Sunday, April 30, 2017

बीजापुर का जामा मसजिद, मेहतर महल और जोड़ी गुंबद

हमारा तांगा बीजापुर की तंग सड़कों से होता हुआ पहुंच गया है, जामा मसजिद। बाहर कुछ फलों और शीतलपेय की दुकाने सजी हैं। हम कुछ फल खरीदकर खाते हैं। मसजिद में प्रवेश से पहले एक जूता चप्पल स्टैंड है। यहां एक सज्जन बैठे हैं दो रुपये प्रति चप्पल। हमलोग मसजिद के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। बीजापुर की जामा मसजिद यानी अल्लाह का इतना बड़ा मकान। यह दिल्ली के जामा मसजिद से ज्यादा पुरानी है। किसी के प्रवेश पर पाबंदी नहीं है। 


बीजापुर के जामा मसजिद को अली आदिल शाह प्रथम ने 1578 में बनवाया। वहीं दिल्ली की जामा मसजिद 1656 की बनी हुई है। साल 1556 में तीलाकोटी के युद्ध में जीत के बाद विजयनगर पर आदिलशाह का अधिकार हो गया। इस जीत के बाद विजयपुरा में इस विशाल जामा मसजिद का निर्माण कराया गया।  इस मसजिद का गुंबज एशिया के सबसे विशालतम गुंबज में गिना जाता है।  मसजिद 1,16,300 वर्ग फीट में वर्गाकार बनी है।  यहां एक साथ ढाई हजार लोग नमाज पढ़ सकते हैं।  पश्चिमी दीवारों की मेहराब पर पवित्र कुरानशरीफ की आयतें लिखी गई हैं।

जामा मसजिद की आंतरिक सज्जा काफी सुंदर है।  मध्यकाल में यह दक्कन क्षेत्र की सबसे बड़ी मसजिद हुआ करती थी।  मसजिद के पूर्बी कोने पर वजू करने के लिए विशाल टैंक बना है। 17वीं सदी में बीजापुर पर जब औरंगजेब ने अधिकार कर लिया तो उसने मसजिद के बाहरी दीवारों का सौंदर्यीकरण कराया।  उसने पूर्वी तरफ एक गेट और बरामदा का निर्माण कराया।  हालांकि निर्माण के लिहाज से यह मसजिद कभी पूरी नहीं हुई। पूर्वी द्वार पर दो मीनार बनने वाले थे, जो नहीं बन सके। इस मसजिद में नियमित नमाज पढ़ी जाती है।

मसजिद से बाहर निकलने के बाद मैं यहीं से बीजापुर पर एक छोटा गाइडबुक खरीदता हूं। अब हम आगे चल पड़ते हैं। पूरा विजयपुरा शहर के विशाल बाउंड्री वाल से घिरा है। इस दीवार का अस्तित्व अभी भी जगह जगह देखा जा सकता है। 

मेहतर महल - आगे तांगे वाले हमें एक मीनार दिखाते हैं। यह काफी हद तक चारमीनार हैदराबाद की नकल है। पर इसका गुंबद यानी प्रवेश द्वार अदभुत दिखाई देता है। इस महल की मीनारों पर चिड़ियों का बसेरा होता है। महल का निर्माण 1620 ई का है। इसका नाम मेहतर महल इसलिए है कि इसका निर्माण एक मेहतर ( झाड़ूकश ) ने कराया। हालांकि यह भी कहा जाता है इस महल का निर्माण एक फकीर ने कराया। उसे निर्माण के लिए राशि इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय से दान में मिली थी।

हमारा तांगा आगे बढ़ता है। बीजापुर का बस स्टैंड आ गया। यहां जाहिर है, वाहनों की भीड़भाड़ है। बीजापुर बस स्टैंड से कर्नाटक आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों के लिए बसें मिलती हैं।


हमलोग आगे बढ़ते हैं। हमारी अगली मंजिल है जोड़ी गुंबद। यह सिटी बस स्टैंड के करीब ही है। यहां पर दो गुंबद एक साथ बने हैं। यहां कुछ दुकानें सजी हैं।

पास में एक मसजिद है जहां काफी लोग मनौती मांगने वाले भी पहुंचते हैं। जोड़ी गुंबज के पास हमेशा रौनक रहती है। साल 2009 में बीजापुर शहर कई महीनों तक बाढ से घिरा रहा। जोड़ी गुंबज तो कई महीने पानी में रहा, पर बीजापुर के ज्यादातर इमारतों की नींव इतनी मजबूत है कि इन पर लंबे समय तक जल जमाव का कोई असर नहीं हुआ।

विद्युत प्रकाश मौर्य 
(JAMA MASJID, MEHTAR MAHAL, BIJAPUR  ) 


बीजापुर का जोड़ी गुंबज। यह बस स्टैंड के पास स्थित है.... 

Friday, April 28, 2017

गोलगुंबज का शहर बीजापुर यानी विजयपुर

 बीजापुर के बारे में बचपन से सुनते आए हैं। पर जब आप रेलवे के मानचित्र में इस शहर को तलाशेंगे तो शायद नहीं मिले क्योंकि इसका नाम मिलता है विजयपुरा। वैसे स्टेशन कोड BJP  ही है। बीजापुर या विजयपुर कर्नाटक का महाराष्ट्र से लगता हुआ आखिरी जिला है। अगर दिल्ली की तरफ से ट्रेन से जा रहे हैं तो बेंगलुरु जाने की जरूरत नहीं है, यह महाराष्ट्र के सोलापुर शहर से ज्यादा करीब है। वहीं तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद भी यहां से ज्यादा दूर नहीं है। आप बेंगलुरु की तुलना में हैदराबाद या सोलापुर से बीजापुर आसानी से पहुंच सकते हैं। सिकंदराबाद से बीजापुर 412 किलोमीटर ( वाया गुलबर्गा, सोलापुर) है। 

सोलापुर से बीजापुर कुल 110 किलोमीटर है। वहीं बेंगलुरु से बीजापुर की दूरी 717 किलोमीटर है। मुंबई से बीजापुर 550 किलोमीटर तो पुणे से 380 किलोमीटर है। बीजापुर के लिए मुंबई, पुणे, सोलापुर, हैदराबाद, बेंगलरु आदि शहरों से सीधी ट्रेन है।


