Wednesday, November 30, 2016

माजुली- विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप ((04))

माजुली को दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप होने का गौरव प्राप्त है।  8 सितंबर 2016 को असम के 35वें जिले के रूप में माजुली को दर्जा मिला। इसके साथ ही माजुली देश का पहला द्वीप जिला बन गया है। जिला बनने से पहले माजुली जोरहाट जिले का सब डिविजन था। पर माजुली दुनिया भर के सैलानियों के बीच आकर्षण का केंद्र है, कौतूहल का केंद्र है। न सिर्फ इसलिए कि यह संसार का सबसे बड़ा नदी द्वीप है बल्कि इसलिए भी कि यह आध्यात्म और कला संस्कृति का भी बड़ा केंद्र है। माजुली को वैष्णव सत्र यानी हिंदू मठों के लिए भी जाना जाता है। बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी इन सत्रों को देखने आते हैं। सुंदर द्वीप माजुली को असम राज्य की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है। माजुली पूर्वी असम का नव वैष्णव विचारधारा का मुख्य केंद्र है। वैष्णव संत शंकरदेव यहां 16वीं शताब्दी में रहा करते थे।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजे माफत मिल्स के सर्वेक्षण रिपोर्ट ऑन प्रोविंस आफ असम के अनुसार 1853 में माजुली का कुल क्षेत्रफल 1246 वर्ग किलोमीटर था। 1950 के सर्वे के मुताबिक माजुली में रहने योग्य जमीन का रकबा 1245.12 वर्ग किलोमीटर था।

परंतु बाद में हर साल भूमि के कटाव के कारण माजुली का दायरा सिमटता जा रहा है। साल 2001 की रिपोर्ट मात्र 421.65 वर्ग किलोमीटर रह गया है। हालांकि असम सरकार के टूरिज्म विभाग की वेबसाइट के मुताबिक यह 515 वर्ग किलोमीटर में विस्तारित है। पर यह तय है कि इसका आकार ऐतिहासिक तौर पर जितना पहले कभी हुआ करता था उसका आधा रह गया है।

सबसे बड़े नदी द्वीप पर विवाद - माजुली को दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप के रूप में कहा जाता है पर कुछ लोगों को तर्क है कि ब्राजील और कई अन्य जगहों के कई नदी द्वीप इससे आकार में बड़े हैं। पर माजुली में लगा असम सरकार के बोर्ड इससे दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप बताता है। वैसे तो नदी पर अवस्थित सबसे बड़ा द्वीप ब्राजील के अमेज़न और परा नदी पर स्थित माराजो द्वीप है परन्तु इसे नदी द्वीप नहीं माना जा सकता क्योंकि इसके एक किनारे पर अटलांटिक महासागर है। नदी द्वीप को लेकर कई भ्रांतियां हैं। बांग्लादेश के मेघना नदी पर हटिया द्वीप जो नोआखाली जिले में है 371 वर्ग किलोमीटर में विस्तारित है। यानी यह माजुली से तकरीबन आधा है।


ब्रह्मपुत्र, खेरकुटिया, लोहित और सुबनसिरी नदी का द्वीप - वास्तव में माजुली द्वीप कोई अकेला एक ही नदी का द्वीप नहीं है। यह दक्षिण में ब्रह्मपुत्र नदी और उत्तर में खेरकुटिया खूटी नामक धारा के बीच अवस्थित है। खेरकुटिया खूटी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है जो आगे चलकर फिर उसी में मिल जाती है। उत्तर में सुबनसिरी नदी खेरकुटिया खूटी से मिल जाती है। माजुली द्वीप का निर्माण कालांतर में ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों विशेषकर लोहित नदी के दिशा और क्षेत्र परिवर्तन की वजह से बनी है।

माजुली का निर्माण कब हुआ इसका आकलन मुश्किल है। इसको लेकर ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते हैं। लेकिन जो प्रमाण मिलते हैं उससे पता चलता है कि माजुली द्वीप का निर्माण 13वीं सदी से पहले हो गया था। डाक्टर डी नाथ अपनी पुस्तक माजुली-आईलैंड सोसाइटी इकोनोमी एंड कल्चर में लिखते हैं – कूच बिहार केराजा नर नारायणा ने माजुली में अपना शिविर लगाया और और उसने अहोम राजा सुखमफा (खोरा राजा) जिसका काल 1548-1563 रहा है, से उपहार आदि प्राप्त किए। वह कूच बिहार के राजा से पराजित हो गया था।

