Monday, January 30, 2017

फेयरी क्वीन से एक मुलाकात

दिल्ली से रेवाड़ी। हरियाणा का शहर। दूरी 80 किलोमीटर। पहचान स्टीम लोकोमोटिव का सुंदर संग्रहालय। रेलवे के इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए रेवाड़ी के स्टीम लोकोमोटिव संग्रहालय की यात्रा जरूरी है। दिल्ली से रेवाड़ी महज 20 रुपये के पैसेंजर ट्रेन के टिकट में दो घंटे में पहुंचा जा सकता है। रेवाड़ी रेलवे स्टेशन के दाहिनी तरफ बाहर की ओर निकलिए। रेलवे कालोनी की तरफ स्टीम लोकोमोटिव का संग्रहालय है। इस संग्रहालय की व्यवस्था उत्तर रेलवे देखता है। हालांकि रेवाड़ी रेलवे स्टेशन जयपुर डिविजन में आता है। यहां का रनिंग स्टाफ जयपुर और जोधपुर दोनों ही डिविजन के हैं।

हिंदी फिल्मों के कई मशहूर दृश्यों में रेवाड़ी के स्टीम लोकोमोटिव का इस्तेमाल कर अतीत को फिल्माया गया है। सुंदर से हरे भरे प्रांगण में मीटर गेज और ब्राडगेज के कई स्टीम लोकोमोटिव यहां आराम फरमा रहे हैं। संग्रहालय सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक खुला रहता है। कोई प्रवेश टिकट नहीं है। पर यह भारतीय रेलवे के इतिहास की अनमोल धरोहर है। हरे भरे सुंदर परिसर में आपकी मुलाकात फेयरी क्वीन से होती है। कौन फेयरी क्वीन।

भारतीय रेलवे के इतिहास में लोकोमोटिव फेयरी क्वीन का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह सबसे पुराना लोकोमोटिव है जो अभी भी चालू अवस्था में है। इसका निर्माण काल 1855 का है। ठीक दो साल बाद जब भारत में पहली रेल चली थी।फेयरी क्वीन दुनिया में काम करने की हालत में सबसे पुराना भाप इंजन है। इस नाते इसका नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज है। 

"फेयरी क्वीन" को लीड्स, ब्रिटेन में 1855 में कीट्सन थामसन एंड हेविस्टन नामक लोकोमोटिव कंपनी ने बनाया गया था। भारत में यह ब्राडगेज का लोकोमोटिव इस्ट इंडियन रेलवे को अपनी सेवाएं दे रहा था। तब इसका नंबर  ईआईआर 22 हुआ करता था। 
  
कई दशक तक भारतीय रेलवे की सेवा देने के बाद फेयरी क्वीन को 1909 में रिटायर कर दिया गया। 

फेयरी क्वीन ने लंबे समय तक हावड़ा से रानीगंज के बीच अपनी सेवाएं दीं। इसकी मदद से बंगाल में 1857 की क्रांति के दौरान फौज को ढोने का काम किया गया। 1909 में सेवा से बाहर होने के बाद फेयरी क्वीन लोको 1943 तक हावड़ा में यूं ही पड़ा रहा। इसके बाद इसे यूपी के चंदौसी में रेलवे के प्रशिक्षण केंद्र में लाकर रखा गया। साल 1972 में फेयरी क्वीन को हेरिटेज दर्जा प्रदान किया गया। बाद में इसे दिल्ली के राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में भी लंबे समय तक रखा गया।


साल 1997 में इसे एक बार फिर सेवा में उतारा गया। एक फरवरी 1997 को फेयरी क्वीन ने दिल्ली से अलवर के बीच एक बार फिर कुलांचे भरी तो दुनिया भर के स्टीम इंजन में रूचि रखने वालों को कौतूहल हुआ क्योंकि 142 साल पुराना लोकोमोटिव फिर फार्म में था। इसे पर्यटकों के लिए चलाया गया। बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी इस लोकोमोटिव को देखने के लिए आते हैं। लोको में खराबी आने पर 2014 में इसे एक बार फिर सेवा से हटाया गया। पर फेयरी क्वीन अभी भी तैयार है एक नए सफर के लिए।

फेयरी क्वीन पर नजर डालें तो यह वाकई रानी की तरह सुंदर दिखाई देता है। इसकी लंबाई 28 फीट 10 इंच और चौड़ाई तकरीबन 9 फीट है। ऊंचाई 10 फीट 8 ईंच है। पहियों के लिहाज से यह 2-2-2 श्रेणी का लोकोमोटिव है। काम करने की स्थित में इसका वजन 26 टन है। इसके पानी के टैंक की क्षमता 3 हजार लीटर की है जबकि कोयला लेने की क्षमता 2 टन की है। दो सीलिंडर का यह लोकोमोटिव है जिसके इंजन की क्षमता 130 हार्स पावर की है और अधिकतम गति 40 किलोमीटर प्रति घंटे की है।



एक बार फिर फेयरी क्वीन को रेलवे ने काफी परिश्रम से रिस्टोर किया। यह 1997 में 18 जुलाई को एक बार फिर पटरियों पर दौड़ा।  88 साल बाद किसी लोकोमोटिव को एक बार फिर पटरी पर दौड़ाया गया। साल 1998 में इसे गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में विश्व के सबसे पुराने लोकोमोटिव के तौर पर शामिल किया गया। साल 2011 में फेयरी क्वीन के कुछ पार्ट पुर्जे चोरी चले गए। बाद में इसे चेन्नई के पास स्थित पेरांबुर रेल इंजन कारखाना भेजा गया जहां से दुबारा चलने योग्य बनाया गया। एक बार फिर इसने 22 दिसंबर 2012 के पटरियों पर कुलांचे भरी। 


सैलानियों ने किया शाही सफर - कई साल तक इसे अक्तूबर से मार्च तक हर माह के दूसरे और चौथे शनिवार को सैलानियों केलिए चलाया गया। इसके साथ एक 60 सीट वाला वातानुकूलित कोच लगाया जाता है। इस सफर का अपना शाही अंदाज है। फेयरी क्वीन से यात्रा के लिए दोनों ओर का प्रति व्यक्ति खर्च 8600 रुपया है जबकि एक तरफ का खर्च 6000 रुपया है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( FAIRY QUEEN, STEAM LOCOMOTIVE, REWARI SHEAD, OLDEST RUNNING LOCOMOTIVE IN WORLD  ) 

Saturday, January 28, 2017

जल संरक्षण का अदभुत नमूना – अग्रसेन की बावड़ी

राजधानी दिल्ली के भूली बिसरे दर्शनीय स्थलों में से एक है अग्रसेन की बावली। उक लोग इसे उग्रसेन की बावली भी कहते हैं। बावली मतलब बावड़ी यानी जल संग्रह का अनूठा तरीका। ऐतिहासिक तौर पर यह बावड़ी 14वीं सदी की है। पर यह बावड़ी चर्चा में तब आई जब फिल्म पीके में इसे आमिर खान के अस्थायी निवास के तौर पर दिखाया गया। अब यहां हर रोज हजारों लोग पहुंचते हैं। छुट्टी वाले दिन तो बावड़ी दिन भर गुलजार रहती है। पीके ने इसे दिल्ली के टूरिस्ट मानचित्र पर ला दिया है। पर यह बावड़ी विश्व विरासत के स्थल में शामिल गुजरात के रानी के बाव से कुछ कम नहीं है।