बीजापुर शहर की नींव कल्याणी चालुक्य राजाओं ने दसवीं -11वीं शताब्दी के बीच रखी थी। उन्होंने इस शहर का नाम विजयपुरा यानी जीत का शहर दिया था। पर बाद में आदिलशाही राज्य में विजयपुरा में कई बड़े निर्माण हुए जिसने इस शहर के देश के पुरातात्विक महत्व वाले शहरों की सूची में शामिल कर दिया। बचपन से आप गोलगुंबज बीजापुर के बारे में पढ़ते आए होंगे।

आदिलशाह ने बीजापुर में 50 मस्जिदें 20 गुंबज और कई महल बनवाए।  आज बीजापुर, जामा मस्जिद, बारह कमान, इब्राहिम रौजा, ताज बावड़ी, मल्लिके मैदान, मेहर महल जैसे स्थापत्य कला से जुड़े इमारतों के लिए जाना जाता है।  साल 2011 के जनगणना में बीजापुर की आबादी 3 लाख 11 हजार थी। शहर में मुस्लिम आबादी ज्यादा है। आबादी में यह कर्नाटक का नौंवा बड़ा शहर है।
बीजापुर रेलवे स्टेशन पर हमलोग सुबह 10 बजे उतरे हैं। छोटे से स्टेशन से बाहर निकलते ही तांगे वाले और आटोवाले घेर लेते हैं। हम उनसे बीजापुर घूमने की इच्छा जाहिर करते हैं। ट्रेन में एक सहयात्री ने बताया था कि बीजापुर घूमने का अच्छा तरीका तांगे से घूमना भी है। इससे पहले हमने बिहार के राजगीर में और तमिलनाडु के रामेश्वरम, मैसूर आदि शहरों में तांगे की सवारी की थी। तांगा अब बीते दिनों की बात होता जा रहा है। इसलिए हमने यहां तांगे वाले से बात करना ही उचित समझा। तांगे की सवारी का अपना अंदाज है। तांगा बग्घी नुमा हो तो शाही एहसास होता है। बीजापुर का तांगा अच्छा था। उन्होंने पुरा शहर घूमाने का 500 रुपये बताया। आटोवाले भी इतने ही रुपये मांग रहे थे। तो तांगा ही बेहतर था।  

तांगे वाले के पास एक छोटी सी गाइड बुक भी थी जिसमें प्रमुख दर्शनीय स्थलों की जानकारी थी। समय का कोई बंधन नहीं था। हमें बीजापुर में रात्रि विश्राम नहीं करना था, बल्कि दिन में शहर घूमने के बाद शाम तक बादामी पहुंचना था। तांगे वाले से 350 रुपये पर समझौता हो गया। और हम बैठ गए तांगे पर। अनादि और उनकी मां आगे और मैं पीछे। तांगे पर संतुलन बनाना पड़ता है। क्योंकि आगे या पीछे वजन ज्यादा कम नहीं होना चाहिए। इसके बाद घोड़ा चल पड़ा बीजापुर की सड़कों पर। टकभक...टकभक...टकभग...

बीजापुर में गर्मियों में तापमान काफी बढ़ जाता है, इसलिए यह शहर सर्दियों में घूमने के लिए मुफीद है।  पूरे शहर को देखने के लिए दिन भर का वक्त काफी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

 (VIJAYPURA, BIJAPUR, GOL GUMBAJ, TANGA RIDE ) 

 
A View of Vijaypura city from GOLGUMBAJ 

Wednesday, April 26, 2017

गोलगुंबज एक्सप्रेस से बीजापुर वाया अलमाट्टि डैम

रेलगाड़ी में जब दिन में चल रही हो तो आने वाले स्टेशनों को देखना अच्छा लगता है खासकर सफर जब नए मार्ग पर हो। पर रात में आप रास्ते का आनंद नहीं ले पाते। पर बेंगलुरु से विजयपुरा जाते हुए रात में भी मुझे ज्यादातर नींद नहीं आई। गोलगुंबज एक्सप्रेस बेंगलुरु सिटी के बाद यशवंतपुर में रुकी। हमलोग एस4 कोच में है। कोच में आधी सीटें खाली हैं। हमारा नीचे का कोई भी बर्थ नहीं है। पर खाली होने के कारण नीचे सोने का मौका मिल गया। 70 किलोमीटर बाद तुमकुरु आया। कर्नाटक का एक जिला। इसके बाद ट्रेन रुकी अरसिकेरे जंक्शन पर, यह हासन जिले का रेलवे स्टेशन है। मध्य रात्रि में ट्रेन बिरूर जंक्शन पर रुकी। यह चिकमंगलुर जिले का रेलवे स्टेशन है। इसके बाद आया चिकजाजुर जंक्शन। यह स्टेशन चित्रदुर्ग जिले में आता है। ट्रेन समय से चल रही है। रात के एक बजे आया दावणगेरे रेलवे स्टेशन। तुमकुर और दावणगेरे नाम मेरे लिए काफी समय से परिचित हैं क्योंकि मेरे दो बचपन के साथी इन शहरों में इंजीनयरिंग की पढ़ाई के लिए आए थे।

इसके बाद ट्रेन रुकी हरिहर रेलवे स्टेशन पर, यह भी दावणगेरे जिले का एक शहर है। अगला स्टेशन है राणीबेनुर, यह हावेरी जिले का एक शहर है।  यहां पास में एक काले हिरण की सेंक्चुरी है। इसके बाद का  स्टेशन है हावेरी। यह कर्नाटक का एक जिला है। हावेरी लाल मिर्च के लिए जाना जाता है देश भर में। सुबह 4 बजे ट्रेन हुब्बली जंक्शन पर रुकी। यहां ट्रेन का इंजन आगे से पीछे की ओर लगा और ट्रेन नए मार्ग पर चल पड़ी। हुबली कर्नाटक का प्रसिद्ध शहर है। यह अपने पेड़े के लिए प्रसिद्ध है। हुबली आबादी में बेंगलुरू के बाद राज्य का दूसरा बड़ा शहर है। यह राज्य के धारवाड़ क्षेत्र में आता है। इसके बाद अगला स्टेशन है अन्निगेरी। अन्निगेरी शहर धारवाड़ जिले में आता है। सुबह हो चुकी है अगला स्टेशन है गदग जंक्शन। यहां ट्रेन 10 मिनट रुकी। गदग भी जिला और जिले का मुख्यालय है। अगला ठहराव होले आलुर है, यह भी गदग जिले का हिस्सा है। इसके बाद बादामी में एक मिनट का ठहराव, बगलकोट जिला आरंभ हो चुका है।


