Sunday, December 18, 2016

माजुली का सांस्कृतिक प्रतिबिंब - नूतन कमलाबाड़ी सत्र ((15))

माजुली के कमलाबाड़ी क्षेत्र में तीन प्रमुख सत्र हैं जिनमें से एक है नूतन कमलाबाड़ी सत्र। कमलाबाड़ी सत्र की स्थापना माधव देव के प्रमुख शिष्यों में से एक बादल पद्म ने 1673 में की थी। यह एक उदासीन सत्र है। यानी इसके भगत लोग विवाह नहीं करते। माजुली को सांस्कृतिक तौर पर शिखर पर ले जानेे में इस सत्र और उसके सत्राधिकार का बड़ा योगदान है।
सत्र की स्थापना -  कहा जाता है तब यहां बड़ी संख्या में सरोवर में संतरे के पेड़ थे जिसे असमिया में कमला कहा जाता है। इसलिए इसका नाम कमलाबाड़ी सत्र पड़ा। कहा जाता है कि इस बड़े उद्यान के मालिक का नाम कमला मुदोई था। पर अब मूल कमलाबाड़ी सत्र माजुली में नहीं रहा। ब्रह्मपुत्र के कटाव के कारण इसे शिफ्ट करके 1975 में मोहिमाबारी तिताबाड़ में ले जाना पड़ा। पर इसके बाद माजुली में कमलाबाड़ी नामक दो सत्र बचे हैं एक उत्तर कमला बाड़ी है तो दूसरा नूतन कमलाबाड़ी।

नूतन कमलाबाड़ी माजुली का बड़ा ही सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध सत्र है। इसके सत्राधिकार नारायण चंद्र देव गोस्वामी ने अपने भगत लोगों को बेहतर मार्गदर्शन प्रदान किया है। नारायणचंद्र देव गोस्वामी असमिया साहित्य के विद्वान हैं। उन्हें असम सरकार ने 2004 में शंकरदेव सम्मान प्रदान किया। साल 2010 में ढिब्रूगढ़ यूनीवर्सिटी ने उन्हें डिलिट की उपाधि प्रदान की। सत्र परंपरा और असमिया साहित्य में उन्होंने कई पुस्तकों की भी रचना की है।

नारायणचंद्र देव गोस्वामी का जन्म 24 सितंबर 1954 को सामागौरी सत्र में हुआ। वे आठ साल की उम्र में कमलाबाड़ी सत्र आए। तब से यहीं हैं। उन्होंने हिंदी, अंगरेजी और संस्कृत का गहन अध्ययन किया। साल 1972 में महज 18 साल की उम्र में वे नूतन कमलाबाड़ी सत्र के सत्राधिकार बन गए। 1975 में वे रामविजय नट ( नाटक )  लेकर इंडोनेशिया भी गए। साल 1981 में सत्राधिकार नारायणचंद्र देव गोस्वामी के प्रयास से माजुली में  माजुली सत्रीय संगीत कॉलेज की स्थापना हुई।

कमलाबाड़ी बाजार से नहर के साथ चलती हुई कच्ची सड़क पर तीन किलोमीटर चलने के बाद आता है नूतन कमलाबाड़ी सत्र। आज के दिन हमारा ये तीसरा सत्र है जिसे हमें देखने जा रहे हैं। यहां भी सत्र के मुख्यद्वार पर बाल भगत मिलते हैं जो हमारा स्वागत करते हैं। सत्र का प्रवेश द्वार बाकी सत्रों की सुरूचिपूर्ण है।
सत्र में घूमते हुए एक भगत मिलते हैं जो बैठकर धान से चावल निकाल रहे हैं। खेती और उससे जुड़े तमाम कामकाज करना सत्र में रहने वाले भगत लोगों को नियमित कार्य है। एक दो बाल भगत दिखाई देते हैं जो सात आठ साल के उम्र के हैं। सत्र के परिसर में नामघर है। नामघर की दीवारों पर हनुमान, रामचंद्र, कृष्ण और दूसरे देवी देवताओं की सुंदर पेंटिंग बनी हुई है। बगीचे में रंग बिरंगे फूल खिले हैं। भगत लोगों के रहने के लिए लंबा आवासीय क्षेत्र है। भगत लोगों के आवास में लकड़ी के बने हुए अत्यंत प्राचीन नक्काशीदार दरवाजे दिखाई देते हैं।

यहां पर मैं अपना कौतूहल एक सत्र के भगत के साथ जाहिर करता हूं। इन सत्रों का खर्च कैसे चलता है। एक भगत बताते हैं। अहोम राजाओं की दी हुई जमीन है सत्र के पास। ये जमीन दान में मिली है। ये जमीन असम के अलग जिलों में हैं। इन जमीन पर किसान खेती करते हैं और उससे होने वाली कमाई में से आधा हिस्सा सत्र को पहुंचाते हैं। नूतन कमलाबाड़ी सत्र के परिसर में भी खेती योग्य जमीन और तालाब है। ये सत्र वैसे अवनिअति की तुलना में छोटा है। सत्र की एक शाखा जोरहाट शहर में भी है। सत्र की ओर से जोरहाट में स्कूल का भी संचालन होता है।
बाहर निकलते हुए हमें एक सत्र से जुड़े एक मार्डन भगत दिखाई दिए। वे नीचे धोती तो ऊपर काली टी शर्ट धारण किए हुए थे।

नूतन कमलाबाड़ी सत्र में कई ऐतिहासिक वस्तुएं संरक्षित हैं। इनमें शंकरदेव का सिर के बाल, शंकरदेव द्वारा इस्तेमाल की गई हाथी दांत की कंघी,  शंकरदेव के शरीर की राख, संस्थापक बादल पद्म की पगड़ी आदि यहां संरक्षित है।
नूतन कमलाबाड़ी सत्र के नृत्य शैलियां –  1 झूमर 2 भाव नाच 3 नादु भोंगी नाच 4 प्रोबेक्स नाच 5 सत्राधिकारी नाच 6 चाली नाच 7 कृष्णा नृत्य 8 गोपी नृत्य 9 जुधार नाच।
सत्र के  गीत – बरगीत, फौजिया गीत, अंकिया गीत आदि।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

No comments:

Post a Comment