Wednesday, June 7, 2017

अतीत का वैभव - हंपी का विरुपाक्ष मंदिर

हंपी का सबसे प्रमुख स्मारक और आस्था का केंद्र  है विरुपाक्ष मंदिर। विरुपाक्ष यानी शिव का मंदिर। यह मंदिर 15वीं शताब्दी का बना हुआ है। यह हंपी के केंद्र में स्थित है। आजकल मंदिर के आसपास ही मुख्य बाजार और कई गेस्ट हाउस, होम स्टे आदि बने हैं। हंपी आने वाले लोग सबसे पहले इस मंदिर में ही दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विरुपाक्ष मंदिर हंपी के सबसे प्राचीन स्मारकों में से एक है।

विरुपाक्ष मंदिर हंपी के उन गिने-चुने मंदिरों में से है, जिनमें आज भी विधिवत पूजा होती है। विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय ने 8 अगस्त 1509 ई. में अपने राज्याभिषेक के समय मंदिर का विशाल गोपुरम निर्मित कराया था। कुछ लोगों का मानना है कि यह गोपुरम पहले से बना था इसका पुनर्निर्माण कृष्णदेव राय के काल में हुआ। विरुपाक्ष मन्दिर को 'पंपापटी' नाम से भी जाना जाता है। मन्दिर का मुख्य शिखर जमीन से 50 मीटर (165 फीट) ऊंचा है। इस गोपुरम में कुल 11 मंजिले हैं। इसके बाहरी दीवारों पर शानदार मूर्तिकारी कई गई है। इसमें कई मिथुन मूर्तियां भी देखी जा सकती हैं।  

विरुपाक्ष मंदिर का परिसर 210 फीट लंबा और 135 फीट चौड़ा है। मंदिर के मध्य में नहर है जिससे तुंगभद्रा नदी का पानी मंदिर में आता है। हालांकि इस नगर को अब पत्थरों से ढक दिया गया है। मंदिर परिसर में दाहिनी तरफ कल्याण मंडप बना है, जहां श्रद्धालु विविध संस्कार करा सकते हैं। यहां एक कुआं भी है।

मंदिर के अंदर दूसरा गोपुरम भी है जिसका नाम राय गोपुरम है। इससे आगे बढ़ने पर आप पतालेश्व,  मुक्तिनरसिम्हा और सूर्यनरसिम्हा के दर्शन कर पाते हैं। वहीं दाहिनी तरफ लक्ष्मीनरसिम्हा और महिषासुर मर्दिनी के मंदिर स्थित हैं। मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में भगवान विरुपाक्ष यानी शिव का मंदिर है। मंदिर सुबह 6 बजे खुल जाता है। यहां भक्तगण कई तरह के संस्कार भी कराते हैं। मंदिर की ओर से हर तरह के संस्कारों की दरें निर्धारित हैं। आप टोकन प्राप्त करके अभिषेक करा सकते हैं।

इस विशाल मंदिर के प्रांगण में कई छोटे-छोटे मन्दिर हैं। मंदिर परिसर में पंपादेवी और भुवनेश्वरी देवी के भी मंदिर हैं। परिसर के कई मंदिर तो विरुपाक्ष मन्दिर से भी ज्यादा प्राचीन हैं। मन्दिर के पूर्व में पत्थर की एक विशाल नंदी प्रतिमा है। दक्षिण की ओर गणेश की विशाल प्रतिमा देखी जा सकती है। यहां पर एक अर्ध सिंह और अर्ध मनुष्य की देह धारण किए नरसिंह की 6.7 मीटर ऊंची मूर्ति देखी जा सकती है।
विरुपाक्ष मंदिर के प्रवेश द्वार या गोपुरम हेमकुटा पहाड़ियों और आसपास की अन्य पहाड़ियों पर रखी विशाल चट्टानों से घिराहुआ है।  इन चट्टानों का संतुलन देखने में हैरान कर देता है।


मंदिर के बारे में यह किंवदंती है कि भगवान विष्णु ने इस जगह को अपने रहने के लिए कुछ अधिक ही बड़ा समझा और अपने घर वापस लौट गए। तब यहां शिव ने निवास किया। कहा जाता है कि विरुपाक्ष मन्दिर में एक भूमिगत शिव मन्दिर भी है। मन्दिर का बड़ा हिस्सा पानी के अन्दर समाहित है, इसलिए वहां कोई नहीं जा सकता। कहा जाता है कि बाहर के हिस्से के मुकाबले मन्दिर के इस हिस्से का तापमान बहुत कम रहता है। विरुपाक्ष मंदिर का एक प्रवेश द्वार तुंगभद्रा नदी की तरफ से भी है। भव्यता के लिहाज से यह दक्षिण भारत के प्रमुख मंदिरों में शामिल है।

हमलोग शाम को विरुपाक्ष मंदिर परिसर में पहुंचे हैं। दर्शन के बाद थोड़ी देर परिसर में बैठ जाते हैं। तभी इस्कान का एक बड़ा जत्था मंदिर प्रवेश करता है, वे लोग हरे राम हरे कृष्णा की धुन पर नृत्य कर रहे हैं। हमलोग भी उनके नृत्य में शामिल हो जाते हैं। फिर ये सिलसिला घंटों चलता है।
मंदिर के मुख्यद्वार पर प्रसाद की दुकाने हैं। कुछ महिलाएं केले बेच रही थीं। दस रुपये में छह केले। बताया कि ये केले मंदिर के अंदर निवासी हाथी को खिलाने के लिए है। मंदिर परिसर में बंदर बड़ी संख्या में हैं। वे आपकी आइसक्रीम झटक लेते हैं और शान से उसे चूसते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

(VIRUPAKSH TEMPLE, HAMPI ) 

2 comments:

  1. जीवंत विवरण। आइस क्रीम चूसते बन्दर की फोटो मस्त है।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस : ख्वाजा अहमद अब्बास और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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