Thursday, May 18, 2017

सातवीं सदी का अदभुत मंदिर - दुर्ग देवालय

कर्नाटक के बगलकोट जिले का गांव एहोल, भले ही सैलानियों की नजरों में ज्यादा नहीं चढ़ा हो पर यह देश की अनुपम विरासत समेटे हुए हैं। छठी से 12वीं सदी के बीच बने यहां 100 से ज्यादा मंदिर अभिनव वास्तुकला और सौंदर्य समेटे हुए हैं। सातवीं शताब्दी में एहोल वास्तु कला का प्रमुख केंद्र बन चुका था। इसकी समृद्धि का एहसास यहां आकर ही हो पाता है। संस्कृत में एहोल को आर्यपुर कहा गया है। यह भी कहा जाता है कि अडवश्वर नामक संत ने यहां कठोर तपस्या की थी और लोगों का दुख दूर किया था। सैकड़ो साल तक एहोल लोगों की नजरों से दूर था। ब्रिटिश काल में 1912 में एहोल के स्मारकों के संरक्षण की शुरुआत हुई। अब यहां संरक्षित स्मारकों की सूची में 123 देवालय हैं।
जब इन देवालयों के संरक्षण की शुरुआत हुई तो कई मंदिरों में स्थानीय लोगों ने कब्जा कर लिया था। उसमें घर बनाकर रहने लगे थे।

सातवीं सदी का अदभुत मंदिर-  दुर्ग देवालय

मुख्य परिसर में हम सबसे पहले पहुंचे हैं, दुर्ग देवालय। दूर से ही यह आकार में सभी मंदिरों से अलग नजर आता है। इसकी संरचना किसी शिवलिंगम जैसी है। यह सातवीं शताब्दी का बना हुआ अत्यंत सुंदर मंदिर है। इसके अंदर बाहर बनाई गई कलाकृतियां चमत्कार करने वाली हैं। मंदिर के गर्भ गृह के चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ बना है। यह किसी बौद्ध मंदिर के चैत्य (हाल) की तरह प्रतीत होता है। मंदिर का गुंबद लगता है मानो अपने पूरे आकार में नहीं है।

मंदिर की बाहरी दीवारों पर नरसिंह, महिषासुर मर्दिनी, वराह, विष्णु, शिव, अर्धनारीश्वर आदि की प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। मंदिर में कुछ सुंदर मिथुन प्रतिमाएं भी देखी जा सकती हैं। मंदिर में प्रकाश जाने के लिए झरोखे बनाए गए हैं। मंदिर का मुख्य आधार तकरीबन आठ फीट की ऊंचाई पर है। मंदिर के अंदर से देखे पर इसके छत में उकेरी गई देव प्रतिमाएं अनायास ही विस्मित करती हैं। छत पर एक तालाब का चित्रण है जिसमें कई कमल के फूल खिले हैं। वहीं छत पर एक राजा और उसके साथ महिला सहायिकाओं का सुंदर चित्र भी उकेरा गया है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूरब की ओर से है। मंदिर में बनाई गई कई मूर्तियां विध्वंस कर दी गई हैं। इसके बावजूद मंदिर का सौंदर्य अभिभूत करता है। मंदिर में आप नरसिम्हा, विष्णु और गरुड़ आदि की प्रतिमाएं भी देख सकते हैं।

मंदिर के पास बावड़ी - दुर्ग देवालय से आगे बढ़े तो एक बावड़ी नजर आती है। यह बावड़ी आकार में बहुत बड़ी नहीं है, पर इसमें उतरने के लिए सीढ़िया बनी हुई हैं। इसमें नीचे पानी दिखाई देता है। हमें पुरातत्व विभाग के कर्मचारी नीचे नहीं उतरने की सलाह देते हैं। पर अनादि और माधवी इस बावड़ी में उतरना चाहते हैं। वे कुछ सीढ़ियां उतरते भी हैं, फिर वापस लौट आते हैं। बावड़ी का आकार वर्गाकार है। इसमे एक तरफ से सीढ़ी बनाई गई है। संभवतः  यह मंदिरों में पूजा करने से पहले स्नान और जल लेने के लिए बनाई गई होगी। इस बावड़ी के जल को आजकल संरक्षित नहीं किया गया है। पानी में गंदगी नजर आ रही है। हम अक्सर जल संरक्षण के नाम पर लापरवाही बरतते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( DURG TEMPLE, AHOLE, KARNATKA ) 






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