Friday, March 31, 2017

वत्स, जेजाभुक्ति और फिर खजुराहो

सुबह की रोशनी में खजुराहो का रेलवे स्टेशन खूब दमक रहा है। मेरी तरह यहां रेल से जितने लोग उतरे हैं तकरीबन सभी लोग सैलानी हैं जो खजुराहो घूमने आए हैं। बाहर जाने पर मिनी  बस और टुकटुक की भीड़ है। कुछ टैक्सी वाले छतरपुर के लिए आवाज लगा रहे हैं। खजुराहो छतरपुर जिले में आता है। और यहां जिला मुख्यालय छतरपुर 50 किलोमीटर है। मैं एक आटो वाले बात करता हूं खजुराहो बाजार चलने के लिए वे मुझसे 30 रुपये मांगते हैं। मैं बैठ जाता हूं। रेलवे स्टेशन से खजुराहो बाजार के लिए आटो का रिजर्व किराया 100 रुपये है। दूरी 8 किलोमीटर है। आटो में पहले से दो सवारियां हैं इसलिए मामला साझेदारी में निपट गया।  आटो वाले का नाम राकेश है। उनका मोबाइल नंबर 9993924207 है। आप कभी खजुराहो जाएं तो उन्हें याद कर सकते हैं। उनके साथ घूमते हुए खुशी होगी।
राकेश पहले से बैठे दोनों यात्रियों को एयरपोर्ट रोड पर एक होटल में उतार देते हैं, उसके बाद मुझे पहुंचाते हैं मेरी मंजिल योगी लॉज। राकेश जाते हुए अपना नंबर दे जाते हैं कि अगर खुजाराहो घूमना हो तो मुझे याद करें। चार घंटे 400 रुपये का पैकेज है। थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें याद किया। चार घंटे क्या वे मुझे छह घंटे घुमाते रहे। पर जो तय था वही राशि ली।

अब बात योगी लॉज की। वैसे तो खजुराहो में रहने के लिए 135 होटल हैं फाइव स्टार से लेकर गेस्ट हाउस और होमस्टे तक। पर योगी लॉज की लोकेशन सबसे बेहतर है। यह खजुराहो के प्रमुख दर्शनीय स्थल पश्चिमी मंदिर समूह के बिल्कुल पास है। यहीं पर खजुराहो का पुरातत्व संग्रहालय, सागर और शिवसागर झीलें और प्रमुख बाजार, खाने पीने के रेस्टोरेंट आदि सब कुछ हैं। इसलिए वाहन विहीन लोगों के रहने के लिए मुफीद जगह है। योगी लाज में अकेले व्यक्ति के लिए कमरा 400 रुपये में उपलब्ध है। डबलबेड रूम 500 रुपये का है। हालांकि मुझे गो आईबीबो डाट काम पर यह अत्यंत रियायती दर पर पड़ा था।


 योगी लाज में 23 कमरे हैं और इसकी संरचना किसी आंगन वाले घर जैसी है। छत पर एक रेस्टोरेंट भी है। रुम सर्विस काफी अच्छी है। आप परिवार के साथ यहां वक्त गुजार सकते हैं। लॉज के बाहर एक पुराना कुआं है। इसमें पानी की मोटर लगी है। बाहर किसी कस्बे सा लुक नजर आता है। पेड़ के नीचे कुरसी पर बैठकर सुबह का अखबार पढ़ना । योगी लॉज में रोज कुछ विदेशी मेहमान होते हैं। सुबह सुबह एक विदेशी बाला धूप में बैठकर डायरी लिखती नजर आई।

खजुराहो प्राचीन काल में वत्स नाम से मध्यकाल में जेजाभुक्ति के नाम से जाना जाता था। 14वीं सदी के बाद इसे बुंदेलखंड के नाम से जाना गया। कहा जाता है कि खजूर के पेड़ों की अधिकता के कारण इसका नाम खजुराहो पड़ा। 641 ई में ह्वेनसांग इस इलाके में आया था। उसने इस क्षेत्र का नाम जझोति बताया है। मोहम्मद गजनवी के साथ आए इतिहासकार अबू रेहन (1022ई) ने इस इलाके का नाम जैजाभुक्ति बताया है। वहीं 1455 में आए इब्न बतूता ने इसका नाम कजूरा (खजुराहो) बताया है।
 दसवीं सदी के बाद यहां चंदेल वंश का उत्थान हुआ। चंदेलों की राजधानी, राजमहल, तालाब और मंदिरों से परिपूर्ण थी। चंदेल शासकों ने खजुराहो में अत्यंत कलात्मक मंदिरों का निर्माण कराया। 
कहा जाता है कि खजुराहो में कुल 85 मंदिर थे। पर अब केवल 25 मंदिर बचे हैं। कई शताब्दी तक ये मंदिर लोगों की नजरों से ओझल रहे। पर जब इन्हें तलाशा गया तो पूरी दुनिया में इनकी चर्चा होने लगी। वर्ष 1986 में खजुराहो के मंदिरों को यूनेस्को ने विश्व विरासत की सूची में शामिल किया। पूरी दुनिया में अपनी कलात्मकता के अलावा मंदिरों में चित्रित कामकला के भाव भंगिमाओं की मूर्तियों के कारण खजुराहो को देखने पूरी दुनिया से लोग खींचे चले आते हैं।

कैसे घूमें – खजुराहो शहर का विस्तार छह वर्ग किलोमीटर में है। खजुराहो के इन मंदिरों को शहर में तीन हिस्सों में बांट कर घूमा जा सकता है। इनमें सबसे प्रमुख पश्चिमी मंदिर समूह है। जिसमें प्रवेश के लिए 30 रुपये का टिकट है। इसके अलावा कुछ मंदिर पूर्वी समूह में और कुछ दक्षिण समूह में विभाजित हैं। खजुराहो की आबोहवा इतनी अच्छी है कि आप यहां एक से ज्यादा दिन रहने का कार्यक्रम बना सकते हैं। यहीं रहते हुए आप पन्ना नेशनल पार्क और आसपास के झरनों की सैर कर सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( KHAJURAHO, MP, TEMPLES, RAKESH, AUTORIKSHAW, KHAJURAHO -  9993924207 )

  

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