Saturday, December 24, 2016

बापू के बताए रास्तों पर चलता एक गांव - देवरी ((21))

यह माजुली द्वीप की सबसे लंबी सड़क है। सड़क गड़मूर बाजार से जंगराई मुख की ओर जा रही है। ये 26 किलोमीटर का रास्ता है। दोनों तरफ हरे भरे धान के खेत। बीच बीच में छोटे छोटे चौराहे आ जाते हैं, जहां दो चार छोटी छोटी दुकानें हैं। विजयादशमी का दिन है। रास्ते एक जगह धार्मिक स्थल पर गांव के लोग पूजा में जुटे दिखाई देते हैं। सभी पुरुष सफेद कपड़ों में हैं। आगे एक धार्मिक जुलूस निकल रहा है। इसमें महिलाएं और लड़कियां सफेद साड़ियों में कतार में चल रही हैं। सबसे आगे वाद्य यंत्रों की धुन पर कुछ लोग धार्मिक गीत गाते चल रहे हैं। सबसे आगे एक नाव का सजा कर रखा गया है। नाव की पूजा।

माजुली के लिए नाव बहुत की अहम। यहां हर घर के पास नाव है। बारिश के दिनों में जब हर गांव में पानी भर जाता है ये नाव ही तो सहारा बनती है। इसलिए नाव तो इनके लिए प्रत्यक्ष देवता के समान है। यही नाव बारिश के चार महीने माजुली के लोगों के लिए घर बन जाती है। यहां विजयादशमी पर कहीं भी दुर्गापूजा नहीं देखने को मिला। माजुली के लोग तो कान्हा की भक्ति में रमे हैं। सजी-धजी महिलाएं और माजुली बालाएं आस्था की इस यात्रा में नंगे पांव सड़क पर निकल पड़ी हैं।

थोड़ी देर हम उनके साथ चलते हैं फिर चल पड़ते हैं आगे। अनादि धान के खेतों के साथ कुछ तस्वीरें खिंचवाना चाहते हैं तो हमलोग रूक जाते हैं। हमारे गांव में धान की खेती खूब होती पर अनादि कभी धान के मौसम में गांव नहीं गए।

जंगराईमुख से पहले एक पंचायत ब्लॉक डेवलपमेंट आफिस आता है। इसके अंदर गांधी जी मूर्ति मुस्कुराती हुई दिखाई देती है। थोड़ा आगे चलने पर लोग सड़क के किनारे स्टैंड पर कैरम बोर्ड लगाकर खेलते हुए नजर आते हैं। बंगाल में भी लोग इस तरह कैरम खेलते नजर आते हैं।   

बाजार से पहले हमें जंगराई मुख कालेज का हरे रंग का चमचमाता हुआ भवन नजर आता है। यह कालेज 1973 में स्थापित है। वैसे माजुली का प्रमुख कालेज माजुली कालेज है। ये कालेज ढिब्रूगढ़ यूनीवर्सिटी के तहत आते हैं।  

थोड़ा और चलने पर हमें जंगराई मुख बाजार नजर आता है। एक तिराहा और उसके आसपास सौ के करीब दुकानें। जैसा कि मंजीत रिसांग ने बताया था पर हमें यहां कोई खाने के लिए होटल नहीं नजर आया। गांव की जरूरतों के अनुरूप बाजार है। यहां से हम पहले बायीं तरफ की सड़क पर चलते हैं। इधर ज्यादातर गांव मिसिंग जनजाति के लोगों के हैं। एक तरफ हमें नदी की जलधारा दिखाई देती है। यह ब्रह्मपुत्र की सहायक खैरकुटिया नदी का क्षेत्र है। जंगराईमुख से लखमीपुर जाने के लिए सड़क मार्ग है। विशाल हरे भरे बांस के झुरमुट हैं।

चरखा चलता बापू का ....

हम अपनी एक्टिवा वापस मोड़ते हैं। जंगराई मुख बाजार से दाहिनी तरफ वाली सड़क पर हम आगे बढ़ते हैं। कुछ दूर चलने पर सड़क कच्ची होने लगती है। जगह जगह कटाव नजर आता है। यह सड़क गांव के लोगों के लिए बांध का भी काम करती है। हमें यहां एक गेस्ट हाउस भी नजर आता है। पर लगता है उसमें कोई रहता नहीं। कोई छह किलोमीटर चलने पर हम देवरी गांव में पहुंच जाते हैं। यह भी एक मिसिंग ट्राईब के लोगों का गांव है।

देवरी गांव में लगभग हर घर में हाथ से चलने वाला करघा थाटल दिखाई देता है। कुछ घरों में रुककर हम गृहस्वामी और परिवार के सदस्यों से बातें करते हैं। वे बताते हैं कि हम गांधी जी के संदेश को मानते हुए अपने लिए कपड़ा खुद बुनते हैं। वे लोग हथ करघा से चादर, असमिया गमछा तैयार करते हैं। नीचे करघा लगा है। बांस के स्तंभो पर बने अस्थायी घर में ऊपर परिवार रहता है। एक महिला अलमारी खोल कर तैयार वस्त्र दिखाती है। ये लोग तैयार कपड़ों को एजेंटों को बेचते हैं जो इंपोरियम तक पहुंचता है। पर एक असमिया गमछा वे गांव में भी कम से कम 250 रुपये में देने को तैयार होते हैं। हालांकि अब मिल के बने हुए गमछे सस्ते मिल जाते हैं।

रास्ते में हमें कुछ देवरी महिलाएं मिलीं। वे ब्लाउज के ऊपर एक साफा बांधती हैं। सिर पर गमछा लपेटती हैं तो कमर के नीचे भी खुद की बुनी हुई सफेद चादर लपेटे हुए दिखाई दीं।


देवरी की बात करें तो माजुली में इस गांव के नाम पर देवरी जनजाति भी है और देवरी की अपनी देवरी भाषा भी है। यह माजुली के 144 गांवों में से एक है। देवरी गांव के रास्ते में भी लोग पूजा करते दिखाई दिए। यहां एक पालकी पर नाव को सजा कर ले जाया जा रहा था। यह नाव ही तो इन्हें ब्रह्मपुत्र के कोप से बारिश के दिनों विजय दिला पाती है। 

- vidyutp@gmail.com

(MAJULI, ASSAM, JANGRAI MUKH MARKET, DEORI VILLAGE ) 
माजुली के देवरी गांव में एक सेल्फी ....
माजुली की यात्रा को शुरुआत से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

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