Friday, May 12, 2017

विरुपाक्ष देवालय- पट्टडकल का सबसे विशाल मंदिर

पट्टडकल के मंदिर समूहों में सबसे विशाल मंदिर है विरुपाक्ष मंदिर। विरुपाक्ष शिव का एक नाम है। पट्टडकल के परिसर में यह मंदिर आखिरी छोर पर गांव से लगा हुआ है। इसका प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है। द्रविड़ शैली में बना यह देवालय पट्टडकल परिसर में सबसे भव्य मंदिर है। इसका निर्माण रानी लोकमहादेवी ने कराया था, इसलिए इसका नाम लोकेश्वर देवालय भी है। मंदिर के प्रवेश द्वार के पूरब की तरफ विशाल नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई है। नंदी की यह प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित की गई है। इस मंदिर में आजकल भी पुजारी मौजूद नजर आते हैं। इस मंदिर में नियमित पूजा अर्चना होती है। मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

विरुपाक्ष मंदिर का निर्माण 740 ई में चालुक्य राज घराने की रानी लोकमहादेवी ने अपने पति विक्रमादित्य के पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम पर तीन बार विजय के बाद कराया।


यह वास्तु शिल्प में कांचीपुरम के कैलाशनाथ मंदिर से काफी मिलता जुलता नजर आता है।  वह भी शिव का ही मंदिर है।


मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर दोनों तरफ द्वारपाल की आकर्षक मूर्तियां बनाई गई हैं। मंदिर की दीवारों पर आप बेहतरीन नक्काशियां देख सकते हैं। हालांकि इनमें कई मूर्तियां नष्ट हो गई हैं।

मंदिर में गर्भ गृह के अलावा शिव परिवार के लिए कई और कक्ष बने हैं। मुख्य मंदिर में शिव के बगल में गणेश और महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा निर्मित है।

इस देवालय की छत 18 विशाल चौकाकार स्तंभों पर टिकी हुई है। इन स्तंभों पर रामायण, महाभारत और गीता के प्रसंगों को चित्रों में उकेरा गया है। वहीं बाहरी दीवारों पर नटराज, शिव पार्वती और अर्धनारीश्वर के चित्र बनाए गए हैं।

इस मंदिर में आप कैलाश पर्वत को उठाते रावण, बालि को मारते राम, रावण से लड़ते जटायु  के अलावा कृष्ण लीला और पंचतंत्र की कथाओं के भी चित्र देख सकते हैं। मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा पथ बना है। परिक्रम पथ पर भी दीवारों पर मूर्तियां उकेरी गई हैं। कई मूर्तियों का कला शिल्प अत्यंत मोहक हैं जिन्हें देर तक निहारते रहने का जी करता है। वास्तव में विरुपाक्ष मंदिर चालुक्य वास्तु और कला शिल्प का उत्कर्ष प्रदर्शित करता है।
मल्लिकार्जुन मंदिर- विरुपाक्ष का जुड़वा मंदिर भी कहा जाता है...

मल्लिकार्जुन देवालय - विरुपाक्ष मंदिर के ठीक बगल में मल्लिकार्जुन देवालय है। इसे विरुपाक्ष का जुड़वा मंदिर भी कहते हैं। यह शिव का त्रिलोकेश्वर मंदिर है। इसका निर्माण विक्रमादित्य द्वितीय की दूसरी महारानी त्रिलोक महादेवी ने कराया। इसका शिखर वृताकार है जो विरुपाक्ष मंदिर से थोड़ा अलग है। इसकी छत पर भी पार्वती और शिव के चित्र देखे जा सकते हैं।

Kashi Vishwara Temple, Pattadakal
काशी विश्वेश्वर देवालय – मल्लिकार्जुन देवालय के बगल में ही काशी विश्वेश्वर देवालय स्थित है। यह मंदिर भी पूरब रुख का है। इसके बाहरी दीवारों के निर्माण में काले बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ है। हालांकि इस मंदिर का नंदी मंडप और शिखर अब नष्ट हो गए हैं। इस मंदिर में शिव की नृत्य करती हुई मूर्ति स्थापित है। यहां भी रामायण और महाभारत के विविध प्रसंगों को दीवारों पर देखा जा सकता है। इस मंदिर का निर्माण आठवीं नौंवी सदी का प्रतीत होता है। इसका शिल्प उत्तर भारत के मंदिरों की तरह नागर शैली का है। मंदिर में शिव पार्वती विवाह, अंधकासुर वध, गंगा अवतरण, गजासुर संहार जैसे कथानक को चित्रों में देखा जा सकता है।

( अगली कड़ी में पढे... संगमेश्वर देवालय और कुछ और मंदिर....)
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  ( PATTADAKAL, WORLD HERITAGE SITE, BAGALKOT, BADAMI, KARNATKA, CHALUKYA KINGS ) 

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