Saturday, December 17, 2016

माजुली का सबसे बड़ा सत्र - अवनिअति सत्र ((14))

माजुली द्वीप के वैष्णव सत्रों में आज के दौर में सबसे बड़ा और समृद्ध सत्र है अवनिअति सत्र है। अगर भगत की संख्या के लिहाज से भी देखा जाए तो यहां 350 लोग निवास करते हैं। इस लिहाज से यह बड़ा है। इस सत्र को असम के वैष्णव संस्कृति का केंद्र माना जाता है। सत्र सुंदर व्यवस्थित है, अंदर सुंदर संग्रहालय और पुस्तक और स्मारक बिक्रय केंद्र भी है। इस सत्र की अपनी वेबसाइट भी है।

अवनिअति सत्र की स्थापना 1653 में अहोम राजा सुल्तानला ने किया था। उसका नाम जयधज सिंघ रखा गया, जब उसने वैष्णव हिंदू धर्म ग्रहण किया। अवनिअति सत्र के पहले सत्राधिकार निरंजन देव ने राजा को हिंदू धर्म में दीक्षित कराया था। इसके साथ ही राजा ने सत्र को 81,650 बीघा जमीन असम के अलग अलग स्थलों पर सत्र के लिए दान में प्रदान किया। इन जमीन को दो खंड देवोत्तरा और ब्रह्मोत्तरा में प्रदान किया गया। इस सत्र का अहोम राजा की नजर में बड़ा सम्मान था। इसके नाम को लेकर भी बड़ा रोचक कथ्य है। अवनि का मतलब पान के पत्ते हैं। यहां किसी समय में पान की खेती खूब होती थी। अति का मतलब ऊंची जमीन से है।

दैनिक पूजा के लिए जो मूर्ति यहां राजा कीओर से प्राप्त हुई वह नटवर नागर कृष्ण की है। इसे यहां गोविंदा कहते हैं। कृष्ण की यह मूर्ति ओडिशा के जगन्नाथ पुरी से यहां लाई गई थी।  इसे यहां विधिपूर्वक स्थापित किया गया है।

अवनिअति सत्र की पूरे असम में 12 शाखाएं हैं। असम की राजधानी के पास उत्तर गुवाहाटी में 60 बीघा क्षेत्र में इसकी प्रमुख शाखा है। माजुली स्थित अवनिअति सत्र में आजकल 350 से ज्यादा भगत लोग रहते हैं। सत्र ने कई पुस्तकों का प्रकाशन किया है।
हमलोग दोपहर के बाद इस सत्र में पहुंचे। हर सत्र की तरह इसके प्रवेश द्वार पर जूते चप्पल उतार कर अंदर जाना होता है। मुख्य द्वार से पहले एक छोटा सा बाजार भी है। यहां हमें पांच सात साल के भगत लोग टहलते हुए नजर आए। ये भगत लोग नीचे धोती को उपर टी शर्ट पहने हुए थे। अंदर के भगत गाय चराते हुए भी नजर आए। उन्होंने अपना नाम अनंत कलिता बताया। उम्र 10 साल है। कान्हा जी भी तो गाय चराते थे। सत्र का जीवन कान्हा जी से काफी प्रभावित है। सत्र के मुख्यद्वार के अंदर एक सुंदर संग्रहालय है जिसका प्रवेश टिकट 10 रुपये का है। इस संग्रहालय में कई नायाब वस्तुएं के देखने को मिली। अंदर फोटोग्राफी निषिद्ध है। संग्रहालय के अंदर ही एक पुस्तक बिक्री केंद्र भी है।

350 साल से अनवरत प्रार्थना -  अवनित अति सत्र के नामघर में पिछले 350 सालों से लगातार सुबह से लेकर शाम तक ईश्वर की प्रार्थना चलती रहती है। इसमें भगत बदलते रहते हैं पर प्रार्थना में कोई व्यावधान नहीं आता है। इसके अलावा होली, दिवाली, जन्माष्टमी और बीहू के मौके पर सत्र में विशेष आयोजन होते हैं। इसके लिए भगत लोग पहले से तैयारी करते हैं।
नामघर देखने के बाद हमलोग सत्र की रंगशाला में पहुंचे। यहां पर कई भगत लोग संगीत की थाप के साथ भाव नृत्य के रिहर्सल में लगे थे। उन्होंने हमें सम्मान से बैठने के लिए कहा। पता चला कि एक दिन बाद लखीमपुर में परफार्मेंस है उसकी तैयारी कर रहे हैं। हमने थोड़ी देर उनका प्रदर्शन देखा। आनंद आया। इन भाव नृत्य में कृष्ण की लीला के साथ ही राम के जीवन से जुड़ी कथाओं का मंचन होता है।

दस लाख से ज्यादा शिष्य -  सत्र से बाहर निकलने पर हमें सत्र की ओर से संचालित स्कूल का भवन नजर आता है। अवनिअति में 1997 से सत्राधिकार श्री पीतांबर देव गोस्वामी हैं। उनका जन्म 14 दिसंबर 1959 को असम के दुलियाजान में हुआ। वे 10 साल की उम्र में अवनिअति सत्र में बाल भगत के तौर पर आ गए थे। उन्होंने तब के सत्राधिकार हेमचंद्र गोस्वामी के सानिध्य में आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण की। सत्र का दावा है  कि उसके देश भर में 10 लाख से ज्यादा शिष्य हैं जो उनके कार्यक्रमों के साथ जुड़े हए हैं।
- vidyutp@gmail.com

( ASSAM, MAJULI, AUNIATI SATRA, PITAMBAR DEV GOSWAMI  )

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