दिल्ली के इस अग्रसेन की बावडी कहानी रोचक स्मारक है। शहर की ऊंची और आधुनिक इमारतों के बीच यह बावड़ी ज्यादातर लोगों को दिखाई नहीं देती।  इसलिए कम लोग ही इस ऐतिहासिक सीढीदार कुएं के बारे में जानते हैं। वास्तव में अग्रसेन की बावली, एक संरक्षित पुरातात्विक स्थल है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और अवशेष अधिनियम 1958 के तहत भारत सरकार द्वारा संरक्षित हैं।

पारसी स्थापत्य की झलक
बावली की स्थापत्य शैली उत्तरकालीन तुगलक और लोदी काल की दिखाई देती है। कहा जाता है कि इसे अग्रहरि एवं अग्रवाल समाज के पूर्वज अग्रसेन ने 14वीं सदी में बनवाया था। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यह बावड़ी महाभारत कालीन है। 14वीं सदी में सिर्फ इसे नया रूप दिया गया। इमारत की मुख्य विशेषता है कि यह उत्तर से दक्षिण दिशा में 60 मीटर लम्बी तथा भूतल पर 15 मीटर चौड़ी है। इस बावली में सीढ़ीनुमा कुएं में करीब 105 सीढ़ियां हैं। इसके स्थापत्य में व्हेल मछली की पीठ के समानछत इसे खास बनाता है। इस बावड़ी का निर्माण लाल बलुए पत्थर से हुआ है। अनगढ़ और गढ़े हुए पत्थर से बनी यह दिल्ली की बेहतरीन बावड़ियों में से एक है। यह दिल्ली की उन गिनी चुनी बावलियों में से एक है, जो अभी भी अच्छे हाल में है। हालांकि अब इसमें पानी नहीं दिखाई देता। 

साल 2012 में डाक टिकट - सन 2012 में भारत के डाक विभाग ने अग्रसेन की बावली पर डाक टिकट भी जारी किया। कहा जाता है कि जमाने मं यहां पर नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली के लोग तैराकी सीखने के लिए भी आते थे।
अग्रसेन की बावली में पश्चिम की ओर तीन प्रवेश द्वार युक्त एक मस्जिद भी है। किसी जमाने में इस बावड़ी में पानी एकत्रित किया जाता था। यह पांच स्तरों पर होता था। बावड़ी में चार मंजिले साफ देखी जा सकती हैं। आजकल बावडी में पानी नहीं है, और बड़ी संख्या में यहां कबूतरों और चमगादड़ और बिल्लियां दिखाई देती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,   दिल्ली मंडल इन दिनों बावड़ी के संरक्षण में लगा है। बेहतर हो कि इसमें फिर से पानी लाने का इंतजाम किया जाए।


कैसे पहुंचे - अगर आप दिल्ली में हैं तो इसे जरूर देखें। कहां है... दिल्ली के दिल कनाट प्लेस से कस्तूरबा गांधी मार्ग पर चलें। टायल्सटाय मार्ग चौराहा से आगे बायीं तरफ हेलीरोड में मुड़े। फिर हेली लेन में बायीं तरफ मुड़े। बस पहुंच गए ना...
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( AGRASEN KI BAVDI, WATER, AMIR KHAN, PK MOVIE, DELHI, KG MARG ) 

Thursday, January 26, 2017

कर दे फीका रंग चुनरी का दोपहरी नैनीताल की

रुपहरी सुबह नेपाल की, सुनहरी शाम बंगाल की, कर दे फीका रंग चुनरी का दोपहरी नैनीताल की। कवि गोपाल सिंह नेपाली की ये पंक्तियां नैनीताल की खूबसूरती बयां करने के लिए काफी है। तो एक ऐसी दोपहर में नैनीताल पहुंचना हुआ था। साल था 1999 का। एक शादी में जाने का मौका था। हालांकि इससे पहले भी एक बार नैनीताल जाना हुआ था एक फिल्म की शूटिंग की कवरेज के दौरान। 1998 में पीआरओ देवेंद्र खन्ना मुंबई के एक बी क्लास निर्माता की फिल्म की शूटिंग दिखाने के लिए हमें नैनीताल ले गए थे। दिल्ली से हमारा सफर एक एसयूवी में शुरू हुआ। हमारे साथ दिल्ली के कई फिल्म पत्रकार थे। इसमें फिल्म रेखा निकालने वाले प्रमोद कुमार गुप्ता, एसके पंकज, प्रेम बाबू शर्मा, चांद खां रहमानी समेत कई और पत्रकार थे। साल 1996 से 1999 के दौरान मुझे टीवी और फिल्मों पर रिपोर्टिंग का मौका मिला था। वह मेरे कैरियर के शुरुआती दिन थे। तो हमलोग सुबह 9 बजे आईटीओ से रवाना हुए।

गाजियाबाद, हापुड़, मुरादाबाद के बाद रामपुर में एक रेस्टोरेंट में हमलोग खाने के लिए रुके। दोपहर का लंच अच्छा था, पर हमारे पीआरओ को उसका बिल कुछ ज्यादा लगा। खैर आगे का सफर शुरू हुआ। रामपुर के बाद बिलासपुर होते हुए हलद्वानी पहुंचे। थोड़ा आगे जाने पर काठगोदाम रेलवे स्टेशन दिखाई दिया। यह आखिरी रेलवे स्टेशन है इस मार्ग है। पूरा हलद्वानी शहर पार करने के बाद हमारी एसयूवी नैनीताल के मार्ग पर दौड़ रही थी। एक तरफ पहाड़ की शुरुआत हो गई थी। उन दिनों उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की खबरें खूब आ रही थीं। हालांकि तब नए राज्य उत्तराखंड का सृजन नहीं हुआ था। काठगोदाम और नैनीताल को एनएच 109 नंबर जोड़ता है। हमें सड़क के किनारे कई बोर्ड दिखाई दिए जिसमें लोगों के भावुक अपील की गई थी कि जंगलों को आग लगने से बचाएं।

काठगोदाम से कुछ दूर आगे जाकर भीमताल के लिए रास्ता अलग हो जाता है। पर हम सीधे आगे बढ़े। पर हम नैनीताल तक नहीं पहुंचे। हाईवे के किनारे बने एक छोटे से होटल में हमें ठहराया गया। फिल्म की पूरी यूनिट भी यहीं ठहरी हुई थी। शाम हो गई थी। पर पास में बह रही छोटी सी नदी के किनारे फिल्म की शूटिंग जारी थी। चाय नास्ते के बाद रात के अंधेरे में हमलोग शूटिंग देखने पहुंच गए। नदी के किनारे सेट लगा हुआ था। फिल्म में कोई नामचीन एक्टर नहीं था। पर इसमें मोहन जोशी प्रमुख भूमिका में थे। सैकड़ों मराठी हिदीं और भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाले मोहन जोशी हाल में यशवंत, मृत्युदंड जैसी फिल्मों में अपनी भूमिका के लिए पहचाने जा रहे थे। पर कम रोशनी में मैं उन्हें पहचान नहीं पाया। मैंने उनसे पूछा आपका नाम क्या है...उन्होंने शालीनता से कहा, मोहन जोशी। मेरे साथी पत्रकार मुझ पर हंसने लगे। अगले दिन दोपहर तक फिल्म की शूटिंग के कुछ और दृश्य देखे। हालांकि हमें बाद पता नहीं चला वह फिल्म कब और कहां रीलीज हुई। 

