Thursday, May 25, 2017

आदिशक्ति बनशंकरी देवी का मंदिर बादामी

बादामी शहर से पांच किलोमीटर बाहर बनशंकरी मंदिर स्थित है। आखिर कौन हैं बनशंकरी। वे देवी पार्वती का अवतार मानी जाती हैं, जो चालुक्य राजाओं की कुलदेवी थी। तिलकारण्य जंगलों में स्थित इस मंदिर का नाम दो शब्दों वन और शंकर से मिलकर बना है। पहले शब्द का अर्थ है जंगल तो दूसरे शब्द का अर्थ है भगवान शिव जो देवी पार्वती के पति हैं। मतलब हुआ वन में विराजने वाली देवी शंकरी यानी पार्वती। पर मंदिर में इन्हें शाकंभरी देवी भी लिखा गया है। देश में शाकंभरी देवी का मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में बना हुआ है। बनशंकरी भी दक्षिण की शाकंभरी देवी हैं। एक अन्य कथा के अनुसार बादुब्बे नामक लोकदेवी बाद में बनशंकरी कहलाईं। यह भी तर्क दिया जाता है कि बादुब्बे निलयम की बदलकर बादामी हो गया।

बनशंकरी मंदिर में देवी की मूर्ति काले पत्थर से निर्मित की गई है। देवी सिंह पर सवार हैं और इनके पैरों के नीचे राक्षस को दिखाया गया है। देवी के आठ हाथों में त्रिशूल, घंटा, कमलपत्र, डमरू, खडग खेता और वेद दिखाए गए हैं।

सातवीं सदी का मंदिर - बनशंकरी मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में कल्याणी के चालुक्य राजाओं ने कराया था। यह भी संदर्भ आता है कि वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण मराठा वंश के एक सरदार परशुराम आगले ने सत्रहवीं सदी में कराया। मंदिर वास्तुकला के लिहाज से द्रविड़ शैली को दर्शाता है। यह मंदिर भी भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित किया गया है।

विशाल सरोवर हरिदा तीर्थ - मंदिर के सामने विशाल सरोवर है। इसका नाम हरिश्चंद्र तीर्थ है जिसे अब लोग हरिदा तीर्थ कहते हैं। सरोवर के चारों तरफ घाट बने हुए हैं। हालांकि इसमें सालों भर पानी नहीं रहता। सरोवर के प्रवेश द्वार पर एक विशाल तीन मंजिला बुर्ज बना हुआ है। विशाल सरोवर चारों तरफ नारियल पेड़ के जंगलों से घिरा हुआ है।  

मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लिखा है श्री शाकंभरी प्रसाद। प्रवेश द्वार के अंदर विशाल प्रांगण बना हुआ है। मंदिर के गर्भ गृह में श्रद्धालुओं के जाने के लिए मार्ग निर्धारित किया गया है। यह कर्नाटक के उन मंदिरों में शामिल है जहां हर रोज भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर ट्रस्ट की ओर से यहां प्रसाद काउंटर बना हुआ है। दान और विभिन्न संस्कार कराने का भी इंतजाम है।
स्कंद पुराण और पदम पुराण की कथाओं के अनुसार इस मंदिर की देवी बनशंकरी ने दुर्गमासुर नामक राक्षस का वध किया था। स्कंद पुराण की कथा के मुताबिक राक्षण दुर्गम ने वेदों को अपने कब्जे में कर लिया था। ऋषि मुनियों ने मां शाकंभरी से आग्रह किया। तब देवी शाकंभरी ने एक बड़े युद्ध में दुर्गम को पराजित कर उसका वध किया और वेद ग्रंथों की रक्षा कर उन्हें ऋषिओं को सौंपा। देवी ने एक बार अकाल पड़ने पर शाक, धान्य और आयुर्वेदिक पादपों का सृजन मानव कल्याण के लिए किया था इसलिए उन्हें शाकंभरी कहा गया। वे आदि शक्ति हैं।
बनशंकरी मंदिर के सामने स्थित सरोवर में पानी नहीं है.....

अगर आप जनवरी और फरवरी के महीनों में इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो यहां विशाल मेला देखने को मिलेगा। स्थानीय लोग पौष के महीने में यहां उत्सव का आयोजन करते हैं। मंदिर में बनशंकरी रथयात्रा या बनशंकरी जात्रा का आयोजन होता है। मंदिर के बाहर बने विशाल रथ पर माता की यात्रा निकाली जाती है। मोटे मोटे रस्से से इस विशाल रथ को खींचा जा जाता है। आसपास से हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में हिस्सा लेने के लिए आते हैं।

माता बनशंकरी का रथ। 
कैसे पहुंचे – बनशंकरी देवी का मंदिर बादामी बस स्टैंड से पांच किलोमीटर की दूरी पर चोलाचीगुड गांव में स्थित है। बादामी रेलवे स्टेशन से दूरी 10 किलोमीटर होगी। बादामी से आपको आटो जैसे साधन यहां पहुंचने के लिए मिल जाएंगे। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार है। यहां आपको प्रसाद की दुकानें और खाने पीने के स्टाल मिल जाएंगे।

हमलोग अपनी पट्टडकल, एहोल, महाकूटाकी यात्रा के बाद आखिरी पड़ाव से पहले बनशंकरी देवी के दरबार में पहुंचे हैं। दोपहर का समय है, लेकिन मंदिर में श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ है। हमलोग दर्शन के लिए पंक्ति में लग जाते हैं। दर्शन के बाद मंदिर के काउंटर से लड्डू प्रसाद खरीदते हैं। तिरुपति जैसे विशाल आकार के लड्डू यहां भी मिलते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( BANSHANKARI TEMPLE, BADAMI, SHIVA, PARVATI, SKAND PURAN )
बनशंकरी मंदिर के बाहर दुकानें।

Tuesday, May 23, 2017

कर्नाटक की काशी – महाकूटा शिव देवालय

महाकूटा देवालय का प्रवेश द्वार।
कर्नाटक के महाकूटा मंदिर को दक्षिण की काशी भी कहा जाता है। यहां शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। प्रतिदिन यहां आसपास से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। लोगों में महाकूटा शिव मंदिर को लेकर अगाध श्रद्धा का भाव है।
महाकूटा का शिव देवालय अपने सुंदर शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। नागर शैली में बना यह शिव मंदिर अपने अष्टभुजाकृति और सुंदर गुंबद के लिए भी प्रसिद्ध है।

