Wednesday, May 10, 2017

पट्टडकल के देवालय - चालुक्य राजाओं की अदभुत कृति

कर्नाटक का पट्टडकल विश्व विरासत में शामिल दर्शनीय स्थल है। बगलकोट जिले का यह गांव बादामी से 22 किलोमीटर की दूरी पर है। बेंगलुरु से पट्टडकल की दूरी 514 किलोमीटर है। मलप्रभा नदी के तट पर बना ये मंदिर समूह दुनिया भर से आने वाले कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र है। हालांकि पट्टडकल में भी कर्नाटक पर्यटन की ओर से विश्राम गृह बना है, पर यहां घूमने आने वालों के लिए बादामी में ही रहना बेहतर है, क्योंकि पट्टडकल एक गांव है, यहां  दो चार दुकानों के अलावा कुछ भी नहीं है।

हमने 24 मार्च को दिन भर पट्टडकल और अन्य दर्शनीय स्थलों को घूमने के लिए आटो रिक्शा बुक कर लिया है। इस आटो रिक्शा में सात लोग बड़े आराम से आ सकते हैं। पर हम ढाई लोग ही तो हैं। बादामी में अपने होटल से सुबह के नास्ते के बाद आठबजे हमलोग घूमने निकल पड़े। हमारा पहला पड़ाव है पट्टडकल। हरे भरे खेतों से होकर गुजरती बेहतरीन सड़क से होते हुए कोई 40 मिनट में हम पहले पड़ाव पर पहुंच गए हैं। 

विश्व विरासत होने के कारण पट्टडकल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारक है। यहां प्रवेश के लिए 30 रुपये का टिकट है। प्रवेश द्वार पर अधिकृत गाइड भी मिलते हैं। पर हमने गाइड के बिना ही घूमना तय किया। पट्टडकल के मंदिर समूह के सारे मंदिर एक ही बाउंड्री वाल के अंदर स्थित हैं। परिसर को एएसआई ने बहुत ही सुंदर हरा भरा बना रखा है। फूलों की क्यारियां सजी हैं। अंदर प्रवेश करते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। सुबह की वेला में धूप भी तीखी नहीं है। ऐसे मौसम में मंदिरों की कलात्मकता के साथ कुछ घंटे गुजारना अत्यंत सुखकर है।   

चालुक्य राजा न सिर्फ बहादुर लड़ाके थे बल्कि कला संस्कृति में गहरी रूचि रखते थे ये पट्टडकल के मंदिरों को देखकर भली प्रकार जाहिर होता है। उन्होंने पट्टडकल के अलावा, अहोले, महाकुटा और बादामी में अदभुत मंदिरों का निर्माण कराया। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को द्वारा भारत के विश्व विरासत के स्थलों में पट्टडकल को 1987 में ही शामिल कर लिया गया था। देश के तमाम लोकप्रिय स्मारकों को इस सूची में आने का मौका इसके बाद मिला है। तो इससे समझा जा सकता है कि पट्टडकल कितना वैश्विक महत्व रखता है।

पट्टडकल के ज्यादातर मंदिरों का निर्माण कला प्रेमी राजा विक्रमादित्य द्वितीय के शासन काल में हुआ है। ज्यादातर देवालयों का निर्माण द्रविड़ शैली में हुआ है। इन देवालयों को देखकर लगता है कि छठी से आठवीं सदी तक यह जगह धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध केंद्र था। इसलिए यह चालुक्य राजाओं की दूसरी राजधानी कहलाता था। यहां राजाओं के राज्याभिषेक उत्सव हुआ करते थे। यह उत्तर और दक्षिण के वास्तु शिल्प के समागम का केंद्र था।
पट्टडकल की सबसे पहले चर्चा दूसरी सदी में भारत भ्रमण पर आए ग्रीक यात्री टालेमी ने की है।  उसने पट्टडकल को पेट्रिगल लिखा है। इसे लाल मिट्टी का प्रदेश या रक्तपुर भी कहा गया है।

पट्टडकल में कुल 10 देवालय हैं। इनमें से आठ एक ही परिसर में हैं। वहीं पापनाथ देवालय यहां से आधा किलोमीटर की दूरी पर और जैन नारायण देवालय 1.5 किलोमीटर की दूरी पर है। तो फिर चलते हैं इन देवालयों का दर्शन करने... जो लोग चलने  में सक्षम नहीं हैं उनके लिए बैटरी कार का भी यहां पर इंतजाम है।
 
( अगली कड़ी में पढ़े .. ) 
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( PATTADAKAL, WORLD HERITAGE SITE, BAGALKOT, BADAMI, KARNATKA, CHALUKYA KINGS )




2 comments:

  1. विद्युत् जी नमस्कार, आपके ब्लॉग काफी समय से पढ़ रहा हूँ. आपके द्वारा सम्पूर्ण देश का भ्रमण कर रहा हूँ. ऐतिहासिक, व धार्मिक स्थलों का आपके द्वारा बहुत ही सजीव चित्रण हैं. बहुत अच्छा लगा, घुमक्कड़ी इसको ही कहते हैं, धन्यवाद....

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    1. धन्यवाद भाई. आभारी हूं. पढ़ते रहिए.. उत्साह बढ़ाते रहें

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