Friday, December 23, 2016

सामाजिक बदलाव का अगुआ रहा माजुली का गड़मूर सत्र ((20))

गड़मूर वैसे तो माजुली जिले का मुख्यालय है। जब माजुली जोरहाट जिले का सब डिविजन था तब से यहां प्रशासनिक दफ्तर हुआ करते थे। माजुली के भूगोल के लिहाज से भी देखा जाए तो गड़मूर बीच में है। पर गड़मूर जाना जाता है इसी नाम से सत्र के लिए। गड़मूर सत्र का एक प्रवेश द्वार गड़मूर बाजार में जब आप कमलाबाड़ी की ओर से आते हैं तो बायीं तरफ दिखाई देता है। पर गड़मूर सत्र यहां से एक किलोमीटर अंदर है।

सड़क से दाहिनी तरफ सत्र का भव्य प्रवेश द्वार है। यहीं पर सत्र का का के अतिथिगृह भी बना हुआ है। गड़मूर सत्र अति व्यस्थित साफ सुथरा और चमचमाता हुआ नजर आता है। गड़मूर वास्तव में दो शब्दों से मिलकर बना है। असमिया में  गढ़ मतलब कोई ऊंचा स्थान। मूर मतलब प्रमुख। गड़मूर सत्र भी असम के अमीर सत्रों में से एक है। राजा शिव सिंह ने इस सत्र को 30 हजार पूरा ( 1 पूरा में 2.66 एकड़ ) जमीन दान में दी थी जिससे कोई मालगुजारी नहीं वसूली जाती है।

गड़मूर सत्र की स्थापना 1653-1660 के दौरान अहोम राज जय ध्वज सिंह के संरक्षण में हुई थी। इस सत्र में कृष्ण की पूजा बंशी गोपाल, अच्युतानंद और मोहन मुरारी के रूप में की जाती है।  
वर्तमान सत्राधिकार परमानंद देवगोस्वामी
सत्र के अंदर सुंदर और विशाल नामघर बना हुआ है। आजकल सत्र में भगत लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है। अभी 21 भगत यहां निवास कर रहे हैं।

वर्तमान सत्राधिकार परमानंद देव गोस्वामी बिल्कुल युवा हैं। एक भक्त ने बताया कि पहले वाले सत्राधिकार विवाह करके चले गए। तब हमने नए सत्राधिकार का चुनाव किया। यह एक उदासीन सत्र है इसलिए इसमें विवाहित लोग नहीं रहते।

सुबह और शाम को गड़मूर सत्र में विधिपूर्वक पूजा होती है। हमलोग सुबह सुबह पहुंचे हैं तो नाम घर में संगीत की सुर लहरियों के साथ भक्त लोग नटवर नागर की पूजा में लीन हैं। हमारी मुलकात वर्तमान सत्राधिकार परमानंद देवजी से हो जाती है। वे हमें सत्र का परिसर और संग्रहालय देखने को कहते हैं। गड़मूर सत्र के नामघर की दीवारों पर चित्रों में भागवत कथा उकेरी गई है। इसके साथ असमिया में कथा भी लिखी गई है।

