद ( 1968 ) में ये गीत देखिएगा – रेलगाड़ी रेलगाड़ी, रेलगाड़ी रेलगाड़ी, छुक छुक छुक छुक बीच वाले स्टेशन बोले रुक रुक रुक। इस गीत को अशोक कुमार ने खुद अपनी आवाज में ही गाया है। संगीतबद्ध किया था वसंत देसाई ने। गीत के लेखक थे हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय।  इस गीत की आगे की लाइनें सुनिए -  बीच वाले स्टेशन बोलें, रुक रुक रुक रुक , ब्रह्मपुर धरमपुर ब्रह्मपुर , मांडवा खंडवा , रायपुर जयपुर , तालेगांव मालेगांव , नेल्लोर वेल्लोरे, शोलापुर,कोल्हापुर , कुक्कल डिंडीगुल , मच्छलीपट्नम बींबलीपट्नम , ऊंगोल नंदीगुल , कॉरेगांव, गोरेगांव , ममदाबाद अमदाबाद अमदाबाद ममदाबाद, शोल्लुर कोन्नुर शोल्लुर कोन्नुर,  छुक छुक छुक छुक।
ये गीत पूरी तरह बच्चों का गीत था। इस गीत पर नन्हे मुन्ने बच्चों ने खूब मजा लिया है। क्या आपको भी कोई रेलगाड़ी वाला गाना या कोई कविता याद आती है तो बताइए ना।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( RAIL, MOVIE SONGS, POEMS, BHOJPURI ) 


Friday, October 13, 2017

शानदार 150 साल - दिल्ली का पुराना लोहे का पुल

आपकी रेलगाड़ी कई बार दिल्ली के पुराने लोहे के पुल से गुजरी होगी। आपको पता है कि यमुना नदी पर बना ये पुल सिर्फ दिल्ली का ही नहीं बल्कि देश के सबसे पुराने रेल पुल में से एक है। रेलवे के नंबरिंग के हिसाब से ब्रिज नंबर 249 इस पुल के पर यातायात चालू होने के बाद ही दिल्ली हावड़ा से जुड़ सका। यह एक रेल कम रोड ब्रिज है। यानी नीचे नीचे सड़क मार्ग और ऊपर ऊपर रेल।

इस पुल का निर्माण 1863 में आरंभ हुआ यानी 1857 की क्रांतिके छह साल बाद। पुल तीन साल में बनकर तैयार हो गया। 1866 में इस पर यातायात आरंभ हो गया। पहले यह सिंगल ट्रैक वाला पुल था पर 1913 में इसे डबल ट्रैक वाले रेल में पुल में बदला गया। इस पुल के निर्माण में 16 लाख 16 हजार 335 रुपये की कुल लागत आई थी। 1913 में डाउन लाइन बिछाने के लिए इसमें 12 स्पैन और दो एन्ड स्पैन जोड़े गए।