महाकूटा बादामी के पास के एक छोटा सा गांव है। यह अत्यंत सुरम्य पहाड़ियों के बीच में बसा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार अगस्त्य मुनि ने दो असुर भाइयों वातापि और इल्वाल का यहीं पर संहार किया था। कहा जाता है कि मृत्यु के उपरांत दोनों असुर दो पहाड़ बन गए।

महाकूटा मंदिर परिसर के बाहर कुछ दुकानें बनाई गई हैं। यहां मंदिर ट्रस्ट का दफ्तर भी है। मंदिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार का निर्माण किया गया है। देवालय के अंदर, अर्ध मंडप, मुख मंडप और गर्भगृह बना हुआ  है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनो तफ द्वारपाल की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर परिसर में कई और मूर्तियां दिखाई देती हैं। यहां सालों भर नियमित उपासना होती है। हर रोज यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाकूटा मंदिर समूह का निर्माण बादामी चालुक्य राजाओं द्वारा छठी-सातवीं सदी में कराया गया। महाकूटा मंदिरों की संरचना एहोल से मिलती जुलती है। 

विष्णु पुष्करिणी -  महाकूटा मंदिर परिसर में एक विशाल सरोवर भी है। इसका नाम विष्णु पुष्करिणी है। इस सरोवर में पहाड़ों से निर्मल जल सालों भर आता रहता है। इसके निर्मल जल में श्रद्धालु स्नान करते हैं। कई लोग स्नान के बाद मंदिर में पूजन के लिए जाते हैं। दोपहर की गर्मी के बीच काफी लोग मंदिर के इस सरोवर के शीतल जल में स्नान करते दिखाई देते हैं।


मंदिर परिसर में एक कुआं भी है जिसे लोग पापविनाशन तीर्थ कहते हैं। विष्णु पुष्करिणी के पास ही एक अनूठा शिवलिंगम है जिसमें पांच अलग आकृतियां बनी हुई हैं। इसे पंचलिंगम कहते हैं।

पत्र लिखकर आशीर्वाद भेजा जाता है - महाकूटा मंदिर में एक अनूठी परंपरा नजर आती है। मंदिर के कार्यालय में हजारों की संख्या में पत्र लिखे हुए दिखाई देते हैं। इन पत्रों पर कर्नाटक के अलग अगल जिलों के श्रद्धालुओं के पते लिखे हुए हैं। दरअसल ये सभी पत्र मंदिर में दान करने वाले श्रद्धालुओं के परिवार को सालों भर भेजे जाते हैं। इन पत्रों पर श्रद्धालुओं के लिए महाकुंटेश्वर महादेव का आशीर्वाद भेजा जाता है।   

महाकूटा शिलालेख - महाकूटा में एक शिलालेख भी है। यह 595 से 602 ई के बीच का है। इस स्तंभ पर संस्कृत और कन्नड़ में लिखा गया है। इस शिलालेख में चालुक्य राजा पुलकेशिन प्रथम की पत्नी दुर्लभदेवी द्वारा दान दिए जाने का उल्लेख है। इसमें पट्टडकल, एहोल समेत दस गांवों को दान दिए जाने का उल्लेख है। यह शिलालेख अब बीजापुर संग्राहलय में देखा जा सकता है।
यहां एक और शिलालेख है जो वीनापोति द्वारा लिखवाया गया है। यह चालुक्य राजा विजयादित्य की एक रानी थी। कन्नड़ में लिखा यह शिलालेख 693-733 ई के बीच का है। इस शिलालेख में रानी द्वारा महाकूटा मंदिर को दान दिए जाने का उल्लेख है।

कैसे पहुंचे – बादामी बाजार से महाकूटा मंदिर की दूरी 14 किलोमीटर है। पर यहां जाने के लिए आमतौर पर आपको निजी वाहन का सहारा लेना होगा। यह पट्टडकल मार्ग से थोड़ा सा अलग रास्ते पर है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
(MAHAKUTA SHIV TEMPLE, BADAMI ) 




Sunday, May 21, 2017

एहोल..कर्नाटक की एक छिपी हुई विरासत

एहोल का मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर समूह। 
एहोल के मंदिरों को देखते हुए मुझे यह आश्चर्य होता है कि देश की सुंदरतम विरासत तक काफी कम लोगों की नजर क्यों पड़ी है। यह कर्नाटक की छिपी हुई विरासत है। यह आस्थावान और घुमक्कड़ लोगों की नजर में ज्यादा क्यों नहीं चढ़ा है, सोचने लायक है। इतनी अदभुत विरासत एक गांव में रची बसी है जहां पहुंचने के लिए नियमित वाहन सेवा की भी कमी है।

सूर्य नारायण देवालय - एहोल के मंदिरों की कलात्मकता देखते हुए लगता है मानो समय की सूई रूक गई होहम सूर्य मंदिर से मुखातिब हैं। सूर्य नारायण देवालय का निर्माण आठवीं सदी में हुआ है। इसमें चार स्तंभों और बारह अर्ध स्तंभों पर वृताकार मंडप का निर्माण किया गया है। गर्भ गृह पर गरुड़, गंगा यमुना के चित्र बनाए गए हैं। गर्भ गृह के अंदर सूर्य देव की सुंदर मूर्ति हैं। सूर्य धरती पर एक मात्र देवता हैं जो हमें रोज दिखाई देते हैं। पर उनके मंदिर देश में बहुत कम ही हैं। 

बडिगेर (सुतार) देवालय -  नौंवी सदी का बना यह एक और सूर्य मंदिर है। इसके छत पर सूर्य का चित्र बना हुआ है। बादामी चालुक्य राजाओं द्वारा निर्मित इस देवालय से लगा हुआ एक सरोवर भी है।

सूर्यनारायण देवालय के पास पांचवी सदी का बना गौडर देवालय देखा जा सकता है। कभी इस देवालय में गांव का मुखिया निवास करता था। कन्नड़ में गौड़ा का मतलब मुखिया होता है।
एहोल - हुच्चामली मंदिर समूह में 

बौद्ध चैत्यालय – एहोल के मंदिर परिसर में एक बौद्ध चैत्यालय भी देखा जा सकता है। इसका मुख पूरब की तरफ है। इसके एक बड़े हिस्से को चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसके गलियारे के मध्य में बुद्ध की मूर्ति पद्मासन के मुद्रा में बनी हुई है। उसके ऊपर छतरी है। यहां बुद्ध यों बैठे हैं मानो वे प्रशांत मुद्रा में नजर आ रहे हों। उनके घुंघराले बाल हैं, घुटने तक धोती है, और वे ध्यानमग्न नजर आ रहे हैं।  

