Friday, March 31, 2017

वत्स, जेजाभुक्ति और फिर खजुराहो

सुबह की रोशनी में खजुराहो का रेलवे स्टेशन खूब दमक रहा है। मेरी तरह यहां रेल से जितने लोग उतरे हैं तकरीबन सभी लोग सैलानी हैं जो खजुराहो घूमने आए हैं। बाहर जाने पर मिनी  बस और टुकटुक की भीड़ है। कुछ टैक्सी वाले छतरपुर के लिए आवाज लगा रहे हैं। खजुराहो छतरपुर जिले में आता है। और यहां जिला मुख्यालय छतरपुर 50 किलोमीटर है। मैं एक आटो वाले बात करता हूं खजुराहो बाजार चलने के लिए वे मुझसे 30 रुपये मांगते हैं। मैं बैठ जाता हूं। रेलवे स्टेशन से खजुराहो बाजार के लिए आटो का रिजर्व किराया 100 रुपये है। दूरी 8 किलोमीटर है। आटो में पहले से दो सवारियां हैं इसलिए मामला साझेदारी में निपट गया।  आटो वाले का नाम राकेश है। उनका मोबाइल नंबर 9993924207 है। आप कभी खजुराहो जाएं तो उन्हें याद कर सकते हैं। उनके साथ घूमते हुए खुशी होगी।
राकेश पहले से बैठे दोनों यात्रियों को एयरपोर्ट रोड पर एक होटल में उतार देते हैं, उसके बाद मुझे पहुंचाते हैं मेरी मंजिल योगी लॉज। राकेश जाते हुए अपना नंबर दे जाते हैं कि अगर खुजाराहो घूमना हो तो मुझे याद करें। चार घंटे 400 रुपये का पैकेज है। थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें याद किया। चार घंटे क्या वे मुझे छह घंटे घुमाते रहे। पर जो तय था वही राशि ली।

अब बात योगी लॉज की। वैसे तो खजुराहो में रहने के लिए 135 होटल हैं फाइव स्टार से लेकर गेस्ट हाउस और होमस्टे तक। पर योगी लॉज की लोकेशन सबसे बेहतर है। यह खजुराहो के प्रमुख दर्शनीय स्थल पश्चिमी मंदिर समूह के बिल्कुल पास है। यहीं पर खजुराहो का पुरातत्व संग्रहालय, सागर और शिवसागर झीलें और प्रमुख बाजार, खाने पीने के रेस्टोरेंट आदि सब कुछ हैं। इसलिए वाहन विहीन लोगों के रहने के लिए मुफीद जगह है। योगी लाज में अकेले व्यक्ति के लिए कमरा 400 रुपये में उपलब्ध है। डबलबेड रूम 500 रुपये का है। हालांकि मुझे गो आईबीबो डाट काम पर यह अत्यंत रियायती दर पर पड़ा था।


 योगी लाज में 23 कमरे हैं और इसकी संरचना किसी आंगन वाले घर जैसी है। छत पर एक रेस्टोरेंट भी है। रुम सर्विस काफी अच्छी है। आप परिवार के साथ यहां वक्त गुजार सकते हैं। लॉज के बाहर एक पुराना कुआं है। इसमें पानी की मोटर लगी है। बाहर किसी कस्बे सा लुक नजर आता है। पेड़ के नीचे कुरसी पर बैठकर सुबह का अखबार पढ़ना । योगी लॉज में रोज कुछ विदेशी मेहमान होते हैं। सुबह सुबह एक विदेशी बाला धूप में बैठकर डायरी लिखती नजर आई।

खजुराहो प्राचीन काल में वत्स नाम से मध्यकाल में जेजाभुक्ति के नाम से जाना जाता था। 14वीं सदी के बाद इसे बुंदेलखंड के नाम से जाना गया। कहा जाता है कि खजूर के पेड़ों की अधिकता के कारण इसका नाम खजुराहो पड़ा। 641 ई में ह्वेनसांग इस इलाके में आया था। उसने इस क्षेत्र का नाम जझोति बताया है। मोहम्मद गजनवी के साथ आए इतिहासकार अबू रेहन (1022ई) ने इस इलाके का नाम जैजाभुक्ति बताया है। वहीं 1455 में आए इब्न बतूता ने इसका नाम कजूरा (खजुराहो) बताया है।
 दसवीं सदी के बाद यहां चंदेल वंश का उत्थान हुआ। चंदेलों की राजधानी, राजमहल, तालाब और मंदिरों से परिपूर्ण थी। चंदेल शासकों ने खजुराहो में अत्यंत कलात्मक मंदिरों का निर्माण कराया। 
कहा जाता है कि खजुराहो में कुल 85 मंदिर थे। पर अब केवल 25 मंदिर बचे हैं। कई शताब्दी तक ये मंदिर लोगों की नजरों से ओझल रहे। पर जब इन्हें तलाशा गया तो पूरी दुनिया में इनकी चर्चा होने लगी। वर्ष 1986 में खजुराहो के मंदिरों को यूनेस्को ने विश्व विरासत की सूची में शामिल किया। पूरी दुनिया में अपनी कलात्मकता के अलावा मंदिरों में चित्रित कामकला के भाव भंगिमाओं की मूर्तियों के कारण खजुराहो को देखने पूरी दुनिया से लोग खींचे चले आते हैं।

कैसे घूमें – खजुराहो शहर का विस्तार छह वर्ग किलोमीटर में है। खजुराहो के इन मंदिरों को शहर में तीन हिस्सों में बांट कर घूमा जा सकता है। इनमें सबसे प्रमुख पश्चिमी मंदिर समूह है। जिसमें प्रवेश के लिए 30 रुपये का टिकट है। इसके अलावा कुछ मंदिर पूर्वी समूह में और कुछ दक्षिण समूह में विभाजित हैं। खजुराहो की आबोहवा इतनी अच्छी है कि आप यहां एक से ज्यादा दिन रहने का कार्यक्रम बना सकते हैं। यहीं रहते हुए आप पन्ना नेशनल पार्क और आसपास के झरनों की सैर कर सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( KHAJURAHO, MP, TEMPLES, RAKESH, AUTORIKSHAW, KHAJURAHO -  9993924207 )

  