पहले इसका नाम माजाली और मोजाली हुआ करता था। औरंगजेब के काल में 17वीं सदी में मोहम्मद काजिम ने माजुली के 100 वर्ग मील में होने का जिक्र किया है। 1901 में ब्रिटिश लेखक बीसी एलेन माजुली के बारे में लिखते हैं कि यह 185 वर्ग मील में विस्तारित है और यहां 35 हजार की आबादी रहती है।


माजुली में ब्रह्मपुत्र द्वारा लाई गई अत्यंत उपजाउ जमीन के कारण यहां पर लोगों ने आकर खेतीबाड़ी शुरू की। हर साल बारिश के दिनों में ब्रह्मपुत्र यहां नई मिट्टी लेकर आती है। माजुली की जमीन पर धान, सरसों, गन्ना, पटसन, आलू और कई तरह की सब्जियां उगाई जाती हैं। इसका एक बड़ा हिस्सा वेट लैंड या दलदली जमीन वाला भी है।
- vidyutp@gmail.com

(MAJULI, RIVER ISLAND, DR D NATH, ASSAM, BRAHMPUTRA RIVER ) 


Monday, November 28, 2016

सत्र नगरी माजुली में आपका स्वागत है.... ((03))


ब्रह्मपुत्र में फेरी पर तकरीबन 50 मिनट के सफर के बाद हमें दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली का घाट दिखाई देने लगा। फेरी कमलाबाड़ी सत्र के घाट के करीब थी। यह थोड़ी देर में फेरी किनारे लग गई। यह भी एक अस्थायी घाट नजर आ रहा है, जिसकी रूपरेखा बारिश के दिनों में पानी बढने पर बदल जाती होगी। फेरी से सबसे पहले बाइक और जीप जैसे वाहन उतरे। रास्ता बनने के बाद धीरे धीरे लोगों ने उतरना शुरू किया।

सामने एक बड़ा बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है वेलकम टू सत्रनगरी माजुली। अनादि और माधवी को अभी माजुली के बारे में अभी ज्यादा पता नहीं। हमारे टूर प्लान में यह उनके लिए तो सरप्राइज विजिट है। इसलिए वे इस सफर को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। पर तीन दिन के माजुली प्रवास के बाद यह उनकी अत्यंत प्रिय और कभी न भुलाने वाली जगह बन जाएगी मुझे ऐसा लगता है।
फेरी से उतरने पर सामने कच्ची सड़क नजर आ रही है। झोपड़ी में कुछ दुकाने हैं। यहां से फिर जीप और टाटा मैजिक जैसी गाड़ियां हैं जो सवारी ढूंढ रही हैं। हमलोग भी गड़मूर सत्र जाने वाले हैं। तो एक मैजिक वाले से बात होती है 30 रुपये प्रति सवारी। वह हमारा सामान उठाकर गाड़ी के छत पर सजा देता है। थोड़ी देर में ही सवारी भरने पर गाड़ी चल पड़ती है। 


फेरी में चलती है छोटी सी दुकान...
 थोड़ी देर बाद पक्की सड़क आ गई। पहले कमलाबाड़ी सत्र का बाजार आया। इसके बाद फिर खेतों से के बीच सड़क से होते हुए गड़मूर सत्र का बाजार। हमारे मैजिक वाले ड्राईवर जिनका नाम नालकू है, वे हम गड़मूर बाजार में छोड़ देते हैं पर मैं कहता हूं कि मुझे गड़मूर सत्र जाना है। सत्र का गेट यहां से एक किलोमीटर आगे है। थोड़े विवाद के बाद वे हमें सत्र के गेट पर पहुंचाते हैं। पर जब मैं अपने मेजबान को फोन करता हूं तो वे मुझे गड़मूर बाजार में स्टेट बैंक से आगे आने को कहते हैं। अब हमें फिर बाजार में ही वापस आना पड़ा। पर मैजिक वाले ने कोई अतिरिक्त किराया नहीं मांगा। स्टेट बैंक से फिर हमने अपने मेजबान से रास्ता पूछा। उन्होंने बताया सीधे पैदल चलकर चौराहे ( चारआली) तक आएं। वहां से बाएं मुड़े फिर आपको ला मिसन डी आनंदा दिखाई देगा। इस तरह हम अपनी मंजिल तक पहुंचे। ला मैसन डी आनंदा के संचालक मंजीत रिसांग हैं। उन्होंने पहुंचने पर बताया कि हमें अपने सभी गेस्ट को रिसीव करने टैक्सी स्टैंड तक आ जाते हैं, पर आज कई लोग चेकआउट कर रहे थे इसलिए आपके लिए समय नहीं निकाल सका। उन्होंने इसलिए औपचारिक माफी मांगी। हमारा अगले तीन दिन के लिए ठिकाना बना ला मैसन डी आनंदा का चंपा कमरा।


