Thursday, May 25, 2017

आदिशक्ति बनशंकरी देवी का मंदिर बादामी

बादामी शहर से पांच किलोमीटर बाहर बनशंकरी मंदिर स्थित है। आखिर कौन हैं बनशंकरी। वे देवी पार्वती का अवतार मानी जाती हैं, जो चालुक्य राजाओं की कुलदेवी थी। तिलकारण्य जंगलों में स्थित इस मंदिर का नाम दो शब्दों वन और शंकर से मिलकर बना है। पहले शब्द का अर्थ है जंगल तो दूसरे शब्द का अर्थ है भगवान शिव जो देवी पार्वती के पति हैं। मतलब हुआ वन में विराजने वाली देवी शंकरी यानी पार्वती। पर मंदिर में इन्हें शाकंभरी देवी भी लिखा गया है। देश में शाकंभरी देवी का मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में बना हुआ है। बनशंकरी भी दक्षिण की शाकंभरी देवी हैं। एक अन्य कथा के अनुसार बादुब्बे नामक लोकदेवी बाद में बनशंकरी कहलाईं। यह भी तर्क दिया जाता है कि बादुब्बे निलयम की बदलकर बादामी हो गया।

बनशंकरी मंदिर में देवी की मूर्ति काले पत्थर से निर्मित की गई है। देवी सिंह पर सवार हैं और इनके पैरों के नीचे राक्षस को दिखाया गया है। देवी के आठ हाथों में त्रिशूल, घंटा, कमलपत्र, डमरू, खडग खेता और वेद दिखाए गए हैं।

सातवीं सदी का मंदिर - बनशंकरी मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में कल्याणी के चालुक्य राजाओं ने कराया था। यह भी संदर्भ आता है कि वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण मराठा वंश के एक सरदार परशुराम आगले ने सत्रहवीं सदी में कराया। मंदिर वास्तुकला के लिहाज से द्रविड़ शैली को दर्शाता है। यह मंदिर भी भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित किया गया है।

विशाल सरोवर हरिदा तीर्थ - मंदिर के सामने विशाल सरोवर है। इसका नाम हरिश्चंद्र तीर्थ है जिसे अब लोग हरिदा तीर्थ कहते हैं। सरोवर के चारों तरफ घाट बने हुए हैं। हालांकि इसमें सालों भर पानी नहीं रहता। सरोवर के प्रवेश द्वार पर एक विशाल तीन मंजिला बुर्ज बना हुआ है। विशाल सरोवर चारों तरफ नारियल पेड़ के जंगलों से घिरा हुआ है।  

मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लिखा है श्री शाकंभरी प्रसाद। प्रवेश द्वार के अंदर विशाल प्रांगण बना हुआ है। मंदिर के गर्भ गृह में श्रद्धालुओं के जाने के लिए मार्ग निर्धारित किया गया है। यह कर्नाटक के उन मंदिरों में शामिल है जहां हर रोज भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर ट्रस्ट की ओर से यहां प्रसाद काउंटर बना हुआ है। दान और विभिन्न संस्कार कराने का भी इंतजाम है।
स्कंद पुराण और पदम पुराण की कथाओं के अनुसार इस मंदिर की देवी बनशंकरी ने दुर्गमासुर नामक राक्षस का वध किया था। स्कंद पुराण की कथा के मुताबिक राक्षण दुर्गम ने वेदों को अपने कब्जे में कर लिया था। ऋषि मुनियों ने मां शाकंभरी से आग्रह किया। तब देवी शाकंभरी ने एक बड़े युद्ध में दुर्गम को पराजित कर उसका वध किया और वेद ग्रंथों की रक्षा कर उन्हें ऋषिओं को सौंपा। देवी ने एक बार अकाल पड़ने पर शाक, धान्य और आयुर्वेदिक पादपों का सृजन मानव कल्याण के लिए किया था इसलिए उन्हें शाकंभरी कहा गया। वे आदि शक्ति हैं।
बनशंकरी मंदिर के सामने स्थित सरोवर में पानी नहीं है.....

अगर आप जनवरी और फरवरी के महीनों में इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो यहां विशाल मेला देखने को मिलेगा। स्थानीय लोग पौष के महीने में यहां उत्सव का आयोजन करते हैं। मंदिर में बनशंकरी रथयात्रा या बनशंकरी जात्रा का आयोजन होता है। मंदिर के बाहर बने विशाल रथ पर माता की यात्रा निकाली जाती है। मोटे मोटे रस्से से इस विशाल रथ को खींचा जा जाता है। आसपास से हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में हिस्सा लेने के लिए आते हैं।

माता बनशंकरी का रथ। 
कैसे पहुंचे – बनशंकरी देवी का मंदिर बादामी बस स्टैंड से पांच किलोमीटर की दूरी पर चोलाचीगुड गांव में स्थित है। बादामी रेलवे स्टेशन से दूरी 10 किलोमीटर होगी। बादामी से आपको आटो जैसे साधन यहां पहुंचने के लिए मिल जाएंगे। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार है। यहां आपको प्रसाद की दुकानें और खाने पीने के स्टाल मिल जाएंगे।

हमलोग अपनी पट्टडकल, एहोल, महाकूटाकी यात्रा के बाद आखिरी पड़ाव से पहले बनशंकरी देवी के दरबार में पहुंचे हैं। दोपहर का समय है, लेकिन मंदिर में श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ है। हमलोग दर्शन के लिए पंक्ति में लग जाते हैं। दर्शन के बाद मंदिर के काउंटर से लड्डू प्रसाद खरीदते हैं। तिरुपति जैसे विशाल आकार के लड्डू यहां भी मिलते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( BANSHANKARI TEMPLE, BADAMI, SHIVA, PARVATI, SKAND PURAN )
बनशंकरी मंदिर के बाहर दुकानें।

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