खैर कुछ महीने बाद दोबारा नैनीताल जाना हुआ। दिल्ली से सुबह सुबह बस पकड़ी। दोपहर में नैनीताल उतरा। सामने विशाल ताल दिखाई दे रहा था। यह नैनी लेक नैनीताल के चार तालों में से एक है। इसके अलावा भीमताल, नौकुचिया ताल और सातताल जैसी झीलें हैं यहां। नैनी लेक एक फ्रेश वाटर लेक है, जिसमें नाव पर सैर करना यहां आने वाले सैलानियों का प्रिय शगल है। नैनी लेक तकरीबन डेढ किलोमीटर लंबी है। झीले के किनारे सात पहाड़ियां हैं जो इसका सौंदर्य बढाती हैं। नैनीताल के कई होटल इसी झील के किनारे हैं।
मुझे जिस शादी में शामिल होना था उसका विवाह स्थल ऊपर प्रशासनिक अकादमी और यूथ हास्टल के पास था। शादी में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल सूरज भान पधारे थे। अप्रैल-मई में नैनीताल में दिन में ठंड नहीं थी। पर रात काफी ठंडी हो गई, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था। वैसे नैनीताल में एक और फिल्म सिर्फ तुम की शूटिंग हुई थी। 1999 में आई इस फिल्म में संजय कपूर, प्रिया गिल और सुष्मिता सेन थे।
नैनीताल का यूथ हास्टल  

कहां ठहरें - नैनीताल में ठहरने के लिए सबसे सस्ती जगह यूथ हास्टल हो सकती है। यूथ हास्टल डारमेटरी 120 रुपये छात्रों के लिए 80 रुपये एक दिन का किराया है। कमरा चाहिए तो 750 रुपये एक दिन का। ज्यादातर होटल इससे महंगे हैं। आप ताल के आसपास के ही किसी होटल में ठहरें तो अच्छा होगा। दिल्ली से नैनीताल की दूरी 296 किलोमीटर है। वहीं काठगोदाम से नैनीताल दूरी 25 किलोमीटर है। आप रेल से काठगोदाम तक जा सकते हैं।

नैनीताल में क्या देंखे - नैनी लेक, जीबी पंत हाई एल्टीड्यूट जू, केव गार्डन, नौकुचिया ताल और भीम ताल देख सकते हैं । आगे समय हो तो अल्मोड़ा रानीखेत की ओर भी जाने का कार्यक्रम बना सकते हैं। 

उपसंहार - शादी में शामिल होने के बाद नैनीताल से वापस लौटते हुए मैं किच्छा गया। किच्छा में शुगर मिल में मेरे दोस्त दिग्विजय नाथ सिंह के पिताजी कार्यरत थे। दिग्विजय तो नहीं मिले पर उनके परिवार के सदस्यों के साथ एक दिन गुजारने के बाद मैं दिल्ली वापस आ गया। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
(NAINITAL, UTTRAKHAND, LAKE, FILM SIRF TUM, BHIM TAL, YOUTH HOSTEL )

Tuesday, January 24, 2017

उत्तराखंड आंदोलन और रामपुर तिराहा गोली कांड के शहीद

दिल्ली से सहारनपुर जाने के लिए देहरादून वाली बस में बैठता हूं। कंडक्टर महोदय ने कहा कि बस मुजफ्फरनगर बाईपास से होकर जाएगी। आप रामपुर तिराहे पर उतर जाना। सुबह-सुबह रामपुर तिराहे पर उतर जाता हूं। दूसरी बस के इंतजार में अचानक नजर शहीद स्मारक पर पड़ती है। कदम उस बढ़ जाते हैं। उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों की याद में यह स्मारक बना है। सड़क के किनारे 800 गज में बने विशाल स्मारक में नए राज्य की मांग को लेकर जान गंवाने वालों के नाम सम्मान से लिखे गए हैं। साथ ही यह भी याद किया गया है कि आपकी कुरबानी कभी भुलाई नहीं जा सकेगी। इस स्मारक का विकास संस्कृति विभाग उत्तराखंड की ओर से किया गया है। स्मारक का हरित परिसर मन मोह लेता है।  

रामपुर तिराहा गोली काण्ड पुलिस द्वारा उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के आन्दोलनकारियों पर उत्तर प्रदेश के रामपुर क्रासिंगमुज़फ्फरनगर जिले में की गई गोलीबारी की घटना को कहते हैं। घटना के समय मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री थे। अलग राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारी 1 अक्टूबर, 1994 को दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए जा रहे थे, उस दौरान यूपी पुलिस ने मुज़फ्फरनगर जिले के रामपुर तिराहे के पास आंदोलनकारियों पर गोली चला दी। इसमें कई आंदोलनकारियों की मौत हो गई। साथ ही, पुलिस पर कुछ महिलाओं के साथ छेड़खानी और बलात्कार के आरोप भी लगे। पीएसी और पुलिस की गरजती गोलियों और पटकती लाठियों से लहूलुहान निहत्थे आंदोलनकारी कराह रहे थे। 

'आज दो, अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो' जैसे गगनभेदी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे सभी आंदोलनकारियों को पुलिस ने मुजफ्फरनगर के नारसन रामपुर तिराहे पर रोक दिया। आंदोलनकारियों को बसों से बाहर निकालकर उन पर अंधाधुंध लाठियां बरसाई। मुजफ्फरनगर में हुए उस दिल दहला देने वाले कांड को उत्तराखंड के लोग कभी नहीं भूला पाएंगे।
1994 के इस आंदोलन से अलग राज्य की मांग को और हवा मिली। आंदोलन ने जनान्दोलन का रूप ले लिया और अन्ततः साल 2000 में उत्तराखंड देश का सत्ताइसवां राज्य बना। हर साल इस गोलीकांड की बरसी पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री समेत तमाम नेतागण शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि के पुष्प चढ़ाने आते हैं।

गोलीकांड की जांच - 12 जनवरी 1995 में दायर याचिका के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रामपुर तिराहा गोलीकांड की सीबीआई से जांच कराने के आदेश दिए थे और जांच के बाद सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल किया था। हालांकि इस शर्मनाक कांड के दो दशक से ज्यादा गुजर चुके हैं पर, रामपुर तिराहा गोलीकांड के दोषियों कोअभी तक सजा नहीं मिल सकी है।
-    - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ( RAMPUR TIRAHA GOLIKAND, UTTRAKHAND, MUZAFFARNAGAR, NEW STATE DEMAND )