साल 2016 में दिल्ली के इस लोहा पुल ने अपनी सेवा के स्वर्णिम 150 साल पूरे किए। पर पुल का सड़क मार्ग और रेल मार्ग दुरुस्त है। इसपुल की खास बात है कि यह ऐतिहासिक लालकिला के बिल्कुल बगल में है। पुल पार करने के बाद ट्रेन तुरंत दिल्ली जंक्शन रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर जाती है। पुल के तरफ दिल्ली के जमुना बाजार का इलाका है। इसी तरह के लोहे के पुल दिल्ली हावड़ा मार्ग पर इलाहाबाद के नैनी में और पटना के पास कोईलवर में सोन नदी पर बनाए गए हैं।
अब दिल्ली में यमुना नदी पर कई नए सड़क पुल बन गए हैं पर अभी भी बड़ी संख्या में ट्रैफिक हर रोज पुराने लोहे के पुल से होकर गुजरता है। इसके सड़क मार्ग पर रिक्शे ठेले चलते नजर आते हैं जो होल सेल बाजार गांधीनगर और चांदनी चौक के बीच आवाजाही करते हैं। कभी कभी तो पुल पर जाम लगने के हालात बन आते हैं। पुराने लोहे के पुल ने दिल्ली के बसते हुए  देखा और आबादी का बोझ बढ़ते हुए देखा है।
बारिश के दिनों बंद करना पड़ता है - दिल्ली में हर साल बढ़ने वाले यमुना के जलस्तर का यह पुल साक्षी रहा है। 1978 में यमुना में सबसे बड़ी बाढ़ को देखा है, जब पानी खतरे के निसान से काफी ऊपर आ गया था। तब दिल्ली के कई इलाके डूब गए थे। हर साल यमुना का जल स्तर बढ़ने पर पुराने लोहे के पुल पर रेल यातायात एहतियात के तौर पर कुछ दिनों के लिए रोक दिया जाता है। पर बाढ़ से पुल को कोई नुकसान नहीं हुआ है। 150 साल में इस पुल की कई बार मरम्मत की गई है। पर इसका सुपर स्ट्रक्टचर आज भी बेहतर है।
आसपास कई नए पुल बने- भारतीय रेलवे ने 1997-98 में इस पुल के बगल में ही एक नया रेलवे पुल बनाने की योजना बनी। 2003 में काम शुरू हुआ। पिलर डाल दिए गए पर पर्यावरण और ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के मुद्दे पर 2008 में काम रुक गया। नए पुल के राह में ऐतिहासिक सलीमगढ़ का किला आ रहा था। अब यह विवाद दूर हो गया है। पर जब तक नया पुल नहीं तैयार हो जाता यह पुराना लोहे का पुल अपनी सेवाएं बदस्तूर जारी रखेगा।
- vidyutp@gmail.com

( OLD YAMUNA BRIDGE, DELHI, RAIL ) 

Thursday, October 12, 2017

कई मामलों में अनूठी है गुरुग्राम की रैपिड मेट्रो

भारत के कई शहरों में मेट्रो रेल सेवा आरंभ हो चुकी है। पर महानगरों में कुछ रेल सेवाएं मेट्रो से थोड़ी अलग किस्म की भी हैं। जैसे मुंबई में मोनो रेल चलती है तो दिल्ली से सटे गुरुग्राम ( गुड़गांव) में रैपिड मेट्रो रेल सेवा चलती है। यह रैपिड रेल कई मामलों में अनूठी है। यह देश की एकमात्र निजी क्षेत्र में चलाई जाने वाली मेट्रो रेल सेवा है। गुरुग्राम में रैपिड मेट्रो दिल्ली मेट्रो के फीडर सिस्टम यानी सहयोगी की तरह काम करती है।


सिकंदरपुर में जुड़ती है दिल्ली मेट्रो से - गुरुग्राम की रैपिड रेल पूरी तरह एलिवेटेड ट्रैक पर चलनेवाली मेट्रो सेवा है। इससे आप मेट्रो के सिकंदरपुर स्टेशन से चलकर दिल्ली गुरुग्राम के बीच जा रही सड़क नेशनल हाईवे नंबर 8 तक पहुंच सकते हैं। वास्तव में यह दिल्ली के मेट्रो के नेटवर्क और गुड़गांव के साइबर सिटी के कुछ प्रमुख सेक्टरों को जोड़ने का काम करती है।

एक सर्किल में चलती रेल -  रैपिड मेट्रो वास्तव में एक सर्किल में चलती है। जहां से चलती है लौटकर वही पहुंच जाती है। कुल ट्रैक 11.7 किलोमीटर का है और कुल 11 स्टेशन हैं। ट्रैक चौड़ाई के लिहाज से स्टैंडर्ड गेज (1435 मिमी) के हैं। रैपिड मेट्रो गुरुग्राम के सेक्टर 55-56 स्टेशन से आरंभ होकर वहीं वापस आ जाती है। इसके रास्ते में साइबर सिटी, डीएलएफ फेज 2, डीएलएफ फेज 3, एनएच 8, गोल्फ कोर्स रोड के इलाके आते हैं। फिलहाल हर 4 मिनट के अंतर पर मेट्रो उपलब्ध रहती है। गुरुग्राम में रैपिड मेट्रो की शुरुआत 14 नवंबर 2013 में हुई। हालांकि दिल्ली एनसीआर में रहते हुए मुझे इसकी सवारी का मौका 2017 में मिला।