Wednesday, March 29, 2017

महोबा से खजुराहो, उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति से

खजुराहो की एक सुबह ( 09 फरवरी 2017 ) 
महोबा रेलवे स्टेशन से ट्रेन खजुराहो की ओर सरपट भागी जा रही है। सुबह का उजाला हो चुका है। दोनों तरफ खेतों में दूर दूर तक सरसों झूम रही है। दिल्ली से खजुराहो के लिए रोज एक ट्रेन जाती है। उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (12448) 5.20 में खजुराहो से खुलने के लिए नीयत है। पर आज थोड़ी देर से चल रही है। ट्रेन सुबह साढ़े सात बजे खजुराहो पहुंचा देती है। इसके अलावा एक और एक्सप्रेस ट्रेन रोज खजुराहो आती है। उदयपुर खजुराहो इंटरसिटी एक्सप्रेस (19666) यह शाम को 6.05 बजे खजुराहो पहुंचती है। 
महोबा से खजुराहो की दूरी 63 किलोमीटर है। साल 2008 में रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में विश्व भर में चर्चित पर्यटक स्थल खजुराहो रेल नेटवर्क से जुड़ा। अभी यहां दिल्ली, झांसी, उदयपुर कानपुर आदि शहरों से सीधी रेल सेवा है। पर साफ सुथरे शानदार खजुराहो रेलवे स्टेशन पर बहुत कम रेलगाड़ियां ही पहुंचती है। मैं उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति में झांसी से बैठा हूं। महोबा में ये ट्रेन दो हिस्सों में बंट जाती है। एक हिस्सा बांदा चला जाता है तो दूसरा खजुराहो। महोबा से खजुराहो के बीच कुल पांच छोटे छोटे रेलवे स्टेशन आते हैं। चिथारी, राघौली, सिंहपुर डुमरा, राजनगर और इसके बाद खजुराहो। पर एक्सप्रेस ट्रेनें इन स्टेशनों पर नहीं रुकतीं। महोबा उत्तर प्रदेश में है और खजुराहो मध्य प्रदेश में। पर दोनों ऐतिहासिक तौर पर बुंदलेखंड के हिस्सा हैं। 

अब यहां लोग खजुराहो से मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लिए सीधी ट्रेन की मांग कर रहे हैं। खजुराहो से एक रेलवे लाइन टीकमगढ़ होते हुए ललितपुर तक के लिए बन चुकी है। इस लाइन से भी हर रोज झांसी तक के लिए एक पैसेंजर ट्रेन चलती है।

खजुराहो रेलवे स्टेशन (KURJ) के आसपास अभी कोई बाजार नहीं है। यहां रेल आने पर बाहर आटो रिक्शा, टुकटुक टैक्सी आदि मिलती हैं। रेलवे स्टेशन से खजुराहो मुख्य बाजार 8 किलोमीटर की दूरी पर है। वहीं रेलवे स्टेशन से आपको छतरपुर के लिए भी शेयरिंग टैक्सियां मिलती हैं। खजुराहो के साफ सुथरे रेलवे स्टेशन पर एक छोटी सी खाने पीने की दुकान है जहां आपको चाय समोसा बिस्कुट आदि मिल जाते हैं। कोई कैंटीन नहीं है। रिटायरिंग रूम हैं पर यहां रहने का कोई फायदा नहीं है।

रेल के अलावा खजुराहो आप हवाई सेवा और बस से भी पहुंच सकते हैं। दिल्ली से खजुराहो के लिए रोज विमान सेवा है। दोपहर में विमान यहां पहुंचते हैं। एयरपोर्ट बिल्कुल बाजार के पास है। एयरपोर्ट के पास कई मिडिल क्लास और महंगे होटल भी हैं। अगर आप सड़क मार्ग से खजुराहो पहुंचना चाहते हैं तो ग्वालियर, झांसी, हरपालपुर, महोबा और छतरपुर से सीधी बसें मिल सकती हैं। खजुराहो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में आता है। यह चर्चा कर देना भी लाजिमी होगा कि चंदेल काल में बने भव्य मंदिरों के लिए खजुराहो विश्व विरासत स्थलों में शामिल किया गया है। देश का ऐसा शहर है जहां सालों भर सैलानियों की आमद होती है। सैलानियों के स्वागत के लिए यहां समान्य से लेकर लग्जरी तक कुल 135 होटल बने हुए हैं।  

-     ---- विद्युत प्रकाश मौर्य
( (KHAJURAHO, WORLD HERITAGE SITE, RAIL, TEMPLE) 
बुंदेलखंड में पीला सोना उगलते खेत....

Tuesday, March 28, 2017

जौरा में 88 साल के नौजवान का जन्मदिन

कई बार जौरा जा चुका हूं। पर एक बार फिर जा रहा हूं। 7 फरवरी 2017 की सुबह है। निजामुद्दीन से ताज एक्सप्रेस में सवार हुआ। ट्रेन नियत समय पर मुरैना पहुंची। उपरिपुल से चलकर स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार से बाहर आया। यहां से बैटरी रिक्शा से मुरैना बस स्टैंड। चौराहे से सबलगढ़ की ओर जाने वाली बस में बैठ जाता हूं। कंडक्टर को गर्व से कहता हूं कि जौरा का एक टिकट। बस आधी दूरी चलने के बाद खराब हो जाती है। उसका इंजन गर्म हो गया। थोड़ी देर इंतजार के बाद दूसरी बस आई। इसमें खूब भीड़ थी। पर क्या पहुंचना है जौरा। 20 मिनट के सफर के बाद हम जौरा बाजार में थे। वहां से हास्पीटल रोड होते हुए पहुंच गया महात्मा गांधी सेवा आश्रम । देश भर से 200 से ज्यादा गांधीवादी सर्वोदयी और युवा कार्यकर्ता पहुंचे हुए थे। मंच पर विराजमान थे 88 साल के नौजवान एसएन सुब्बराव। उनका जन्मदिन है आज। वे अपना जन्मदिन मनाना पसंद नहीं करते। पर उनके हजारों चाहने वाले माने तब न।