हुच्चमल्ली देवालय समूह  - एहोल के मुख्य मंदिर परिसर से निकलने के बाद हमलोग अगले मंदिर की ओर चलने वाले हैं। पर थोड़ी तरावट की जरूरत है तो गन्ने का जूस बेहतर हो सकता है। हम तीनों ही गन्ने का जूस पीते हैं। मैं दही तो पहले ही पी चुका हूं। अब हमलोग तकरीबन एक फर्लांग आगे चलकर पहुंचे हैं हुच्चमल्ली देवालय समूह में। यह एक शिव मंदिर है। गर्भ गृह और दरवाजों पर कई सुंदर कलाकृतियों का निर्माण हुआ है। इसे 11वीं सदी में कल्याणी चालुक्य राजाओं द्वारा निर्मित बताया जाता है। मंदिर के सभा मंडप में इंद्र, यम, कुबेर आदि के चित्र हैं। इस मंदिर में कुछ प्रेम मग्न मिथुन मूर्तियां भी हैं, बिल्कुल खजुराहो की तरह। पर यह अति सुंदर मंदिर एहोल में भी एक कोने में उपेक्षित प्राय दिखाई देता है। देवालय के परिसर  में एक छोटा सा तालाब भी है। इस तालाब की दीवारों पर भी देव प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। इसके साथ ही पंचतंत्र की कथाओं से संबंधित चित्र भी यहां दिखाई देते हैं। हुच्चीमल मंदिर समूह में एक छोटा सा मंदिर भी है, पर अब वह नष्ट प्राय हो गया है।

रावणफडि गुफा मंदिर – हमारा अगला पड़ाव है रावणफडि। यह एक गुफा मंदिर समूह है। यह एहोल के सभी स्मारकों में सबसे पुराना है। हालांकि यह बादामी के गुफा मंदिरों से छोटा है।  इस मंदिर के बाहर चार खंभे मात्र दिखाई देते हैं। दीवार पर ऊंचे दस हाथों वाले शिव तांडव करते दिखाई देते हैं। एक अन्य कलाकृति में सप्तमातृकाएं शिव तांडव देखती हुई दिखाई गई हैं। यह गुफा मंदिर छठी शताब्दी का बना हुआ है। पहाड़ों पर गुफाओं तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। पर ये सीढ़ियां बेहतर हाल में नहीं हैं। रावणफडि नाम से ऐसा लगता है कि कहीं यह वास्तव में रावण पहाड़ी तो नहीं है। इस गुफा मंदिर समूह में एक सुंदर सरोवर भी बना हुआ है। इसमें पानी मौजूद है, पर सरोवर की साफ सफाई नहीं की जाती है। कदाचित बारिश के दिनों में यहां बेहतरीन नजारा दिखाई देता होगा।


हमलोग अब एहोल से निकल चुके हैं। रास्ते में गांव में फिर से कुछ देवालय दिखाई देते हैं जिसके आसपास बिल्कुल सट कर लोगों ने घर बना रखे हैं। अगर कर्नाटक सरकार चाहे तो एहोल का सौंदर्यीकरण और बेहतर ढंग से कर सकती है। गांव के इन घरों को मंदिर से थोड़ा दूर करके एहोल के बाकी मंदिरों को भी दर्शनीय बनाया जा सकता है।
- vidyutp@gmail.com

( AHOLE, BUDDHA, SUN TEMPLE, SHIVA ) 
एहोल गांव में मंदिर - कई मंदिरों का रखरखाव बिल्कुल नहीं होता...

Friday, May 19, 2017

देश का सबसे पुराना शिवालय - एहोल का लडखान मंदिर

क्या आपको पता है कि देश का सबसे पुराना मंदिर कौन सा है। आजकल हम देश हम जितने भी ऐतिहासिक मंदिरों के दर्शन करते हैं उनमें ज्यादातर छठी से 16वीं सदी के बीच बने हैं। छठी सदी से पहले के निर्मित मंदिर बहुत कम मिलते हैं। एहोल का लडखान मंदिर जो मूल रुप से शिव का मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण काल 450 ई का बताया जाता है। इस लिहाज से यह देश के सबसे पुरातन मंदिरों में शामिल है। हालांकि इससे भी पुराना मंदिर बिहार के कैमूर जिले का मुंडेश्वरी देवी का माना जाता है जो 105 ई का बना हुआ बताया जाता है। मुंडेश्वरी मंदिर में कहा जाता है कि तब से लगातार नियमित पूजन हो रहा है। हालांकि लडखान मंदिर में नियमित पूजा पाठ नहीं होता। 

पर अगर शिव मंदिरों में बात करें तो यह देश का सबसे पुराना मंदिर है। चालुक्य शासन में इस मंदिर का इस्तेमाल शाही आयोजन और विवाह समारोह आदि के लिए होता था। मंदिर में एक ही प्रवेश द्वार है। यह दूर से किसी आवास के सदृश्य ही नजर आता है। इसकी छत सीढ़ीदार बनाई गई है जिससे बारिश में पानी नहीं ठहर सके। यह दूर से किसी लकड़ी के घर होने का एहसास कराता है, पर यह ईश्वर का अपना आवास है।

एहोल का लडखान मंदिर बाहर से बहुत सादगी भरा नजर आता है। इसमें कुल 16 स्तंभ हैं जिसके सहारे मंदिर की छत खड़ी है। मंदिर के पीछे की दीवार से सटे कमरे को गर्भ गृह का रूप दिया गया है। कहा जाता है कि यह प्रारंभिक तौर पर सूर्य देव का मंदिर था। पर बाद में यह शिवालय के रुप में परिणत हो गया। यह मंदिर पंचायत शैली में बना हुआ है। यह दो मंजिला है। इसकी ऊपरी मंजिल पर छोटा सा सुंदर मंडप बना हुआ है। इस मंडप पर भी देव प्रतिमा उकेरी गई है। मंदिर के हाल में बीच में नंदी की छोटी सी प्रतिमा है। सभी मंदिरों की तरह नंदी का मुख मंदिर के गर्भ गृह की ओर है। गर्भगृह में काले रंग का शिवलिंगम स्थापित किया गया है।
छत पर जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ियां बनी हुई हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर सुंदर नक्काशी किए हुए देवी देवताओं के चित्र देखे जा सकते हैं। मंदिर की बाहरी बालकोनी पर कुछ मर्तबान (घड़े) के चित्र और नदियों की देवी गंगा का चित्र देखा जा सकता है। दूसरी तरफ प्रेम में आबद्ध एक युगल का सुंदर चित्र बना हुआ है। मंदिर की दीवारों पर चालुक्य राजाओं का प्रतीक चिन्ह भी अंकित किया गया है।