बगलकोट के बाद आया अलमाट्टि। विजयपुर जिले में अलमाट्टि में कृष्णा नदी पर विशाल बांध बना है जो रेलगाड़ी से दिखाई देता है। उत्तर कर्नाटक का यह बांध 2005 में पूरा हुआ। हालांकि इसकी नींव साल 1964 में रखी गई थी। यहां पर विशाल जलाशय लाल बहादुर शास्त्री सागर बना है। यह कर्नाटक का सबसे बड़ा जलाशय है। इस डैम के साथ कृष्णा भाग्या जल निगम लिमिटेड की ओर से हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट लगाया गया है जिसका लक्ष्य 560 मेगावाट बिजली बनाने का है।

साल 2016 में फंड के बेहतर इस्तेमाल के लिए इस जलाशय के प्रोजेक्ट को विश्व बैंक द्वारा अवार्ड भी मिला है। अलमाट्टि डैम में बांध की ऊंचाई 52 मीटर है। अब यह एक पर्यटक स्थल भी बन गया है। डैम के पास पिकनिक स्पाट विकसित किया गया है। बोटिंग और म्युजिकल फाउंटेन भी का मजा भी यहां लिया जा सकता है। काफी लोग डैम देखने पहुंचते हैं। यह बीजापुर से 66 किलोमीटर की दूरी पर है। बीजापुर से वापस आते हुए भी हमने अलमाट्टि डैम का नजारा लिया।



(ALMATTI DAM, VIJAYPURA, HUBLI, LAL BAHADUR SHASTRI SAGAR ) 

A VIEW OF ALMATTI DAM FROM TRAIN....


Monday, April 24, 2017

क्रांतिवीर संगोली रायणा मतलब बेंगलुरू रेलवे स्टेशन

बेंगलुरु शहर के सिटी रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर क्रांतिवीर संगोल्लि रायणा कर दिया गया है। यानी अब यह कहलाता है केएसआर बेंगलुरू। सिटी रेलवे स्टेशन अति व्यस्त स्टेशन है। यहां कुल 10 प्लेटफार्म हैं।

बेंगलुरु में केंपेगोडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट है तो बस स्टैंड का नाम भी केंपेगोडा बस टर्मिनल है। वैसे लोग इसे लोकप्रिय तौर पर मैजेस्टिक कहते हैं। आखिर कौन थे केंपेगोडा। वे बेंगलुरु शहर के संस्थापक थे। 1537 में उन्होंने इस शहर की स्थापना की। वे विजयनगर सम्राज्य के अंतर्गत एक छोटे राजा थे। वे अपने समय के शिक्षित और सफल शासक थे। उन्होंने एक सपना देखा था सुंदर शहर बसाने का, जिसमें पानी की बड़ी बड़ी झीलें हो, अच्छी सड़कें हों, मंदिर हों।

 
मई 2016 में बेंगलुरु स्टेशन का नाम बदलकर क्रांतिवीर संगोल्ली रायणा कर दिया गया। यह कर्नाटक केलोगों को मांग पर किया गया। संगोल्ली रायणा 19वीं सदी के महान क्रांतिकारी थे। रायना का जन्म 15 अगस्त 1798 को बेलगावी जिले के कित्तूर में हुआ था। वे अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से लड़े। 33 साल की उम्र में 1824 के विद्रोह में शामिल हुए। 26 जनवरी 1832 में बेलगावी जिले में ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें बरगद के पेड़ से फांसी पर लटका दिया। वे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक दौर के शहीदों में थे। सबसे बड़ी बात है कि उनका जन्म तारीख 15 अगस्त और शहादत की तारीख 26 जनवरी है। दक्षिण पश्चिम रेलवे ने रेलवे स्टेशन के प्रवेश द्वार पर रायणा की मूर्ति लगाई है। 


बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पर कुल 10 प्लेटफार्म हैं जिसमें प्लेटफार्म नंबर 8 से 10 पर हुब्बली, यशवंतपुर की तरफ जानेवाली रेलगाड़ियां चलती हैं। एक से 7 तक के प्लेटफार्म पर चेन्नई हैदराबाद और अन्य दिशाओं में जाने वाली गाड़ियां चलती हैं। नई दिल्ली की तरह अब ये स्टेशन मेट्रो नेटवर्क से जुड़ गया है। मेट्रो के दो स्टेशन रेलवे स्टेशन के अगल बगल में हैं। स्टेशन का मुख्य प्रवेश द्वार प्लेटफार्म नबंर एक की तरफ है। वैसे प्लेटफार्म नंबर 10 की तरफ से प्रवेश द्वार है। स्टेशन के बाहर और प्लेटफार्म नंबर एक पर खाने पीने के लिए अच्छे स्टाल हैं। वैसे अब कई ट्रेनें बेंगलुरू के बजाय यशवंतपुर रेलवे स्टेशन से चलती हैं। यशवंतपुर की दूरी बेंगलुरू से महज 6 किलोमीटर है। सिटी रेलवे स्टेशन पर भीड़ बढ़ने के बाद यशवंतपुर को नए टर्मिनल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। 


इस बार हमारी ट्रेन बीजापुर के लिए है जिसका नाम गोल गुंबज एक्सप्रेस है। यह ट्रेन मैसूर से आती है। इसे प्लेटफार्म नबंर 10 पर आना था। पर अचानक ऐलान हुआ कि यह प्लेटफार्म नंबर 8 पर आएगी। हमें सारे सामान के साथ आठ पर शिफ्ट होना पड़ा। दस नंबर प्लेटफार्म के उपरिपुल की सीढ़ियों की चौड़ाई काफी कम थी। हमारे साथ एक बुजुर्ग महिला थीं हमारे स्थानीय दोस्त गुज्जर साहब की मां। सो हमें थोड़ा संभल संभल कर प्लेटफार्म बदलना पड़ा। गोलगुंबज एक्सप्रेस अपने नीयत समय पर रेलवे स्टेशन से चल पड़ी। हमेशा आप सुनते आए होंगे कि दक्षिण भारत में रेलगाड़ियां समय पर चलती हैं। यह काफी हद तक सच भी है। तो अब हम चल पड़े हैं बीजापुर की ओर....