इस बार उन्हे खास तौर पर बधाई देने पहुंचे हैं मैग्सेसे अवार्ड विजेता जल पुरुष राजेंद्र सिंह जो खुद को सुब्बराव जी का शिष्य मानते हैं। पूर्व विधायक डाक्टर सुनीलम। एकता परिषद के प्रमुख पी वी राजगोपाल जी। गुडगांव के काइट्स इंस्टीट्यूट के निदेशक डाक्टर कामरा और उनका पूरा परिवार। पूरे आयोजन का इंतजाम देख रहे हैं डाक्टर रण सिंह परमार और जौरा के स्थानीय लोग। 


पीवी राजगोपाल जी के साथ 
डाक्टर राजगोपाल कई साल तक महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा में सचिव के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। पर इस आश्रम परिसर में मेरी उनसे पहली मुलाकात हो रही है। महाराष्ट्र से नरेंद्र भाई, इंदौर से महेंद्र नागर, ओडिशा से मधुसूदन दास, हरियाणा से सुरेश राठी जैसे तमाम पुराने कार्यकर्ता पधारे हैं। मंच संचालन कर रहे हैं लखनऊ से हमारे अजय पांडे भैया। बधाई  देने का सिलसिला जारी है। राज्यवार लोग मंच पर पहुंच रहे हैं। बधाई दे रहे हैं अपने प्यारे भाईजी को आशीर्वाद ले रहे हैं।

कैलाश पाराशर जी के साथ 
 मैं दिल्ली की मंडली में मंच पर पहुंचता हूं। हमारे साथ संजय राय, डीएस लमकोटी जी हैं। भाईजी बड़े प्यार से पूछते हैं – विद्युत भाई आप भी आ गए। मैं जो माला उनके गले में डालता हूं, वापस निकाल कर मेरे गले में डाल देते हैं। इतना स्नेह। धन्य हो गया मैं। असम से 20 लोगों का दल चल कर आया है। बेंगलुरु से सुब्बरावजी की भांजी रंजनी जायस भी आई हैं। उनसे मैं जनवरी 1992 में बेंगलुरु शिविर में मिला था। घर से निकला था उम्मीद नहीं थी कि इतने सारे पुराने दोस्तों से मुलाकात हो जाएगी।
प्रफुल्ल भाई के साथ कई साल बाद
 भाई प्रफुल्ल श्रीवास्तव तो जौरा आश्रम में ही सालों से रहने लगे हैं। उनसे भी कई साल बाद मिलना हुआ। मंतराम निषाद से 22 साल बाद तो ग्वालियर वाले राजेंद्र सिंह से 23 साल बाद मिलना हुआ। सदभावना रेल यात्रा के दौर के कई पुराने साथी मिले। वक्त ने सबको बदल दिया है पर प्रेम और स्नेह दिल में जगह पहले की तरह बनी हुई है। श्योपुर वाले जय सिंह जादोन और कैलाश पराशर जी कहते हैं कि हमारे साथ श्योपुर चलो। दोपहर के भोज में हजारों लोग शामिल हुआ। आज का खाना सबसे अच्छा कहकर खाया। एक दूसरे को खिलाया।

और मंतराम निषाद भाई 20 साल बाद मिले 
 शाम की सर्वधर्म प्रार्थना से पहले सुब्बराव जी की कुटिया में हूं। कानपुर वाली मनोरमा बहन साथ हैं। वे भाईजी को जन्मदिन पर कुछ सौ रुपये देकर कहती हैं कि इसे मेरी ओर से रखें पर इस धन को संस्था के फंड में डालें अपनी जेब खर्च के लिए रखें।
जौरा आश्रम के बीचोंबीच चंबल घाटी में 1974-1976 में हुए बागियों के सरेंडर की याद में सुंदर संग्रहालय का निर्माण कार्य जारी है। देश भर से आए युवा उसमें अपनी ओर से दान दे रहे हैं। अगली बार आने पर यहां एक सुंदर संग्रहालय देखने को मिलेगा। 
आश्रम में दोपहर का भोज भी। 


मैं सुब्बराव जी विदा लेकर निकलना चाहता हूं। तभी उनके मोबाइल पर अन्ना हजारे का फोन आता है। वे उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं। शाम की सर्वधर्म प्रार्थना में सुब्बराव जी तुकड़ो जी महाराज का प्रसिद्ध भजन गाते हैं - आया हूं दरबार तिहारे .... बहुत जनम का भूला भटका...लगवाले प्रभु चरण तिहारे ....  (लिंक पर क्लिक करें यूट्यूब पर सुनें ) मैं अगले सफर पर निकल पड़ता हूं। रात 12 बजे के बाद झांसी में हूं। ग्वालियर संस्करण का 8 फरवरी का अखबार देखता हूं। सुब्बराव जी के जन्मदिन पर पूरा पेज छपा है। खबरों में मेरा भी नाम है।

-- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( SN SUBBARAO, MAHATMA GANDHI SEVA ASHRAM JOURA, MORENA, MP , PV RAJGOPAL, RAJENDRA SINGH)
   

Monday, March 27, 2017

जिला स्कूल मुजफ्फरपुर और डॉक्टर जयदेव

जिला स्कूल मुजफ्फरपुर। इस स्कूल में मुझे 1983 और 1984 में पढ़ने का मौका मिला। अपने भव्य भवन और विशाल परिसर के कारण यह स्कूल बिहार के कई कालेजों से ज्यादा विशाल और भव्य है। लाल रंग की दो मंजिला लंबी इमारत और बीचों बीच बना विशाल हॉल स्कूल को भव्य स्वरूप प्रदान करता है। यह स्कूल साल 1844 का स्थापित है। इसके सह संस्थापक नवाब तकी साहब थे, जिनकी तस्वीर स्कूल के हाल में लगी है। यह संयुक्त बिहार झारखंड के 17 जिला स्कूलों में से एक है। कभी इसका नाम बहुउद्देशीय जिला स्कूल हुआ करता था। अब 12वीं तक पढ़ाई होने कारण इसका नाम राजकीय इंटर कालेज हो गया है।
 जिस जमाने में मैं इस स्कूल का छात्र था यह स्कूल इसके प्रिसिंपल डाक्टर जयदेव के कारण जाना जाता था। लंबी कद काठी गौर वर्ण के डाक्टर जयदेव हमेशा धोती कुरता पहनते थे। वे बड़े कड़क प्रिंसिपल के तौर पर ख्यात थे। पर उनके व्यक्तित्व के कई और पहलू थे। डाक्टर जयदेव का पूरा नाम जयदेव झा था पर वे झा लिखते नहीं थे। अपने नाम से उन्होंने जाति सूचक शब्द हमेशा के लिए हटा दिया था। 1984 में वे जिला स्कूल मुजफ्फरपुर से ट्रांसफर होकर पटना कालेजियट के प्रिंसिपल बने। यहां से आगे वे बिहार सरकार के माध्यमिक शिक्षा के निदेशक बने। रिटायर होने पर वे हाजीपुर में रहे। इस दौरान वे कुछ गांधीवादी संस्थाओं से जुड़े रहे। इसी दौरान मेरी एक बार उनसे आखिरी मुलाकात हुई थी।

