Sunday, May 14, 2017

तन, मन, धन को समर्पित पट्टडकल का संगमेश्वर मंदिर

जब आप पट्टडकल के मंदिर समूह को देखने के लिए प्रवेश करते हैं तो आपको सबसे पहले काडिसिद्धेश्वर मंदिर, गलगनाथ मंदिर और संगमेश्वर मंदिर के बोर्ड नजर आते हैं। पुरातत्व विभाग ने लोगों की सुविधा के लिए मार्ग संकेतक बनाए हैं।

पट्टडकल के मंदिर समूहों में संगमेश्वर मंदिर प्रमुख है। यह मंदिर कांप्लेक्स के बीच में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण आठवीं सदी का है। इसे राजा विजयादित्य (696-733 ई) ने तन, मन और धन को समर्पित किया था। इसका एक नाम विजयेश्वर देवालय भी है। आजकल यह मंदिर मूल स्वरूप में नहीं है। कई जगह दीवारें और प्रतिमाएं टूटी हुई दिखाई देती हैं।

इस मंदिर के देखते हुए आपको एक अधूरेपन का एहसास होता है। मानो यह मंदिर अभी पूरा नहीं हुआ हो। चालुक्य राजाओं द्वारा पट्टदकल में बनवाए गए मंदिरों में संभवतः यह पहला मंदिर माना जाता है। इस मंदिर में स्तंभयुक्त मंडप और प्रदक्षिणा पथ की योजना है। यहां दक्षिण की ओर गणेश जी और उत्तर की ओर महिषासुर मर्दिनी को स्थान दिया गया है। मुख्य मंडप में ऐसा प्रतीत होता है कि तीन प्रवेश द्वार बनाए जाने की योजना थी। मंदिर की दीवारें और शिखर विशुद्ध रूप से द्रविड़ शैली में बनी है। मंदिर की बाहरी दीवारों में भी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं। 
पट्टडकल का काडसिद्धेश्वर देवालय 


अब बात काडसिद्धेश्वर मंदिर की। यह पट्टडकल मंदिर समूह के उन मंदिरों में शामिल है जिसका निर्माण उत्तर भारतीय नागर शैली में किया गया है। आठवीं सदी में बना यह मंदिर वर्गाकार गर्भ गृह वाला है। गर्भ गृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित किया गया है। मंदिर का शिवलिंग काले पत्थरों का है जो बड़ा ही सुंदर दिखाई देता है। हालांकि मंदिर अब विखंडित अवस्था में है। हमले में मंदिर का आधा हिस्सा ध्वस्त हो गया है। इसकी मूर्तियां भी विखंडित दिखाई देती हैं।

मंदिर के प्रवेश द्वार पर शिव और पार्वती की प्रतिमा स्थापित है। वहीं दोनों पार्श्व पर ब्रह्मा और विष्णु विराजमान हैं। मंदिर के मंडप में दो जालीदार वातायन का निर्माण कराया गया है। मंदिर का शिखर क्रमशः घटते हुए चरणों में बना है। पर मंदिर का शीर्ष भाग का बड़ा हिस्सा अब नष्ट हो चुका है।

गलगनाथ मंदिर - गलगनाथ मंदिर भी उत्तर भारतीय नागर शैली में बना हुआ सुंदर मंदिर है। पर दुखद है कि इसका मुख्य मंडप नष्ट हो चुका है। यह मंदिर चालुक्य राजाओं के द्वारा तेलंगाना के आलमपुर में बने नागर शैली के मंदिरों से साम्य रखता है। पट्टडकल के मंदिर समूहों को ठीक से देखने के लिए आप आधे दिन का समय अपने पास रखें तो बेहतर होगा। ज्यादा जानकारी के लिए मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित पुरातत्व विभाग के दफ्तर से मदद ले सकते हैं। यहां पर गाइड की सेवा भी उपलब्ध है। याद रखिए कि ये विश्व विरासत स्थल है। 








मलप्रभा का कहर और पट्टडकल के मंदिर 

साल 2009 में पट्टडकल के आसपास के इलाकों में भारी बाढ़ आई। इस बाढ के दौरान नंदिकेश्वर गांव के एक हजार से ज्यादा लोगों ने अपने जानवरों और जरूरी सामान के साथ पटट्डकल के ऐतिहासिक मंदिरों में शरण ली। हालांकि पानी मंदिरो तक भी आ गया था, पर इनका कुछ नुकसान नहीं हुआ। मंदिरों की नींव काफी मजबूत है इसलिए पानी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। हजारों लोगों के लिए मंदिर परिसर तारणहार साबित हुआ। छोटी सी मलप्रभा नदी अपने उफान पर थी। मंदिर परिसर में भी कई फीट पानी था। पर मंदिरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। कुल 304 किलोमीटर लंबी नदी मलप्रभा का बगलकोट जिले में ही कुदाल संगम में कृष्णा नदी में मिलन हो जाता है। ( द हिंदू, 8 अक्तूबर 2009 )


 कुछ घंटे पटट्डकल के मंदिर समूह में बीताने के बाद हम बाहर आ गए। प्रवेश द्वार के आसपास कुछ दुकाने हैं। यहां आपको शीतल पेय और नारियल पानी आदि मिल जाता है। दक्षिण भारत में नारियल पानी पीना बेहतर रहता है। प्यास बुझने के साथ ऊर्जा भी मिलती है। एक दो लोग पट्टडकल पर किताबें बेचते नजर आए। पर यहां कोई खाने पीने का ढाबा रेस्टोरेंट नजर नहीं आया। एक औरत चलकर हमारे पास आई। उसके माथे पर टोकरी है। बोली, घर से रोटी सब्जी बनाकर लाई हूं। बीस रुपये में। उसके पास साथ में छाछ की बोतल है। हालांकि हमारी अभी खाने की इच्छा नहीं है। पर ऐसा प्रतीत होता है यहां लोग रोज इस तरह घर से खाना बनाकर लाते हैं सैलानियों के लिए। हमारे आटो रिक्शा वाले भाई हमें अगली मंजिल की ओर ले जाने के लिए तैयार थे। तो हमने मलप्रभा नदी के तट पर बने इस विशाल और अति सुंदर मंदिर समूह को अलविदा कहा। दक्षिण का ऐसा सुंदर मंदिर समूह जो नागर और द्रविड़ शैली के मंदिर एक परिसर में समेटे हुए है।
  -vidyutp@gmail.com
( PATTADAKAL, WORLD HERITAGE SITE, BAGALKOT, BADAMI, KARNATKA, CHALUKYA KINGS )



2 comments:

  1. मंदिर वाकई दर्शनीय लग रहा है।मौका मिलते ही जाऊँगा।

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