Friday, March 3, 2017

आओ मेरे घनश्याम राजा हो...

जोधपुर में सुबह सुबह की वेला है। सराफा बाजार के चौराहे पर चहल पहल है। चौपाल के आसपास कई मंदिर हैं। पर इन सबके बीच प्रमुख है घनश्याम जी का मंदिर। इस विशाल मंदिर के प्रवेश द्वार से अंदर जाता हूं। लंबे गलियारे के बाद गर्भ गृह में पहुंचने पर लोग तालियां बजाबजा कर भजन गाने में मस्त हैं। प्रमुख गायक के गले में माला है और वे गाए जा रहे हैं - आओ मेरे घनश्याम राजा हो...आओ दर्शन दे जाओ मेरे घनश्याम राजा हो...धनश्याम राजा हो... मैं गीत की मधुरता में खो जाता हूं। कई मिनट तक गीत में खोया रहता हूं। मंदिर में मौजूद सारे भक्तों पर एक खास किस्म की मस्ती सवार है। कान्हा जी का दरबार अति सुंदर सजा हुआ है। पुजारी जी भी पूरे मस्ती के धुन में झूमते हुए भक्तों को प्रसाद और चरणामृत परोस रहे हैं। एक भजन खत्म होने के बाद कृष्ण भक्त दूसरा भजन गाने लगते हैं। मैं पूरे मंदिर की परिक्रमा करता हूं।


महाराजा अजीत सिंह ने बनवाया घनश्याम मंदिर
पुराने जोधपुर शहर के हृदय स्थली में स्थित है घनश्याम जी का मंदिर। इस विशाल मंदिर का निर्माण मारवाड़ शासक महाराजा अजीत सिंह ने करवाया था। वे बड़े ही कला प्रेमी और साहित्य प्रेमी राजा थे। उन्होंने अजित चरित्र,  गुण सागर और निर्वाण गुहा जैसे ग्रंथों की भी रचना की। उन्होंने जोधपुर में फतहमहल और घनश्याम जी का मंदिर बनाया।
महाराजा अजीत सिंह का शासन काल 1678 से 1724 के दौरान रहा। वे जसवंत सिंह के बाद मारवाड़ शासक बने। अजीत सिंह औरंगजेब के समकालीन थे। साल 1724 में अजीत सिंह की हत्या उनके ही बेटे बखत सिंह ने कर दी। राजपूत परंपरा के मुताबिक अजीत सिंह के साथ उनकी छह रानियां, 25 रखैलें और 32 दासियां ने भी अग्नि में प्राण त्याग दिए। कहा जाता है कि तीन पुरुष सलाहकारों ने भी जान दे दी। घनश्याम मंदिर के बगल में एक अति सुंदर दिगंबर जैन मंदिर भी है। यह इलाका महावीर पोल कहलाता है। यहां टैक्सी स्टैंड है जहां से आप शहर में कहीं भी जा सकते हैं।

बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सन 1685 में किया गया था ये मंदिर जोधपुर शहर के एक दम बीच में बना हुआ है। यह इलाका जुनी मंडी के नाम से जाना जाता है। यहां चांदी के पालकी पर कान्हा जी विराजमान हैं। मंदिर में कान्हा जी की मूर्ति का श्रंगार अदभुत है। हर रोज प्रतिमा का फूलों से नए कलेवर में श्रंगार किया जाता है। मंदिर के गर्भ गृह पर उपर लिखा है – जय श्याम री सा... मंदिर में कान्हा जी की पूजा घनश्याम राजा के तौर पर होती है। प्रांगण में विष्णुप्रिया तुलसी विराजती हैं, मंदिर की दीवारों पर धार्मिक कथाओं को चित्रों में प्रदर्शित किया गया है। मंदिर के गर्भ गृह में दीवारों पर मंदिर की छत पर सुंदर पेंटिंग बनी हैं। बाहर से मंदिर सफेद रंग का है। मंदिर के मुख्य द्वार के बाग विशाल आंगन है। इस आंगन में पक्षी दाना चुगते नजर आते हैं। यहां पर आप पक्षियों को दाना डालने के लिए अनाज खरीद सकते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार का नाम अजीत द्वार है। इस द्वार का निर्माण 1718 में हुआ था। बाद में 1964 में इसे नया रूप दिया गया। राजकीय महत्व के इस मंदिर का प्रबंधन राजस्थान सरकार का देवस्थान विभाग देखता है।

खुलने का समय - मंदिर प्रातः 5 बजे खुलता है और रात्रि 10 बजे बंद हो जाता है। दोपहर 12.30 से शाम 5 बजे तक मंदिर बंद रहता है। सेवा और पूजा वैष्णव पद्धति से की जाती है।  

इस मंदिर के बारे में ये मान्यता है की जो कोई सच्चे दिल से मांगता है श्री श्याम जी उसको पूरा कर देते हैं। इसलिए रोज हजारो की संख्या में यहां श्रद्धालु आते है और यहां दर्शन कर अपना जीवन धन्य बनाते हैं। पूरा मंदिर सुरुचि पूर्ण ढंग से सजा है। यहां भक्त गण हर रोज सुबह शाम यूं ही मस्ती में प्रार्थना में डूबे रहते हैं। मंदिर कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। वहीं घनश्याम मंदिर की होली भी काफी प्रसिद्ध है। भक्त लोग कान्हा जी के सामने रंग भरी होली खेलते हैं।  
-        - विद्युत प्रकाश मौर्य

(GHANSHYAM TEMPLE, AJIT SINGH, KRISHNA, JODHPUR, RELIGION ) 

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