डाक्टर जयदेव की ख्याति बिहार के प्रमुख शिक्षाविद में हुआ करती थी। उनके समय में जिला स्कूल मुजफ्फरपुर अनुशासित शिक्षक और छात्रों के लिए जाना जाता था। जब 1983 में मेरा जिला स्कल में नामांकन हुआ तो सातवीं क्लास में छह सेक्शन थे। ए लेकर एफ तक हर सेक्शन में 60 छात्र। मैं सी सेक्शन में हुआ करता था। मेरे वर्ग शिक्षक रामजी झा थे। हमारे कुछ सहपाठी प्रेम प्रकाश, अजय मल्होत्रा, संजय सिंह आदि हुआ करते थे। यहां सातवीं कक्षा में नामांकन प्रवेश परीक्षा के द्वारा होता था। सीमित संख्या में छात्रों के लिए हॉस्टल की भी सुविधा है। जिला स्कूल में हमारी कक्षाओं के नाम प्रसाद सप्तम, राजेंद्र अष्टम जैसे हुआ करते थे। किसी जमाने में स्कूल में उदघोषणा करने का सिस्टम भी लगा था जो हमारे समय में खराब हो गया था।
डॉक्टर जयदेव का छात्रों के बीच ऐसा आतंक था कि कोई भी छात्र स्कूल में लंबी जुल्फें नहीं रख सकता था। अगर दिख गया तो खैर नहीं. आप जिला स्कूल के आसपास किसी भी हेयरकटिंग सैलून में चले जाएं और सैलन वाले से कहें कि जिला स्कूल का छात्र हूं वह आपके बाल उसी स्कूल के अनुरूप छोटे छोटे काट देगा। मैंने हरिसभा चौक के आसपास कई बार ऐसा कहकर बाल कटवाया था।

पर डाक्टर जयदेव के व्यक्तित्व के कई और मार्मिक पहलू भी थे। सातवीं के प्रवेश परीक्षा के दौरान एक गांव से आया छात्र स्कूल के बरामदे से लगे नाली में गिर गया। उसके कपड़े गंदे हो गए और वह रोने लगा। डाक्टर जयदेव ने उसे देखा। तुरंत उसे चुप कराया। चपरासी को अपने घर से धोती लाने के कहा। बच्चे के कपड़े बदलवाए और कहा बेटे आराम से जाकर परीक्षा दो तुम्हारा चयन जरूर होगा। एक बार हमलोग आठवीं क्लास में बैठे थे। कक्षा खाली थी। अचानक प्रिंसिपल जयदेव उधर से गुजरे। किस शिक्षक की क्लास है। हमलोगों ने कहा रहमतुल्ला सर की। उन्होंने कहा रहमतुल्ला तो आया है। खैर उन्होंने एक छात्र को कहा जाकर मेरे चेंबर से मेरा चश्मा लाओ। स्कूल के मध्य में दूसरे तल पर उनका विशाल चेंबर था। हमलोग चश्मा ले आए । उसके बाद वे हमें पढ़ाने लगे।

आपको पता है जिला स्कूल में दैनिक एसेंबली के दौरान कोई प्रार्थना नहीं होती थी। बल्कि रोज प्रतिज्ञा होती थी। हम सब भारत वासी हैं भारत देश हमारा है.... साल 1984 में जब डाक्टर जयदेव का तबादला पटना केलिए हुआ था तो उनकी एक विदाई सभा हॉल में रखी गई। कई शिक्षकों ने भावुक होकर भाषण दिया। कुछ तो रो पड़े। पर डाक्टर जयदेव ने अपने विदाई भाषण में कहा, मुझे किसी बात पर आंसू नहीं आते। जितने आंसू थे बचपन में ही बह गए। सभी छात्रों को शुभकामनाएं देते हुए अपना व्यक्तव्य समाप्त किया। तो ऐसे थे डाक्टर जयदेव। उनको लेकर हजारों छात्रों की अपनी अपनी यादें होंगी जो जिला स्कूल में 80 के दशक में पढ़े। पत्रकारिता में मेरे सीनियर अरविंद शरण परमेंद्र मोहन और चंद्रकांत प्रसाद सिंह भी इसी स्कूल के छात्र रहे।
- vidyutp@gmail.com
( ZILA, SCHOOL, MUZAFFARPUR, DR JAIDEV ) 


  

Saturday, March 25, 2017

जोधपुर की मखनिया लस्सी मावा कचौरी शाही समोसा

जोधपुर शहर की खाने पीने को लेकर अपनी पहचान है। घंटा घर के पास मखनिया लस्सी की दुकान नजर आती है। मखनिया लस्सी मतलब लस्सी में मक्खन डाल के।  राजस्थान की तपती गर्मी में मखनिया लस्सी आपको ठंडक देने का काम करती है। यह एक ठंडा कार्बोनेटिक ड्रिंक है, जिसमें सारे पोषक तत्व हैं। यह राजस्थान की गलियों में बहुत मशहूर है। लेकिन जोधपुर में क्या सरदी क्या गरमी या बरसात लोग सालों भर मखनिया लस्सी पीते हैं। इसलिए मैंने भी दिसंबर जनवरी की ठंड में इस लस्सी का आनंद लिया। घंटाघर के पास सरदार गेट से लगे मिश्रीलाल होटल में मखनिया लस्सी का रेट है 30 रुपये का ग्लास। आप आर्डर करें और लस्सी हाजिर।