गुवाहाटी से माजुली पहुंचने के  तीन रास्ते 


At La Maison De Ananda in Majuli 
असम की राजधानी गुवाहाटी से द्वीप जिला माजुली पहुंचने के तीन रास्ते हैं। 

1. पहला रास्ता जोरहाट होकर है। हमलोग माजुली पहुंचे हैं जोरहाट से निमाती घाट से फेरी पकड़ कर कमलाबाड़ी के रास्ते पहुंचे हैं। गुवाहाटी से जोरहाट 376 किलोमीटर है। जोरहाट से निमाती घाट को 15 किलोमीटर है। निमाती घाट से ब्रह्मपुत्र में 14 किलोमीटर और कमलाबाड़ी से गड़मूर सत्र 8 किलोमीटर। ये दूरियां हमने टुकड़ों में तय की हैं।

2. दूसरा रास्ता है माजुली पहुंचने का जिसमें आप  सीधे बस से गुवाहाटी से माजुली पहुंच सकते हैं। गुवाहाटी से माजुली के लिए नेटवर्क ट्रैवेल्स और दूसरे आपरेटर की बसें चलती हैं। किराया है 600 रुपये। गुवाहाटी से तेजपुर, विश्वनाथ चाराली, नार्थ लखीमपुर, गुगामुख ठकुआखाना होते हुए ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी खैरखोटिया पर बने पुल को पार बस जंगराई मुख मार्केट में प्रवेश कर जाती है जो माजुली द्वीप का एक बाजार है। बस कमलाबाड़ी बाजार में छोड़ती है। वापसी की बस भी यहीं से चलती है। आप गुवाहाटी के पलटन बाजार में नेटवर्क ट्रैवेल्स (http://www.networkbus.in/) की बसों के लिए पूछताछ कर सकते हैं। अभी माजुली के लिए ऑनलाइन बस बुकिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं है। पर हर रोज शाम को एक बस माजुली के लिए चलती है। 
माजुली द्वीप पर चलती लोकल बस 

3 . तीसरा रास्ता फेरी से है नार्थ लखीमपुर से होकर। आपको नार्थ लखमीपुर से धुनागुड़ी घाट आना होता है। यहां से माजुली के लिए फेरी चलती है। यह फेरी का मार्ग छोटा है। आधे घंटे लगते हैं। यहां से गड़मूर सत्र के लिए शेयरिंग टैक्सियां मिल जाती हैं। यहां सुबह से शाम को 5 बजे तक आखिरी फेरी मिलती है। हमलोग जीरो से नार्थ लखीमपुर होकर इस मार्ग से सुगमता से आ सकते थे पर इस मार्ग के बारे में पहले से स्पष्ट जानकारी का अभाव था। दूसरा का हम ज्यादा सफर रेल से तय करना चाहते थे वहीं निमाती घाट से फेरी से माजुली आने का अपना अलग अनुभव और एहसास है। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( MAJULI, ASSAM, SATRA NAGRI, KAMLABARI, GARMUR SATRA, LA MAISON DE ANANDA, MAJULI BY BUS VIA LAKHIMPUR ) 
माजुली की यात्रा को शुरुआत से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

Saturday, November 26, 2016

जोरहाट से माजुली की ओर वाया निमाती घाट ((02))

जोरहाट को असम के टी सिटी के तौर पर जाना जाता है। हालांकि ये तमगा ढिब्रूगढ़ शहर के पास है।  पर जोरहाट भी इसका बड़ा दावेदार है। जोरहाट में रौरिया इलाके में एयरपोर्ट है। यहां आसम एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी है। यहां पर एक मेडिकल कालेज भी है। एशिया का सबसे पुराना गोल्फ कोर्स जोरहाट के जिमखाना क्लब में स्थित है। कृषि विश्वविद्यालय के बाद, असम वीमेंस यूनीवर्सिटी और काजीरंगा यूनीवर्सिटी के कारण जोरहाट शिक्षा का भी बड़ा केंद्र है। यहां पर रेन फारेस्ट शोध केंद्र, टी रिसर्च इंस्टीट्यूट भी स्थित हैं। जोरहाट से काजीरंगा घूमने भी जाया जा सकता है तो जोरहाट दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली का प्रवेश द्वार है।

