Friday, December 2, 2016

कृष्ण की द्वारका है माजुली ((05))

क्या है मतलब माजुली नाम का । कैसे मिला माजुली को ये नाम। वास्तव में असमिया में मा का मतलब है लक्ष्मी यानी धन की देवी वहीं जुली का मतलब हरियाली से है। यानी माजुली धन और हरितिमा दोनों का सम्मिलित पर्याय है। माजुली का हरा भरा वातावरण इसके नाम के अर्थ को सार्थक करते हैं। अठारहवीं सदी से पहले माजुली को माजाली के तौर पर पुकारा जाता था। पर बाद में यह माजुली कहा जाने लगा। माजुली को लेकर धार्मिक आख्यान से जोड़कर कई तरह की दंतकथाएं कही जाती हैं। तो आइए जानते हैं इनमें से कुछ दंतकथाओं को।

ब्रह्मपुत्र का गुस्सा है माजुली - असम के लोककथाओं में कहानी कही जाती है कि यहां के राजा अरिमत्ता ने परिस्थितिवश अपने पिता की हत्या कर दी। पितृहंता के पाप से बचने के लिए उसने कई कोशिशें की। उसने उसने सोना समेत तमाम बेशकीमती पत्थर दान करने का उपक्रम किया। उसने ये सारा दान विशाल ब्रह्मपुत्र नदी में किया जिससे वह पाप से बच सके। पर ब्रह्मपुत्र ने उसके इन दान कर्म को स्वीकार नहीं और नाराज होकर वह दो हिस्सों में बंट गई। इन दो धाराओं में बंटने से बीच में एक विशाल द्वीप का निर्माण हुआ, जिसे कालांतर में माजुली के नाम से जाना गया।

परशुराम की तपस्थली है माजुली - दूसरी कहानी भी कही जाती है माजुली के बारे में। संत और ऋषि परशुराम से उनकी मां की हत्या हो गई। उन्होंने अपने इस पाप से मुक्ति के लिए पूरी दुनिया की यात्रा की। अंत में उन्होंने असम क्षेत्र में आकर भगवान कृष्ण की आराधना शुरू की। वे लंबे समय तक तपस्या में रत रहे। इस दौरान नदी की दो जलधाराएं उनके दोनो तरफ से बहीं। बीच में जहां वह बैठे थे वह स्थल माजुली है।  पूर्वोत्तर राज्यों का परशुराम से बड़ा रिश्ता है। तभी ढिब्रूगढ़ से आगे अरुणाचल प्रदेश में परुशुरामकुंड नाम सरोवर स्थित है जो हिंदुओं की आस्था का केंद्र है।


कृष्ण की द्वारका है माजुली - एक और कहानी कही जाती है कि जब भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ द्वारका से भागने की नौबत आई तब उन्होंने पूर्वोत्तर का रुख किया। कृष्ण ने लंबे समय तक रुक्मिणी के साथ इसी माजुली द्वीप में आकर आराम किया।  रुक्मिणी यहां रहते हुए माजुली के पवित्र और शांत वातावरण से काफी प्रभावित थीं। तब रुक्मिणी ने कहा कि यह तो उनके कल्पना की द्वारका नगरी है। तब भगवान कृष्ण ने भी कहा कि माजुली भविष्य में द्वारका नगरी के रूप में जानी जाएगी। तो माजुली कृष्ण की द्वारका भी है। इसलिए माजुली का कृष्ण और उनकी रासलीला से आज भी गहरा रिश्ता है। माजुली में कृष्ण की मौजूदगी को यहां के सत्र जीवन में बखूबी महसूस किया जा सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य


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