रैपिड मेट्रो का संचालन बाकी मेट्रो नेटवर्क से अलग है। यह निजी क्षेत्र की कंपनी के अधीन है। इसका संचालन इन्फ्रास्ट्रक्चर लिजिंग एंड फाइनेंसियल सर्विसेज लिमिटेड नामक कंपनी करती है। इसकी योजना साल 2008 में बनी थी।

रैपिड मेट्रो में कुल तीन डिब्बों का संयोजन है। अगर गति की बात करें तो यह दिल्ली मेट्रो की तुलना में काफी धीमी गति से चलती है। आमतौर पर यह 35 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती है। हालांकि इसकी अधिकतम स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटा है। पर गुरुग्राम के साइबर सिटी के तमाम बड़े दफ्तरों और शापिंग मॉल्स से कनेक्टिविटी प्रदान करने के कारण इससे सफर करने वालों की अच्छी संख्या है। आपको अगर गुरुग्राम के एंबिएन्स मॉल और लीला होटल जाना हो तो रैपिड मेट्रो के मौलश्री गार्डन उतरना चाहिए।

दिल्ली मेट्रो का कार्ड मान्य - किराया की बात करें तो रैपिड मेट्रो का सफर दिल्ली मेट्रो से महंगा है। इसका न्यूनतम किराया भी मेट्रो के न्यूनतम किराया से ज्यादा है। पर अच्छी बात है कि इसमें दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट कार्ड मान्य है। आप दिल्ली मेट्रो से रैपिड मेट्रो में सिकंदर पुर में चढ़ते हैं तो अलग से कोई टोकन लेने की कोई जरूरत नहीं है। वहीं आप दिल्ली मेट्रो के स्मार्ट कार्ड को रैपिड मेट्रो के स्टेशनों पर रिचार्ज करा सकते हैं।


21 अगस्त 2017 को रैपिड मेट्रो में एक अनूठा प्रयोग किया गया है। इसमें हुए कार्यक्रम में ट्रेन के अंदर लोगों ने योगासन किया। इस दौरान इंदिरापुरम के प्रमोद बिष्ट ने 30 मिनट 14 सेकंड तक सुनील तोमर ने 17 मिनट तक और पूजा ने 15 मिनट सेकंड तक शरीर का संतुलन बनाकर पलैंक चैलेंज का बखूबी प्रदर्शन किया। http://rapidmetrogurgaon.com/home/ ) 
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(RAPID METRO, GRUGRAM, DELHI METRO ) 

Tuesday, October 10, 2017

सोनपुर से इलाहाबाद और आनंद भवन की सैर

पहली बार इलाहाबाद जाना हुआ 1990 में। इंटर पास करने के बाद पढ़ने की इच्छा थी इलाहाबाद या वाराणसी में। तो बीएचयू और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा के फार्म भरे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का फार्म अपनी छोटी बहन की पत्र मित्र मालती प्रजापति से मंगवाया। वे तब वहां से हिंदी साहित्य में एमए कर रही थीं। साहित्यिक पत्रिका आजकल में उनकी एक कविता पढ़ने के बाद बहन ने उन्हें पत्र मित्र बनाया था। ये मित्रता काम आई। तो मई 1990 की एक दोपहर में इलाहाबाद पहुंचा मीटरगेज ट्रेन के सफर से। सोनपुर से इलाहाबाद सिटी (रामबाग) तक एक पैसेंजर ट्रेन चलती थी। सोनपुर से शाम को 5 बजे चली ट्रेन अगले दिन दोपहर इलाहाबाद पहुंची।

इस ट्रेन से पहले मैं वाराणसी तक तो आ चुका था। आगे का सफर नया था। वाराणसी के बाद ट्रेन में भीड़ कम हो गई थी। रास्ते में ज्ञानपुर रोड, माधो सिंह, हंडिया खास जैसे स्टेशन आए। अब ये लाइन ब्राडगेज में बदल चुका है। इलाहाबाद सिटी स्टेशन उतरने पर मुझे रहने के लिए मालती दीदी के घर ही जाना था। तेलियरगंज में लाला की सराय में उनका घर था। लोगों से रास्ता पूछता हुआ वहां पहुंच गया। मालती जी और उनके परिवार के लोगों ने बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। अगले दिन मैंने अपने केंद्र में जाकर प्रवेश परीक्षा दी। इस दौरान दो दिन उनके घर रुका। परीक्षा के बाद मालती जी के सहपाठी मुझे साइकिल से इलाहाबाद शहर घुमाने ले गए। हमारे लिए इलाहाबाद की यात्रा में सबसे बड़ा आकर्षण था आनंद भवन देखना। वह भवन जिसके बार में बचपन से किताबों में पढ़ रखा था।   