जोरहाट में चौक बाजार के स्टैंड से हमें निमाती घाट के लिए टाटा मैजिक मिलता है। प्रति सवारी 25 रुपये. शहर से निकलकर आसाम ट्रंक रोड को पार करते हुए शहर में नए बने बाइपास को पार करता है। इसके बाद हरे भरे खेत शुरू हो जाते हैं। खेतों के बीच सड़क ऐसे बनी है मानो लगता है प्रकृति के साथ हमने अतिक्रमण कर डाला हो। कुमार गांव होते हुए टाटा की मैजिक हरे भरे खेतों को चीर कर बने सड़क पर सरपट दौड़ रही है। धूप बिल्कुल नहीं है। हल्की हल्की बारिश ठंड बढ़ा रही है। कोई 20 मिनट के सफर के बाद अचानक हमें ब्रह्मपुत्र नदी के दर्शन होते हैं। जलराशि का असीमित विस्तार। नदी का दूसरा छोर दिखाई नहीं देता. सड़क ब्रह्मपुत्र नदी के साथ साथ चल रही है।


पहला घाट आता है। पर ये हमारी मंजिल नहीं। यहां से दक्षिणा पथ के लिए फेरी जाती है। थोड़ी दूर चलने पर कमलाबाड़ी जाने वाली फेरी का स्टैंड आ जाता है। यहां पर टाटा मैजिक जैसे वाहनों की लाइन लगी है। कुछ अस्थायी दुकाने हैं। नदी में एक फेरी लगी है जो प्लेटफार्म का काम कर रही है। इससे होकर हमलोग कमलाबाड़ी जाने वाली फेरी पर पहुंच गए। सुबह 8.30 में चलने वाली पहली फेरी जाने के लिए तैयार है। फेरी के बाहरी हिस्से में जीप, कारें और मोटरसाइकिलें लाद दी गई हैं। अंदर बैठने के लिए बेंच बने हैं। मुश्किल से हमें एक जगह मिल पाती है। अंदर के छोटी सी चाय पान की दुकान भी है।

हमें फेरी का स्टाफ के कूपन देता है। वह किराया नहीं लेता। किराया तो बाद में चलती फेरी में दूसरा स्टाफ वसूलने आता है।  निमाती घाट से माजुली के कमलाबाड़ी का किराया 20 रुपये है। बच्चों का किराया नहीं लगता। फेरी सरकारी है। असम सरकार इसका संचालन करती है।

सही समय पर फेरी चल पड़ी। ब्रह्मपुत्र के सीने पर 14 किलोमीटर के सफर पर। मैं और अनादि फेरी की छत पर चढ़ जाते हैं। सीधी सीढ़ियां पर चढ़ते हुए। छत पर फेरी के कप्तान का केबिन है। बाहर काफी लोग खड़े हैं। कुछ लोग बैठकर ताश के पत्ते खेल रहे हैं। हम चारों तरफ नजर घुमाते हैं। अनंत जल का विस्तार नजर आता है। ब्रह्मपुत्र देश की सबसे चौड़ी नदी है। कहीं कहीं तो इसकी चौड़ाई 30 किलोमीटर तक है। हमारी मंजिल माजुली है। 


इस फेरी में एक असमिया न्यूज चैनल की टीम जा रही है जो माजुली का दशहरा कवर करने जा रही है। इसके संवाददाता उत्पल दास मेरा लंबा साक्षात्कार लेते हैं। वे पूछते हैं सरकार जोरहाट से माजुली के बीच पुल बनाने की बात कर रही है। क्या आपको नहीं लगता इससे माजुली का वास्तविक सौंदर्य खत्म हो जाएगा। मेरे लिए इसका जवाब देना मुश्किल था। मैं तो अभी माजुली को महसूस करने ही जा रहा हूं। पर इतना जरूर कहा कि जनता को विकास से दूर  नहीं किया जा सकता।
- vidyutp@gmail.com

( ASSAM, JORHAT TOWN, NIMATI GHAT, BRAHAMPUTRA, FERRY,MAJULI, KAMLABARI  ) 



( आगे - सत्र नगरी माजुली में आपका स्वागत है...) 

