Monday, January 16, 2017

यादें रची बसी हैं यहां - डाक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र

गुवाहाटी से एयरपोर्ट की ओर बढ़ते समय शहर के बाहर बायीं तरफ डाक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र का विशाल बोर्ड नजर आता है। असम के इस महान सपूत की यादें संजोए रखने के लिए इस समाधि क्षेत्र का निर्माण गुवाहाटी शहर में कराया गया है। भारतीय फिल्म संगीत और कला के क्षेत्र में भूपेन हजारिका एक अमर नाम है। उन्हें न सिर्फ असम के लोग बेइंतहा प्यार और सम्मान देते थे बल्कि हिंदी और बांग्ला लोगों के बीच भी वे उतने ही लोकप्रिय थे। उनकी आवाज में जो एक अलग किस्म की कशिश थी, उसके लोग दीवाने तो थे ही, वे जब कुछ बोलते थे तो भी उससे संगीत फूटता प्रतीत होता था।

बहुत पहले सरकारी माध्यम दूरदर्शन पर आए एक धारावाहिक लोहित किनारे (1988) में भूपेन का टाइटिल संगीत सुनने को मिला था। तब से उनकी आवाज कानों में रच बस गई थी। बाद में उनका प्यारा सा गीत – एक कली दो पत्तियां नाजुक नाजुक नाजुक उंगलियां सुनने को मिला। करोडो लोगों ने जब हिंदी फिल्म रुदाली (1993 ) में उन्हें दिल हुम हुम करे...गीत में सुना तो उनकी आवाज के कद्रदानों की संख्या में और इजाफा हुआ।

काफी पहले टीवी पर भूपेन दादा का एक इंटरव्यू सुना था, जिसमें वे अपने शिक्षा दीक्षा के बारे में बता रहे थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़े थे भूपेन हजारिका। वे अपने बिड़ला हास्टल के दिनों को अक्सर याद करते थे। वे पांच साल यहां पढ़े। पहले यहां से स्नातक किया फिर भूपेन हजारिका ने 1946 में काशी हिंदू विवि से राजनीति विज्ञान में एमए किया। हजारों महान विभूतियां बीएचयू में पढ़ने आईं। चूंकि मुझे भी यहां पांच साल पढ़ने का सौभाग्य मिला है इसलिए भूपेन दादा और भी अच्छे लगने लगे। साल 2004 में भूपेन दादा लोकसभा का चुनाव लड़े थे भाजपा के टिकट पर हालांकि वे संसद में नहीं जा सके। पर एक संगीत साधक और समाजसेवक के तौर पर उनका कद काफी ऊंचा था। साल 2016 के अक्तूबर महीने में गुवाहाटी में जालुकबाड़ी क्षेत्र में जब डाक्टर भूपेन हाजारिका समाधि क्षेत्र को देखता हूं तो बड़ी खुशी होती है कि असम के इस महान सपूत की यादों को संजोए रखने के लिए इस स्मारक का निर्माण किया गया है।

कई एकड़ में फैले इस समाधि क्षेत्र में भूपेन दादा की समाधि के साथ उनकी एक आदमकद प्रतिमा भी स्थापित की गई है। सुंदर हरित क्षेत्र के बीच पानी के फव्वारे और कृत्रिम झरनों का निर्माण किया गया है। इन झरनों के कल कल के साथ पार्श्व में भूपेन दादा के गीत बजते हैं तो माहौल मनोरम हो उठता है।  

भूपेन हजारिका का जन्म 8 नवंबर 1926 को तिनसुकिया जिले के सादिया में हुआ था। वे असमिया के कवि, गीतकार, संगीतकार के साथ संस्कृति पुरुष थे। असमिया संस्कृति का नाम उन्होंने पूरी दुनिया में ऊंचा किया। वे अपने तमाम गीत खुद लिखते, संगीत बनाते और खुद ही गाते थे। उनके गीत – ओ गंगा तू बहती क्यूं हो...ने लाखों लोगों को अंदर तक झकझोरा। भूपेन दादा को 1992 में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया। 

5 नवंबर 2011 को 85 साल की उम्र में वे हम सब को छोड़कर चले गए, पर उनकी आवाज तो हमेशा गूंजती रहेगी। उनके निधन के 4 साल बाद साल 2015 में उनकी याद में डाक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र का निर्माण कराया गया है, जो अब गुवाहाटी का दर्शनीय स्थल बन गया है। यहां एक म्युजिक बूथ भी बनाया गया है जिसमें आप भूपेन दादा के पसंदीदा गीत सुन सकते हैं। इसके अलावा एक सभागार का भी निर्माण किया गया है। हर साल उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर बड़ी संख्या में लोग उन्हें याद करने यहां पहुंचते हैं।   

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BHUPEN HAZARIKA SMADHI KSHETRA, SINGER, POET, MEMORIAL, JALUKBARI, GUWAHATI )


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