Tuesday, May 16, 2017

चालुक्य वास्तु शिल्प का अभिनव केंद्र एहोल

पट्टडकल से हमलोग एहोल के मार्ग पर हैं। मलप्रभा नदी को पार करने के बाद एक नया बना साईं मंदिर और बच्चों का स्कूल दिखाई देता है। सड़क कहीं कहीं अच्छी नहीं दिखाई देती, बेहतरीन चौड़ी सड़क का निर्माण कार्य जारी है। पट्टडकल से एहोल के दूरी 14 किलोमीटर है। वहीं बादामी से कुल दूरी 36 किलोमीटर है। दोपहर होने वाली है और गरमी थोड़ी बढ़ रही है। रास्ते में सड़क पर भेड़ों का झुंड मिलता है।

आखिर हम एहोल क्यों जा रहे हैं। एहोल भी चालुक्य शासन काल में वास्तु शिल्प और मंदिर निर्माण का दूसरा प्रमुख केंद्र था। यह पट्टडकल का विस्तार है। आपको एहोल जाने के लिए अगर अपना वाहन न हो तो बसें दिन भर में बहुत कम मिलती हैं। हालांकि कर्नाटक परिवहन की ओर ग्रामीण नेटवर्क में चलने वाली सरकारी बसें इधर चलती हैं। पर यहां आने के लिए दिन भर वाहन सुलभ नहीं है। इसलिए समय का बेहतर सदुपयोग करने के लिए जरूरी है कि दिन भर के लिए ही कोई वाहन बुक कर लिया जाए। अभी बादामी में बाइक रेंट या स्कूटी रेंट का कोई विकल्प दिखाई नहीं देता। कुछ सुंदर नजारे वाले पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए हम एहोल पहुंच गए हैं। एक गांव आता है। गांव में घर देखकर लगता है लोग गरीब हैं। गांव में ही कुछ ऐतिहासिक मंदिर नजर आते हैं। पर इन मंदिरों से ठीक सटकर घर बने हुए हैं। ये मंदिर संरक्षण के लिहाज से बेकद्री का शिकार हैं। पहले लगता है कि हम यही सब देखने आए हैं। पर गांव पार करने के बाद एक चौराहा आता है। वहां पर एहोल मंदिर परिसर है। एक परिसर में कई मंदिर हैं। परिसर के सामने सरोवर है वहां भी तीन मंदिर हैं।

चौराहे पर छोटा सा बाजार है। एक महिला मिलती है, वह काली मिट्टी के ग्लास में दही बेच रही है। दही इसी ग्लास में जमाई गई है। वह मुझसे दही खाने का आग्रह करती है। मैं मना नहीं कर पाता। दस रुपये का ग्लास है दही का। उसमें वह चीनी उड़ेल देती है। एक प्लास्टिक का चम्मच भी देती है। मैं दही को माखन समझ कर खाने लगता हूं। अनादि भी थोड़ी सी दही का स्वाद लेते हैं। यहां हमलोगों को आटो के लिए 25 रुपये पार्किंग भी देनी पड़ती है। टिकट घर में जाकर दो प्रवेश टिकट लेता हूं। आपको पता ही है कि 15 साल तक के बच्चों का प्रवेश टिकट भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के स्मारकों में नहीं लगता है। एहोल मंदिर समूह में एक संग्रहालय भी है। पर आज शुक्रवार को यह संग्रहालय बंद है। इसलिए संग्रहालय का टिकट नहीं लेना पड़ता। संग्रहालय भवन के पास शौचालय बना है। हमलोग पहले उसका इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद चल पड़ते हैं अहोल के मंदिरों का दर्शन करने।

हमारे आसपास कई विदेशी नागरिक भी हैं। एक सज्जन वाशिंगटन, अमेरिका से आए हैं। तीसरी बार हिंदुस्तान घूमने आए हैं। इस बार तफ्शील से दक्षिण भारत की यात्रा कर रहे हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि अपने उत्तर भारत के लोग बादामी और उसके आसपास के समृद्ध चालुक्य राजाओं के धरोहर को देखने इतनी कम संख्या में क्यों आते हैं। एहोल का मंदिर समूह राष्ट्रीय धरोहर है, पर इसे भी अलग से विश्व विरासत की सूची में शामिल करवाने की कोशिश चल रही है। एहोल में छठी से 12वीं सदी के कुल 125 छोटे बड़े मंदिर हैं।
-   विद्युत प्रकाश मौर्य
(AHOLE, BADAMI, BAGALKOT, KARNATKA ) 


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