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Thursday, November 24, 2016

गुवाहाटी से माजुली की ओर- चाय बगान के साथ छुक छुक सफर (( 01))

हमारा लंबे समय से संजोया सपना साकार होने जा रहा है। संसार के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली को देखने और महसूस करने का। ब्रह्मपुत्र के गोद में बसा नदी द्वीप माजुली, हमारी अगली मंजिल है। असम की राजधानी से कोई 300 किलोमीटर आगे। गुवाहाटी से ढिब्रूगढ़ इंटरसिटी एक्सप्रेस (15605) अपने नियत समय पर 8.45 बजे रात्रि में खुल जाती है। हमने पलटन बाजार के एक होटल में रात्रि का भोजन ले लिया है। इसलिए निश्चिंत हैं। ट्रेन के कोच में सहयात्री अच्छे हैं। थोड़ी देर में टीटीई टिकट चेक करने आते हैं। हमारे पड़ोस में एक बैंक अधिकारी अपनी पत्नी के साथ जा रहे हैं जो जोरहट में एक बैंक में चीफ मैनेजर हैं। उन्होंने टिकट बुक करते समय खुद को एफ (फिमेल) और अपनी पत्नी को मेल लिख दिया है । 
टीटी बाबू इस गलती पर नाराज हैं। वे कहते हैं जैसी टिकट में लिखा है वैसा पहचान पत्र दिखाओ या फिर जुर्माना भरो। बैंक अधिकारी अपनी भूल मान लेते हैं। हमलोग भी उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। ऐसी भूल किसी से भी हो सकती है। आजकल तो कई बार कंप्यूटर भी गलतियां कर देता है। काफी समझाने पर टीटी बाबू पिघलते हैं और उन्हें छोड़ देते हैं। बैंक वाले अधिकारी जब ये सुनते हैं कि हम जोरहाट उतरने वाले हैं तो वे तपाक से पूछते हैं कि भला जोरहाट में घूमने की क्या जगह है। मैं उन्हें बताता हूं कि हम वहां से माजुली जाएंगे।

अनादि उत्साहित हैं कि हमारी ट्रेन डिमापुर में रुकते हुए आगे बढ़ेगी, उनकी इच्छा नागालैंड के इस स्टेशन को उतरकर देखने की है। पर मध्य रात्रि में डिमापुर आया तो वे नींद के आगोश में थे। पर मेरी डिमापुर स्टेशन पर तस्वीर देखकर वे झल्लाएंगे जरूर। उनकी दिली इच्छा नागालैंड घूमने की है। मैं तो कोहिमा और आसपास 2013 में ही घूम आया हूं।

गुवाहाटी से जोरहाट टाउन जाने के लिए दिन भर में तीन ट्रेनें है सुबह में जन शताब्दी दोपहर में और रात को इंटरसिटी एक्सप्रेस. पर जोरहाट के 18 किलोमीटर बाद के स्टेशन मरियानी जंक्शन के लिए कई ट्रेनें बढ़ जाती हैं। जोरहाट इंटरसिटी दो हिस्सों में चलती है। इसका एक हिस्सा फारकटिंग जंक्शन से कटकर जोरहाट, शिबसागर होता हुआ ढिब्रूगढ़ जाता है। दूसरा हिस्सा मरियानी, सिमालगुड़ी जंक्शन, नमारुप, नहारकटिया, दुलियाजान, तिनसुकिया, न्यू तिनसुकिया, दिग्बोई होता हुआ पूर्वोत्तर के आखिरी स्टेशन लीडो तक जाता है।
इंटरसिटी एक्सप्रेस फारकटिंग जंक्शन में 30 मिनट से ज्यादा रुकती है क्योंकि यहां ट्रेन दो हिस्सों में बंटती है। फारकटिंग, गोलाघाट जिले का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। मैं डिमापुर से आगे पहली बार जा रहा हूं।


सुबह का उजाला होने लगा है और ट्रेन गोलाघाट स्टेशन पर खडी है। आगे के सफर में ट्रेन की खिड़की से दोनों तरफ जहां तक नजर जाती है चाय के बगान ही दिखाई देते हैं। चाय ही चाय कहीं कहीं बीच में धान के खेत नजर आते हैं। नजारा मन मोह लेता  है। मैं कभी तस्वीरें उतारता हूं तो कभी छोटा सा वीडियो बनाता हूं। विश्व का सबसे बड़ा टी एक्सपेरिमेंटल एस्टेट जोरहाट में स्थित है।