- विद्युत प्रकाश मौर्य
  ( KRANTIVEERA SANGOLLI RAYANNA, KSR BENGALURU RAILWAY STATION ) 

Saturday, April 22, 2017

दिल्ली से कैंपेगोडा ( बेंगलुरु ) के शहर में

नई दिल्ली की 1डी टर्मिनल और पियानो....
बेंगलुरू इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम रखा गया है केंपेगोड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट। पुराना एयरपोर्ट शहर में था, पर 2008 में शहर से 45 किलोमीटर बाहर चिकाबालपुर हाईवे पर ऩए एयरपोर्ट का निर्माण हुआ। देश के दो शहर हैदराबाद और बेंगलुरू के एयरपोर्ट अब शहर से 40 किलोमीटर दूर हो गए हैं। दिल्ली से हमने सुबह सुबह 1डी टर्मिनल से बेंगलुरु के लिए इंडिगो एयरलाइन से उड़ान भरी।

वह मार्च की एक ठंडी सुबह थी। 1डी पर एक सुंदर जापानी पियानो देखने को मिला जिसमें एक पेन ड्राइव लगाने के बाद सुमधुर संगीत निकलने लगा। मैं और अनादि थोड़ी देर इस संगीत का आनंद लेते रहे। पियानो के सारे की अपने अपने आप चलते जा रहे थे। तभी हमारी फ्लाइट में प्रवेश का समय हो गया।
कुछ इस तरह विमान में सो भी सकते हैं....

विमान को अमृतसर की कैप्टन साक्षी शर्मा उड़ा रही हैं।  उनकी सहायक हैं मुंबई की पलक। पलक बड़ी तीव्र गति से  हिंदी में उदघोषणा कर रही हैं जिसे समझना मुश्किल है। अरे तोड़ा पॉज देकर बोलो ना..थोड़ीदेर में हम हवा में थे। बहुत ही सधी हुई उड़ान। सुबह 6.20 की उड़ान थी और 9 बजने से पहले हम बेंगलुरू के आसमान में थे। यहां एयरब्रिज से तुरंत बाहर आ गए। बेंगलुरु के उत्तरहाली इलाके में जाने के लिए ओला कैब बुक किया। कैब वाले ने जीपीएस मे हमारा पहुंच लोकेशन सेट करने को कहा। इसके बाद जैसे जैसे जीपीएस बाबा मार्ग बताते गए कैब वाले चलते रहे। बेंगलुरु शहर को एयरपोर्ट एनएच 44 सड़क जोड़ती है।  


बेंगलुरू शहर से एयरपोर्ट जाने के लिए अच्छी कनेक्टिविटी नहीं है। आपको मैजेस्टिक जय नगर आदि से बसें मिलती हैं जिनका किराया 234 रुपये प्रति व्यक्ति है। अगर टैक्सी करते हैं तो 700 से 1000 रुपये तक बिल आता है। तीन लोग हों तो टैक्सी कर लेना बेहतर है। जब एयरपोर्ट शहर से काफी दूर बनाया जाए तो उसे मेट्रो या लोकल ट्रेन के नेटवर्क से जोड़ा जाना चाहिए। मजे की बात से बेंगलुरू एयरपोर्ट से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर चिकाबालपुर लाइन का लोकल रेलवे स्टेशन है।डोडजाला हाल्ट (DJL) रेलवे स्टेशन की दूरी बेंगलुरु सिटी से 39 किलोमीटर है।
और ये रहा बेंगलुरु...


अगर लोकल ट्रेन नेटवर्क दुरस्त कर दिया जाए तो एयरपोर्ट पहुंचना आसान हो जाए। जैसे चेन्नई एयरपोर्ट के ठीक सामने लोकल ट्रेन का स्टेशन और मेट्रो स्टेशन है। वैसे सुना है कि एयरपोर्ट तक मेट्रो ले जाने की योजना है। अभी अगर आप बेंगलुरू के किसी कोने से भी एयरपोर्ट जाना चाहते हैं तो आपको 3 घंटे का समय लेकर चलना चाहिए। सबसे बड़ाकारण बेंगलुरू शहर का घटिया ट्रैफिक है। ज्यादा तर  सड़के संकरी है, जिसमें बसें और टैक्सी फंस कर रेंगती रहती हैं। दिल्ली की तरह बेंगलुरू में चौड़ी सड़कें काफी कम है। अभी मेट्रो नेटवर्क पूरे शहर को जोड़ नहीं पाया है।

खैर हमारे टैक्सी वाले हमें येलहांका लेकर आए, यह एयरपोर्ट मार्ग पर शहर का बाहरी इलाका है। यहां वायुसेना का स्टेशन है। हमें एयर स्ट्रिप दिखाई देती है जहां हर साल एयर शो होता है।  आगे हम जालाहाली पहुंचते हैं जहां एचएमटी की विशाल कालोनी है। अब एचएमटी की घड़ियों का बाजार में शेयर कम होता जा रहा है। पर किसी जमाने में घड़ी का मतलब एचएमटी ही होता था। जालाहाली से आगे मैसूर रोड में मेट्रो ट्रेन के दर्शन होते हैं। इसके बाद हम थोड़ी देर नाइस एक्सप्रेस वे पर कुलांचे भरते हैं। फिर हम पहुंच जाते हैं गुबालाला। यहां हमारे बड़े भाई रहते हैं। उनके बेटे पुलकित और अनादि एक ही क्लास में पढ़ते हैं। पांच साल बाद मिलकर दोनों की खुशियों का ठिकाना नहीं है।     

 - vidyutp@gmail.com

( KARNATKA, BENGALURU, KEMPEGOWDA INTERNATIONAL AIRPORT ) 
है 

Thursday, April 20, 2017

ऐसा कोई सगा नहीं जिसे हमने ठगा नहीं..