Sunday, January 22, 2017

लजीज खोवा का रामदाना और खाजा

अगर आप बिहार गए हैं और सिलाव का प्रसिद्ध खाजा खाने की इच्छा है और सिलाव नहीं जा सकते तो कोई बात नहीं। कभी पटना के म्यूजिम रोड पर पहुंचिए। यहां पर संग्रहालय के सामने खाजा की कई दुकानें एक साथ दिखाई देंगी। खाजा बिहार की अत्यंत लोकप्रिय मिठाइयों में से है। इसकी कुछ खास बातें यूं है कि इसे कई दिनों तक रखा जा सकता है। खराब नहीं होता। इसको चाहे जितना मर्जी खाते रहो जी नहीं भरता।
और भी बातें हैं खाजा के बारे में जैसे यह कम मिठास वाला होता है। जितना कम मिठास उतना ही अच्छा खाजा। आजकल शुगर फ्री खाजा भी बनने लगा है। तो साल 2016 में खाजा का भाव चल रहा था 140 रुपये किलो। हो सकता है सिलाव में इससे भी कम भाव हो। यह भाव तो मैं पटना का बता रहा हूं। तो म्यूजिम रोड पर खाजा की कई दुकानें एक साथ पंक्ति में दिखाई देती हैं। ये सारे लोग खाजा समेत कुछ मिठाइयों का निर्माण करते हैं। पर इन दुकानों पर खास तौर पर खाजा पैक कराने वालों की बड़ी भीड़ लगी रहती है।

खाजा एक हल्का फुल्का मिष्टान्न है। इसको ज्यादा भी खा लो तो पेट खराब नहीं होता। थोड़ा खाजा खा लिया तो सुबह का नास्ता हो गया। इसमें मैदा और चीनी मुख्य अवयव होते हैं। तो एक किलो खाजा बाकी मिठाइयों की तुलना में जगह ज्यादा घेरता है। लिहाजा इसकी पैकिंग भी अलग तरह की करनी पड़ती है। खाजा की पैकिंग का सबसे लोकप्रिय तरीका है, इसे टोकरी में पैक करके ले जाना। एक छोटी टोकरी मे ढाई किलो तक खाजा आ जाता है। म्युजिम रोड के दुकानदार 300 रुपये का खाज लेने पर टोकरी में पैक करके आपको सौंप देते हैं। इसके लिए अलग से टोकरी या पैकिंग का कोई शुल्क भी नहीं देना पड़ता है। बिहार की शादियों में खाजा की ऐसी 10, 20 या 50 टोकरियां जाती हैं। जिसका जितना सामर्थ्य और जितनी श्रद्धा। शादियों की लोकप्रिय मिठाई है खाजा। संभवतः खाजा रसगुल्ला, चमचम से ज्यादा पुरानी मिठाई है। तभी तो कहावत बना होगा- अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा...
खाजा मतलब पूरा खा जा...   या फिर पहले खा फिर जा... आप जो भी समझें आपको समझने की आजादी है। 

वैसे म्युजिम रोड के मिष्टान भंडार वाले न सिर्फ खाजा बल्कि रामदाना का लड्डू बनाते हैं खालिस खोवा में। इसका अपना स्वाद है। कभी पटना पहुंचे तो इसे भी खाकर देखें। इसके अलावा वहां अनरसा और नमकीन भी ले सकते हैं। कई शादी के घर वाले भी यहां से थोक भाव में पैकिंग कराते दिखाई देते हैं। 
सिलाव के खाजा के बारे में और यहां पढ़ें...

- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KHAJA, RAMDANA LADDU, PATNA, SILAO, SWEETS, SHADI ) 

Friday, January 20, 2017

सन 42 की क्रांति और पटना के वे सात शहीद

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहासमें युवाओं के जोश को जब जब याद किया जाएगा तब तब पटना के उन सात शहीदों के बिना चर्चा अधूरी रहेगी। ये सातो स्कूली छात्र थे जो गांधी जी के करो या मरो के ऐलान के बाद 11 अगस्त 1942 को पटना में सचिवालय पर तिरंगा फहराने निकले थे। पर ब्रिटिश फौज की गोलियों ने उनकी सीना छलनी कर दिया।  

ये सभी नौजवान स्कूली छात्र थे। सबकी उम्र 18 से 20 साल के आसपास थी। पर मुंबई में बापू के अंग्रेजों भारत छोड़ो के आह्वान के बाद उनके खून में उबाल आ गया। वे तिरंगा लेकर निकल पड़े पटना की सड़कों पर। लक्ष्य था सचिवालय पर यूनियन जैक को उतार कर तिरंगा लहरा देना। हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। सीने में कई गोलियां लगी और वे गिरते चले गए। पटना में बिहार सरकार के पुराना सचिवालय के सामने गोलंबर (राउंड अबाउट) के बीच में इन सात शहीदों की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है। 1979 में छुटपन में पिताजी के साथ पटना गया तो पिताजी ने शहीद स्मारक दिखाया था।

ये प्रतिमाएं इस तरह से लगी हैं मानो लगता है कि वे अभी भी उठ पड़ेंगे और जाकर तिरंगा लहरा देंगे। हालांकि ये 1942 के ये सातो शहीद पांच साल देश को मिली आजादी की सुबह नहीं देख सके। पर उनके जैसे तमाम शहीदों के कारण ही हम आजाद हवा में सांस लेने के काबिल हो सके। इस शहीद स्मारक उन सात लीडरों की आदमकद प्रतिमाएं हैं जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में अपने प्राण दिए थे। वास्तव में यह स्मारक उन निडर नायकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता दिखाने के लिए बनाया गया है।

बिहार के पहले राज्यपाल जयरामदास दौलतराम ने 15 अगस्त 1947 को स्मारक की नींव रखी थी। सन 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय विधान सभा भवन के ऊपर भारतीय तिरंगा फहराने के प्रयास में मारे गए पटना के इन शहीदों को याद रखने के लिए शहीद स्मारक बिहार विधान सभा के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने बना गया है।  पटना के स्कूलों से आजा़दी की लड़ाई में जान देनेवाले सात शहीदों के प्रति यह विनम्र श्रद्धांजलि है।

प्रख्यात मूर्तिकार देवी प्रसाद रायचौधरी द्वारा इन भव्य आदमकद मूर्तियों को इटली में बनाकर यहां लगाया गया था। राय चौधरी का जन्म रंगपुर ( अब बांग्लादेश ) में हुआ था। मूर्तिकला में उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें 1958 में पद्म  भूषण ने नवाजा गया। देश भर में उनके द्वारा सृजित कई मूर्तियों में से पटना का शहीद स्मारक भी एक है। इन मूर्तियों का औपचारिक अनावरण देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा 1956 में हुआ। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान बिहार में 134 लोग शहीद हुए थे। कुल 15 हजार से गिरफ्तारियां हुई थीं।

कौन थे ये थे सात शहीद
11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय में ये स्कूली छात्र तिरंगा फहराने का इरादा लेकर पहुंचे थे।  इन सात शहीदों के नाम उमाकांत प्रसाद सिंह, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगतपति कुमार,

1. उमाकांत प्रसाद सिंह – राम मोहन राय सेमिनरी में नौंवी कक्षा के छात्र थे। नरेंद्रपुर सारण के रहने वाले थे।
2. रामानंद सिंह - राम मोहन राय सेमिनरी में नौंवी कक्षा के छात्र थे। शहादत नगर पटना के निवासी थी।  
3. सतीश प्रसाद झा – पटना कालेजियट स्कूलम  कक्षा दस के छात्र थे। खडहरा भागलपुर के रहने वाले थे।
4.जगतपति कुमार – बीएन कालेज ( बिहार नेशनल कालेज ) के सेकेंड इयर के छात्र थे। खराती औरंगाबाद के रहने वाले थे।
5. देवीपद चौधरी - मिलर हाईस्कूल पटना में नौंवी कक्षा के छात्र थे। वे सिलहट जमालपुर के रहने वाले थे।
6.राजेंद्र सिंह – पटना इंगलिश हाई स्कूल में दसवीं कक्षा के छात्र थे। बनवारी चक, सारण जिला के रहने वाले थे।
7. रामगोविंद सिंह – पुनपुन हाईस्कूल में नौंवी कक्षा के छात्र थे। वे पटना जिले के दसरथ गांव के रहने वाले थे।
-        --- vidyutp@gmail.com
(PATNA, SHAHEED SMARAK, 1942, BHARAT CHODO )