गड़मूर सत्र में तीन बिहू, पूर्व सत्राधिकारों के पुण्यतिथि, रासलीला, फाल्गुनोत्सव (होली) जन्माष्टमी, शिवरात्रि आदि उत्सव श्रद्धा और उल्लास से मनाए जाते हैं।
गड़मूर सत्र में एक म्युजियम भी बना है। यहां पीतल के तारों के इस्तेमाल से बनी विशाल साड़ी, चांदी के तारों से बनी विशाल साड़ी, तुलसी की बनी हुई साड़ी, धातु के बने हुए बरतन, मयूर घंटा, गज घंटा, चांदी के बरतन आदि देखे जा सकते हैं। इसके अलावा तकरीबन 40 बहुमूल्य पांडुलिपियां इस सत्र की धरोहर हैं।
श्री पीतांबर देव गोस्वामी और गड़मूर सत्र
आधुनिक काल में गड़मूर सत्र के पूर्व सत्राधिकार श्री पीतांबर देव गोस्वामी का बड़ा नाम है। वे बड़े समाजसुधार होने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान करने वाले सेनानियों में सम्मानित नाम हैं। वे गांधी जी, पंडित नेहरू और बिनोबा भावे के असम के करीबी लोगों में से एक थे। गड़मूर सत्र का असमिया साहित्य के प्रचार प्रसार में बड़ा योगदान रहा है। 12वें सत्राधिकार श्री श्री पीतांबर देव गोस्वामी ने खास तौर पर कई पुस्तकों की रचना की है। राम कथा पर आधारित उन्होंने राम बनबास, लव कुश की रचना की तो महाभारत कथा पर आधारित युधिष्ठिर अश्वमेध यज्ञ लिखा।

उन्होंने करीब 20 पुस्तकों का सृजन किया। पर न सिर्फ असमिया बल्कि हिंदी साहित्य के विकास में उनका बड़ा योगदान है। 10 जून 1885 को जन्मे पीतांबर देव जी छह साल के उम्र में बाल भक्त के तौर पर गड़मूर सत्र आ गए थे। 21 साल की उम्र में वे गड़मूर सत्र के सत्राधिकार बने। पीतांबर देव जी का निधन 20 अक्तूबर 1962 को 77 साल की आयु  में हुआ। संस्कृत के विद्वान होने के साथ ही उन्होंने आयुर्वेद का गहन अध्ययन किया था वे शास्त्रीय संगीत और वाद्य यंत्र जैसे सितार हारमोनियम के भी अच्छे जानकार थे। स्वंतत्रता आंदोलन के दौरान 1943 में उनकी गिरफ्तारी हुई और वे दो साल जेल में भी रहे। असम के कार्बी क्षेत्र में जनजातीय लोगों के विकास कार्य के लिए भी उन्हें याद किया जाता है।
असम में हिंदी का प्रचार किया  
गड़मूर सत्र के 12वें पूर्व सत्राधिकार पीतांबर देव गोस्वामी का असम में हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में बड़ा योगदान था। जोरहाट में हिन्दी शिक्षा की व्ययस्था की श्री पीताम्बर देव गोस्वामी ने नेहरू पार्क स्थित अपनी जमीन का एक टुकड़ा हिन्दी प्रचार के लिए दान में दिया। सन 1936 में बाबा राघवदास के नेतृत्व में गठित अखिल भारत हिन्दी प्रचार समितिके अंतर्गत असम में गड़मुर सत्राधिकार श्री पीताम्बर गोस्वामी के सभापतित्व में असम हिन्दी प्रचार समितिगठित की गई। इसके सचिव कृष्णनाथ शर्मा बने। सभापति कि हैसियत से स्थानीय नेताओं से परामर्श कर पीतांबर देव गोस्वामी ने ऊपरी असम के जोरहाट, गोलघाट, शिवसागर, डिब्रुगढ़ आदि जगहों पर कई हिन्दी स्कूलों की स्थापना की।  गड़मूर सत्र के परिसर में पूर्व सत्राधिकार श्री पीतांबर देव गोस्वामी की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

गड़मूर सत्र के सत्राधिकार - 

1. जय हरिदेव गोस्वामी 
2 लक्ष्मी नारायण देव
3 जयराम देव
4. बालरामदेव
5 हरिदेव प्रथम
6 कृष्णदेव 7 बासुदेव
8. रघुदेव 9. हरिदेव द्वतीय
10. भद्रकृष्ण देव
11 जोगचंद्रदेव
12. पीतांबरदेव गोस्वामी
13. कृष्णचंद्रदेव 14. हरिदेव तृतीय
15 परमानंद देव गोस्वामी।

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