मुझे बाद में बलदेव सिंह सियाग ने पूछा कि आपने जोधपुर में मावा कचौरी खाई या नहीं, तो मैंने जवाब दिया नहीं। अगली जोधपुर यात्रा में कोशिश होगी मावा कचौरी का स्वाद लेने की। जोधपुर की मावा कचौरी का स्वाद वाकई अलग हटकर होता है। लोग कहते हैं कि किसी और जगह की मावा कचौरी उतनी स्वादिष्ट नहीं लगती। मिश्रीवाला में मावा कचौरी भी मिल रही थी। एक मावा कचौरी 40 रुपये की।

अब बात शाही समोसा की। घंटा घर केपास ही एक दुकान है शाही समोसे वाली। यहां पर एक शाही समोसा 17 रुपये का है। वह भी बिना चटनी के। मैंने एक समोसा लेकर खाया पर मुझे इसमें कुछ खास नहीं लगा। पर यह शहर की प्रसिद्ध दुकान है। यहां समोसा के अलावा और भी कई प्रकार की मिठाइयां मिलती हैं।

नीली रोशनी में नहाया घंटाघर – वास्तव में जोधपुर का घंटाघर एक सुंदर विशाल स्तम्भ है जिसमें घड़ियां लगी हैं। इसे सरदार सिंह द्वारा निर्मित किया गया था।  हालांकि आजकल घंटा घर के आसपास अतिक्रमण दिखाई देता है। इस घंटाघर के आसपास ही सदर बाजार और दूसरे लोकप्रिय बाजार हैं, जहां से आप जोधपुरी चप्पले, जूतियां और कपड़े आदि खरीद सकते हैं। यहां सैलानी राजस्थानी वस्त्रों, मिट्टी की छोटी मूर्तियों, लघु ऊंटों और हाथी आदि खरीद कर ले जाते हैं।

जोधपुरी कोट और सर प्रताप सिंह
जोधपुरी कोट सर्वकालिक तौर पर लोकप्रिय है। पर आपको पता है कि इसके डिजाइन कौन थे। जोधपुर रियासत के मुसाहिबे आला सर प्रताप सिंह जी को इसका श्रेय जाता है। तमाम फैशन आते जाते रहते हैं पर बंद गले का जोधपुरी कोट अपनी जगह अडिग है। वह 1887 का साल था जब सर प्रताप सिंह महानी विक्टोरिया के गोल्डन जुबली समारोह में हिस्सा लेने लंदन गए थे। रास्ते में जहाज में उनके सारे कपड़े गुम हो गए।
सर प्रतापसिंह विदेशी वस्त्र नहीं पहनते थे। उन्होंने एक सफेद कपडे का थान खऱीदा और उसे खुद डिजाइन किया। पर लंदन में कोई दर्जी इसकी सिलाई करने वाला नहीं मिल रहा था। बहुत खोजबीन पर एक दर्जी ने इसकी सिलाई की। सर प्रताप सिंह ने इस कोट को पहना और इस तरह जोधपुरी कोट चलन में आया। बंद गले का कोट होने के कारण यह सर्दियों में पहनने के लिए मुफीद रहता है। इसको पहनने के बाद आपको टाई बांधने की जरूरत नहीं रह जाती है।

अब जोधपुर से चला चली की वेला है। शहर का मुख्य बस स्टैंड पावटा इलाके में है। घंटाघर से कोई दो किलोमीटर आगे है पावटा। 
जोधपुर के पावटा में में रात को गरमा गरम दूध। 
पावटा में एक होटल में रात के खाने के लिए रुकता हूं। मुलतान स्वीट्स एंड रेस्टोरेंट में थाली 60 रुपये की। खाने के बाद सड़क पर कड़ाह में दूध उबलते देखा। काफी लोग यहां रात में दूध पीते दिखाई दिए। पूरे जोधपुर शहर में जगह जगह कच्चा दूध शाम को बिकते हुए देखता हूं। लिखा है चौहटा का दूध। आज का भाव लिख कर दरें लिखी हैं, पर दूध की दरें अलग अलग हैं। एक दुकानदार बताता है जैसी क्वालिटी वैेसे दाम।  मैंने आनलाइन बस का टिकट बनवाया है। एमआर ट्रैवल्स की बस रात को 10.45 बजे खुलने वाली है जयपुर के लिए। जोधपुर से जयपुर, उदयपुर, दिल्ली, भीलवाड़ा, सूरत, बड़ौदा मुंबई तक की निजी बसें खुलती हैं। इन सबमें ऑनलाइन आरक्षण कराया जा सकता है। बस में अपनी सीट पर आकर सो जाता हूं। रात में बस पाली जिले में किसी रेस्टोरेंट पर रुकती है। सुबह हुई तो बस जयपुर रेलवे स्टेशन पहुंचने की जानकारी दे रही थी।
-    ---- विद्युत प्रकाश मौर्य
  (MAKHANIA LASSI, MAVA KACHAORI, SHAHI SAMOSA, JODHPUR, RAJSTHAN ) 

Thursday, March 23, 2017

जोधपुर कचहरी और मुसाहिबे आला सर प्रताप सिंह जी

मेहरानगढ़ और उम्मेद भवन के अलावा जोधपुर में शहर के बीचों बीच जोधपुर कचहरी का भवन भी स्थापत्य कला के लिहाज से देखने लायक है। इस भवन का निर्माण  कचहरी भवन का निर्माण 1886 में ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरिया की गोल्डेन जुबली के यादगार में कराया गया था। इसका निर्माण महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय और सरदार सिंह मारवाड़ द्वारा कराया गया।  इस भवन का निर्माण 11 सालों में यानी 18897 में पूरा हुआ।  इस भवन के निर्माण काल में जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री महाराज सरदार सिंह थे। उनके अभिभावक मुसाहिब आला सर प्रताप सिंह थे। भवन के बीचों बीच सर प्रताप सिंह की विशाल मूर्ति स्थापित की गई है। 