Thursday, January 19, 2017

पटना जंक्शन के बाहर साबरमती का संत

पटना जंक्शन पर जब ट्रेन पकड़ने के लिए पहुंचते हैं तो वहां एक स्टीम लोकोमोटिव आपका स्वागत करता नजर आता है। स्टेशन आते जाते मेरे बेटे ने इस लोकोमोटिव के बारे में जानने की इच्छा जताई। पर यहां इस लोकोमोटिव का इतिहास या परिचय नहीं लिखा गया है। मेरी भी जिज्ञासा हुई इसको लेकर। थोड़ी तलाश के बाद साबरमती के संत के बारे में जानकारियां मिल सकीं।
 मीटर गेज का यह इंजन जिसका नाम साबरमती का संत लिखा है, लंबे समय तक गुजरात में अपनी सेवाएं दे रहा था। यह पूर्ण स्वदेशी स्टीम लोकोमोटिव है। वाईपी 2805 (YP – 2805) का निर्माण टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव वर्क्स ने किया है। यह पहियों के लिहाज से 2-8-2 श्रेणी का लोकोमोटिव है। 
यानी दो पहिए आगे आठ बीच में और जो पीछे लगे हैं। यह एक हेवी टैंक वाला लोकोमोटिव है। यानी यह मीटर गेज पर दौड़ने वाला शक्तिशाली इंजन है।

अब यह लंबे समय से पटना जंक्शन के आगे लोगों का स्वागत कर रहा है। जब आप पटना जंक्शन के मुख्य द्वार से प्रवेश करेंगे तो इसे देख सकते हैं। यह लंबे समय तक गुजरात के वांकानेर स्टीम शेड का हिस्सा रहा। पर रेलवे का गौरवशाली इतिहास दिखाने के लिए इससे लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहने के दौरान पटना जंक्शन पर लाकर प्रदर्शित किया गया है।  इसे गुजरात से लाया गया था इसलिए इसका नाम बड़े सम्मान से साबरमती का संत दिया गया। गांधी जी स्वदेशी के पैरोकार थे और यह लोकोमोटिव भी संपूर्ण स्वदेशी है। वैसे पहले इसका नाम वाईपी 2805 साबरमती दिया गया था।

इस लोकोमोटिव का निर्माण 1968 में टेल्को (टाटा इंजीनयरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी लिमिटेड) जमशेदपुर में किया गया था, तब जमशेदपुर बिहार का हिस्सा था। अब टेल्को लोकोमोटिव का निर्माण नहीं करती। टेल्को का नाम भी बदलकर अब टाटा मोटर्स हो गया है। पर लंबे समय तक इसने भारतीय रेल के लिए कई लोकोमोटिव का निर्माण सफलतापूर्वक किया था। 1945 में टेल्को की स्थापना मूल रूप से लोकोमोटिव कंपनी के तौर पर ही हुई थी। पर बाद में टेल्को ने ट्रक आदि का निर्माण शुरू कर दिया।
टेल्को द्वारा निर्मित वाईपी 2805 लोकोमोटिव को पहले रतलाम डिविजन में सेवा में लगाया गया था। उसके बाद यह राजकोट डिविजन में भेज दिया गया। साल 1998 तक इसने गुजरात और मध्य प्रदेश में सफलतापूर्वक अपनी सेवाएं दीं। यह आखिरी दौर में वांकानेर-मोरबी रेलवे लाइन पर अपनी सेवाएं दे रहा था।
तकरीब तीन दशक तक रेलवे को सफलतापूर्वक अपनी सेवाएं देने के बाद इस भारी भरकम लोकोमोटिव को स्थायी रूप से पटना जंक्शन के बाहर लाकर स्थापित कर दिया गया है।

पटना जंक्शन को कभी इतिहास में बांकीपुर के नाम से जाना जाता था, अब बिहार का सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन है। आते जाते हजारों लोग इस साबरमती के संत के अगल बगल से होकर गुजरते हैं। पहले स्टीम फिर डीजल और अब पटना जंक्शन पर भी बिजली से चलने वाले लोकोमोटिव रेलगाड़ियों का भारी भरकम बोझ ढो रहे हैं। पर यह साबरमती का संत मूक खड़ा मानो यह बता रहा है कि मुझे याद रखना, तुम्हारा दादा हूं मैं... अब यह लोकोमोटिव पूर्व मध्य रेलवे, हाजीपुर की अमानत बन गया है। पटना जंक्शन के बाहर रात की रोशनी में यह साबरमती कुछ इस तरह दिखाई देता है मानो अभी अभी चल ही पड़ेगा।
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( TATA ELECTRICAL AND LOCOMOTIVE CO, YP 2805, PATNA JN, ECR, GUJRAT, MORBI, RATLAM )

Wednesday, January 18, 2017

विरासत - पूर्व मध्य रेलवे मुख्यालय में दो लोकोमोटिव

हाजीपुर में पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय है। यह एक नया जोन है। शहर के रामाशीष चौक पर इसका मुख्यालय बना है। मुख्यालय के अंदर दो स्टीम लोकोमोटिव को लोगों के दर्शन के लिए लगाया गया है। पर मुश्किल है कि इन लोकोमोटिव के साथ इनका कोई परिचय नहीं लिखा गया है। वैसे रेल भवन बड़ौदा हाउस आदि के बाहर स्थित लोकोमोटिव के साथ उनका परिचय लिखा गया है। इससे रेलवे का इतिहास समझने में जिज्ञासु लोगों को आसानी होती है। ईसीआर 1996 में जोन बना, अब इसका मुख्यालय भवन शानदार बन गया है। पुरानी बिल्डिंग और नई बिल्डिंग के बीच में एक सुंदर पार्क भी बन गया है।

डेहरी से आया जंग 12796 स्टीम लोकोमोटिव
हाजीपुर में पूर्व मध्य रेलवे के मुख्यालय में एक और रेलवे इंजन लोकोमोटिव देखने को मिलता है। वह काफी अच्छे हाल में दिखाई देता है। यह है जंग 12796 स्टीम लोकोमोटिव। 

