Tuesday, May 2, 2017

विशाल और अनूठी बीजापुर की ताज बावड़ी

हमारा अगला पड़ाव है ताज बावड़ी। इस बावड़ी का एक सुंदर प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस बावड़ी का निर्माण इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने अपनी पत्नी ताज सुल्ताना की याद में करावा था। कहा जाता है कि इस बावड़ी की गहराई 100 फीट से ज्यादा है। यह भी कहा जाता है कि आप कितनी भी ताकत एक पत्थर फेंके तो वह एक कोने से दूसरे कोने में नहीं जाएगा। अपने समय का ताज बावड़ी जल संरक्षण का सुंदर नमूना है। आदिलशाही रियासत में यह पानी का मुख्य स्रोत हुआ करता था। कहा जाता है कि आदिलशाही रियासत को जल संरक्षण का काफी गहरा अनुभव था।
पहाड़ों से आने वाले पानी को सुरंगों से लेकर इस बावड़ी में पहुंचाने के इंतजाम किए गए थे। बावड़ी के चारों तरफ आरामगाह का भी निर्माण कराया गया है। इसका एक सुंदर मेहराबदार प्रवेश द्वार भी बना है।

आज भी हमें ताज बावड़ी में लबालबा पानी भरा हुआ दिखाई देता है, पर पानी काफी गंदा हो चुका है। इस पानी को साफ करके इस बावड़ी को आज भी सुंदर स्विमिंग पुल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। पर इसकी सफाई लेकर जिला प्रशासन सजग नहीं है। वहीं बावड़ी में आसपास के लोग धार्मिक क्रिया कलाप के लिए पहुंच रहे हैं। वे लोग यहां और भी गंदगी फैला कर जा रहे हैं। 

दक्कन का ताजमहल है इब्राहिम रौजा

दोपहर की तेज धूप के बीच हम पहुंच गए हैं इब्राहिम रौजा, जो बीजापुर की एक अनुपम कलाकृति है। गोल गुंबज के बाद यह दूसरा बड़ा विशाल परिसर है। यहां कभी इब्राहिम आदिलशाह द्धितीय की कब्र के साथ उसकी रानी ताज सुल्ताना की भी कब्र हैइब्राहिम आदिल शाह ने 1580 से 1627 तक शासन किया।
इस इमारत के वास्तुकार पारसी वास्तुविद मलिक सन्‍दाल थे। इसके निर्माण की प्रेरणा ताजमहल से मिली, इसलिए ये दक्कन के ताजमहल के तौर पर प्रसिद्ध है। मलिक सन्‍दाल के डिजायन किए इस रौजा में दाईं तरफ मस्जिद है, बायीं तरफ गुम्‍बद है और चार मीनारें हैं।

रौजा में एक आयताकार, पांच मेहराब के साथ मस्जिद बनी है इसके कोनों पर स्‍थित मेहराबों की नक्काशी देखने लायक है। तल पर स्थित स्‍तम्‍भों के साथ मिलकर मंजिलों को विभाजित करती है। मकबरा और मस्जिद दोनो खूबसूरत बगीचे के बीचों-बीच बनाए गए हैं। इब्राहिम रौजा में प्रवेश के लिए 15 रुपये का टिकट है। गोलगुंबज के बाद सबसे ज्यादा सैलानी इब्राहिम रौजा देखने पहुंचते हैं।



मध्यकाल की सबसे विशाल तोप - 
अब हम पहुंच गए मलिके ए मैदान। यहां ऊंचे टीले पर एक विशाल तोप रखी है। 1549 में इस टीले का निर्माण आदिलशाह प्रथम ने कराया था। कभी यहां कई बड़ी बड़ी तोपों को शहर की सुरक्षा के लिए रखा गया था। यहां पर 55 टन भारी 1.5 मीटर व्यास वाली तोप देखी जा सकती है। यह मध्यकाल की दुनिया की सबसे बड़ी तोप मानी जाती है। इसे 17वीं सदी अहमदनगर से विजय की निशानी के तौर पर यहां लाया गया था।कहा जाता है कि इस तोप को छू कर अगर को मन्नत मांगो तो वह पूरी होती है।  


बारा कमान या अली रौजा - बारा कमान बीजापुर का एक और रौजा है जो कभी पूरा नहीं हो सका। यह 1672 में निर्मित है, इसे अली द्वितीय रौजा के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सात सुंदर मेहराब हैं। इसमें आदिलशाही रियासत के आठवें शासक अली द्वितीय के अलावा 11 रानियों की कब्र है। यह रौजा बीजापुर के मुख्य बाजार में स्थित है। जब हम यहां पहुंचे हैं, हमारे साथ कुछ विदेशी सैलानी भी बारा कमान देखने पहुंचे हैं। गरमी बहुत है। हमलोग यहां गन्ने का रस पीकर गरमी से जंग लड़ने की कोशिश करते हैं। अब हमारी अगली मंजिल है, जी हां बीजापुर का गोल गुंबज।
 - vidyutp@gmail.com 
(BARA KAMAN, LARGEST CANON, IBRAHIM RAUJA, TAJ BAWDI, WATER POND ) 
BARA KAMAN at BIJAPUR (KARNATKA ) 

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