आनंद भवन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का पूर्व आवास है। आनंद भवन दो मंजिला इमारत है जो अब यह संग्रहालय में तब्दील हो चुका है। 1899 में पंडित नेहरु के पिता मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद के चर्च लेन नामक मोहल्ले में एक पुरानी इमारत को अपने रहने के लिए खरीदा। जब इस बंगले में नेहरू परिवार रहने के लिए आया तब इसका नाम आनन्द भवन रखा दिया गया। बाद में मोतीलाल नेहरू पुराने भवन के पास एक नए भवन का निर्माण करवाया। फिर पुराने आवास को कांग्रेस के कार्यों हेतु स्थानीय मुख्यालय बना दिया गया। फिर पुराने आनंद भवन का नाम स्वराज भवन रख दिया गया। इसके नए आवास को आनंद भवन कहा जाने लगा। अब आप एक परिसर में स्वराज भवन और आनंद भवन दोनों को देख सकते हैं।

1931 में मोतीलाल नेहरु के निधन के बाद जवाहर लाल नेहरु ने एक ट्रस्ट बना कर स्वराज भवन को देश की जनता के लिए समर्पित कर दिया। तो 1974 में तत्कालीन प्रधानमत्री इंदिरा गांधी ने जवाहर लाल मेमोरियल फण्ड बना कर आनंद भवन को संग्रहालय में तब्दील कर दिया। आनंद भवन भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दिनों दास्तां बयां करता प्रतीत होता है। यहीं पंडित जवाहरलाल नेहरु का बचपन बीता। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तमाम नेताओं की गतिविधियों का केंद्र रहा आनंद भवन। 19 नवम्बर 1919 को इंदिरा गांधी का जन्म भी इसी भवन में हुआ। भारत का संविधान लिखने के लिए चुनी गई आल पार्टी का सम्मेलन भी इसी स्वाराज भवन में हुआ था। गांधी जी जब कभी इलाहाबाद आते थे तो यही रहते थे। यहां गांधीजी की इस्तेमाल की हुई कई वस्तुएं देखी जा सकती हैं। आनंद भवन में खान अब्दुल खां, जेबी कृपलानी, लाल बहादुर शास्त्रीराम मनोहर लोहिया, फिरोज गांधी का आना जाना लगा रहता था। 1942 इन्दिरा गांधी का विवाह यहीं पर हुआ तो 1938 मे जवाहरलाल नेहरु की मां स्वरुप रानी की मृत्यु भी यहीं हुई।

आनंद भवन को घूमते हुए आप नेहरु गांधी परिवार की इस्तेमाल की हुई तमाम वस्तुओं को देख सकते हैं साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से रूबरू हो सकते हैं। कई घंटे तक आनंद भवन में घूमने के बाद यहां से जवाहर लाल नेहरू की लिखी दो पुस्तकें खरीद लेता हूं। एक डिस्कवरी ऑफ इंडिया और दूसरी एन आटोबायोग्राफी।


अब आनंद भवन परिसर में एक ताराघर भी बन गया है। जवाहर प्लेनेटोरियम में दिन भर में कुल छह शो होते हैं। इसमें कुल बैठने के लिए 96 सीटें उपलब्ध हैं। देश के दूसरे कई शहरो से ये छोटा ताराघर है लेकिन शो अच्छा है। शो का टिकट 40 रुपये का है। हमारे सौर मंडल के बारे में जानने के लिए ये शो काफी उपयोगी है। खास तौर पर स्कूली बच्चों के लिए।

खुलने का समय – आनंद भवन सुबह 9.30 से सांय 5 बजे तक खुला रहता है। यह हर सोमवार और सरकारी छुट्टियों के दिन बंद रहता हैं। आजकल आनंद भवन संग्रहालय के लिए 10 रुपये प्रवेश शुल्क भारतीय नागरिकों से लिया जाता है।

विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( ANAND BHAWAN, ALLAHABAD, RAMBAG, JAWAHAR PLANETARIUM )


Sunday, October 8, 2017

कटनी से अमलोरी कोलफील्ड्स वाया सतना रीवा सीधी

साल 1995 में कटनी जाना हुआ था। एमए में पढ़ते हुए पीसीएस की परीक्षा देने की सूझी थी। हालांकि मैं कभी सिविल सेवाओं में नहीं जाना चाहता था। पर एक बार परीक्षा दे दी थी। एमपी  पीसीएस का केंद्र आया कटनी। तो वाराणसी से कटनी जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ। एक सहयात्री मिल गए, डीएलडब्लू की पंडित जी, जो कई बार से पीसीएस की परीक्षा दे रहे थे। रेल यात्रा के दौरान कई संभावित सवालों के जवाब उन्होंने मुझे बता दिए। आश्चर्य ये कि उसमें से कई सवाल अगले दिन परीक्षा में आ भी गए। हालांकि इस परीक्षा में चयन न मेरा हुआ न उनका। पर रेलयात्रा में हमने तय किया कटनी में होटल एक साथ ले लेंगे जिससे कुछ रुपयों की बचत हो जाएगी। कटनी जंक्शन उतरने पर हमलोग होटल की तलाश में निकले। काफी परीक्षार्थी आ गए थे इसलिए होटलों में मारामारी थी। खैर हमें एक होटल में कमरा मिल गया। अगले दिन हमारा परीक्षा केंद्र किसी स्कूल में था।
परीक्षा से निवृत होने के बाद तय किया कि कटनी के आसपास घूम कर वाराणसी वापस जाया जाए। तब जनसत्ता में अक्सर मिश्रीलाल जायसवाल, कटनी के छोटे-छोटे पत्र छपते थे। वास्तव में उनकी ख्याति लघु कविता लेखक के तौर पर थी। मैंने उन्हें बीएचयू से ही एक पोस्टकार्ड लिख डाला था कि कटनी आ रहा हूं आपसे मुलाकात करूंगा। सुबह सुबह मैं मिश्रीलाल जी के घर जा पहुंचा। उनका घर हमारे होटल के पास ही था। बुजुर्ग मिश्रीलाल जी किसी सरकारी नौकरी से रिटायर थे। रोज कई अखबारों के पत्र लिखना उनका प्रिय शगल था। उनके साथ सुबह की चाय पी, कुछ विचार साझा किए। फिर रुखसत हुआ। बाद में पता चला सितंबर 2007 में उनका निधन हो गया। उनकी कविताओं के चार संग्रह भी आ चुके थे। खैर कटनी प्रवास के दौरान मैंने और पंडित जी मैहर देवी के दर्शन के लिए तय किया था। इसलिए हमलोग दोपहर में मैहर के लिए निकल पड़े। कटनी से मैहर की छोटी सी ट्रेन यात्रा की जनरल डिब्बे में।

मैहर में मां शारदा के दर्शन करने के बाद हमारे और पंडित जी के रास्ते अलग हो गए। मैं मैहर सीमेंट प्लांट, सरला नगर के लिए निकल गया। वहां मेरे बड़े मामा जी के दामाद कर्मचारी थे। मुनिलाल सिंह। सीमेंट प्लांट की स्टाफ कालोनी में उन्हें फ्लैट मिला हुआ था। एक दिन दीदी और जीजा जी के साथ गुजारा। ये दीदी मेरी माताजी के उम्र की थीं। मैं उनसे पहली बार मिला था। मामा जी का नाम लेकर रिश्तेदारी की याद दिलाई। उन्होंने खूब खातिर की। अगले दिन बस स्टाप तक विदा करने आए। मैहर सीमेंट का एक और ब्रांड नाम था सेंचुरी सीमेंट। अब यह बिरला गोल्ड सीमेंट के नाम से आता है। यह बीके बिरला समूह की कंपनी है।