यह ब्राडगेज का स्टीम लोकोमोटिव है जिसे डेहरी ऑन सोन स्थित रोहतास इंडस्ट्रीज के ब्राडगेज शेड से यहां लाकर स्थापित किया गया है। जंग 12796 जर्मनी में 1957 का बना हुआ स्टीम लोकोमोटिव है। यह पहियों के लिहाज से 0-6-0टी श्रेणी का है। वैसे तो डेहरी रोहतास लाइट रेलवे एक नैरोगेज रेलवे सिस्टम था, पर रोहतास इंडस्ट्रीज के पास ब्राडगेज का भी शेड था। इन लोकोमोटिव का इस्तेमाल रोहतास इंडस्ट्रीज के डालमियानगर स्थित कारखाने से डेहरी रेलवे स्टेशन तक मालगाड़ी के डिब्बों को खींचने के लिए होता था। साल 2008 में रोहतास इंडस्ट्रीज का सारा स्क्रैप भारतीय रेलवे ने खरीद लिया था। उसके बाद इस लोकोमोटिव को हाजीपुर लाकर स्थापित किया गया है।
रोहतास इंडस्ट्रीज का एक लोकोमोटिव मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन के बाहर भी स्थापित किया गया है। रोहतास इंडस्ट्रीज के पास कुल सात ब्राडगेज स्टीम लोकोमोटिव थे जिसमें 4 जंग कंपनी द्वारा निर्मित थे। रोहतास इंडस्ट्रीज के बंद हो जाने के बाद भी जंग द्वारा निर्मित 4 में से तीन लोकोमोटिव बहुत अच्छे हाल में थे। हाजीपुर में इन दिनों प्रदर्शित जंग 12796 भी काफी अच्छे हाल में नजर आता है।
जर्मनी की कंपनी जंगेनथाल (JUNGENTHAL)  द्वारा निर्मित यह लोकोमोटिव स्टीम के बेहतरीन लोकोमोटिव में शुमार है। जंगेनथाल ने 1885 में स्टीम इंजन का निर्माण आरंभ किया था। 1913 में कंपनी का नाम एर्नाल्ड जंगेनथाल लोकोमोटिव रखा गया। 1976 में इस कंपनी ने लोकोमोटिव का निर्माण बंद कर दिया। रोहतास इंडस्ट्रीज से ही लिए गए जंग के दूसरे लोकोमोटिव जंग 12797 को समस्तीपुर रेलवे स्टेशन के बाहर संरक्षित कर प्रदर्शित किया गया है। रोहतास इंडस्ट्रीज ने संभवतः अपने अच्छे दिनों में इन लोकोमोटिव को अपनी जरूरतों के लिए खरीदा था। हालांकि कंपनी ने ज्यादातर लोकोमोटिव सेकेंड हैंड खरीदे थे लेकिन जंग के लोकोमोटिव को नया खरीदा प्रतीत होता है।

नौरो गेज का स्टीम लोकोमोटिव 
पूर्व मध्य रेलवे के मुख्यालय के मुख्य भवन रेल निकेतन के सामने बने पार्क के ठीक बाहर एक नैरो गेज का लोकोमोटिव आराम फरमा रहा है। यह लोकोमोटिव पहिए के लिहाज से 2-4-0 श्रेणी का लगता है। इसके बॉडी पर कहीं इसकी कंपनी का नाम और नंबर नहीं नजर आ रहा है। इसलिए इसके बारे में विशेष जानकारी जुटा पाना मुश्किल लग रहा है। ईसीआर के वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी जुटा कर यहां एक बोर्ड लगाना चाहिए।

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 ( BIHAR, HAJIPUR, RAIL, STEAM LOCOMOTIVE, BG, JUNG, GERMANY, ROHTAS INDUSTRIES, DEHRI ) 





Tuesday, January 17, 2017

शिलांग से दिल्ली वाया गुवाहाटी

शिलांग में दूसरे दिन गैरोटो चेपल चर्च, लेडी हैदरी पार्क और एयरफोर्स म्युजिम देख लेने के बाद अनादि और माधवी को भूख लग गई थी। सुबह का नास्ता तो हमने होटल के पास पूरी सब्जी वाले के पास कर लिया था। नेपाली भाई के होटल में पूरी सब्जी के साथ उनकी खीर कदम मिठाई अनादि को खूब पसंद आई। निपको दफ्तर के सामने इस नास्ता घर के बारे में हमें टैक्सी वाले भाई वांकी ने बताया था।
अब दोपहर के खाने के लिए हमलोग मारवाड़ी बासा पहुंचे। पुलिस बाजार का मारवाड़ी बासा  सस्ते आवास और शाकाहारी भोजन के लिए जाना जाता है। पर दोपहर में बासा वाले ने बोला कि आपको एक घंटे इंतजार करना होगा। साथ ही यह भी बताया कि थाली नहीं है। फिर यहां अलग अलग खाना महंगा था। हमने मारवाड़ी बासा की काफी तारीफ सुनी थी पर उनका व्यवहार काफी रुखा लगा। यहीं हमारी मुलाकात मुंबई से आए दो युवकों से हुई जो अपने लिए कमरा ढूंढ रहे थे, पर मारवाड़ी बासा वाले ने उनसे भी बड़ी बेरूखी से बात की।
फिर क्या हमलोग आगे बढ़े। बगल में एक बंगाली होटल नजर आया। यहां 40 रुपये की चावल की थाली है। हमें यहां का भी खाना अच्छा लगा। पर माधवी और वंश को संतुष्टि नहीं मिली। तो हम उन्हें दिल्ली मिष्टान भंडार ले गए। वहां पर मिठाइयां, रस मलाई, छोला भठूरा आदि खाकर वे लोग तृप्त हो गए। कई दशक से दिल्ली मिष्टान भंडार अपने स्वाद के लिए शिलांग में सर्वाधिक लोकप्रिय है।  खाने के बाद पुलिस बाजार की सड़क पर घूमते हुए असम इंपोरियम नजर आया। यहां सेल लगी थी। तो औने पौने दाम में पूर्वोत्तर के  बने कई हस्तशिल्प उत्पाद हमने खरीद डाले। झोला, वेस्ट पाउच,  मफलर, सलवार सूट आदि आदि। इसके बाद पुलिस बाजार में स्थित टैक्सी स्टैंड से ही वांकी भाई ने हमें गुवाहाटी की टैक्सी में बिठा दिया। 
यह टैक्सी स्टैंड होटल शेफायर और लिटल चायना के पास है। यहां टैक्सी तुरंत भर जाती है। जबकि सिविल हास्पीटल के पास के टैक्सी वाले एक घंटे तक चौराहे पर चक्कर लगाकर सवारी ढूंढते रहते हैं। दोपहर के बाद हमलोगों ने शिलांग शहर और वांकी भाई को अलविदा कहा।

शाम को टैक्सी नूंगपो में एक शानदार हाईवे ढाबे में रूकी। यहां शाकाहारी मांसाहारी खाने काे तमाम विकल्प थे। पर हमें कुछ खाने की इच्छा नहीं थी।  अनादि यहां देर तक झूला झूलते रहे। शाम के सात बजने तक हमलोग गुवाहाटी के पलटन बाजार में पहुंच चुके थे। इस बार हमारा ठिकाना बना होटल गीतांजलि। शाम को मैं अनादि और माधवी को खाने केलिए तिरुमाला ढाबा में ले गया जहां मैं पहले भी कई बार खाने जा चुका हूं। अब हमलोग पलटन में बाजार में पूर्वोत्तर की कुछ निशानियां खरीदने में जुट गए। सबसे पहले जाफी खरीदी और बांस और बेंत के बने कुछ और सजावटी सामान। पलटन बाजार रात 10 बजे तक खुला रहता है। 

