Monday, November 14, 2016

जीरो से वापसी का सफर– नहारलगून

तीन दिन जीरो की वादियों में गुजारने के बाद अब वापसी का समय था। हमारी सूमो का वक्त तय था साढे नौ बजे। बुकिंग एजेंट तिवारी ने कहा था कि टैक्सी यानी सूमो आपको होटल से ही ले लेगी। इसलिए कहीं और जाकर इंतजार करने की जरूरत नहीं है। इस बार हमें बीच वाली लाइन में एक खिड़की की और एक उसके बगल वाली सीट मिली थी। वहां माधवी और अनादि बैठे। तो मेरी सीट आगे ड्राईवर के बगल वाली थी।

सूमो तकरीबन 10 बजे जीरो से चलने को तैयार थी। धूप नहीं है। जीरो में हल्की बारिश हो रही है। आखिरी दिन मैं सुबह गुप्ता स्वीट्स में जाकर पूड़ी सब्जी नाश्ते में लेकर आया। माधवी ने होटल से सैंडविच लिया। हल्की बारिश के बीच हमारी वापसी की यात्रा आरंभ हो गई। 

मेरी बगल वाली सीट पर एक मणिपुरी भाई बैठे हैं जो अरुणाचल में सरकारी नौकरी में है। ओल्ड जीरो में पोस्टिंग है। 28 साल उम्र है, अभी शादी नहीं की है। बातें करने में बहुत मजेदार हैं। वे बिहारियों की श्रम साधना के कायल जान पड़ते हैं। वे बताते हैं कि बिहारी लोग पढ़ाई में खूब मेहनत करते हैं और एसएससी की परीक्षा में मेहनत की बदौलत पास हो जाते हैं। हम उतनी मेहनत नहीं कर पाते। वे बिहारी मजदूरों की मेहनत की भी दाद देते हैं। कहते हैं- पहले मणिपुर में एक बिहारी आता है,  चूल काटने की दुकान खोलता है।  कुछ दिन बाद उसके दोस्त भी आ जाते हैं। वे दूसरी दुकाने खोल लेते हैं। इस तरह उनका कारोबार बढ़ता है।

वे स्वीकार करते हैं कि हम मणिपुरी लोग उनकी तरह मेहनत करके बिजनेस नहीं कर पाते। हमारा एक मणिपुरी भाई दुकान खोलता है। अगर कोई ग्राहक आकर कुछ सामन देखता है और बिना खरीदे चला जाता है तो दुकानदार नाराज होता है। पर कोई बिहारी या बंगाली दुकान चला रहा हो तो चाहे कितना भी सामान देखो, खरीदो या नहीं उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। दुकानदार सामान दिखाने में कोताही नहीं करता। ये मणिपुरी भाई काफी भोजपुरी गाने भी सुन चुके हैं। वे पूछते हैं कि ज्यादातर भोजपुरी गानों में राजा जी शब्द क्यों आता है। मुझे गीत के बोल याद आते हैं – गवनवा ले जा राजा जी
सूमो हरी भरी वादियों में  धीरे धीरे आगे बढ़ रही है। ड्राईवर बड़े ही सुरक्षित ढंग से गाड़ी चला रहे हैं। पहाड़ों पर ऐसे ही ड्राईवर होने चाहिए। हमारी सूमो मे दो विदेशी हैं। पोलैंड के नागरिक हैं। जीरो घूमने के बाद अब तवांग की ओर जा रहे हैं।
जीरो के बाद जोरम नामक गांव आता है। हमारे ड्राईवर इसी गांव के हैं। सड़क के किनारे अपना घर दिखाते हैं। जोरम में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रीजिजू की ससुराल है। वे गर्व से कहते हैं रीजिजू हमारा जीजा है। जोरम के बाद हम याचुली को पार करते हैं। कई जगह सड़क काफी खराब है। इसके बाद आता है याजाली।

रास्ते में दिखाई देता है रंगानदी हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट। 


याजाली के बाद आता है पोसा।  यहां हमें रंगानदी हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट नजर आता है। रंगानदी हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट 2001 में आरंभ हुआ। कुल क्षमता 405 मेगावाट की है। 135 मेगावाट के तीन प्रोजेक्ट हैं, पर इतना उत्पादन कभी नहीं हो पाया। यह नार्थ इस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन ( नीपको) की परियोजना है। अरुणाचल प्रदेश में कई छोटी छोटी नदियां है। राज्य की भौगोलिक स्थित ऐसी है कि पनबिजली परियोजनाओं के लिए काफी संभावना हैं। अभी अरुणाचल में मौजूद ऊर्जा की संभावनाओं को बहुत कम दोहन हुआ है। 

हम फिर पोटीन में रुकते हैं। कुछ खाने पीने की बारी है। पर हम कुछ खास नहीं लेते। मैं अमरूद और केले खरीदता हूं। हां रास्ते में हमें केले के पेड़ खूब दिखाई दिए। लोगों ने बताया कि ये जंगली केले हैं। इनके फूल और पत्तों को लोग तोड़कर ले जाते हैं। मिडपो, दोईमुख के बाद हमारी सूमो डेकरांग पुल पार करके इटानगर में प्रवेश कर रही है। दोपहर के दो बज रहे हैं। हल्की धूप है। यहां गरमी लग रही है। हम जीरो के सुहाने मौसम को काफी याद कर रहे हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

( ARUNCHAL, ZIRO, RANGANADI DAM, NEEPCO, SUMO, JORAM, HAPOLI, POTIN, NAHARLAGUN ) 


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