ऐसा कोई सगा नहीं जिसे हमने ठगा नहीं...वे ऐसा खुलेआम कहते हैं। पर उनकी दुकान पर भीड़ उमड़ती है। आपने कानपुर के ठग्गू के लड्डू की चर्चा तो सुनी ही होगी। चर्चा तो हमने भी खूब सुनी थी। पर ठग्गू के लड्डू को कई बार चखने का और खाने का मौका मिला अपने कानपुर के साथी रमन शुक्ला के सौजन्य से वे जब कानपुर से आते हैं कोई न कोई मिठाई हम दोस्तों के लिए लेकर जरूर आते हैं। वे कई बार ठग्गू के लड्डू भी लेकर आए। वे ठग्गू के लड्डू की कहानी अपने अंदाज में सुनाते हैं। वैसे आपने अगर फिल्म बंटी और बबली देखी होगी तो ऐसा कोई सगा नहीं जिसे हमने ठगा नहीं संवाद से आप परिचित ही होंगे। पर ठग्गू के लड्डू की ये टैग लाइन है। जब उनके लड्डू खाएंगे तो आप ठगा हुआ नहीं महसूस करेंगे। बदलते वक्त के साथ उन्होंने अपने स्वाद और नफासत को बरकरार रखा है। ठग्गू के लड्डू के दीवाने फिल्मी सितारे से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक हैं।
ठग्गू के लड्डू की दुकान की दूसरी पहचान बदनाम कुल्फी से है। बदनाम कुल्फी की टैग लाइन है – बिकती नहीं फुटपाथ पर तो नाम होता टाप पर। आगे लिखा है – मेहमान को चखाना नहीं टिक जाएगा.... यानी जाने का नाम ही नहीं लेगा। कानपुर के लोग इस कुल्फी के दीवाने हैं। कुल्फी शहर से बाहर नहीं जा सकती पर ठग्गू के लड्डू को मुंबई और दूसरे शहरों तक भी पहुंच जाते हैं। ठग्गू के लड्डू का दावा है कि वे मिठाईयों के निर्माण में शुद्ध देशी घी का इस्तेमाल करते हैं। कानपुर में इनका स्टोर उरसला इमरजेंसी मार्केट माल रोड पर स्थित है। कभी कानपुर जाएं तो उधर का रुख कर सकते हैं।
ठग्गू के लड्डू नाम से मिठाई के दुकान की शुरुआत मट्ठा पांडे (रामअवतार पांडे) ने की थी। अब उनकी अगली पीढ़ी में प्रकाश पांडे कारोबार देखते हैं। हालांकि उनके परिवार के लोग बताते हैं कि ऐसा कोई सगा नहीं....जैसा वाक्य मात्र पब्लिसिटी स्टंट था जो काफी हिट रहा।

मट्ठा पांडे ने कानपुर में कोई 60 साल पहले लड्डू की दुकान खोली।वे पहले दिल्ली गए वहां फुटपाथ पर दुकान लगाई। बात नहीं बनी तो फिर कानपुर आकर मेस्टन रोड पर मट्ठा की दुकान खोली। फिर मिठाई के कारोबार में आए। वे गांधी जी के अनुयायी थे। एक बार गांधी जी के भाषण में बापू को यह कहते सुना कि चीनी मीठा जहर है। तो उन्होंने ये चुनौती स्वीकारी कि वे बिना चीनी वाली मिठाई बनाएंगे। ठग्गू के लड्डू की दुकान से आप स्पेशल लड्डू, खोया लड्डू, काजू लड्डू, दूध पेड़ा और बादाम कुल्फी खरीद सकते हैं। उनका स्पेशल लड्डू 510 रुपये किलो या उससे अधिक की दर पर उपलब्ध है।

कानपुर में ठग्गू के लड्डू के तीन स्टोर हैं। काकदेव में देवकी सिनेमा के पास भी उनका आउटलेट है। बड़ा चौराहा सिविल लाइंस में भी उनका स्टोर है। अब ठग्गू के लड्डू वाले दिल्ली एनसीआर में अपना फ्रेंचाइजी खोलने जा रहे हैं। इससे आप दिल्ली में भी कानपुर वाले लड्डू खरीद सकेंगे।


इस बार रमन शुक्ला पेडे लेकर आए। वह जिस मिठाई की दुकान से था उसका नाम है - कृष्ण धाम की राधा बर्फी। यह दुकान कानपुर के शिवाजी नगर में है। हांलाकि वे अत्यंत सुस्वादु पेडे लेकर आए लेकिन यह दुकान खास तौर पर राधा बर्फी के लिए जानी जाती है। इसके प्रोपराइटर ठग्गू के लड्डू परिवार के रिश्तेदार हैं। वैसे कानपुर शहर में कई मिठाई की दुकानें प्रसिद्ध हैं। जब कभी कानपुर जाएं तो अलग अलग तरह की मिठाइयों का आनंद लें।
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---- विद्युत प्रकाश मौर्य
(  ( THAGGU KE LADDU, KANPUR, BADNAM KULFI, RADHA BARFEE ) 


Tuesday, April 18, 2017

और बीस रुपये में खरीदें कामसूत्र

संयोग से आज विश्व विरासत दिवस है...तो इस मौके पर पेश है विश्व विरासत स्थलों शामिल खजुराहो पर आखिरी आलेख...