गोलाघाट के बाद नुमालीगढ़, खुमटाई, बादुलीपुर, रंगालीटिंग,  बरुआ बामनगांव, भालुकमारा और रौरिया जैसे छोटे छोटे स्टेशन जल्दी जल्दी आते हैं। इन स्टेशनों का भवन किसी हाल्ट जैसा है। कई स्टेशनों पर तो कोई चढ़ता उतरता दिखाई नहीं देता। पर यहां एक्सप्रेस ट्रेन का ठहराव है। ट्रेन अपने तय समय आधे घंटे देर से जोरहाट टाउन रेलवे स्टेशन पर हमें उतार देती है।

वैसे तो जोरहाट असम का गुवाहाटी, सिलचर के बाद तीसरा बड़ा शहर माना जाता है पर रेलवे स्टेशन छोटा सा है। सिर्फ दो प्लेटफार्म हैं। मुख्य शहर स्टेशन के मुख्य प्रवेश के उल्टी तरफ है। हमलोग लाइन क्रॉस करके बाहर निकलते हैं। हमें बस-आटो स्टैंड पहुंचना है जहां से निमाती घाट के लिए छोटे वाहन मिलते हैं। आटो वाला 80 रुपये मांग रहा है तो रिक्शावाला 50 रुपये। हम रिक्शे पर बैठ जाते हैं। रिक्शावाला बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का है। वह 40 साल से जोरहाट में है।  सुबह का समय है अभी जोरहाट का बाजार बंद है इसलिए हमें शहर की जीवंतता का एहसास नहीं होता। रिक्शावाला हमें निमाती घाट जाने वाले ऑटो स्टैंड पर पहुंचा देता है। हम उसे धन्यवाद कह उतर जाते हैं।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य    ( आगे की 25 कड़ियों में लगातार पढ़ते रहिए माजुली की कहानी ... ) 



( ASSAM, RAIL, JORHAT TOWN, MAJULI, FURKATING JN, DIMAPUR, NUMALIGARH, TEA GARDEN ) 

Wednesday, November 23, 2016

ब्रह्मपुत्र का किनारा और फैंसी बाजार की रौनक

नील पर्वत से मां कामाख्या के दर्शन करके लौटते वक्त हमलोग फैंसी बाजार जाने वाली बस में चढ़े। दोपहरी गहरा गई थी। इसलिए अब भोजन करने की इच्छा थी। मंदिर परिसर में हमें गुवाहाटी के एक मारवाड़ी भाई मिले थे। उनसे हमने गुवाहाटीके के शाकाहारी भोजनालयों के बारे में पूछा था। ज्यादातर मारवाड़ी लोग शाकाहारी होते हैं इसलिए उन्हें इसके बारे में ज्यादा पता होता है। उन्होंने हमें फैंसी बाजार में तीन शाकाहारी भोजनालयों के बारे में बताया था। जयश्री की रसोई, गोपाल महाराज (गल्ला पट्टी में) और जेबीएस घाट के किनारे। हम इन तीनों में से कहीं एक जगह जा सकते थे इसलिए जय श्री की रसोई ही जाना तय किया।
हमारी बस ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बने सड़क से होकर गुजर रही है। हमें मुंबई का मरीन ड्राईव याद आ रहा है। यह नदी के किनारे बनी सड़क मरीन ड्राईव जैसी ही लगती है। ब्रह्मपुत्र में कुछ स्टीमर और मोटर लांज दिखाई दे रहे हैं। सड़क और नदी के तट के बीच में पार्क बना है। पार्क में लोग टहलते हुए नजर आ रहे हैं। दोपहर में इतनी रौनक है तो शाम यहां काफी सुहानी होती होगी। नदी के किनारे झालमुड़ी बेचने वाले घूम रहे हैं। नदी के तट पर कुछ प्रतिमाएं लगी हैं। यहां से बैठकर दूर तक बहते विशाल नद ब्रह्मपुत्र को निहारना बड़ा सुखकर अनुभव हो सकता है। यहां शाम को कुछ जहाज चलते हैं जो आपको ब्रह्मपुत्र की सैर कराते हैं। आप लंच क्रूज में सवार होकर ब्रह्मपुत्र की सैर के साथ खाने पीने का मजा ले सकते हैं। गुवाहाटी के इस रिवर फ्रंट की सुंदरता में और इजाफा हो सकता है अगर साफ सफाई पर थोड़ा और ध्यान दिया जाए।
गुवाहाटी -- ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे किनारे...
हमारी इच्छा उमा नंदा मंदिर जाने की है जो ब्रह्मपुत्र के बीच में बने पीकॉक द्वीप पर स्थित है। लोगों ने बताया कि फैंसी बाजार के पास ही शुक्लेश्वर घाट से उमा नंदा के लिए बोट जाती है। पर समयाभाव के कारण हम वहां नहीं जा सके। फैंसी बाजार के स्टाप पर उतरकर थोड़ी देर ब्रह्मपुत्र दर्शन के बाद हम फैंसी बाजार की गलियों में घुस गए। दोनों तरफ असंख्य रेडीमेड कपड़ों की दुकानें और लोगों की भीड़। हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी। गुवाहाटी का ये फैंसी बाजार दिल्ली के चांदनी चौक या मुंबई के फैशन स्ट्रीट से मुकाबला करता हुआ नजर आता है। 
बाजार में सुबह से लेकर शाम तक खरीददारों की भीड़ लगी है। आवाजें लगाकर बेचते दुकानदार और मोलजोल करते ग्राहक। आधा किलोमीटर इस बाजार में चलने के बाद में हमें फैंसी बाजार का गुरुद्वारा नजर आता है। यहां से हम दाहिनी तरफ मुड़ जाते हैं। आप गुवाहाटी से कुछ असम की निशानी ले जाना चाहते हैं तो फैंसी बाजार से खरीददारी कर सकते हैं। पर हम तो ढूंढ रहे हैं जयश्री की रसोई।

