Thursday, December 22, 2016

असम में नटवरनागर कृष्ण – कृष्णा इन गार्डेन ऑफ असम ((19))

मुखौटा बनाने की कला के लिए मशहूर शामागौरी सत्र में मुझे जानेमाने में मुखौटा कलाकार हेमचंद्र गोस्वामी एक अंग्रेजी पुस्तक दिखाते हैं – कृष्णा इन द गार्डेन ऑफ असम। शानदार छपाई में प्रकाशित इस कॉफी टेबल बुक में हेमचंद्र गोस्वामी के बनाए कई मुखौटों के चित्र शामिल किए गए हैं। वहीं पुस्तक में हेमचंद्र गोस्वामी के बारे में चर्चा भी है। 
हेमचंद्र गोस्वामी सिर्फ मुख के आकार वाले मुखौटे नहीं बनाते, बल्कि कई बार मानव के आकार के मास्क भी बनाए जाते हैं जिसमें पूरे चरित्र को ही मास्क में दिखाया जा सके। मानव आकार के मास्क को बोर मुख कहते हैं। वे न सिर्फ मास्क बल्कि नाटक में इस्तेमाल होने वाले हथियार जैसे तीर कमान, कुल्हाडी, त्रिशूल, तलवार आदि की रचना कर डालने में भी पारंगत हैं।
जब हमलोग उनके स्टूडियो में पहुंचते हैं तो तमाम मुखौटे दिखाने के बाद हमें वह एक पुस्तक दिखाते हैं। पुस्तक का नाम है कृष्णा इन गार्डेन ऑफ असम। शानदार छपाई में इस कॉफी टेबल बुक में असम में कृष्ण की आध्यात्मिक यात्रा के बारे में बताया गया है। माजुली की खास चर्चा है। टी रिचार्ड बलर्टन की इस पुस्तक को हमने पाया कि कई ऑनलाइन वेबसाइटों पर उपलब्ध है। कीमत है भारतीय मुद्रा में 783 रुपये।
पुस्तक महान संत शंकरदेव के बारे में काफी जानकारी देती है। बर्लटन असम की आधात्यमिक यात्रा को बेहतरीन ढंग से कहने की कोशिश करते हैं।
पुस्तक में माजुली में होने वाली रासलीला के बारे में चर्चा है। इसके साथ सुंदर चित्र पेश किए गए हैं। पुस्तक संगीत, नाटक और नृत्य पर प्रकाश डालती है। इस पुस्तक में हेमचंद्र गोस्वामी के बनाए कई चित्रों को शामिल किया गया है। गोस्वामी जी हमें खास तौर पर वे पन्ने पलटकर दिखाते हैं जहां उनके चित्र इस पुस्तक में शामिल किए गए हैं।
मैं हेमचंद्र गोस्वामी से सवाल करता हूं। वे बताते हैं कि 16वीं सदी से उनके पुरखे मास्क मेकिंग यानी मुखौटे बनाने में लगे हैं। अब उनके बेटे भतीजे और परिवार के दूसरे सदस्य इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। काफी लोग माजुली में आकर उनसे मास्क मेकिंग सीखते भी हैं। पर जो मास्क मेकिंग वे सीखाते हैं इसी तरह की पढ़ाई तो देश के नामचीन फाइन आर्ट्स कालेजों में भी होती है। 


अगर हम हेमचंद्र गोस्वामी का कार्य देखें तो यह किसी फाइन आर्ट्स के बड़े कालेज के समतुल्य या उससे भी ज्यादा है। तो क्यों नहीं उन्हें किसी यूनीवर्सिटी में मानद प्रोफेसर बना दिया गया। पर सच्चाई है कि वे माजुली के आश्रम में ही अपना जीवन खपा देना चाहते हैं। विश्वविद्यालय की चाहरदीवारी तक जाने की कोई तमन्ना नहीं। हालांकि वे कई बार दिल्ली के इंदिरागांधी कला केंद्र में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। जुलाई 2016 में उनके भतीजे भी दिल्ली में जाकर मुखौटा बनाने की कला से लोगों को रुबरू करा चुके हैं।
हेमचंद्र गोस्वामी को ये कला अपने पिता रुद्रकांत देव गोस्वामी से विरासत में मिली। पर वे बताते हैं कि 1663 ईश्वी से उनकी कई पीढ़ियां इस कला को आगे बढ़ा रही हैं। हमारी मुलाकात उनकी अगली पीढ़ी दिव्यज्योति गोस्वामी और खगेन गोस्वामी से होती है।हमलोग थोड़ी देर उनके भतीजे और उनकी बहू से बात करते हैं। उनका आश्रम जीवन जानने की कोशिश करते हैं। सबसे चेहरे पर अदभुत संतोष का भाव नजर आता है। वे बड़ी आत्मीयता से मिलते हैं। महान कलाकार को नमन करते हुए हम अगली मंजिल की ओर चल पड़ते हैं।
 - vidyutp@gmail.com
( MAJULI, ASSAM, MASK MAKING, KRISHNA IN GARDEN OF ASSAM ) 
और इस तरह तैयार होता है एक नया मुखौटा....देखिए तीन स्टेज....
माजुली की यात्रा को शुरुआत से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

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