जोधपुर के लोग उनका बड़ा सम्मान करते हुए दिखाई देते हैं। मैं लोगों को आकर मूर्ति के चरण स्पर्श करते और माल्यार्पण करते हुए देखता हूं।  सर प्रतापसिंह जी जोधपुर के महाराजा तख़्तसिंह जी के छोटे पुत्र थे,वे जोधपुर के राजा तो नहीं बने पर उनका सम्मान राजाओं की तरह होता है। वे जीवन भर जोधपुर के मुसाहिबे आला ( युवराज) ही बने रहे। वे खुद तो पढ़ लिखे नहीं थे लेकिन उन्होंने मारवाड़ में शिक्षा की ज्योति जगाने के लिए बहुत काम किया। उन्होंने मारवाड़ में बहुत सारे स्कूल खुलवाए। वे बाल विवाह और मृत्यु भोज जैसी सामाजिक बुराइयों के भी खिलाफ थे। उन्होंने जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह का विवाह भी साधारण घर की कन्या से करवाया। जोधपुर के प्रसिद्ध चोपसानी स्कूल की स्थापना उनके प्रयासों से हुई। सर प्रताप सिंह ने जोधपुर रिसाला नाम की एक मिलिट्री इन्फेंट्री गठन किया था। इसमे एक सिपाही से लेकर अफसर तक के लिए खादी पहनना अनिवार्य था। उनके इन महान कार्यो के वजह से ही जनता में वे आज भी पूजे जाते हैं। सर प्रताप सिंह जी के बारे में एक और रोचक बात है कि वे जोधपुर कोट के डिजाइनर थे।
इस भवन को जुबली कोट या फिर बावन कचहरियां के नाम से भी जाना जाता है। इस भवन का डिजाइन ब्रिटेन के चर्चिच वास्तुविद स्वेनस जैकब ने बनाया था। इसके निर्माण के दौरान जोधपुर रेलवे के जनरल मैनेजर  डब्लू होम इसकी निगरानी कर रहे थे। इसके निर्माण के इंजीनियर नागौर निवासी जगधर श्री इसहाक थे। इसके निर्माण में तब कुल 4 लाख 50 रुपये खर्च हुए थे। इस भवन के निर्माण काल के दौरान कई साल तक हजारों लोगों को रोजगार मिला था। यह भवन वास्तु कला की लिहाज से देश के संरक्षित स्मारकों में शामिल किया गया है। इसका संरक्षण इंटैक के जिम्मे है। भवन दो मंजिला है। विशाल लंबे भवन के दोनों तरफ सुंदर छतरियां बनी हुई हैं।
स्वतंत्रता के बाद जोधपुर कचहरी के इस भवन में जिला कलेक्टरेट और संभागीय आयुक्त का दफ्तर संचालित होता है। इसलिए दिन भर इस भवन में चहल पहल बनी रहती है। पर मारवाड़ के पुरखों के इस विरासत की देखभाल आजकल बेहतर ढंग से नहीं हो पा रही है। समाचार पत्रों में छपी खबर के मुताबिक भवन की बालकनी कई जगह टूट रही है। जालियां छतिग्रस्त हो रही हैं। पर प्रशासन इस विरासत वाले भवन के ररखाव को लेकर गंभीर नहीं है। भले आंतरिक कक्षों को बेहतर ढंग से संवारा गया हो पर बाहरी दीवारं की हालत खराब हो रही है। (राजस्थान पत्रिका 20-9-2015)
- vidyutp@gmail.com

( JODHPUR KACHAHRI, SIR PRATAP SINGH ) 








Tuesday, March 21, 2017

अदभुत अनूठी मंडोर की छतरियां और देवल

जोधपुर के मंडोर की पहचान मंडोर की छतरियों और यहां बने देवल से है। ऐसी अनूठी छतरियां देश में कहीं और एक साथ देखने को नहीं मिलती हैं। मंडोर उद्यान में ये छतरियां एक पंक्ति में अदभुत सौंदर्य प्रस्तुत करती हैं। मंडोर की इन छतरियों को खाली गुम्बद के नाम से भी जाना जाता है।

मंडोर के देवलों की श्रंखला में राव चंदा से लेकर महाराजा महाराजा तख्त सिंह के देवल देखे जा सकते हैं। आप कह सकते हैं कि मंडोर एक तरह से मारवाड़ शासकों की कब्रगाह है। यानी शाही श्मसान घाट। मरने के बाद यादगारी को अजर अमर करने की एक शासकीय कोशिश। इस तरह की शाही छतरियां राजस्थान के दूसरे शहरों में भी देखी जा सकती हैं। खासतौर पर जयपुर, अलवर, भीलवाड़ा आदि शहरों में। मंडोर की इन छतरियों को आपने कई फिल्मों में भी देखा होगा।

दुनिया के मशहूर फिल्म कलाकार जैकी चैन जब यहां शूटिंग करने पहुंचे तो उन्होंने मंडोर की छतरियां देखी और इसकी खूब सराहना की। फिल्म 'कुंग फू योगा' की शूटिंग में जैकी चैन ने मंडोर की छतरियों के साथ की है। वहीं अभिनेत्री सनी लियोनी फिल्म लीला की शूटिंग के सिलसिले में जोधपुर आई थीं। जोधपुर के मंडोर पचकुंडा की छतरियों और मंदिर में इस फिल्म के कई दृश्य शूट किए गए थे। 


मंडोर की इन छतरियों में सबसे बड़ी छतरी महाराजा अजित सिंह की है। अजीत सिंह के देवल का निर्माण उनके उत्तराधिकारी महाराजा अभय सिंह ने 1724 से 1749 के बीच कराया था। पूरब रुख के इस तीन मंजिला देवल का निर्माण लालघाटू पत्थरों से किया गया है। इस देवल के अंदर पत्थरों पर बेमिशाल कलाकृतियां उकेरी गई हैं। यहां शिव पार्वती, कुबेर, लक्ष्मी नारायण, हरिहर, वायु, यम, अग्नि, गणेश आदि देवताओं की प्रतिमाएं दीवारों पर देखी जा सकती हैं। इस देवल में उत्कीर्ण प्रतिमाओं में तत्कालीन समाज के आभूषणों की झलक भी देखी जा सकती है। स्थापत्य कला के लिहाज से ये देवल इतिहास में अलग स्थान रखते हैं। इस नाते ये वंडर्स ऑफ इंडिया में जगह पाने के लायक हैं।


हॉल ऑफ हीरो ऑफ राजस्थान यानी वीरों की दालान
मंडोर उद्यान में एक हॉल ऑफ हीरो ( वीरों की दालान) बना है। इसमें चट्टान से दीवार में तराशी हुई पन्द्रह आकृतियां हैं जो हिन्दू देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करती है।