दुनिया भर के आने वाले सैलानियों के लिए खजुराहो के मंदिर आकर्षण का केंद्र तो हैं ही पर उसके साथ ही ये प्रसिद्ध स्थल लोगों को मिथुन मूर्तियों के कारण भी आकर्षित करता है। हालांकि खजुराहो के मंदिरों में उकेरी गई मूर्तियों में सिर्फ 10 फीसदी ही मिथुन मूर्तियां हैं। पर खजुराहो के बाजार में आपको कामसूत्र से जुडी हुई सीडी, किताबें, पोस्टर और खिलौने बिकते हुए मिल जाएंगे। महर्षि वात्सायन के कामसूत्र की संक्षिप्त रंगीन पुस्तकें यहां दिन भर घूम घूम कर बेचते हुए लोग मिल जाते हैं। इन पुस्तकों को 30 से 40 रुपये मांगने के बाद महज 20 रुपये में बेच डालते हैं। इसके अलावा खजुराहो की तस्वीरों वाली अलबम और परिचयात्मक पुस्तकें भी दिखाई देती हैं।
जैन मंदिर के बाहर एक हाकर मुझे मिलता है। वह कहता है भाई कामसूत्र की सीडी ले लो। महज 120 रुपये में। मैंने कहा मुझे नहीं चाहिए। वह फिर सीडी 80 रुपये में देने को तैयार हो जाता है। वह मुझे आश्वस्त करता है कि जैसी तस्वीरें आपने यहां मंदिरों मे देखी है यह सीडी उससे आगे की है। पर साथ ही वह यह भी कहना नहीं भूलता कि ये कोई ब्लू फिल्म नहीं है। खैर मैं सीडी नहीं खरीदता। आगे कुछ लोग चाबी रिंग और छोटे छोटे सेक्स टॉय बेचते हुए मिल जाते हैं। इन खिलौनों में एक्शन दिखाई देता है। पर मैं इसे लेकर कहां दिखाउंगा। किसी को उपहार में भी तो नहीं दे सकता। मैं मना कर देता हूं। पर कुछ किताबें जरूर खरीद लेता हूं।


खजुराहो के सारे मंदिर देख लेने के बाद पश्चिम मंदिर समूह के सामने बाहर खजुराहो का संग्रहालय जरूर देखें। इस संग्रहालय में वे मूर्तियां देखी जा सकती हैं जो अलग अलग उन मंदिरों से लाई गई हैं जो मंदिर अब अपना अस्तित्व खो चुके हैं। छोटे से संग्रहालय का प्रवेश टिकट 10 रुपये का है। विदेशी नागरिकों के लिए टिकट 250 रुपये का है। इसके अंदर फोटोग्राफी की मनाही है।
शाम को लाइट एंड साउंड शो देखने के बाद खजुराहो के बाजार में पैदल घूमने निकल पडता हूं। इस बाजार में एक सुंदर का झोला पसंद आ जाता है 200 रुपये का। महिलाओं के लिए स्कर्ट, टॉप और पायजामा आदि यहां बड़े ही डिजाइनर और वाजिब दाम पर मिलते हैं। ये ज्यादातर खजुराहो के आसापास के बाजारों में बनते हैं। आप इनकी खरीददारी शौक से कर सकते हैं।

अगले दिन सुबह सुबह मार्निंग वाक पर निकलता हूं। एयरपोर्ट रोड पर पहिल वाटिका और शिल्प ग्राम दिखाई देता है। कुछ दिनों बाद ही यहां खजुराहो नृत्य महोत्सव होने वाला है। यह महोत्सव हर साल फरवरी महीने में होता है। इस दौरान खजुराहो के सारे होटल पूरी तरह भर जाते हैं। इस दौरान आना हो तो अग्रिम आरक्षण कराकर ही यहां पहुंचे। अगर आप एक दिन से ज्यादा खजुराहो में हैं तो पन्ना में हीरे की खान देखने जाने का कार्यक्रम बना सकते हैं। इसके अलावा खजुराहो के आसपास में स्नेह प्रपात, पांडव प्रपात, गंगल झील आदि स्थानों की सैर के लिए जा सकते हैं।

सुबह 9.30 बजे की ट्रेन है खजुराहो से वापसी की। उदयपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस। ट्रेन पकड़ने के लिए नास्ता छोड़ देता हूं। उदयपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस में आगरा कैंट तक आरक्षण है। ट्रेन समय पर चल पड़ती है। ट्रेन में एक रेलवे कर्मचारी मिलते हैं जो मुझे बुंदेली में गीत गाकर सुनाते हैं। उनके गीत सुनते सुनते मैं महोबा पहुंच गया हूं। यहां रेलवे स्टेशन पर अच्छी कैंटीन है। कैंटीन में 35 रुपये की ( पार्सल 45 रुपये) खाने की थाली उपलब्ध है। यहां मैं एक थाली लेकर अपनी सीट पर आ जाता हूं। देश के दो प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों खजुराहो और उदयपुर को जोडने वाली ये ट्रेन अपनी गति से कुलांचे भर रही है। हरपालपुर, झांसी, ग्वालियर जैसे स्टेशन पीछे छूटते जा रहे हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  

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खजुराहो से वापसी में लहलहाते सरसों के खेत....

Sunday, April 16, 2017

पंचायतन शैली का सुंदर नमूना विश्वनाथ मंदिर

खजुराहो के पश्चिमी मंदिर समूह के परिसर में कंदरिया महादेव  मंदिर के बाद जगदंबी मंदिर, चित्रगुप्त ( सूर्य) मंदिर, पार्वती मंदिर, विश्वनाथ मंदिर और  नंदी मंडप देखे जा सकते हैं। मैं जब पहुंचा हूं विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य चल रहा है।

विश्वनाथ मंदिर खजुराहो के शिव मंदिरों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्वनाम मंदिर का निर्माण 1002 से 1003 के दौरान यशोवर्मन के पुत्र राजा धंग के शासनकाल में हुआ। विशाल जगती पर स्थित यह मंदिर अति सुंदरों में से एक है। मंदिर की लंबाई 89 फीट और चौड़ाई 45 फीट है। पंचायतन शैली का बना हुआ यह मंदिर शिव भगवान को समर्पित है। पर इसके उपमंदिरों में दो ही शेष बचे हैं। गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना की गई है। मंदिर के ठीक समाने एक नंदी मंडप मे नंदी की विशाल प्रतिमा सुशोभित है। विश्वनाथ मंदिर में भी 600 से ज्यादा छोटी छोटी प्रतिमाएं हैं। कुछ मिथुन मूर्तियों के अलावा सुंदर अप्सराएं भी यहां उकेरी गई हैं। ये अप्सराएं अदभुत सौंदर्य बिखेरती हैं। यहां मंदिर की दीवार पर चंदेल राजा धंग का अभिलेख देखा जा सकता है। इस अभिलेख में संस्कृत की 33 पंक्तियां हैं। विश्वनाथ मंदिर के बायीं तरफ पार्वती मंदिर स्थित है।