 गुवाहाटी की एक और सुबह। मैं खिली खिली धूप में टहलने निकल पड़ता हूं। हमें 10 बजे एयरपोर्ट जाना है तो मैं एयरपोर्ट जाने के रास्ता और तरीके पता लगाता हूं। टैक्सी वाले 700 मांग रहे हैं एसी के लिए और 600 नान एसी के लिए। पलटन बाजार से एयरपोर्ट एसी बस भी जाती है। उसका स्टैंड बना हुआ है। पर अकेले जाने वालों के लिए बस ठीक है। सुबह नास्ते के लिए हमलोग कामरूप फूड जंक्शन पहुंचे। एमई रोड पर यह नया फूड प्लाजा खुला है। यहां हमने छोले भठूरे, पूरी सब्जी और मसाला डोसा खाया।
साफ सफाई अच्छी है। कीमतें भी वाजिब हैं। इसके बाद एयरपोर्ट के लिए ओला बुक किया। 24 किलोमीटर के एयरपोर्ट का सफर संतोषजनक रहा। बिल आया महज 349 रुपये यानी टैक्सी वालों से आधा। गुवाहाटी का एयरपोर्ट शहर से दूर है। रास्ते में हमें जुलुकबाड़ी में असमिया के महान कवि और फिल्मकार भूपेन हजारिका की समााधि नजर आई। गुवाहाटी पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा एयरपोर्ट है पर काफी भव्य नहीं है।

गुवाहाटी - लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई एयरपोर्ट पर इंतजार...
चेक इन के बाद लांज में इंतजार। लांज में काफी भीड़ है। कई शहरों की उडानों के लिए लोग बैठे हैं। गुवाहाटी के इस एयरपोर्ट का नाम असम की महान शख्शियत लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई के नाम पर है। 
हमारी उड़ान दिल्ली के लिए एयर एशिया से है। उड़ान 12 बजे है। हम पर्याप्त समय पहले पहुंच गए हैं। एक जर्मनी के बुजुर्ग मिले। वे विशाल असमिया जाफी लेकर अपने वतन जा रहे हैं। असम की यादें संजोए। हमने भी छोटी जाफी ली है।
एयर एशिया से दिल्ली की ओर....
गुवाहाटी से नीयत समय पर विमान ने उड़ान भरी। हमने एयर एशिया का टिकट छह माह पहले कराया था इसलिए हमें रियायती दरों पर मिल गया था। नौ हजार में तीन लोगों का दिल्ली गुवाहाटी का टिकट। हमलोग तीन बजे दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टी 3 पर थे। यहां से एयरपोर्ट मेट्रो सेवा का इस्तेमाल कर नई दिल्ली और फिर एक बार फिर ओला कैब से अपने घर। 11 दिनों बाद फिर से उसी दिल्ली में। पर अनादि और माधवी के जेहन में इस बार पूर्वोत्तर की ढेर सारी मीठी यादें हैं।  
- vidyutp@gmail.com 
( पूर्वोत्तर के तीन राज्यों की यात्रा के संस्मरण, आलेखों को यहां विराम। फिर कभी चलेंगे एक नई यात्रा पर, ये जिंदगी अनवरत यात्रा ही तो है ...) 

(SHILLONG, GUWAHATI, AIR ASIA, DELHI, LOKPRIYA GOPINATH BARDOLOI AIRPORT ) 




Monday, January 16, 2017

यादें रची बसी हैं यहां - डाक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र

गुवाहाटी से एयरपोर्ट की ओर बढ़ते समय शहर के बाहर बायीं तरफ डाक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र का विशाल बोर्ड नजर आता है। असम के इस महान सपूत की यादें संजोए रखने के लिए इस समाधि क्षेत्र का निर्माण गुवाहाटी शहर में कराया गया है। भारतीय फिल्म संगीत और कला के क्षेत्र में भूपेन हजारिका एक अमर नाम है। उन्हें न सिर्फ असम के लोग बेइंतहा प्यार और सम्मान देते थे बल्कि हिंदी और बांग्ला लोगों के बीच भी वे उतने ही लोकप्रिय थे। उनकी आवाज में जो एक अलग किस्म की कशिश थी, उसके लोग दीवाने तो थे ही, वे जब कुछ बोलते थे तो भी उससे संगीत फूटता प्रतीत होता था।

बहुत पहले सरकारी माध्यम दूरदर्शन पर आए एक धारावाहिक लोहित किनारे (1988) में भूपेन का टाइटिल संगीत सुनने को मिला था। तब से उनकी आवाज कानों में रच बस गई थी। बाद में उनका प्यारा सा गीत – एक कली दो पत्तियां नाजुक नाजुक नाजुक उंगलियां सुनने को मिला। करोडो लोगों ने जब हिंदी फिल्म रुदाली (1993 ) में उन्हें दिल हुम हुम करे...गीत में सुना तो उनकी आवाज के कद्रदानों की संख्या में और इजाफा हुआ।

काफी पहले टीवी पर भूपेन दादा का एक इंटरव्यू सुना था, जिसमें वे अपने शिक्षा दीक्षा के बारे में बता रहे थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़े थे भूपेन हजारिका। वे अपने बिड़ला हास्टल के दिनों को अक्सर याद करते थे। वे पांच साल यहां पढ़े। पहले यहां से स्नातक किया फिर भूपेन हजारिका ने 1946 में काशी हिंदू विवि से राजनीति विज्ञान में एमए किया। हजारों महान विभूतियां बीएचयू में पढ़ने आईं। चूंकि मुझे भी यहां पांच साल पढ़ने का सौभाग्य मिला है इसलिए भूपेन दादा और भी अच्छे लगने लगे। साल 2004 में भूपेन दादा लोकसभा का चुनाव लड़े थे भाजपा के टिकट पर हालांकि वे संसद में नहीं जा सके। पर एक संगीत साधक और समाजसेवक के तौर पर उनका कद काफी ऊंचा था। साल 2016 के अक्तूबर महीने में गुवाहाटी में जालुकबाड़ी क्षेत्र में जब डाक्टर भूपेन हाजारिका समाधि क्षेत्र को देखता हूं तो बड़ी खुशी होती है कि असम के इस महान सपूत की यादों को संजोए रखने के लिए इस स्मारक का निर्माण किया गया है।

कई एकड़ में फैले इस समाधि क्षेत्र में भूपेन दादा की समाधि के साथ उनकी एक आदमकद प्रतिमा भी स्थापित की गई है। सुंदर हरित क्षेत्र के बीच पानी के फव्वारे और कृत्रिम झरनों का निर्माण किया गया है। इन झरनों के कल कल के साथ पार्श्व में भूपेन दादा के गीत बजते हैं तो माहौल मनोरम हो उठता है।  

भूपेन हजारिका का जन्म 8 नवंबर 1926 को तिनसुकिया जिले के सादिया में हुआ था। वे असमिया के कवि, गीतकार, संगीतकार के साथ संस्कृति पुरुष थे। असमिया संस्कृति का नाम उन्होंने पूरी दुनिया में ऊंचा किया। वे अपने तमाम गीत खुद लिखते, संगीत बनाते और खुद ही गाते थे। उनके गीत – ओ गंगा तू बहती क्यूं हो...ने लाखों लोगों को अंदर तक झकझोरा। भूपेन दादा को 1992 में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया। 

5 नवंबर 2011 को 85 साल की उम्र में वे हम सब को छोड़कर चले गए, पर उनकी आवाज तो हमेशा गूंजती रहेगी। उनके निधन के 4 साल बाद साल 2015 में उनकी याद में डाक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र का निर्माण कराया गया है, जो अब गुवाहाटी का दर्शनीय स्थल बन गया है। यहां एक म्युजिक बूथ भी बनाया गया है जिसमें आप भूपेन दादा के पसंदीदा गीत सुन सकते हैं। इसके अलावा एक सभागार का भी निर्माण किया गया है। हर साल उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर बड़ी संख्या में लोग उन्हें याद करने यहां पहुंचते हैं।   