वीरों की दालान में देवी चामुंडा, महिषासुरमर्दिनी, श्री गोसाई जी, श्री मल्लीनाथ जी जी की प्रतिमाएं क्रम से हैं। इसके आगे बढ़ने पर आपको श्री पाबू जी, श्री रामदेवजी, श्री हडबू जी, श्री गोगाजी और श्री मेहाजी की प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं। ये सभी वीर पुरुष अपने घोड़े या घोड़ियों पर सवार हैं। राजस्थान की लोककथाओं में इन सभी वीरों की दास्तां गाई और सुनाई जाती है।


इसके आगे आप श्री रामचंद्र जी का दरबार , श्री कृष्ण जी और श्री महादेव जी ( शंकर) का दरबार देख सकते हैं। यहां महादेव को भी राजों की तरह प्रदर्शित किया गया है। मंडोर में इन वीरों की दालान का निर्माण महाराजा अजीत सिंह द्वारा 1707 से 1724 के दौरान कराया गया। 

वहीं देवताओं की साल का निर्माण महाराज अभय सिंह द्वारा 1224 -49 के बीच कराया गया। देवताओं की साल में जालंधर नाथ, शिव पार्वती, राम, शिव, सूर्य, पंचमुखी ब्रह्म की प्रतिमाएं हैं। मंडोर में कई सदियों से होली के दूसरे दिन राव के मेले का आयोजन भी किया जाता है। मेले में निभाई जाने वाली कई परंपराएं और रीतियां सदियों से चलती आ रही हैं।

सबसे अनूठा है इकथंबा महल

मंडोर में घूमते हुए संग्रहालय के पास एक मीनार नुमा संरचना दिखाई देती है। इसका नाम इकथंबा महल है। क्योंकि दूर से देखने में यह एक थंब ही तरह ही नजर आती है। पर नजदीक से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि यह तीन मंजिला एक महल ही है। इसका निर्माण महाराजा अजीत सिंह के काल (1705-1723 र्इ. ) में हुआ था। 

इसके अलावा आप मंडोर में अनूठा बाल उद्यान भी देख सकते हैं। इसमें बच्चों के लिए कई प्रकार के खेल कूद के साधन यानी झूल आदि लगाए गए हैं। इनका मामूली टिकट है। ट्रैकिंग के शौकीन लोग पहाड़ी पर चढ़ने का और जंगलों में घूमने का भी आनंद ले सकते हैं। मंडोर गार्डन में सुंदर तालाब भी है, हालांकि इसमे काफी लोग गंदगी फैलाते हुए नजर आते हैं। पर इसमें सुंदर कमल के फूल खिले भी दिखाई दे जाते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( MANDORE, WONDERS OF INDIA, CHATRI, DEVAL, MARWAR KING ) 


Sunday, March 19, 2017

मंडोर - यहां की रहने वाली थी मंदोदरी

जोधपुर मे घूम रहा हूं। अब मंडोर गार्डन जाना है। उम्मेद भवन से मंडोर की दूरी कोई नौ किलोमीटर बताई जा रही है। उम्मेद भवन से आधा किलोमीटर पैदल चलते हुए नीचे उतरने पर मुझे एक आटो वाला खाली नजर आता है। उससे मैं मंडोर चलने की बात करता हूं। तय होता  है कि मंडोर घूमाने के बाद वह मुझे वापस शहर में छोड़ देगा, जहां मुझे आगे जाना है। यह सब 300 रुपये में तय होता है। आटो वाले का नाम जवाहर है। जवाहर बताते हैं कि अगर दिन भऱ जोधपुर घूमना हो तो 700 रुपये में आटो बुक कर सकते हैं। यह वाजिब दर है। जवाहर का मोबाइल नंबर 8890724798 है। आप कभी जोधपुर जाएं तो उन्हें याद कर सकते हैं। वैसे जोधपुर के ज्यादातर आटो वाले अच्छे हैं। मंडोर पहुंचने पर उद्यान के प्रवेश द्वार पर काफी चहल पहल नजर आ रही है।विशाल उद्यान में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। मैं नींबू पानी पीने के बाद अंदर की ओर चल पड़ता हूं।

मंडोर उद्यान में मुख्य द्वार के प्रवेश करने के बाद रावण हत्था (वाद्य यंत्र) पर लोक गीतों की धुनें बजाकर पर्यटकों का मनोरंजन करते लोक कलाकार नजर आते हैं। तो सड़क के किनारे महिलाएं राजस्थानी चूड़ियां और दूसरे हस्तशिल्प उत्पाद बेचती नजर आती हैं। अगर आपको सलमान की फिल्म तेरे नाम का गीत ओढ़नी ओढ़ के नाचूं आज याद आता हो तो उसे देखिए एक बार फिर...इस गाने की शूटिंग मंडोर के किले और मंडोर की छतरियों के बीच हुई है। सलमान खान के साथ इस गीत में भूमिका चावला हैं। गीत के कुछ दृश्य मेहरान गढ़ फोर्ट में भी फिल्माए गए हैं।

मण्डोर का प्राचीन नाम 'माण्डवपुर' था। यह पुराने समय में मारवाड़ राज्य की राजधानी हुआ करती थी। राव जोधा ने मंडोरको असुरक्षित मानकर सुरक्षा के लिहाज से चिड़िया कूट पर्वत पर मेहरानगढ़ का निर्माण कर अपने नाम से जोधपुर को बसाया था।

राजस्थान में ऐसी लोक मान्यता है की लंकापति रावण और मंदोदरी का विवाह जोधपुर के मंडोर में हुआ था। यानी मंदोदरी मंडोर की रहने वाली है। इसलिए कुछ मान्यताओं के अनुसार रावण का ससुराल जोधपुर में मंडोर नामक स्थान पर है। कहते हैं कि यहां रावण ने यहीं पर मंदोदरी के साथ फेरे लिए थे। इसलिए मंडोर में आज भी बकायदा रावण की पूजा होती है। इसलिए यहां दशहरे में रावण को हरगिज जलाया नहीं जाता।