मंदिर के सभी 16 स्तंभों पर भी अदभुत नक्काशी देखी जा सकती है। इनमें राजसी वैभव के प्रतीक दिखाई देते हैं। एक छतरी, दो मशालें नीचे बैठे दो व्यक्ति स्तंभों की नक्काशी को अतीव सुंदर बनाते हैं। एक स्तंभ पर गाय और उसके साथ बाल गोपाल का चित्र नजर आता है। मंदिर में अलग अलग जगह के झरोखों से धूप आने का इंतजाम है। इन झरोखों में भी जालीदार नक्काशी दिखाई देती है। मंदिर की छतों पर भी फूलों की सुंदर नक्काशियां दिखाई देती हैं। एहोल मंदिर समूह का यह पहला मंदिर लगता है अंदर की ओर से काफी मनोयोग से निर्मित किया गया था। कुछ मामलों यह बादामी के गुफा मंदिरों से साम्य रखता है। दूर से देखने पर लडखान मंदिर किसी अनगढ़ संरचना सा नजर आता है, पर करीब से देखने पर यह काफी सुंदर है।

एहोल के मंदिर समूह में लडखान मंदिर दुर्ग मंदिर के दक्षिण में स्थित है। इसका नाम लडखान क्यों पड़ा इसको लेकर भी एक कहानी है। दरअसल इस मंदिर में बाद में गांव का लडखान का परिवार रहने लगा था, इसलिए लोग इसे लडखान मंदिर के नाम से पुकारने लगे। लडखान एक मुस्लिम राजकुमार था, जिसने इस मंदिर में थोड़े समय के लिए अपना निवास बनाया था। बाद लोग मंदिर को उसी के नाम से पुकारने लगे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( LADAKHAN TEMPLE, AHOLE, OLDEST SHIVA TEMPLE,  KARNATKA, CHALUKYA KINGS )


Thursday, May 18, 2017

सातवीं सदी का अदभुत मंदिर - दुर्ग देवालय

कर्नाटक के बगलकोट जिले का गांव एहोल, भले ही सैलानियों की नजरों में ज्यादा नहीं चढ़ा हो पर यह देश की अनुपम विरासत समेटे हुए हैं। छठी से 12वीं सदी के बीच बने यहां 100 से ज्यादा मंदिर अभिनव वास्तुकला और सौंदर्य समेटे हुए हैं। सातवीं शताब्दी में एहोल वास्तु कला का प्रमुख केंद्र बन चुका था। इसकी समृद्धि का एहसास यहां आकर ही हो पाता है। संस्कृत में एहोल को आर्यपुर कहा गया है। यह भी कहा जाता है कि अडवश्वर नामक संत ने यहां कठोर तपस्या की थी और लोगों का दुख दूर किया था। सैकड़ो साल तक एहोल लोगों की नजरों से दूर था। ब्रिटिश काल में 1912 में एहोल के स्मारकों के संरक्षण की शुरुआत हुई। अब यहां संरक्षित स्मारकों की सूची में 123 देवालय हैं।
जब इन देवालयों के संरक्षण की शुरुआत हुई तो कई मंदिरों में स्थानीय लोगों ने कब्जा कर लिया था। उसमें घर बनाकर रहने लगे थे।

सातवीं सदी का अदभुत मंदिर-  दुर्ग देवालय

मुख्य परिसर में हम सबसे पहले पहुंचे हैं, दुर्ग देवालय। दूर से ही यह आकार में सभी मंदिरों से अलग नजर आता है। इसकी संरचना किसी शिवलिंगम जैसी है। यह सातवीं शताब्दी का बना हुआ अत्यंत सुंदर मंदिर है। इसके अंदर बाहर बनाई गई कलाकृतियां चमत्कार करने वाली हैं। मंदिर के गर्भ गृह के चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ बना है। यह किसी बौद्ध मंदिर के चैत्य (हाल) की तरह प्रतीत होता है। मंदिर का गुंबद लगता है मानो अपने पूरे आकार में नहीं है।

मंदिर की बाहरी दीवारों पर नरसिंह, महिषासुर मर्दिनी, वराह, विष्णु, शिव, अर्धनारीश्वर आदि की प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। मंदिर में कुछ सुंदर मिथुन प्रतिमाएं भी देखी जा सकती हैं। मंदिर में प्रकाश जाने के लिए झरोखे बनाए गए हैं। मंदिर का मुख्य आधार तकरीबन आठ फीट की ऊंचाई पर है। मंदिर के अंदर से देखे पर इसके छत में उकेरी गई देव प्रतिमाएं अनायास ही विस्मित करती हैं। छत पर एक तालाब का चित्रण है जिसमें कई कमल के फूल खिले हैं। वहीं छत पर एक राजा और उसके साथ महिला सहायिकाओं का सुंदर चित्र भी उकेरा गया है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूरब की ओर से है। मंदिर में बनाई गई कई मूर्तियां विध्वंस कर दी गई हैं। इसके बावजूद मंदिर का सौंदर्य अभिभूत करता है। मंदिर में आप नरसिम्हा, विष्णु और गरुड़ आदि की प्रतिमाएं भी देख सकते हैं।

मंदिर के पास बावड़ी - दुर्ग देवालय से आगे बढ़े तो एक बावड़ी नजर आती है। यह बावड़ी आकार में बहुत बड़ी नहीं है, पर इसमें उतरने के लिए सीढ़िया बनी हुई हैं। इसमें नीचे पानी दिखाई देता है। हमें पुरातत्व विभाग के कर्मचारी नीचे नहीं उतरने की सलाह देते हैं। पर अनादि और माधवी इस बावड़ी में उतरना चाहते हैं। वे कुछ सीढ़ियां उतरते भी हैं, फिर वापस लौट आते हैं। बावड़ी का आकार वर्गाकार है। इसमे एक तरफ से सीढ़ी बनाई गई है। संभवतः  यह मंदिरों में पूजा करने से पहले स्नान और जल लेने के लिए बनाई गई होगी। इस बावड़ी के जल को आजकल संरक्षित नहीं किया गया है। पानी में गंदगी नजर आ रही है। हम अक्सर जल संरक्षण के नाम पर लापरवाही बरतते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( DURG TEMPLE, AHOLE, KARNATKA ) 