जरूर देखें खजुराहो में ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम

अगर खजुराहो में शाम को भी मौजूद हैं तो लाइट एंड साउंड शो जरूर देखें। यह शो पश्चिमी मंदिर समूह के परिसर में ही होता है। इसका टिकट 200 रुपये का है। हर रोज दो शो होते है। पहला शो अंगरेजी का जो शाम 6.30 बजे शुरू होता है, दूसरा शो हिंदी का है जो शाम 7.30 बजे शुरू होता है। एक घंटे के इस शो का टिकट 200 रुपये का है। ध्वनि और प्रकाश के माध्यम से एक घंटे में खजुराहो शहर, चंदेल राजवंश का इतिहास, खजुराहो के मंदिरों के कला शिल्प को समेटने की खूबसूरत कोशिश की गई है इस लाइट एंड साउंड शो में।
पश्चिमी मंदिर समूह के पहला प्रवेश द्वार टिकट घर के पास है, जहां से मंदिर देखने के लिए प्रवेश करते हैं। लाइट एंड साउंड शो इससे 200 मीटर आगे के दूसरे प्रवेश द्वार के पास होता है। इसके लिए टिकट भी शाम को ही मिलते हैं। शो का स्थल शिवसागर तालाब के समाने है। शो विश्वनाथ मंदिर और नंदी मंडप के पास हरित ग्राउंड में होता है।
चौदहवीं सदी का यात्री इब्नबतूता खजुराहो का वर्णन बड़े ही रोचक ढंग से करता है। वह इस नगर को कचराद या कजुसहा लिखता है। वह लिखता है कि एक मील में फैले सरोवर के आसपास कई मंदिर हैं। हालांकि इन मंदिरों की मूर्तियों के आंख, नाक और कान मुसलमानों ने काट दिए हैं। सरोवार के चारो कोनों पर योगी लोग तपस्या करते हैं। इन योगियों के केश पैरों तक लंबे होते हैं। इनके शरीर में भभूत लगी रहती है।

इब्नबतूता लिखता है कि तपस्या के कारण उनका रंग पीला हो गया है। इन साधुओं के पीछे काफी मुसलमान भी लगे रहते हैं। क्योंकि इन साधुओं की कृपा से कुष्ठ रोग जैसी बीमारियां ठीक हो जाती हैं। इब्नबतूता के मुताबिक इन साधुओं की सेवा से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  
 ( KHAJURAHO, VISHWANATH TEMPLE, LIGHT AND SOUND SHOW )  ( Remember it's a world heritage site )





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Friday, April 14, 2017

खजुराहो का सबसे विशाल मंदिर - कंदरिया महादेव

खजुराहो के तमाम मंदिरों के बीच कंदरिया महादेव मंदिर सबसे प्रसिद्ध है, जहां कला और शिल्प का उत्कर्ष दिखाई देता है। मंदिर के गर्भ गृह में संगमरर का शिवलिंग स्थापित है। यह अपनी भव्यता और संगीतमय कलाकृतियों के लिए जाना जाता है। एकबारगी इस मंदिर को देखकर लगता है कि यह सैंडस्टोन की बना न होकर चंदन की लकड़ी की बना हुआ हो। कलात्मकता के लिहाज से पूरे देश में शायद ही कोई इतना भव्य मंदिर हो। सूरज की चमकती रोशनी में मंदिर को देखते हुए विस्मय होता है कि एक हजार से ज्यादा सालों यह अदभुत मंदिर यों खड़ा है।

कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण काल 1000 ई के बाद का है। इसकी लंबाई 102 फीट चौड़ाई 66 फीट और ऊंचाई 101 फीट है। मकर तोरण इसकी मुख्य विशेषता है। स्थानीय मत के अनुसार इसका कंदरिया नामांकरण, भगवान शिव के एक नाम कंदर्पी के नाम पर किया गया था। पर कुछ लोगों का मानना है कि इसका आकार कंदरा के समान है इसलिए इसे कंदरिया महादेव कहा जाता है। मुख्यद्वार से देखने पर यह किसी कंदरा के समान ही प्रतीत होता है। इस विशाल मंदिर का निर्माण महा प्रतापी चन्देल राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी पर अपनी विजय के बाद में कराया था। राजा गंड देव के पुत्र विद्याधर का कार्यकाल 1017 से 1029 ई के बीच रहा। उसने 1019 और 1022 में महमूद गजनी से उसने बहादुरी पूर्वक युद्ध लड़ा।

कंदरिया महादेव मंदिर पांच हिस्सों में विभाजित है। इसके गर्भगृह, अर्धमंडप, प्रदक्षिणा पथ, अंतराल और महामंडप प्रमुख हिस्से हैं।
मंदिर के दीवारों पर असंख्य मूर्तियां बनाई गई हैं। इनकी नक्काशी अत्यंत सुंदर है, जिससे नजरें नहीं हटतीं। इन्हे देखते हुए बरबस ये सवाल उठता है कि इन मूर्तियों का आखिर शिल्पकार कौन रहा होगा। इसके पीछे दर्शन किसका रहा होगा। इन्हें बनाने में कितना वक्त लगा होगा। इन मूर्तियों में देव देवियां और कामकला की भाव भंगिमाओं वाली मूर्तियां हैं।

मंदिर के संगमरमरी लिंगम के अलावा इसकी विशेषता यहां मौजूद अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन मूर्तियां हैं। इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम लिखते हैं कि खजुराहो के सभी मंदिरों की तुलना में यहां सर्वाधिक मिथुनों की आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियां और भीतर 246 आकृतियों की गिनती की थी।

अब थोड़ी बात चंदेल राजाओं की। चंदेल राजवंश के बार में कहा जाता है कि वे गोंड जनजाति से आते थे। बाद में राजा बनने पर वे राजपूत कहलाए। प्रतिहारों के पतन के बाद चंदेल राजा नौंवी शताब्दी में शासन में आए। चंदेल शासन का संस्थापक नन्नुक था। उसके बाद वाकपति, जयशक्ति, राहिल, हर्ष चंदेल आदि शासक हुए। कालिंजर का किला, महोबा, खजुराहो और अजगढ़ उनके प्रमुख शासन केंद्र थे। यशोवर्मन (925 से 950) के बाद उसका पुत्र धंगदेव (950-1000) चंदेलों का सबसे प्रतापी राजा हुआ। उसका बेटा गंड देव (1001 से 1017) हुआ। उसके बाद विद्याधर। विद्याधर के बाद चंदेलों की शक्ति घटने लगी। इसके बाद विजयपाल, देव वर्मन, कीर्तिवर्मन जैसे राजा हुए।

