Monday, June 5, 2017

चंचल-चपला तुंगभद्रा नदी के तट पर...

चंचल और चपला तुंगभद्रा नदी। जीवन दायिनी तुंगभद्रा। हंपी में विरुपाक्ष मंदिर के पार्श्व में बहती है तुंगभद्रा नदी। देश के ज्यादातर पुराने शहरों का विकास किसी न किसी नदी के किनारे ही हुआ है। जाहिर है विजय नगर सम्राज्य के लिए तुंगभद्रा के तट को जल की प्रचूर उपलब्धता के कारण ही चुना गया होगा।

हमारे अस्थायी पड़ाव लक्ष्मी हेरिटेज होम के छत से तुंगभद्रा नदी दिखाई देती है। मैं शाम को एक बार अकेले जाकर तुंगभद्रा के घाटों का मुआयना करके लौटा हूं। विरुपाक्ष मंदिर के पार्श्व में नदी तट पर सीढ़ीदार घाट बने हुए हैं। शाम हो या सुबह लोग तुंगभद्रा में स्नान करते नजर आते हैं। फिलहाल नदी में पानी ज्यादा नहीं है। पूरी नदी में जगह जगह विशाल शिलाएं है जिनसे टकराकर रास्ता बनाती हुई तुंगभद्रा मदमाती हुई आगे बढ़ती है।

रामायण काल में तुंगभद्रा पंपा के नाम से जानी जाती थी।  तुंग भद्रा नदी का संगम शिवमोगा जिले में कुदली नामक स्थान पर है। तुंग और भद्रा नदियों के संगम के बाद इसका नाम तुंगभद्रा हो जाता है। कुदली शिवमोगा से 16 किलोमीटर की दूरी पर है। तुंगभद्रा नदी का उदगम पश्चिमी घाट में कुदली से 147 किलोमीटर पहले कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले के गंगामूला में है। तुंगभद्रा में पश्चिमी घाट के पहाड़ियों से पानी आता है। यह नदी अत्यंत निर्मल जल लेकर आगे बढ़ती है। कर्नाटक में तुंग नदी में स्नान को अत्यंत पुण्य फलदायी माना जाता है। कर्नाटक के कई जिलों के बाद आंध्र प्रदेश में प्रवेश करने वाली तुंगभद्रा 531 किलोमीटर के सफर के बाद करनूल के आगे तेलंगाना के महबूब नगर जिले के आलमपुर में कृष्णा नदी में समाहित हो जाती है। आजकल यह लंबी दूरी तक आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सीमा बनाती है। इससे पहले यह आंध्र और कर्नाटक की सीमा रेखा पर भी बहती है। तुंग नदी के तट पर श्रिंगेरी में आदि शंकराचार्य ने शारदा पीठम की स्थापना की थी।

सुबह होने के साथ ही मैं एक बार फिर तुंगभद्रा के तट पर पहुंच जाता हूं। सुबह सुबह स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की कतारें दिखाई दे रही हैं। इस बार में तुंगभद्रा के बीचों बीच उगते हुए सूर्य के दर्शन करता हूं। नदी में पानी कम है तो कुछ लोग नदी को पैदल पार कर रहे हैं। इनमें कुछ विदेशी भी हैं। मैं भी चप्पल उतारकर नदी की जलधारा में उतर जाता हूं। नदी पार करके उसपार पहुंचता हूं। दरअसल कई होटल और होम स्टे उस पार भी बने हैं। कई विदेशी शांति की तलाश में उसपार भी जाकर निवास करते हैं। इस तरह रोज तुंगभद्रा को पार करना कौतूहल भरा है। नदी के बीच शिलाओं पर शिवलिंगम और नंदी स्थापित किए गए हैं।

नदी के तट पर कर्नाटक टूरिज्म पुलिस के जवान तैनात हैं। वे नदी में स्नान कर रहे सैलानियों की मदद करने और उन्हें सावधान करने के लिए हैं। कर्नाटक सरकार की ये बहुत अच्छी पहल है। टूरिज्म पुलिस वाले भाई कहते हैं, मेरी फोटो खींच लो इसे जरूर कहीं छाप देना। इससे लोगों को पता चल सकेगा कि हंपी में तुंगभद्रा नदी के तट पर टूरिज्म पुलिस तैनात रहती है। मैं उनकी कार्य निष्ठा पर मुग्ध हूं। इस तरह के इंतजाम बाकी के पर्यटक स्थलों पर भी हो तो लोगों को काफी लाभ हो सकेगा। तभी कुछ लोगों को देखता हूं कि वे हाथी पर चढ़कर भी नदी को पार कर रहे हैं।


भोर की किरण - तुंगभद्रा नदी के साथ उगता हुआ सूरज। 

शाम को एक बार फिर अनादि और माधवी के साथ हमलोग तुंगभद्रा के तट पर आते हैं। इस बार मैं नदी में डूबकी लगाने की तैयारी के साथ आया हूं। काफी देर तक तुंग में स्नान करता हूं। पर जी नहीं भरता। यूं लगता है जैसे ममता के आंचल में हूं, कैसे इतनी जल्दी छोड़कर चला जाऊं। नदी की सीढ़ियों पर हमारी मुलाकात जर्मनी के न्यूरेमबर्ग शहर की सैलानी इवा से होती है। उनके साथ उनके मित्र हैं। हमलोग थोड़ी देर  बातें करते हैं। फिर तुंगभद्रा को प्रणाम करके चल पड़ते हैं। नदी तट पर दुकानें सजी हैं। नारियल पानी और पूजन सामग्री बिक रही है। नास्ते के स्टाल भी लगे हैं। हमलोग भी चलते चलते नारियल पानी पीने लगते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य
( TUNGBHADRA RIVER, HAMPI, KARNATKA ) 
तुंगभद्रा के तट पर......
और भक्त कुछ दान पुण्य भी हो जाए.....


    

3 comments:

  1. इस यात्रा में आपके साथ-साथ ही चल रहे है। दक्षिण भारत में नदी व समुन्द्र किनारे कोई दूब न जाये, इसलिये चौकसी रखने के लिये जवान तैनात किये जाते है, गोवा में भी मैंने देखे थे।

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    1. हां, चेन्नई के मरीना बीच और केरल के कोवलम में भी जल पुलिस तैनात रहती है। पर वे समंदर हैं। तुंगभद्रा बहुत कम चौड़ाई वाली नदी है।

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  2. इस आलेख को पढ़ कर Krishan Kumar Goswami जी फेसबुक पेज पर लिखते हैं - 30 वर्ष पहले तुंगभद्रा के दर्शन किए थे। इसे पढ़ते ही हम्पी और तुंगभद्रा के चित्र सामने आ गए। मेरे अग्रज उग्र सेन गोस्वामी ने तुंगभद्रा के तीर नामक पुस्तक भी 35 वर्ष पहले लिखी थी जिसकी बड़ी प्रशंसा हुई थी। मौर्य जी आपने हम्पी और तुंगभद्रा नदी की यादें ताज़ा कर दीं। धन्यवाद।

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