Tuesday, March 7, 2017

मेहरानगढ़ किला - राजसी ऐश्वर्य का उत्कर्ष

मेहरानगढ- केसरिया बालम नी आओ पधारो म्हारो देस....
राजस्थान के सबसे शानदार किलों में से एक मेहरानगढ़ का किला पन्द्रहवी शताब्दी का बना हुआ है। यह विशाल किला तकरीबन 125 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है इसलिए जोधपुर शहर  कहीं से भी नजर आता है। किले में अनगिनत बुर्ज हैं। यह किला दस किलोमीटर लंबी ऊंची दीवार से घिरा है। इस किले में बाहर से नजर न आने वाले कुल चार द्वार हैं जो घुमावदार सड़कों से होकर आपको ले जाते हैं। किले के अंदर कई भव्य महल हैं। इन महलो में अद्भुत नक्काशी वाले विशालकाय दरवाजे जालीदार खिड़कियां देखी जा सकती हैं। इनमें से मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना, दौलत खाना आदि देखने लायक हैं। इन महलों में भारतीय राजाओं के ऐश्वर्य का शानदार झांकी देखी जा सकती है। ये झांकियां आपको एकबारगी विस्मित कर देती हैं।
इसके अतिरिक्त किले में दर्जनों किस्म की पालकियां देखी जा सकती है। राजा के लिए हाथियों पर लगाए जाने वाले हौदों को विशाल संग्रह है। इन्हें देखते हुए प्रतीत होता है कि किले के लिए खरीदे गए टिकट का मूल्य सार्थक हो गया। प्रवेश द्वार पर हमें एक संगमरर का सिंहाशन नजर आता है। यहां हर राजा का ताजपोशी इसी सिंहाशन पर होती है। अगर आप पेंटिंग में शौक रखते हैं तो विभिन्न शैलियों के लघु चित्रों का संग्रह भी यहां देख सकते हैं।  किले में तमाम किस्म के वाद्य् यंत्रों और पोशाकों का भी सुंदर संग्रह है।

किले में जब आप मोती महल और फूल महल के इलाके में पहुंचते हैं तो राजघाने का ऐश्वर्य देखकर आंखे चौंधिया जाती हैं। मेहरानगढ़ का यह किला के देश के प्राचीनतम किलों में से एक है जो भारत के समृद्ध अतीत की कहानी सुना रहा है। किले में तैनात स्टाफ भी राजसी पोशाक में नजर आते हैं। कंटीली मूंछे और विशाल साफा उनकी पहचान है।
राव जोधा जिनके नाम पर जोधपुर शहर का नाम पड़ा वे जोधपुर के राजा रणमल की 24 संतानों मे से एक थे। वे जोधपुर के पंद्रहवें शासक बने। उनसे पहले जोधपुर का शासन मंडोर के किले से चलता था। शासन की बागडोर सम्भालने के एक साल बाद राव जोधा को लगने लगा का मंडोर का किला सुरक्षित नहीं है। उन्होंने अपने इस किले से नौ किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर नया किला बनाने का विचार किया।
इस पहाड़ी को तब भोर चिड़िया के नाम से लोग जानते थे। क्योंकि वहां तब बड़ी संख्या में पक्षी निवास करते थे।  राव जोधा ने 12 मई 1459  में इस पहाड़ी पर किले का निर्माण शुरू कराया। यह किला महाराज जसवंत सिंह (1638-1678) के कार्यकाल में पूरा हो सका। पहले इस किले में कुल सात दरवाजे थे। बाद में राजा अजीत सिंह ने फतेह पोल का निर्माण अपनी मुगलों पर जीत के याद में कराया। किले के पहेल द्वार पर हाथियों के हमले से बचाव के लिए नुकीली कीलें लगाई गई हैं। जयपोल द्वार का निर्माण 1806 में महाराज मान सिंह ने अपनी जयपुर और बीकानेर पर विजय जीत की खुशी में कराया।


किले से बाहर निकलने के द्वार पर किले के स्मृति चिन्हों की दुकान है। यहां पर जोधपुर पोलो क्लब की टी शर्ट यादगारी के तौर पर खरीदी जा सकती है। इसके अलावा गहने और पेंटिंग आदि खरीद सकते हैं। जोधपुर जूतियों और चप्पलों का भी संग्रह यहां देखा जा सकता है। यहां से बाहर निकलने पर आप किले के प्राचीर पर दर्जनों तोपों का संग्रह देख सकते हैं जो कभी आग उगला करते होंगे। किले में चलते हुए रंग बिरंगी कठपुतलियों की भी दुकानें देखी जा सकती हैं।  
- vidyutp@gmail.com

मेहरानगढ़ के किले में देख सकते हैं दर्जनों तोपें... जो कभी आग उगलती थीं...
चलो टैटू बनवाते हैं....मेहरानगढ़ के किले में....
(MEHRANGARH FORT, JODHPUR, RAJSTHAN, MOTI MAHAL, PHOOL MAHAL )  
मेहरानगढ़ के किले मे कठपुतलियों की सजी दुकानें.....


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