Saturday, November 19, 2016

मां कामाख्या के दरबार में हाजिरी लगाई...

सुबह के छह बजे हैं। हमारी ट्रेन बिल्कुल समय पर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर पांच पर पहुंच चुकी है। हमारी होटल इंद्र में बुकिंग है मेक माई ट्रिप डॉट काम से। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के पलटन बाजार वाले साइड में बाहर निकलते ही बाईं तरफ केसी सेन रोड पर पुलिस स्टेशन के सामने होटल स्थित है। किसी भी ट्रेन से 24 घंटे कभी भी उतरिए और टहलते हुए होटल पहुंच जाइए। एक बार पहले भी यहां ठहर चुका हूं। इस बार वे हमें पांचवी मंजिल पर कमरा नंबर 387 देते हैं। स्नानादि से निवृत होकर हमारी कामाख्या देवी के दरबार में हाजिरी लगाने की योजना है।

सुबह के आठ बजे हमलोग निकल पड़ते हैं। पलटन बाजार में नेपाली मंदिर के पास से बस लेते हैं। जुलुकबाड़ी तक जाने वाली बस हमें रास्ते में कामाख्या देवी मंदिर के प्रवेश द्वार पर उतार देती है। यहां से मंदिर तीन किलोमीटर ऊपर चढ़ाई पर है। टैक्सी वाले खड़े हैं 20 रुपये प्रति सवारी। वैसे मंदिर तक बस भी जाती है 10 रुपये प्रति सवारी। आज दुर्गाअष्टमी है। मंदिर में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ है। हमारी टैक्सी में गुवाहाटी का एक मारवाड़ी परिवार बैठा है। मारवाड़ी भाई मूल रूप से तो सीकर राजस्थान के रहने वाले हैं। गुवाहाटी में इनकी हार्डवेयर की दुकान है। बताया कि आज इतनी भीड़ होगी कि 9 से 10 घंटे लाइन में लगने पर दर्शन के लिए नंबर आएगा। इसलिए बाहरी दीवार पर ही मत्था टेककर लौट आएंगे। मंदिर के करीब पहुंचते ही हमें भी भीड़ का अंदाजा लगने लगा। टैक्सी से उतरने के बाद हमलोग सुंदर सजे धजे बाजार के बीच से आगे बढ़ने लगे। विशाल कार पार्किंग के बाद मंदिर की ओर से संचालित निःशुल्क जूता घर आया। जूते चप्पल जमाकरा कर हमलोग आगे बढ़े।


 भीड़ जरूर है पर कहीं कोई अव्यवस्था नहीं दिखाई देती। लोग क्रमबद्ध ढंग से आगे बढ़ते जा रहे हैं। मुख्यद्वार से अंदर प्रवेश करने के बाद मां के मंदिर में मनोरम नजारा दिखाई देता है। ऊंचे पर्वत पर हरे भरे पेड़ों के बीच मां का मंदिर। परिसर में असंख्य श्रद्धालु। काफी लोग बायीं  तरफ बने परिसर में दीप दान में जुटे हैं। कुछ लोग परिसर में बैठकर  मां की आराधना में जुटे हैं। लाल वस्त्र में मंदिर के पंडे जगह जगह दिखाई दे रहे हैं। पर ये पंडे लोग किसी भी श्रद्धालु को दर्शन या कोई कर्मकांड कराने के लिए बाध्य करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। आपकी मर्जी आप जैसे पूजा करना चाहें। हमने पता दिया दर्शन में नौ घंटे लगने की उम्मीद है। मुख्य मंदिर की परिक्रमा कर डाली। बाहर से दीवारों का स्पर्श कर मां का आशीर्वाद लिया। उसके बाद मंदिर के दाहिनी तरफ सीढ़ियों पर बैठकर सुस्ताने लगे। भला मां के दरबार में आए हैं जाने की इतनी भी क्या जल्दी है। मां मंदिर के सौंदर्य को हर कोण से निहार लें तब चलें।
एक घंटे बाद निकलने की इच्छा तो नहीं हो रही पर बाहर निकल पड़े। मंदिर के मुख्यद्वार के दोनों तरफ बाजार सजा है। काशी के विश्ननाथ गली की तरह। थोड़ा मोलजोल और खरीददारी करते हुए हमलोग आगे बढ़े। एक दुकान से मंदिर का धागा खरीदा। इसमें स्वास्तिक की सुंदर कढ़ाई की गई है। एक जगह एक सज्जन अचार बेचते नजर आए। हमने बांस और आमड़ा का अचार खऱीदा। 
तो ये है रुद्राक्ष ..एक मुख,पंच मुखी या फिर माला बनवाएं...

थोड़ा आगे चलने पर एक रुद्राक्ष की दुकान दिखाई दे गई। दुकानदार महोदय ने हरे हरे रुद्राक्ष रखे हुए थे। आपके समाने इसको छीलकर उसके अंदर से रुद्राक्ष निकाल रहे थे। कितने मुख का निकल आए ये आपकी किस्मत। ताजे रुद्राक्ष बेच रहे थे 10 रुपये में एक। मुझे तुरंत एक रुद्राक्ष छीलकर दिखाया, पंचमुखी निकल आया। माधवी ने मणिपुरी ज्वेलरी तो अनादि ने खिलौने खरीदे। कुछ यादगारी लेकर तो जाना ही है ना...

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नील पर्वत वासिनी मां कामाख्या देवी 

-         विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ASSAM, MAA KAMAKHYA TEMPLE, GUWAHATI ) 


  

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