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BHUPEN HAZARIKA SMADHI KSHETRA, SINGER, POET, MEMORIAL, JALUKBARI, GUWAHATI )


Sunday, January 15, 2017

युद्ध में बहादुरी की दास्तां बयां करता एयरफोर्स म्यूजियम

लड़ाकू विमान हंटर के साथ जिसने पाकिस्तान के साथ दो युद्धों में जलवा दिखाया....
मेघालय की राजधानी शिलांग भ्रमण के दौरान वायु सेना म्युजियम देखना न भूलें। वास्तव में शिलांग में वायु सेना के ईस्टर्न कमांड (पूर्वी कमांड) का मुख्यालय है। पूरे देश में वायु सेना के पांच कमांड हैं। पूर्वी कमांड की स्थापना 1958 में हुई थी। इस कमांड का युद्ध और शांति दोनों की काल में बहुत बड़ा योगदान रहता है।

युद्ध के समय आर्मी को हर तरीके से मदद करना तो शांति काल में फंसे हुए लोगों की मदद करने में वायु सेना की बड़ी भूमिका रहती है। असम में बाढ़ के दौरान फंसे लोगो को भोजन पहुंचाना हो या उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना हो या ओडिशा में सुपर साइक्लोन का समय वे पूर्वी कमान ने कमाल का काम किया है।
पूर्वी कमान के पास मिग 21 और मिग 27 का बड़ा बेड़ा है। इसके अलावा एएन 32 और एन 26 और सुखोई विमान भी इस कमान के अधीन हैं। साल 1962 के चीन से हुए युद्ध और 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में इस कमान ने बड़ी भूमिका निभाई थी। संग्राहालय के अंदर चित्र प्रदर्शनी के माध्यम से वायु सेना और खास तौर पर पूर्वी कमांड का इतिहास बताया गया है। यहां आप भारत में वायु सेना के विकास की कहानी चित्रों माध्यम से देख सकते हैं। अंगरेजी राज से लेकर आजादी के बाद दास्तां यहां समझी जा सकती है। सभी वायुसेना प्रमुख के चित्र और उनका कार्यकाल देखा जा सकता है।  

वायु सेना के पूर्वी कमांड के मुख्यालय के अंदर एयरफोर्स म्युजियम है जिसे देखकर वायु सेना के बारे में ज्ञान बढ़ाया जा सकता है। यहां वायुयानों के मिनिएचर माडल से लेकर असली विमान और वायुसेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़े और अन्य वस्तुएं देखी जा सकती हैं। यहां भारत चीन युद्ध और 1965 , 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की यादगार तस्वीरें भी देखी जा सकती हैं। यहां पर आप कई तरह के मिसाइल भी देख सकते हैं। जेट विमानों के अंदर का नजारा क्या हो सकता है इसको यहां आप महसूस कर सकते हैं।
एमआई 17 के अंदर का वाशप्लेट और अन्य यंत्र को आप देख सकते हैं। एक वायुसैनिक की वर्दी कैसी होती है। उसका काकपिट कैसा होता है। चेतक का एयरो इंजन के अलावा सुखोई 30, मिराज 2000 और जैगुआर की कहानी चित्रों में देख समझ सकते हैं।  यहां वायु सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों का भी संग्रह है। वायु सेना का ये संग्रहालय पूर्वोत्तर राज्यों के कला और संस्कृति के रंग से भी यहां आने वालों को रूबरू कराता है। 
एएमआई 4 हेलीकॉप्टर के साथ, 70 के दशक में इसका जलवा था....


संग्रहालय के बाहर लॉन में एक एमआई 4 हेलीकॉप्टर प्रदर्शित किया गया है जो 60 के दशक में काफी इस्तेमाल में था। 1971 तक एमआई 4 ने वायु सेना में परिवहन में अपनी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1971 के युद्ध में बांग्लादेश के सिलहट क्षेत्र में इसने खूब उड़ाने भरी थीं। बांग्लादेश को आजाद कराने में एमआई 4 की भी भूमिका यादगार है। आगे आप यहां एनतनोव 32 ( एएन 32)  विमान के प्रोपेलर को देख सकते हैं। इस विमान की भी वायु सेना के परिवहन में अहम भूमिका है। आज भी यह विमान वायुसेना की रीढ़ बना हुआ है। इसे खास तौर पर देश के हर हिस्से में सामान ढोने और लोगों को परिवहन में भी इस्तेमाल में लाया जाता है। यह एक डबल इंजन वाला विमान है जिसकी 100 से ज्यादा विमानों की खेप भारतीय वायुसेना के पास है। इसके पंखे में कुल 4 ब्लेड लगे होते हैं जो 5000 हार्स पावर की शक्ति से 1075 आरपीएम ( रोटेशन पर मिनट) की गति से घूमते हैं। यहां इजरायल से खरीदे गए अवाक्स विमान को भी शान से विराजमान देखा जा सकता है। 
हंटर से मुलाकात - संग्रहालय के बाहर लॉन में आप हंटर विमान को देख सकते है। 1954 में आए हंटर ने भारत पाकिस्तान के बीच हुए दो युद्ध 1965 और 1971 में अपना कमाल दिखाया था। जैसलमेर बेस से उड़ान भरने वाले छह हंटर विमानों ने पाकिस्तान में खूब तबाही मचाई थी। दो सीटों वाले इस विमान का लंबे समय तक फाइटर पायलटों ने इस्तेमाल किया। 

पोलैंड से 1975 में आया इसकरा ( ISKRA) ट्रेनर विमान। इसकी समान्य गति 600 किलोमीटर प्रतिघंटा और अधिकम 720 किमी प्रति घंटा है। खास तौर पर नए पायलटों की ट्रेनिंग में इसका इस्तेमाल हुआ करता था। 



कैसे पहुंचे - एयरफोर्स म्यूजिम ईस्ट खासी  हिल्स में अपर शिलांग में स्थित है। आपको शिलांग के पुलिस बाजार चौराहे से कोई वाहन लेकर यहां तक पहुंचना होगा। संग्रहालय दोपहर में एक से ढाई बजे तक बंद रहता है। प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। आपको पास कोई मान्य परिचय पत्र होना चाहिए।  पर यहां पूरा संग्रहालय देखने के लिए दो घंटे का वक्त मुकर्रर रखें। संग्रहालय परिसर में सोवनियर और गिफ्ट शॉप भी है जहां से आप यादगारी के लिए कुछ खरीद भी सकते हैं। संग्रहालय में घूमते हुए यह ध्यान रखें कि आप संग्रहालय के अलावा वायु सेना क्षेत्र के बाकी हिस्सों में नहीं जाएं। 
-vidyutp@gmail.com

( SHILLONG, MEGHALAYA, AIR FORCE MUSEUM ) 

कारिबोउ डीएचसी के साथ... 32 सैनिको को लेकर उडा़न भरने में सक्षम था। 400 किलोमीटर प्रतिघंटे तक की अधिकतम गति के साथ उड़ान भरता था। 1963 से लेकर 1988 तक सेवा में रहा। कम जगह में भी उतरने में सक्षम।