Tuesday, May 16, 2017

चालुक्य वास्तु शिल्प का अभिनव केंद्र एहोल

पट्टडकल से हमलोग एहोल के मार्ग पर हैं। मलप्रभा नदी को पार करने के बाद एक नया बना साईं मंदिर और बच्चों का स्कूल दिखाई देता है। सड़क कहीं कहीं अच्छी नहीं दिखाई देती, बेहतरीन चौड़ी सड़क का निर्माण कार्य जारी है। पट्टडकल से एहोल के दूरी 14 किलोमीटर है। वहीं बादामी से कुल दूरी 36 किलोमीटर है। दोपहर होने वाली है और गरमी थोड़ी बढ़ रही है। रास्ते में सड़क पर भेड़ों का झुंड मिलता है।

आखिर हम एहोल क्यों जा रहे हैं। एहोल भी चालुक्य शासन काल में वास्तु शिल्प और मंदिर निर्माण का दूसरा प्रमुख केंद्र था। यह पट्टडकल का विस्तार है। आपको एहोल जाने के लिए अगर अपना वाहन न हो तो बसें दिन भर में बहुत कम मिलती हैं। हालांकि कर्नाटक परिवहन की ओर ग्रामीण नेटवर्क में चलने वाली सरकारी बसें इधर चलती हैं। पर यहां आने के लिए दिन भर वाहन सुलभ नहीं है। इसलिए समय का बेहतर सदुपयोग करने के लिए जरूरी है कि दिन भर के लिए ही कोई वाहन बुक कर लिया जाए। अभी बादामी में बाइक रेंट या स्कूटी रेंट का कोई विकल्प दिखाई नहीं देता। कुछ सुंदर नजारे वाले पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए हम एहोल पहुंच गए हैं। एक गांव आता है। गांव में घर देखकर लगता है लोग गरीब हैं। गांव में ही कुछ ऐतिहासिक मंदिर नजर आते हैं। पर इन मंदिरों से ठीक सटकर घर बने हुए हैं। ये मंदिर संरक्षण के लिहाज से बेकद्री का शिकार हैं। पहले लगता है कि हम यही सब देखने आए हैं। पर गांव पार करने के बाद एक चौराहा आता है। वहां पर एहोल मंदिर परिसर है। एक परिसर में कई मंदिर हैं। परिसर के सामने सरोवर है वहां भी तीन मंदिर हैं।

चौराहे पर छोटा सा बाजार है। एक महिला मिलती है, वह काली मिट्टी के ग्लास में दही बेच रही है। दही इसी ग्लास में जमाई गई है। वह मुझसे दही खाने का आग्रह करती है। मैं मना नहीं कर पाता। दस रुपये का ग्लास है दही का। उसमें वह चीनी उड़ेल देती है। एक प्लास्टिक का चम्मच भी देती है। मैं दही को माखन समझ कर खाने लगता हूं। अनादि भी थोड़ी सी दही का स्वाद लेते हैं। यहां हमलोगों को आटो के लिए 25 रुपये पार्किंग भी देनी पड़ती है। टिकट घर में जाकर दो प्रवेश टिकट लेता हूं। आपको पता ही है कि 15 साल तक के बच्चों का प्रवेश टिकट भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के स्मारकों में नहीं लगता है। एहोल मंदिर समूह में एक संग्रहालय भी है। पर आज शुक्रवार को यह संग्रहालय बंद है। इसलिए संग्रहालय का टिकट नहीं लेना पड़ता। संग्रहालय भवन के पास शौचालय बना है। हमलोग पहले उसका इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद चल पड़ते हैं अहोल के मंदिरों का दर्शन करने।

हमारे आसपास कई विदेशी नागरिक भी हैं। एक सज्जन वाशिंगटन, अमेरिका से आए हैं। तीसरी बार हिंदुस्तान घूमने आए हैं। इस बार तफ्शील से दक्षिण भारत की यात्रा कर रहे हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि अपने उत्तर भारत के लोग बादामी और उसके आसपास के समृद्ध चालुक्य राजाओं के धरोहर को देखने इतनी कम संख्या में क्यों आते हैं। एहोल का मंदिर समूह राष्ट्रीय धरोहर है, पर इसे भी अलग से विश्व विरासत की सूची में शामिल करवाने की कोशिश चल रही है। एहोल में छठी से 12वीं सदी के कुल 125 छोटे बड़े मंदिर हैं।
-   विद्युत प्रकाश मौर्य
(AHOLE, BADAMI, BAGALKOT, KARNATKA ) 


Sunday, May 14, 2017

तन, मन, धन को समर्पित पट्टडकल का संगमेश्वर मंदिर

जब आप पट्टडकल के मंदिर समूह को देखने के लिए प्रवेश करते हैं तो आपको सबसे पहले काडिसिद्धेश्वर मंदिर, गलगनाथ मंदिर और संगमेश्वर मंदिर के बोर्ड नजर आते हैं। पुरातत्व विभाग ने लोगों की सुविधा के लिए मार्ग संकेतक बनाए हैं।

पट्टडकल के मंदिर समूहों में संगमेश्वर मंदिर प्रमुख है। यह मंदिर कांप्लेक्स के बीच में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण आठवीं सदी का है। इसे राजा विजयादित्य (696-733 ई) ने तन, मन और धन को समर्पित किया था। इसका एक नाम विजयेश्वर देवालय भी है। आजकल यह मंदिर मूल स्वरूप में नहीं है। कई जगह दीवारें और प्रतिमाएं टूटी हुई दिखाई देती हैं।

इस मंदिर के देखते हुए आपको एक अधूरेपन का एहसास होता है। मानो यह मंदिर अभी पूरा नहीं हुआ हो। चालुक्य राजाओं द्वारा पट्टदकल में बनवाए गए मंदिरों में संभवतः यह पहला मंदिर माना जाता है। इस मंदिर में स्तंभयुक्त मंडप और प्रदक्षिणा पथ की योजना है। यहां दक्षिण की ओर गणेश जी और उत्तर की ओर महिषासुर मर्दिनी को स्थान दिया गया है। मुख्य मंडप में ऐसा प्रतीत होता है कि तीन प्रवेश द्वार बनाए जाने की योजना थी। मंदिर की दीवारें और शिखर विशुद्ध रूप से द्रविड़ शैली में बनी है। मंदिर की बाहरी दीवारों में भी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं। 
पट्टडकल का काडसिद्धेश्वर देवालय 