अब शुरू होता है इस यात्रा में नए मोड़ का अचानक आ जाना। मैहर में हमारी मुलाकात गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा संचालित एक यात्रा से होती है। जीप पर आठ लोगों के साथ चल रही यह यात्रा अहिंसक समाज की रचना के लिए निकाली गई थी। इसमें हमारे राष्ट्रीय युवा योजना (एनवाईपी) के दो पुराने साथी मिल गए थे जिन्होंने मुझे पहचान लिया और यात्रा में कुछ दिन मुझे साथ रहने को आमंत्रित किया। यहीं पर पता चला कि इस यात्रा में अगले दिन महान गांधीवादी एसएन सुब्बराव जी भी आ रहे हैं। तो सुब्बराव जी से मुलाकात का लोभ देखकर मैं यात्रा का सहभागी बन गया। शाम को सुब्बराव जी आए। उनसे 1991 से ही परिचय गहरा हो गया था। उन्होंने मुझे रात को अपना एक लेख हिंदी में लिखने का काम सौंप दिया। देर रात मैं ये कार्य करता रहा। अगले दिन यात्रा के साथ हमलोग सतना शहर में थे। सतना में भी कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई। इसके बाद अगले दिन मध्य प्रदेश का एक और शहर रीवा में पहुंचे। पर रीवा में मैंने दोपहर में यात्रा का साथ छोड़ दिया। यहां से मैं वाया सीधी- शक्तिनगर होते हुए वाराणसी सड़क मार्ग से जाने का मन बना चुका था।


मैं रीवा से सीधी बस से पहुंचा। सीधी मध्य प्रदेश का वह जिला है जो भोजपुरी बोलता है। सीधी के बस स्टैंड से मैंने अगली बस ली बैढ़न के लिए। बैढ़न के पास नार्दन कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के अमलोरी प्रोजेक्ट में मेरे मामाजी के बेटे कार्यरत हैं। तब यह सीधी जिले में आता था अब सिंगरौली जिले में आता है। उनके घर एक बार पहले भी जा चुका था, पर तब शक्तिनगर की ओर से आया था। बैढ़न बाजार में पहुंचते हुए बस ने रात के नौ बजा दिए थे। मेरी चिंता थी कि अगर अमलोरी कालोनी में जाने वाली आखिरी बस छूट गई तो छोटे बैढ़न कस्बे में रात कहां गुजारूंगा।

पर इसे संयोग कहिए अमलोरी कालोनी की ओर जाने वाली आखिरी बस मिल गई। मुझे जान में जान आई। रात 10 बजे के बाद भैया के फ्लैट में मैंने दस्तक दी। कई साल बाद गया था, पर भाभी ने आवाज से पहचान लिया। अगले कुछ दिन अमलोरी में गुजरे। भैया ने अमलोरी में कोयले की खुली खदानें दिखाईं। एनसीएल भारत सरकार की मिनी रत्न कंपनी है। इस इलाके में अमलोरी, जयंत और निगाही में एनसीएल की तीन प्रमुख खदानें हैं। इन सबके साथ बड़ी स्टाफ कालोनी है। अमलोरी से शक्तिनगर, चौपन, चुनार होते हुए वाराणसी वापस आ गया। 


-    - विद्युत प्रकाश मौर्य 
   (KATNI, MAIHAR, SATNA, RIWA, SIDHI, SINGRAULI, BAIDHAN, AMLORI, NCL, COALFIELDS) 
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Saturday, October 7, 2017

यहां आइए और आदिवासी समाज का जीवन देखिए...

अगर शहर में रहकर ग्राम्य जीवन की झलक देखनी हो तो भोपाल के मानव संग्रहालय को जरूर देखिए। यह संग्रहालय भोपाल के श्यामला हिल्स पर बना है। घूमने के लिए कई घंटे का समय निकाल कर रखिए। यह संग्रहालय 200 एकड़ में बना हुआ है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय का उद्देश्य आदिवासी और ग्राम्य जीवन से जनता को रुबरू करना है। अपने तरह का यह न सिर्फ भारत में बल्कि एशिया का अनूठा संग्रहालय है। यह संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार का एक स्वायत्त शासी संस्थान है। भोपाल में स्थित यह संग्रहालय वास्तव में राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है।
यहां आप भारत के अलग राज्यों के जनजातीय समाज का जीवन देख सकते हैं। संग्राहलय में अलग अलग क्षेत्र के आदिवासी परिवारों को लाकर कुछ समय के लिए रखा जाता है। यहां उनका परंपरागत घर, खानपान और जीवन शैली देखी जा सकती है।  यहां उनके बरतन, रसोई घर, कामकाज के उपकरण, पहनावा आदि को देखा जा सकता है। यहां आप जनजातीय आवास, तटीय गांव, देश की नदी घाटी संस्कृति को करीब से देख सकते हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता को देखने के लिए मानव संग्रहालय के सुंदर जगह हो सकती है। 

