Thursday, November 10, 2016

जीरो यानी अरुणाचल का धान का कटोरा

सड़क के दोनों तरफ हरे हरे खेतों में धान की बालियां झूम रही हैं। कुछ पक गई हैं तो कुछ जल्द पकने वाली हैं। सिद्धेश्वर नाथ के दर्शन के बाद हमने अपने टैक्सी वाले भाई पूरा बाबू से कहा कि आप हमें ओल्ड जीरो तक छोड़ दो। अभी दोपहरी नहीं गहराई थी। हमारे पास थोड़ा और घूमने के लिए वक्त था। वे तैयार हो गए।

वैसे हापोली टैक्सी स्टैंड से ओल्ड जीरो के लिए शेयरिंग टैक्सियां जाती हैं किराया है 20 रुपये सवारी। उन्होंने 50 रुपये अतिरिक्त देकर ओल्ड जीरो छोड़ने की बात कही। रास्ते में सूमो स्टैंड आया। वहां हमने रुककर अगले दिन के लिए नहारलगून वापसी के लिए सूमो में तीन सीटें बुक कराई। बुकिंग एजेंट थे बलिया के तिवारी जी। वे 20 सालों से जीरो में टैक्सी बुकिंग का ही काम कर रहे हैं। ओल्ड जीरो शुरू होते है कि सुरम्य घाटियां दिखाई देनें लगीं। दोनों तरफ धान के झूमते खेत। धान तैयार होने के हैं। आपातानी लोगों ने धान काटना शुरू कर दिया है। 

हमारे टैक्सी वाले पूरा बाबू ने कहा कि घर से बहन का फोन आ गया है धान काटने के लिए बुला रही है। अब और टैक्सी नहीं चलाऊंगा। आप हमारे आज के आखिरी सवारी हो। ओल्ड जीरो में हीजा गांव का बोर्ड दिखाई देता है। यह आपातानी लोगों का बड़ा गांव हैं। सड़क के किनारे खेतों में कई जगह आपातानी परिवार के लोग धान काटते दिखाई दिए। धान पक गए हैं पर खेतों में अभी भी पानी है। आपातानी महिलाएं और पुरुष खेतों में उतर कर धान काट रहे हैं। पर ये लोग हमारे यहां की तरह धान नहीं काटते। ये सिर्फ बालियों को काट लेते हैं। धान का शेष हिस्सा यूं ही खेतों में छोड़ देते हैं। बालियों को काटने के बाद धान को बालियोंसे अलग करने का काम भी यहीं पर कर डालते हैं। इसके बाद पीठ पर लेकर ढोई जाने वाली टोकरी में धान को जमा कर लेते हैं। हमारे यहां की तरह खलिहान में ले जाकर दवनी करने की कोई जरूरत नहीं।
अब खेत में पड़ी धान की फसल का क्या होता है। कुछ नहीं होता है। सर्दियों में पड़ने वाली बर्फ में यह दब जाती है। आपातानी लोग पूरे साल में अपने इन खेतों से सिर्फ एक ही फसल निकालते हैं। बाकी समय खेत खाली रहते हैं। 

हमारे यहां तो किसान साल में तीन फसल निकालते हैं। इसके बावजूद जीरो को अरुणाचल का राइस बाउल यानी धान का कटोरा कहा जाता है। यहां पर अरुणाचल का उम्दा किस्म का धान होता है।

धान के खेत में मछली पालन भी - आपातानी लोगों में धान की खेती और मछली पालने का रिवाज है। जिन खेतों में धान लगाते हैं उन्हीं खेतों में वे मछली पालन भी करते हैं। यानी एग्रीकल्चर और एक्वाकल्चर एक साथ। आमतौर पर यहां होने वाला धान आर्गेनिक है। आपातानी लोग किसी खाद या पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल आम व्यवहार में नहीं करते।

अप्रैल से सितंबर के बीच आमतौर पर धान के खेतों में मछली पालन होता है। वहीं कई किसान नवंबर से फरवरी के बीच धान काट लिए जाने के बाद भी खेतों में मछली पालन करते हैं। खेतों के चारों तरफ मजबूत बांध बनाए जाते हैं जिससे पानी का लिकेज नहीं होता है। यानी उनके खेत एक तरह से मछली पालन के लिए तालाब का भी काम करते हैं। इन खेतों में कतला और रोहू जैसी मछलियां पाली जाती हैं। वहीं खेत के इन बांधों पर वे कई तरह की सब्जियां भी उगा लेते हैं।

           - vidyutp@gmail.com

(PADDY FARM, OLD ZIRO, RICE, APATANI TRIBE ) 

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