अब बात काडसिद्धेश्वर मंदिर की। यह पट्टडकल मंदिर समूह के उन मंदिरों में शामिल है जिसका निर्माण उत्तर भारतीय नागर शैली में किया गया है। आठवीं सदी में बना यह मंदिर वर्गाकार गर्भ गृह वाला है। गर्भ गृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित किया गया है। मंदिर का शिवलिंग काले पत्थरों का है जो बड़ा ही सुंदर दिखाई देता है। हालांकि मंदिर अब विखंडित अवस्था में है। हमले में मंदिर का आधा हिस्सा ध्वस्त हो गया है। इसकी मूर्तियां भी विखंडित दिखाई देती हैं।

मंदिर के प्रवेश द्वार पर शिव और पार्वती की प्रतिमा स्थापित है। वहीं दोनों पार्श्व पर ब्रह्मा और विष्णु विराजमान हैं। मंदिर के मंडप में दो जालीदार वातायन का निर्माण कराया गया है। मंदिर का शिखर क्रमशः घटते हुए चरणों में बना है। पर मंदिर का शीर्ष भाग का बड़ा हिस्सा अब नष्ट हो चुका है।

गलगनाथ मंदिर - गलगनाथ मंदिर भी उत्तर भारतीय नागर शैली में बना हुआ सुंदर मंदिर है। पर दुखद है कि इसका मुख्य मंडप नष्ट हो चुका है। यह मंदिर चालुक्य राजाओं के द्वारा तेलंगाना के आलमपुर में बने नागर शैली के मंदिरों से साम्य रखता है। पट्टडकल के मंदिर समूहों को ठीक से देखने के लिए आप आधे दिन का समय अपने पास रखें तो बेहतर होगा। ज्यादा जानकारी के लिए मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित पुरातत्व विभाग के दफ्तर से मदद ले सकते हैं। यहां पर गाइड की सेवा भी उपलब्ध है। याद रखिए कि ये विश्व विरासत स्थल है। 








मलप्रभा का कहर और पट्टडकल के मंदिर 

साल 2009 में पट्टडकल के आसपास के इलाकों में भारी बाढ़ आई। इस बाढ के दौरान नंदिकेश्वर गांव के एक हजार से ज्यादा लोगों ने अपने जानवरों और जरूरी सामान के साथ पटट्डकल के ऐतिहासिक मंदिरों में शरण ली। हालांकि पानी मंदिरो तक भी आ गया था, पर इनका कुछ नुकसान नहीं हुआ। मंदिरों की नींव काफी मजबूत है इसलिए पानी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। हजारों लोगों के लिए मंदिर परिसर तारणहार साबित हुआ। छोटी सी मलप्रभा नदी अपने उफान पर थी। मंदिर परिसर में भी कई फीट पानी था। पर मंदिरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। कुल 304 किलोमीटर लंबी नदी मलप्रभा का बगलकोट जिले में ही कुदाल संगम में कृष्णा नदी में मिलन हो जाता है। ( द हिंदू, 8 अक्तूबर 2009 )


 कुछ घंटे पटट्डकल के मंदिर समूह में बीताने के बाद हम बाहर आ गए। प्रवेश द्वार के आसपास कुछ दुकाने हैं। यहां आपको शीतल पेय और नारियल पानी आदि मिल जाता है। दक्षिण भारत में नारियल पानी पीना बेहतर रहता है। प्यास बुझने के साथ ऊर्जा भी मिलती है। एक दो लोग पट्टडकल पर किताबें बेचते नजर आए। पर यहां कोई खाने पीने का ढाबा रेस्टोरेंट नजर नहीं आया। एक औरत चलकर हमारे पास आई। उसके माथे पर टोकरी है। बोली, घर से रोटी सब्जी बनाकर लाई हूं। बीस रुपये में। उसके पास साथ में छाछ की बोतल है। हालांकि हमारी अभी खाने की इच्छा नहीं है। पर ऐसा प्रतीत होता है यहां लोग रोज इस तरह घर से खाना बनाकर लाते हैं सैलानियों के लिए। हमारे आटो रिक्शा वाले भाई हमें अगली मंजिल की ओर ले जाने के लिए तैयार थे। तो हमने मलप्रभा नदी के तट पर बने इस विशाल और अति सुंदर मंदिर समूह को अलविदा कहा। दक्षिण का ऐसा सुंदर मंदिर समूह जो नागर और द्रविड़ शैली के मंदिर एक परिसर में समेटे हुए है।
  -vidyutp@gmail.com
( PATTADAKAL, WORLD HERITAGE SITE, BAGALKOT, BADAMI, KARNATKA, CHALUKYA KINGS )



Friday, May 12, 2017

विरुपाक्ष देवालय- पट्टडकल का सबसे विशाल मंदिर

पट्टडकल के मंदिर समूहों में सबसे विशाल मंदिर है विरुपाक्ष मंदिर। विरुपाक्ष शिव का एक नाम है। पट्टडकल के परिसर में यह मंदिर आखिरी छोर पर गांव से लगा हुआ है। इसका प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है। द्रविड़ शैली में बना यह देवालय पट्टडकल परिसर में सबसे भव्य मंदिर है। इसका निर्माण रानी लोकमहादेवी ने कराया था, इसलिए इसका नाम लोकेश्वर देवालय भी है। मंदिर के प्रवेश द्वार के पूरब की तरफ विशाल नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई है। नंदी की यह प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित की गई है। इस मंदिर में आजकल भी पुजारी मौजूद नजर आते हैं। इस मंदिर में नियमित पूजा अर्चना होती है। मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

विरुपाक्ष मंदिर का निर्माण 740 ई में चालुक्य राज घराने की रानी लोकमहादेवी ने अपने पति विक्रमादित्य के पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम पर तीन बार विजय के बाद कराया।


यह वास्तु शिल्प में कांचीपुरम के कैलाशनाथ मंदिर से काफी मिलता जुलता नजर आता है।  वह भी शिव का ही मंदिर है।


मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर दोनों तरफ द्वारपाल की आकर्षक मूर्तियां बनाई गई हैं। मंदिर की दीवारों पर आप बेहतरीन नक्काशियां देख सकते हैं। हालांकि इनमें कई मूर्तियां नष्ट हो गई हैं।

मंदिर में गर्भ गृह के अलावा शिव परिवार के लिए कई और कक्ष बने हैं। मुख्य मंदिर में शिव के बगल में गणेश और महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा निर्मित है।

