Saturday, December 31, 2016

चला-चली की वेला... माजुली को हमेशा याद रखें... ((28))

चला-चली की वेला है। हम माजुली से वापसी के लिए तैयार हैं। पर ला मैसन डी आनंदा कभी खाली नहीं रहता। हमारी जगह नए मेहमान आ गए हैं। पुणे से सोनम और लक्ष्मी टपक पड़ी हैं। मंजीत रिसांग कहते हैं हम अपने हर मेहमान को टैक्सी स्टैंड तक छोड़ते हैं। वे हमें अपनी एक्टिवा से बारी बारी बारी से टैक्सी स्टैंड छोड़ आते हैं। हम एक बार फिर शेयरिंग टैक्सी में हैं। कमलाबारी फेरी तक के लिए 30 रुपये प्रति सवारी। डेढ़ बजे दोपहर वाली फेरी हमारा इंतजार कर रही है।

फेरी पर चढ़ने से पहले हम एक बार माजुली को पीछे मुड़कर देखते हैं। जैसे अपना घर छूटा जा रहा हो। मंजीत भाई कह रहे थे कुछ विदेशी सैलानी हर साल माजुली आते हैं, भला क्यों। माजुली से उनका कुछ इस तरह का भावनात्मक लगाव हो जाता है कि खींच लाता है ये नदी द्वीप उन्हें बार-बार।  
आदमी, बाइक, कार, एसयूवी सब लद चुका है और फेरी चलने को तैयार है। अक्तूबर महीने में पिछले दो दिन में कई जगह अच्छी बारिश हुई है। ब्रह्मपुत्र में पानी बढ़ गया है। फेरी वापसी के सफर पर चल पड़ी है। मैं और अनादि एक बार फिर फेरी की छत पर हैं फेरी के कप्तान के केबिन के इर्द गिर्द से नदी के अनंत विस्तार और पीछे छूट रहे माजुली द्वीप का नजारा करने के लिए। हल्की हल्की बारिश हो रही है तो हम विनचिटर तान लेते हैं। एक सहयात्री बताते हैं कि आज नदी में करंट ज्यादा है। निमाती घाट से माजुली आते समय में फेरी धारा के साथ आती है तब 14 किलोमीटर का सफर 50 मिनट में पूरा करती है। वापसी का सफर कोई डेढ़ घंटे का होता है। पर यह क्या आज सफर में वक्त ज्यादा लग रहा है। हमारी फेरी कोई ढाई घंटे से भी ज्यादा वक्त लगाती है। नदी में तेज प्रवाह होने के कारण कप्तान को दिक्कतें आ रही है।

फेरी में नीचे देखकर आता हूं दो विशाल बड़े बड़े डीजल इंजन लगे हैं। आधे लोग बैठे हैं तो आधे लोग अलग अलग जगह पर फोटो खींचने में लगे हैं। सहयात्री बताते हैं कि जून से सितंबर के बीच बारिश के दिनों में कई बार चार चार दिनों के लिए फेरी को बंद करना पड़ता है। उस वक्त जब ब्रह्मपुत्र उफान पर होती है, फेरी का संचालन मुश्किल हो जाता है। तब माजुली जोरहाट से कट ही जाता है।  
वहीं दिसंबर के महीने में इस क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र  में पानी कम हो जाता है। तब नदी में खोदकर फेरी चलाने के लिए चैनल बनाना पड़ता है। दोनों ही स्थितियां मुश्किल भरी होती हैं। पर फेरी के साथ माजुली के लोगों को बहुत गहरा रिश्ता है। शाम के 4 से बज चुके हैं।  हमें अब निमाती घाट नजर आने लगा है। पर दूसरी तरफ ब्रह्मपुत्र में छोटे छोटे मानव विहीन द्वीप नजर आते हैं। इनमें से कई द्वीप ब्रह्मपुत्र हर साल बनाती है तो कई द्वीपों को लील भी जाती है। एक द्वीप पर एक सज्जन अपने जानवरों को लेकर चराते हुए नजर आते हैं। उनके पास एक नाव भी है। बड़ा जीवट वाला काम है निर्जन द्वीप पर जानवर लेकर जाना फिर वापसी।

खैर निमाती घाट आ चुका है। हम एक दूसरे फेरी के सहारे सड़क पर पहुंच जाते हैं। दर्जनों शेयरिंग टैक्सियां खड़ी हैं। जिसमें बैठो तुरंत भर गई। शुरू हो गया सफर जोरहाट बाजार की ओर। आसाम ट्रंक रोड बाइपास होते हुए हम जोरहाट शहर में प्रवेश करते हैं। शाम को बाजार में काफी रौनक है। हम रेलवे स्टेशन के लिए रिक्शा लेते हैं । फिर हमें रिक्शा वाले बिहार के ही मिलते हैं।

रेलवे स्टेशन पहुंच कर गुवाहाटी इंटरसिटी का इंतजार। प्लेटफार्म पर दो छोटी छोटी कैंटीन हैं। समोसा पांच रुपये। लौंगलता पांच रुपये। स्वाद अच्छा है। छोटा सा वेटिंग हाल है स्लीपर क्लास के लिए। साफ सुथरा। मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट भी काम कर रहे हैं। ट्रेन समय पर आती है और चल पड़ती है। रात नौ बजे के आसपास फरकाटिंग जंक्शन आता है। यहां 35 मिनट का ठहराव है। स्टेशन पर  मौजूद भोजनालय से हम खाना पैक कराते हैं। 50 रुपये की थाली। ट्रेन फरकाटिंग से गुवाहाटीके लिए चल पड़ती है। 

 हमलोग अपने बर्थ पर सो जाते हैं। हां रेल में चढ़ने के बाद हम माजुली में ला मैसन डी आनंदा के मंजीत भाई को एसएमएस करते हैं – हम सकुशल जोरहाट पहुंच गए और ट्रेन मिल गई। उनका तुरंत भावुक सा उत्तर आता है- कृपया माजुली को हमेशा याद रखें। भला हम माजुली को भूला कैसे सकते हैं। यह तो अब हमारी स्मृतियों का स्थायी हिस्सा बन चुका है।

-        ---विद्युत प्रकाश मौर्य
(ASSAM, MAJULI, JORAHAT, BRAHAMPUTRA RIVER)
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1 comment:

  1. लाजवाब !
    वो माजुली जो रहेगा याद !

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