मारवाड़ी हिंदी पुस्तकालय वाले भवन में गली में अंदर जाकर पहली मंजिल पर है जयश्री की रसोई। शाकाहारी वातानुकूलित भोजनालय। यह मारवाड़ी बासा नहीं है। बैठने के लिए टेबल और कुरसियां लगी हैं। अंदर का डेकोर तो अच्छा है। 
गुवाहाटी फैंसी बाजार, जयश्री की रसोई में भोजन का इंतजार। 
पर नवरात्र के कारम मेनू बदला हुआ है। हमने अपनी पसंद के अनुरूप आर्डर कर दिया। उन्होंने बताया आधा घंटा से ज्यादा वक्त लगेगा। हमें भी जल्दी कहां थी। खाना माधवी और वंश को सुस्वादु लगा, मुझे कुछ खास पसंद नहीं आया। खाने पीने के दरें ऊंची हैं उस हिसाब से इस भोजनालय के वेटर पढ़े लिखे नहीं हैं। खाने के बाद हमलोग एक बार फिर फैंसी बाजार की सड़क पर थे। 
हमलोग वहां से फिर फैंसी बाजार घूमते हुए बस लेकर पलटन बाजार पहुंच गए। माधवी और वंश होटल मेंआराम करना चाहते थे। कुछ घंटे बाद शाम को वे लोग बाजार में घूमने निकल गए। मैं गुवाहाटी चौथी बार आया हूं। इस बार पूर्वोत्तर के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार श्री रविशंकर रवि जी से मिलने की इच्छा है। मैं उनके लेख और रिपोर्ट स्कूली जीवन से पढ़ता आ रहा हूं। वे दैनिक पूर्वोदय के संपादक हैं। नवरात्र के मौके पर अष्टमी और नवमी को गुवाहाटी के सारे अखबार बंद हैं। 
इसलिए उन्होंने जीएस रोड के एक होटल में बुलाया है। फोन पर और फेसबुक पर संपर्क के बाद रवि जी से कुछ देर की मुलाकात यादगार बन जाती है। छोटी सी मुलाकात में वे मेरा पूर्वोत्तर को लेकर ज्ञान काफी बढ़ाते हैं। आप सब कुछ पढ़कर ही नहीं सीखते हैं, काफी ज्ञान विद्वानों संग से चर्चा से ही मिलता है।  
- vidyutp@gmail.com

( GUWAHATI, BRAHAMPUTRA RIVER, FANCY BAZAR,  JAISREE KI RASOI, RAVI SHANKAR RAVI, NANDAN HOTEL ) 
गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी का तट
गुवाहाटी ब्रह्मपुत्र में सैर....



