Monday, December 26, 2016

माजुली की आधी आबादी है मिशिंग जनजाति ((23))

माजुली द्वीप का सबसे प्रमुख जन जातीय समूह है मिशिंग। यह द्वीप के कुल आबादी का तकरीबन आधा है। इसलिए माजुली के कई गांवों में मिशिंग जनजाति के लोग ही रहते हैं। तकरीबन 63,500 आबादी है माजुली में मिशिंग लोगों की। ला मैसन डी आनंदा के केयर टेकर मंजीत रिसांग भी मिशिंग जनजाति से आते हैं।
वे बताते हैं कि मिशिंग लोग कई सौ साल पहले अरुणाचल प्रदेश से माजुली आए थे। मिशिंग लोगों का यहां मुख्य पेशा कृषि और मछली पकड़ना है। ये लोग ज्यादातर बांस के घर बनाकर रहते हैं। वैसे असम और अरुणाचल में मिशिंग लोगों की संख्या 10 लाख से ज्यादा है। असम के जोरहाट, गोलाघाट, धेमजी, शोणितपुर, लखीमपुर, तिनसुकिया, ढिब्रूगढ़,  शिबसागर जिले में मिशिंग लोग पाए जाते हैं। अरुणाचल प्रदेश में अभी पूर्वी सियांग, लोअर दिबांग वैली और लोहित जिले में इनकी आबादी है। पूर्वोत्तर में बोडो के बाद ये दूसरी बड़ी जनजाति है।
MONJIT with KALKI KOCHLIN 
मिशिंग मतलब बहुमूल्य आदमी -  मिशिंग लोग अगर शाब्दिक अर्थ की बात करें तो मतलब निकलता है बहुमूल्य आदमी। मूल की बात करें तो तिब्बती बर्मी परिवार से आते हैं। यानी उनका संबंध मूल रूप से तिब्बत से है। हालांकि उनके माइग्रेशन का  कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है, पर मिशिंग लोग बताते हैं कि वे तिब्बत से पहले अरुणाचल में आए फिर वहां से असम में अलग अलग स्थानों पर। साक्षरता की बात करें तो मिशिंग लोगों के बीच साक्षरता दर काफी ऊंची है। पुरुषों में साक्षरता 78 फीसदी है।
असम राज्य में मिशिंग आटोनोमस काउंसिल बना है जिसमें 36 विधानसभा सीटों से मिशिंग लोग ही चुनकर जाते हैं। 2009 में एक संस्था बनाकर मिशिंग लोगों ने अपने लिए अलग राज्य के लिए भी आवाज बुलंद की थी।  अरुणाचल प्रदेश के मिशिंग लोगों की बात करें तो वे योद्धा रहे हैं और उन्होंने कई युद्ध लड़े हैं।
असम की आबादी सरकारी नौकरी में, डॉक्टर, उद्योग जगत आदि में भी मिशिंग लोगों का प्रतिनिधित्व काफी बेहतर है। अगर माजुली के मिशिंग गांवों की बात करें तो उनका जीवन स्तर काफी साधारण है।
माजुली के मिशिंग लोगों में ज्यादातर वैष्णव धर्म को मानते हैं पर यहां काफी लोग डोनी पोलो को मानने वाले भी हैं। माजुली में भी डोनी पोलो का नामघर बना हुआ है।
ला मैसन डी आनंदा से सुबह उठकर मैं और अनादि टहलने के लिए निकलते हैं। शिव मंदिर के बगल वाले रास्ते से बांस के बने पुल को पारकर एक मिशिंग गांव में प्रवेश करते हैं। यह बांस का पुल हिलता डुलता जरूर है पर इसके ऊपर से न सिर्फ साइकिल मोटर साइकिल बल्कि मोटरकार भी पार कर जाती है। गांव का नाम है चितादारचुक। गांव में एक बांस से कमरे में पोस्ट आफिस भी है। हर भरी कच्ची सड़क बांस के झुरमुट के बीच से बढ़ती चली जा रही है। हमें दो आस्ट्रेलियाई महिलाएं आती दिखती हैं जो गांव में आगे एक रिजार्ट में ठहरी हैं।
गांव के लोग सुबह सुबह साइकिल से बाजार के लिए जा रहे हैं। एक साइकिल वाला ग्रामीण साइकिल से उतरकर मुझे नमस्कार करता है फिर आगे बढ़ जाता है। कुछ लोग सूअर का मांस ( पोर्क) खरीदकर वापस लौट रहे हैं। सभी घर बांस से बने हैं। बांस के स्तंभ पर मचान के ऊपर। महिलाएं सुबह सुबह काम में जुट गई हैं। थाटल यानी हथकरघा पर चादरें, मेखला बुनने का काम। एक महिला बताती है एक चादर तैयार होने पर पांच हजार में बिकेगी। तो दूसरी महिला जो चादर बुन रही है उसकी कीमत 3500 मिलने की उम्मीद जता रही है।  अमूमन हर घर में बुनने का काम चल रहा है।


गांव में जगह जगह लकड़ी की नाव दिखाई दे रही है। साफ पता चलता है कि बारिश के दिनों में इधर नाव चलने लगती है। गांव के बीच में एक छोटा सा जनरल स्टोर भी नजर आता है। थोड़ा आगे बढ़ने पर एक बांस के घर के बाहर एक साथ  निक्कर टी शर्ट पहने कुछ कमसिन लड़कियां बैठी दिखाई देती हैं। उनके साथ एक महिला है जो असमिया में कुछ कह रही है जो मेरी समझ में नहीं आया। हम वहीं से वापस लौट आते हैं। शिवमंदिर के पास मंजीत रिशांग और उनके भाई मिलते हैं। बड़ा सा सूअर काटा जा चुका है और उसका मांस बिक रहा है। पास के कुछ दुकानों पर हरी सब्जियां भी बिक रही है। 
- vidyutp@gmail.com
(MAJULI, MISHING TRIBE, ASSAM, ARUNACHAL, DONYI POLO ) 
माजुली के मिशिंग गांव में बिक रहा सूअर का मांस। 
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