इस देवालय की छत 18 विशाल चौकाकार स्तंभों पर टिकी हुई है। इन स्तंभों पर रामायण, महाभारत और गीता के प्रसंगों को चित्रों में उकेरा गया है। वहीं बाहरी दीवारों पर नटराज, शिव पार्वती और अर्धनारीश्वर के चित्र बनाए गए हैं।

इस मंदिर में आप कैलाश पर्वत को उठाते रावण, बालि को मारते राम, रावण से लड़ते जटायु  के अलावा कृष्ण लीला और पंचतंत्र की कथाओं के भी चित्र देख सकते हैं। मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा पथ बना है। परिक्रम पथ पर भी दीवारों पर मूर्तियां उकेरी गई हैं। कई मूर्तियों का कला शिल्प अत्यंत मोहक हैं जिन्हें देर तक निहारते रहने का जी करता है। वास्तव में विरुपाक्ष मंदिर चालुक्य वास्तु और कला शिल्प का उत्कर्ष प्रदर्शित करता है।
मल्लिकार्जुन मंदिर- विरुपाक्ष का जुड़वा मंदिर भी कहा जाता है...

मल्लिकार्जुन देवालय - विरुपाक्ष मंदिर के ठीक बगल में मल्लिकार्जुन देवालय है। इसे विरुपाक्ष का जुड़वा मंदिर भी कहते हैं। यह शिव का त्रिलोकेश्वर मंदिर है। इसका निर्माण विक्रमादित्य द्वितीय की दूसरी महारानी त्रिलोक महादेवी ने कराया। इसका शिखर वृताकार है जो विरुपाक्ष मंदिर से थोड़ा अलग है। इसकी छत पर भी पार्वती और शिव के चित्र देखे जा सकते हैं।

Kashi Vishwara Temple, Pattadakal
काशी विश्वेश्वर देवालय – मल्लिकार्जुन देवालय के बगल में ही काशी विश्वेश्वर देवालय स्थित है। यह मंदिर भी पूरब रुख का है। इसके बाहरी दीवारों के निर्माण में काले बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ है। हालांकि इस मंदिर का नंदी मंडप और शिखर अब नष्ट हो गए हैं। इस मंदिर में शिव की नृत्य करती हुई मूर्ति स्थापित है। यहां भी रामायण और महाभारत के विविध प्रसंगों को दीवारों पर देखा जा सकता है। इस मंदिर का निर्माण आठवीं नौंवी सदी का प्रतीत होता है। इसका शिल्प उत्तर भारत के मंदिरों की तरह नागर शैली का है। मंदिर में शिव पार्वती विवाह, अंधकासुर वध, गंगा अवतरण, गजासुर संहार जैसे कथानक को चित्रों में देखा जा सकता है।

( अगली कड़ी में पढे... संगमेश्वर देवालय और कुछ और मंदिर....)
- vidyutp@gmail.com

  ( PATTADAKAL, WORLD HERITAGE SITE, BAGALKOT, BADAMI, KARNATKA, CHALUKYA KINGS ) 

Wednesday, May 10, 2017

पट्टडकल के देवालय - चालुक्य राजाओं की अदभुत कृति

कर्नाटक का पट्टडकल विश्व विरासत में शामिल दर्शनीय स्थल है। बगलकोट जिले का यह गांव बादामी से 22 किलोमीटर की दूरी पर है। बेंगलुरु से पट्टडकल की दूरी 514 किलोमीटर है। मलप्रभा नदी के तट पर बना ये मंदिर समूह दुनिया भर से आने वाले कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र है। हालांकि पट्टडकल में भी कर्नाटक पर्यटन की ओर से विश्राम गृह बना है, पर यहां घूमने आने वालों के लिए बादामी में ही रहना बेहतर है, क्योंकि पट्टडकल एक गांव है, यहां  दो चार दुकानों के अलावा कुछ भी नहीं है।

हमने 24 मार्च को दिन भर पट्टडकल और अन्य दर्शनीय स्थलों को घूमने के लिए आटो रिक्शा बुक कर लिया है। इस आटो रिक्शा में सात लोग बड़े आराम से आ सकते हैं। पर हम ढाई लोग ही तो हैं। बादामी में अपने होटल से सुबह के नास्ते के बाद आठबजे हमलोग घूमने निकल पड़े। हमारा पहला पड़ाव है पट्टडकल। हरे भरे खेतों से होकर गुजरती बेहतरीन सड़क से होते हुए कोई 40 मिनट में हम पहले पड़ाव पर पहुंच गए हैं। 

विश्व विरासत होने के कारण पट्टडकल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारक है। यहां प्रवेश के लिए 30 रुपये का टिकट है। प्रवेश द्वार पर अधिकृत गाइड भी मिलते हैं। पर हमने गाइड के बिना ही घूमना तय किया। पट्टडकल के मंदिर समूह के सारे मंदिर एक ही बाउंड्री वाल के अंदर स्थित हैं। परिसर को एएसआई ने बहुत ही सुंदर हरा भरा बना रखा है। फूलों की क्यारियां सजी हैं। अंदर प्रवेश करते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। सुबह की वेला में धूप भी तीखी नहीं है। ऐसे मौसम में मंदिरों की कलात्मकता के साथ कुछ घंटे गुजारना अत्यंत सुखकर है।   

चालुक्य राजा न सिर्फ बहादुर लड़ाके थे बल्कि कला संस्कृति में गहरी रूचि रखते थे ये पट्टडकल के मंदिरों को देखकर भली प्रकार जाहिर होता है। उन्होंने पट्टडकल के अलावा, अहोले, महाकुटा और बादामी में अदभुत मंदिरों का निर्माण कराया। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को द्वारा भारत के विश्व विरासत के स्थलों में पट्टडकल को 1987 में ही शामिल कर लिया गया था। देश के तमाम लोकप्रिय स्मारकों को इस सूची में आने का मौका इसके बाद मिला है। तो इससे समझा जा सकता है कि पट्टडकल कितना वैश्विक महत्व रखता है।

