Monday, November 21, 2016

मां कामाख्या के मंदिर में दाना चुगते कबूतर

मां कामाख्या के मंदिर परिसर में असंख्य सफेद कबूतर चावल के दाने चुगते नजर आते हैं। दरअसल मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालु इन कबूतरों को चावल दान करते हैं। वहीं मंदिर की गली में कुछ दुकानदार कबूतर बेचते भी नजर आए। भाव पूछा तो 300 रुपये जोड़ा। लोग मनौती मांगने के लिए मंदिर में कबूतर खरीदने का बाद छोड़ते हैं। यानी कबूतरों को आजादी। यह भी जीव दया का सिद्धांत नजर आता है। हो सकता है ये दुकानदार महोदय उन आजाद कबूतरों को फिर से मंदिर परिसर से लाकर बेच देते हों।
पर इन कबूतरों की किस्मत बहुत अच्छी नहीं है। मंदिर परिसर में  कबूतरों की बलि भी दी जाती है। यानी हमेशा के लिए आजादी। पता नहीं मां को इन परिंदों की बलि पसंद आती होगी या नहीं। पर ये दस्तूर तो चला आ रहा है।

पर मां कामाख्या के मंदिर में तो बकरा और भैंसों की भी बलि हर रोज दी जाती है। मंदिर के गर्भ गृह के ठीक सामने बने एक हॉल में बलि की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। मैं मंदिर परिसर में घूमते हुए उस स्थल पर पहुंच गया हूं। एक भैंसे को बलि देने की तैयारी है। देखने वालों की भी भारी भीड़ लगी है।
मंदिर के पंडे बार बार बीच में रास्ता छोड़ने का आग्रह कर रहे हैं। वह क्यों ताकि बलि के स्थल से मां के मंदिर का गर्भ गृह साफ नजर आए। यानी बलि मां के नजरों के सामने दी जाए। और देखते ही देखते एक विशालकाय भैंसे की गरदन को एक लकड़ी के फ्रेम में लाकर फंसा दिया गया। 

छपाक...की आवाज के साथ वह भैंसा शांत हो गया। यह दृश्य देखना काफी मुश्किल था मेरे लिए। पर मां कामाख्या के मंदिर में यह रोज का नजारा है। हम धर्म में समय के साथ कई तरह के बदलाव कर चुके हैं। पर देश के कई मंदिरों में अभी बलि की प्रथा जारी है। मंदिर परिसर में कई और भैंसे दिखाई देते हैं जिनकी बारी आने वाली है। कई जगह लोग बकरे लेकर जाते दिखाई दिए। यह सब कुछ देखना मुश्किल था। क्या मां सचमुच बलि मांगती हैं और ऐसी बलि से प्रसन्न होती होंगी। शायद नहीं। तो फिर यह सब रुकता क्यों नहीं है। ऐसा ही कुछ त्रिपुरा के त्रिपुर मालिनी मंदिर और झारखंड के रजरप्पा में छिन्नमस्तिके भवानी मंदिर में देख चुका हूं।  
असमिया साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर इंदिरा गोस्वामी ( मूल नाम. मामोनी रायसम गोस्वामी) ने  अपने उपन्यास छिन्नमस्तार मानुहटो में उन्होंने कामाख्या देवी पीठ पर बलि देने की परंपरा का विरोध किया है। उपन्यास में यहां की धार्मिक परम्परा (कहा जाता है कि मनसा-पूजा में यहां मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग भी बलि चढ़ाते थे)साथ ही इसके नकारात्मक पहलू आदि को कथानक का रूप दिया गया है। उपन्यास छिन्नमस्ता के संन्यासी बलि प्रथा का विरोध करते है। वे मां से आग्रह करते हैं- मां तुम रक्त वस्त्र उतार दो। रक्त को त्याग फूलों से देवी की पूजा करो। फूल में ज्यादा शक्ति है।

दस हजार भैंसों की बलि
इंदिरा गोस्वामी अपने उपन्यास में लिखती हैं कि अहोम राजा स्वर्गदेव रुद्र सिंह उर्फ सुखरंगफा हर साल दुर्गा अष्टमी पर 10 हजार भैंसो की बलि मां कामाख्या को चढ़ाते थे। उनका शासनकाल  1694 से 1714 के बीच का था। उनके द्वारा दी जाने वाली बलि का जिक्र ऐतिहासिक पुस्तकों में आता है। अहोम राजाओं के काल से यहां बलि की परंपरा चली आ रही है। देश के कई मंदिरों में बलि रूक गई है, पर कई मंदिरों में यह अभी बदस्तूर जारी है।

साल के चार दिन बलि नहीं - सिर्फ साल के चार दिन ही ऐसे होते हैं जब मां कामाख्या के दरबार में  बलि नहीं चढाई जाती।  आषाढ़ के महीने में मंदिर की देवी को माहवारी होती है। तब यहां अंबूमाची मेला लगता है। इस मेले के दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और कोई बलि नहीं चढ़ाई जाती। इसके इतर सालों भर यहां बलि देकर मां को प्रसन्न करने का क्रम जारी रहता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

 ( MAA KAMAKHYA TEMPLE, GUWAHATI, ASSAM, SECRIFICIAL , Pigeon, Buffalo, Goat, Ahom King, Indira Goswami ) 


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