पश्चिमी समूह के प्रमुख मंदिर – लक्ष्मण मंदिर ( मतंगेश्वर मंदिर के बगल में), वराह मंदिर, कंदरिया महादेव मंदिर, जगदंबी मंदिर, चित्रगुप्त ( सूर्य) मंदिर, पार्वती मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, नंदी मंडप।


खजुराहो में जो 25 मंदिर बचे हुए हैं उसमें कंदरिया महादेव मंदिर सबसे ज्यादा देखा जाने वाला मंदिर है। हर रोज दिन भर सैकड़ों की संख्या में देशी और विदेशी सैलानी इस मंदिर को निहारते हुए पाए जाते हैं। 
- vidyutp@gmail.com
 ( KHAJURAHO, KANDARIA MAHADEV TEMPLE, SEX EDUCATION, CHANDELA KING VIDYADHAR ) 

Wednesday, April 12, 2017

सोलह हजार शिल्पकारों ने मिलकर बनाया खजुराहो का लक्ष्मण मंदिर

LAXMAN TEMPLE, KHAJURAHO
दोपहर के भोजन के बाद हम पहुंच गए हैं खजुराहो के मुख्य दर्शनीय स्थल यानी पश्चिम मंदिर समूह में। खजुराहो में पश्चिम मंदिर समूह ही एक मात्र मंदिर कांप्लेक्स है जहां प्रवेश के लिए टिकट है। वैसे यहां के सभी मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित हैं, पर टिकट सिर्फ पश्चिमी मंदिर समूह के लिए लगता है। मुख्य बाजार में यह मंदिर समूह शिव सागर और सागर तालाब के बीच स्थित है। प्रवेश के लिए टिकट काउंटर मतंगेश्वर मंदिर के बगल में है। भारतीय नागरिकों के लिए 30 रुपये का प्रवेश टिकट है। कैमरे के लिए कोई फीस नहीं है। हां अगर अधिकृत गाइड लेना चाहें तो ले सकते हैं।
LAXMAN TEMPLE, KHAJURAHO

इस मंदिर समूह में लक्ष्मण मंदिर, कंदरिया महादेव मंदिर, वराह मंदिर, जगदंबा मंदिर, महादेव मंदिर आदि प्रमुख आकर्षण है। ये सारे मंदिर विशाल हरित क्षेत्र में फैले हुए हैं। अंदर सुंदर पथ बना है। पेयजल और शौचालय आदि का भी बेहतर इंतजाम है।

मथुरा से आए शिल्पियों ने तराशा विष्णु का मंदिर-  पश्चिम मंदिर समूह में प्रवेश द्वार से अंदर जाने पर पहला मंदिर आता है लक्ष्मण मंदिर। यह मंदिर परिसर के बाहर स्थित मतंगेश्वर मंदिर से बिल्कुल लगा हुआ है। भगवान विष्णु का यह मंदिर 937 ई का बना हुआ बताया जाता है। यह मंदिर पंचरथ शैली में बना हुआ है। इसे चंदेल राजा यशोवर्मन ने बनवाया था। यह मंदिर पंचायत शैली का बेहतरीन नमूना है। राजा यशोवर्मन ने अपने पिता हर्षवर्मन द्वारा कन्नौज के राजा महिपाल को पराजित करने के बाद यहां भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कराई। इस मंदिर का निर्माण 930 ई में आरंभ हुआ। दरअसल यशोवर्मन को लक्ष्मण वर्मन के नाम से भी जाना जाता था। इसलिए इस मंदिर का नाम लक्ष्मण मंदिर पड़ गया। इस मंदिर के निर्माण के लिए मथुरा से 16 हजार शिल्पकारों को बुलवाया। यह सात साल की अवधि में पूरा हुआ।
LAXMAN TEMPLE, KHAJURAHO


अत्यंत शानदार कलाकृतियों से सुसज्जित यह मंदिर आज भी दुनिया भर से आने वाले सैलानियों और कला पारखियों को चकित कर देता है। इस मंदिर के चारों कोनो पर एक एक उप मंदिर भी बना है। बीच में प्रमुख मंदिर होने के कारण इसे पंचायत शैली का मंदिर कहते हैं। मंदिर का जगत 98 फीट लंबा और 45 फीट चौड़ा है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर के महामंडप के स्तंभों पर अप्सराओं के सुंदर चित्र बनाए गए हैं। मंदिर की दीवारों पर शिकार के नजारे, युद्ध के नजारे, पैदल सैनिकों के जुलूस, हाथी, घोड़ा आदि उकेरे गए हैं। लक्ष्मण मंदिर में कुछ दृश्य प्रेमालाप के भी हैं। मंदिर की दीवारों पर प्रतिमाओं की दो पंक्तियां हैं। इस मंदिर में कई मिथुन प्रतिमाएं भी हैं। मुख्य मंदिर के द्वार पर रथ पर सवार सूर्यदेव की सुंदर प्रतिमा है।
VARAH TEMPLE, KHAJURAHO

वराह मंदिर – लक्ष्मण मंदिर केठीक सामने वराह मंदिर स्थित है। छोटे से मंदिर में वराह की विशाल प्रतिमा है। वराह के शरीर पर छोटी छोटी कई हजार देवताओं की आकृतियां बनी हुई हैं। वराह का मुख लक्ष्मण मंदिर की ओर है। यह मंदिर विन्यास में आयताकार है और इसकी छत पिरामिडनुमा है। बलुआ पत्थर से निर्मित इस मंदिर का निर्माण 900 से 925 ई के बीच में किया गया है।

( WESTERN GROUP OF TEMPLES, KHAJURAHO, LAKSHMAN MANDIR, VARAH MANDIR )
LAXMAN TEMPLE, KHAJURAHO