मंडोर में एक सुन्दर बगीचा बना हुआ है और इस बगीचे में देवताओं की साल और वीरों का दालान बनी हुई है।  मंडोर गार्डन के अंदर अजीत पोल, एक थम्ब महल, जनाना बाग आदि देखे जा सकते हैं। मंडोर के ये ऐतिहासिक किले चौथी सदी और उसके बाद के बने हुए हैं। छठी से 12वीं सदी तक मंडोर गुर्जर प्रतिहार राज्य का हिस्सा रहा। इसके बाद यह पाली  के चौहान राजाओं के अधीन आ गया। इस दौरान दिल्ली सल्तनत की ओर से कई हमले हुए मंडोर पर। कभी राठौर राजाओं को दहेज मिला मंडोर, इसके बाद शेरशाह सूरी के हाथों से होता हुआ बाद में यह मारवाड़ राजाओं के कब्जे में आ गया।


मंडोर कभी राजस्थान के कला संस्कृति का भी बड़ा केंद्र रहा है। अजीत पोल के आगे मंडोर का पुराना किला है। यहां एक सरकारी संग्रहालय भी है, जो दिन के समय खुलता है।

अदभुत गणेश जी का मंदिर
मंडोर के किले के सामने एक गणेश जी का सुंदर मंदिर है। मंदिर में हर रोज स्थानीय लोग बड़ी संख्या में पूजा करने आते है। गणेश जी का फूलों से अदभुत श्रंगार किया जाता है। गणेश जी के तरफ काला गौरा और दूसरी तरफ भैरव नाथ की प्रतिमा है। मंदिर के सामने लोग हवन कुंड में समिधा डालने के बाद मन्नत लेकर प्रदक्षिणा करते हैं। मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर लोग गणेश जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में काफी आस्था है।

-        - विद्युत प्रकाश मौर्य
 (MANDORE, RAJSTHAN, JODHPUR, MANDODARI, RAVAN, TERE NAM FILM, GANESH TEMPLE ) 


Friday, March 17, 2017

उम्मेद भवन का अदभुत संग्रहालय – राजसी ठाठ की निशानियां

जोधपुर के उम्मेद भवन पैलेस में पहुंचने वाला हर आदमी इसके हेरिटेज होटल में रहने का आनंद तो नहीं उठा सकता। पर वह उम्मेद भवन के बीचों बीच स्थित संग्रहालय को जरूर देख सकता है। प्रवेश टिकट लेने के बाद इस संग्रहालय को इत्मीनान से देखने के लिए दो घंटे का वक्त जरूर रखिए अपने पास।

अगर घूमते हुए भूख सताए तो टिकट घर के बगल में एक कैफेटेरिया भी है। यहां आप कुछ पेट पूजा करके राजसी एहसास महसूस कर सकते हैं। जोधपुर के वर्तमान राज परिवार ने अपने तमाम विरासत का व्यवसायीकरण काफी बेहतर ढंग से किया है। जब आप संग्रहालय में प्रवेश करते हैं तो राजसी इस्तेमाल की तमाम वस्तुएं देखकर आपको अचरज हो सकता है। इस राजाओं को शाही जीवन की एक तस्वीर पेश करता है।


उम्मेद भवन के स्टाफ गाइड के तौर पर राजासी ठाठ बाट की दास्तां आपको सुनाते हैं। सुनते जाइए और आगे बढ़ते जाइए। उम्मेद भवन पैलेस संग्रहालय जोधपुर के शाही परिवार द्वारा इस्तेमाल की गई प्राचीन वस्तुओं की एक विस्तृत श्रृंखला को प्रदर्शित करता है। इस संग्रहालय में हवाई जहाज के मॉडलों, हथियारों, प्राचीन वस्तुओं, घड़ियों, बॉब घड़ियों, बर्तनों, कटलरी का शानदार संग्रह देखने को मिलता है।

एक गैलरी में मारवाड़ राजघराने के सारे राजाओं की तस्वीरें हैं। वर्तमान राज परिवार की भी तस्वीरें यहां प्रदर्शित की गई हैं।  गैलरी में जानकारी मिलती है कि उम्मेद भवन के निर्माण में तब 94 लाख 51 हजार 565 रुपये खर्च हुए थे। यह विश्व के सबसे बड़े निजी आवास में शुमार है। 1978 में इसके एक हिस्से को निजी हेरिटेज होटल में तब्दील किया गया।

लाइफ स्टाइल गैलरी में आप खास तौर पर महाराजा उम्मेद सिंह द्वारा 1940 से 1950 के बीच इस्तेमाल की हुई वस्तुओं को देख सकते हैं। सबसे शानदार है यहां पर दर्जनों की किस्म की घड़ियों से रुबरू होना। हैदराबाद के निजाम के संग्रहालय में भी सैकड़ों घड़ियां देखने को मिलती हैं।

पर उम्मेद भवन में प्रदर्शित की गई किस्म किस्म की घड़ियां देखने और देर तक निहारने लायक हैं। ये घड़ियां अलग अलग देशों की बनी हुई हैं।

कुछ घड़ियां ऐसी हैं जो तारीख महीना और साल भी बताती हैं। ये सारी घड़ियां मैकेनिकल दौर की हैं। बड़ी घड़ियों से लेकर निहायत छोटी चांदी की बनी अंगूठी घड़ी भी देख सकते हैं।


आप यहां ड्रेसिंग टेबल और अलग अलग डिजाइन के आइने देख सकते हैं। इसके साथ मर्तबान और कटलरी का भी शानदार संग्रह है। और इन सब चीजों को देखते हुए मन भर जाए तो रेलवे लोकोमोटिव का मिनिएचर आपको चौंका देता है। दो घड़ियां ऐसी भी हैं जो रेलवे लोकोमोटिव के डिजाइन की बनी हुई है। यहां मिनिएचर कारें भी देखी जा सकती हैं।

 पर जब आप संग्रहालय से बाहर निकलते हैं को एक दर्जन के करीब असली कारें प्रदर्शित की गई हैं। ये कारें अलग अलग समय में राज परिवार द्वारा इस्तेमाल की जाती थीं। कारों के शौकीन के लिए इन्हे देखना बड़ी ही बेहतरीन मौका हो सकता है। इन कारों को इस तरह संभाल कर रखा गया है मानो ये अभी भी चलने को तैयार हैं। कारों के संग्रहालय के पास से उम्मेद भवन का विहंगम नजारा दिखाई देता है। ये सब कुछ देखने के बाद अब आगे चलने की बारी थी। अरे कहां, अब मंडोर गार्डन।

 - vidyutp@gmail.com
( UMMED BHAWAN PALACE, WATCH, CAR, LOCOMOTIVE, COLLECTION )