मानव संग्रहालय में जनजातियों द्वारा उपासना की जाने वाली मूर्तियां, संगीत में इस्तेमाल किए जाने वाले वाद्य यंत्र, आभूषण, चित्रकारी, प्रस्तर उपकरण, कृषि उपकरण, शिकार करने के हथियार, तीर कमान आदि देखे जा सकते हैं। मैं जब 1994 में यहां पहुंचा था तो छत्तीसगढ राज्य का गठन नहीं हुआ था। तब यहां  छत्तीसगढ़ की भी जनजातियां निवास करती थीं। अब वे जनजातियां वहां से हट गई हैं। फिर भी मध्य प्रदेश की लगभग 40 जनजातियों द्वारा निर्मित कालकृतियों को यहां देखा जा सकता है। इनमें सहरिया, भील, गोंड भरिया, कोरकू, प्रधान, मवासी, बैगा, पनिगा, खैरवार कोल, पाव भिलाला, बारेला, पटेलिया, डामोर आदि की झलक आप यहां देख सकते हैं।

पहले दिल्ली में खुला था यह संग्रहालय-  वास्तव में यह संग्रहालय 21 मार्च 1977 में नई दिल्ली के बहावलपुर हाउस में खोला गया था। परंतु दिल्ली में पर्याप्त जमीन व स्थान के अभाव में इसे भोपाल में लाया गया। चूंकि श्यामला पहाडी के एक भाग में पहले से ही प्रागैतिहासिक काल की प्रस्तर पर बनी कुछ कलाकृतियां मौजूद थीं, इसलिए इसे यहीं स्थापित करने का निर्णय लिया गया। यहां पर 32 परंपरागत चित्रित प्रागऐतिहासिक काल का दर्शित करने वाले शैलाश्रय भी हैं। संग्रहालय के अंदर कई प्रदर्शनी कक्ष भी बनाए गए हैं।

खुलने का समय - हर रोज 10 बजे से शाम 5 बजे तक मानव संग्रहालय खुला रहता है। हर सोमवार और राजकीय अवकाश के दिनों में बंद रहता है। आजकल प्रवेश टिकट 30 रुपये का है। संग्रहालय में प्रवेश गेट नंबर एक और गेट नंबर दो से किया जा सकता है।  जिन लोगों ने कभी गांव नहीं देखा हो उनके लिए यह स्थल अदभुत है। वहीं छात्रों और बच्चों को भी यह जगह लुभा सकता है। मानव संग्रहालय के परिसर से भोपाल की झील का सुंदर नजारा दिखाई देता है। 

सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भारत भवन - मानव संग्रहालय के एक कोने पर भारत भवन, भोपाल बना है। यह भोपाल की सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। इसकी स्थापना 1982 में की गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसका उदघाटन किया था। इस भवन का डिजाइन प्रसिद्ध वास्तुकार चार्ल्स कोरिया ने तैयार किया था।इस भवन के अंदर आर्ट गैलरी, इनडोर और आउटडोर सभागार आदि का निर्माण कराया गया है। भारत भवन में प्रमुख कलाकारों की पेंटिंग की प्रदर्शनी देखी जा सकती है। एक समय में भारत भवन विवादों का भी केंद्र रहा है। पर भारत भवन भोपाल की साहित्य और रंगकर्म की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। अक्सर यहां फिल्म शो, नाटक और चित्रकला प्रदर्शनियां जारी रहती हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( BHOPAL, ITARSI, BHARAT BHAWAN, SHYAMLA HILLS, MANAV SANGRAHALYA )