पट्टडकल के ज्यादातर मंदिरों का निर्माण कला प्रेमी राजा विक्रमादित्य द्वितीय के शासन काल में हुआ है। ज्यादातर देवालयों का निर्माण द्रविड़ शैली में हुआ है। इन देवालयों को देखकर लगता है कि छठी से आठवीं सदी तक यह जगह धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध केंद्र था। इसलिए यह चालुक्य राजाओं की दूसरी राजधानी कहलाता था। यहां राजाओं के राज्याभिषेक उत्सव हुआ करते थे। यह उत्तर और दक्षिण के वास्तु शिल्प के समागम का केंद्र था।
पट्टडकल की सबसे पहले चर्चा दूसरी सदी में भारत भ्रमण पर आए ग्रीक यात्री टालेमी ने की है।  उसने पट्टडकल को पेट्रिगल लिखा है। इसे लाल मिट्टी का प्रदेश या रक्तपुर भी कहा गया है।

पट्टडकल में कुल 10 देवालय हैं। इनमें से आठ एक ही परिसर में हैं। वहीं पापनाथ देवालय यहां से आधा किलोमीटर की दूरी पर और जैन नारायण देवालय 1.5 किलोमीटर की दूरी पर है। तो फिर चलते हैं इन देवालयों का दर्शन करने... जो लोग चलने  में सक्षम नहीं हैं उनके लिए बैटरी कार का भी यहां पर इंतजाम है।
 
( अगली कड़ी में पढ़े .. ) 
 -vidyutp@gmail.com
( PATTADAKAL, WORLD HERITAGE SITE, BAGALKOT, BADAMI, KARNATKA, CHALUKYA KINGS )




Monday, May 8, 2017

चालुक्य राजाओं का दमकता इतिहास है बादामी

हमलोग बादामी पहुंच चुके हैं। बादामी कर्नाटक में बगलकोट जिले की एक तहसील है। बादामी का बस स्टैंड काफी साफ सुथरा और सुंदर है, कर्नाटक के दूसरे बस अड्डों की तरह ही इसका रंग रोगन अपनी पहचान बताता है। बस स्टैंड के अंदर के बेहतरीन कैंटीन भी है। इसे देखकर मैं सोचता हूं हमारे उत्तर भारत के छोटे छोटे शहरों में इतने सुंदर बस स्टैंड कब बनेंगे।

बादामी का पुराना नाम वातापी था। हम बादामी इसलिए पहुंचे हैं कि यहां से हमें बादामी के अलावा पट्टडकल ( विश्व विरासत स्थल) एहोले और दूसरे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों को देखना  है। इसके लिए बादामी मुफीद जगह है। यहां रहने के लिए कई होटल हैं। खाने के कई विकल्प हैं। अच्छा खासा बाजार है।
तो बात बादामी की, बादामी यानी वातापी लंबे समय तक बादामी चालुक्य वंश की राजधानी रही।  540 ई से 757 तक यह नगर अपने उत्कर्ष पर था। अब बादामी को केंद्र सरकार ने हेरिटेज शहर की ह्रदय परियोजना में शामिल किया है। पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि अगस्त्य ने असुर वातापी को यहां मार डाला था। इसलिए यहां उनके नाम पर अगस्त्य कुंड है और शहर का पुराना नाम वातापी है। पर ऐतिहासिक तौर पर बादामी शहर की स्थापना चालुक्य वंश के शासक पुलकेशिन प्रथम ने 540 ई में की। पुलकेशिन ने ही बादामी फोर्ट का निर्माण कराया।
पुलकेशिन ने इसे राजधानी के तौर पर इसलिए चुना था कि पूरा नगर तीन तरफ से विशाल पहाड़ियों से घिरा हुआ था। इसलिए यह सामरिक तौर पर सुरक्षित था। पुलकेशिन प्रथम के बेटे कीर्तिवर्मन ने बादामी में गुफा मंदिरों का निर्माण कराया। छठी से आठवीं सदी तक चालुक्य वंश का कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों तक शासन रहा। पुलकेशिन द्वितीय (610-642 ) इस वंश का सबसे प्रतापी राजा हुआ जिसने कई पड़ोसी राजाओं को पराजित किया। राष्ट्रकूट वंश के 757 ई में शासन में आने के बाद बादामी का महत्व कम होने लगा।
बादामी का भूतनाथ मंदिर 

बादामी में क्या देखें – बादामी के गुफा मंदिर, अगस्त्य कुंड, भूतनाथ मंदिर, बादामी संग्रहालय ( शुक्रवार को बंद रहता है ), बादामी का किला (पहाड़ी पर), कई शिव मंदिर आदि। यहां वे तमाम नजारे हैं जिन्हें आपने फिल्म गुरू और राउडी राठौर में देखा होगा। 

मैं शाम को बादामी के बाजार में घूमने निकलता हूं। गन्ने का जूस , आईसक्रीम और तरबूज की दुकाने की सजी हैं। यहां पर भेलपुरी की दुकानें दिखाई दीं, जहां आप रेस्टोरेंट की तरह बैठकर भेलपुरी खा सकते हैं। 15 रुपये की प्लेट। गोलगप्पे की कई दुकानें दिखीं। दस रुपये में 7 गोलगप्पे या पानी पुरी। एक गोलगप्पे वाले राजस्थान के मिल गए। कई साल से बादामी में ही गोलगप्पे बेच रहे हैं। यहां रहकर खुश हैं। मैं शहर के सब्जी बाजार का मुआयना करता हूं। सब्जियां सस्ती हैं। एक होजरी की दुकान से बेटे के लिए बनियान खरीदता हूं। दुकानदार बताते हैं तुम्हारी दिल्ली में इलेक्ट्रानिक सामान सस्ता मिलता है। मैं पिछले साल दिल्ली हरिद्वार और बद्री केदार की यात्रा पर गया था।

दक्षिण भारतीय थाली... होटल राजसंगम बादामी 
पूरे बाजार का मुआयना करने के बाद रात का खाना अपने होटल के ही रेस्टोरेंट में खाना तय किया। मैंने मंगाई दक्षिण भारतीय शाकाहारी थाली। 80 रुपये की। जी भरके खाओ। अनादि ने मंगाया सेट डोसा। सेट डोसा मतलब तीन मसाला डोसा का सेट। यह 40 रुपये का। तो माधवी की पसंद थी मसाला डोसा। पर मेरी थाली में आइटम ज्यादा हैं तो वे दोनों इसमें साझेदारी करने से नहीं चुके। अब खाने के बाद आइसक्रीम की तलब हुई तो पहुंच गए पड़ोस के आईसक्रीम पार्लर में। होटल राजसंगम के वातानूकूलित सूट में नींद अच्छी आई। 24 मार्च की सुबह पांच बजे मस्जिद की अजान के साथ नींद खुल गई।

-vidyutp@gmail.com
(BADAMI, VATAPI, CHALUKYA KINGS, BADAMI FORT )