अगली कडी से चलेंगे माजुली द्वीप की यात्रा पर। 


        

Monday, November 21, 2016

मां कामाख्या के मंदिर में दाना चुगते कबूतर

मां कामाख्या के मंदिर परिसर में असंख्य सफेद कबूतर चावल के दाने चुगते नजर आते हैं। दरअसल मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालु इन कबूतरों को चावल दान करते हैं। वहीं मंदिर की गली में कुछ दुकानदार कबूतर बेचते भी नजर आए। भाव पूछा तो 300 रुपये जोड़ा। लोग मनौती मांगने के लिए मंदिर में कबूतर खरीदने का बाद छोड़ते हैं। यानी कबूतरों को आजादी। यह भी जीव दया का सिद्धांत नजर आता है। हो सकता है ये दुकानदार महोदय उन आजाद कबूतरों को फिर से मंदिर परिसर से लाकर बेच देते हों।
पर इन कबूतरों की किस्मत बहुत अच्छी नहीं है। मंदिर परिसर में  कबूतरों की बलि भी दी जाती है। यानी हमेशा के लिए आजादी। पता नहीं मां को इन परिंदों की बलि पसंद आती होगी या नहीं। पर ये दस्तूर तो चला आ रहा है।

पर मां कामाख्या के मंदिर में तो बकरा और भैंसों की भी बलि हर रोज दी जाती है। मंदिर के गर्भ गृह के ठीक सामने बने एक हॉल में बलि की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। मैं मंदिर परिसर में घूमते हुए उस स्थल पर पहुंच गया हूं। एक भैंसे को बलि देने की तैयारी है। देखने वालों की भी भारी भीड़ लगी है।
मंदिर के पंडे बार बार बीच में रास्ता छोड़ने का आग्रह कर रहे हैं। वह क्यों ताकि बलि के स्थल से मां के मंदिर का गर्भ गृह साफ नजर आए। यानी बलि मां के नजरों के सामने दी जाए। और देखते ही देखते एक विशालकाय भैंसे की गरदन को एक लकड़ी के फ्रेम में लाकर फंसा दिया गया। 

छपाक...की आवाज के साथ वह भैंसा शांत हो गया। यह दृश्य देखना काफी मुश्किल था मेरे लिए। पर मां कामाख्या के मंदिर में यह रोज का नजारा है। हम धर्म में समय के साथ कई तरह के बदलाव कर चुके हैं। पर देश के कई मंदिरों में अभी बलि की प्रथा जारी है। मंदिर परिसर में कई और भैंसे दिखाई देते हैं जिनकी बारी आने वाली है। कई जगह लोग बकरे लेकर जाते दिखाई दिए। यह सब कुछ देखना मुश्किल था। क्या मां सचमुच बलि मांगती हैं और ऐसी बलि से प्रसन्न होती होंगी। शायद नहीं। तो फिर यह सब रुकता क्यों नहीं है। ऐसा ही कुछ त्रिपुरा के त्रिपुर मालिनी मंदिर और झारखंड के रजरप्पा में छिन्नमस्तिके भवानी मंदिर में देख चुका हूं।  
असमिया साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर इंदिरा गोस्वामी ( मूल नाम. मामोनी रायसम गोस्वामी) ने  अपने उपन्यास छिन्नमस्तार मानुहटो में उन्होंने कामाख्या देवी पीठ पर बलि देने की परंपरा का विरोध किया है। उपन्यास में यहां की धार्मिक परम्परा (कहा जाता है कि मनसा-पूजा में यहां मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग भी बलि चढ़ाते थे)साथ ही इसके नकारात्मक पहलू आदि को कथानक का रूप दिया गया है। उपन्यास छिन्नमस्ता के संन्यासी बलि प्रथा का विरोध करते है। वे मां से आग्रह करते हैं- मां तुम रक्त वस्त्र उतार दो। रक्त को त्याग फूलों से देवी की पूजा करो। फूल में ज्यादा शक्ति है।

दस हजार भैंसों की बलि
इंदिरा गोस्वामी अपने उपन्यास में लिखती हैं कि अहोम राजा स्वर्गदेव रुद्र सिंह उर्फ सुखरंगफा हर साल दुर्गा अष्टमी पर 10 हजार भैंसो की बलि मां कामाख्या को चढ़ाते थे। उनका शासनकाल  1694 से 1714 के बीच का था। उनके द्वारा दी जाने वाली बलि का जिक्र ऐतिहासिक पुस्तकों में आता है। अहोम राजाओं के काल से यहां बलि की परंपरा चली आ रही है। देश के कई मंदिरों में बलि रूक गई है, पर कई मंदिरों में यह अभी बदस्तूर जारी है।

साल के चार दिन बलि नहीं - सिर्फ साल के चार दिन ही ऐसे होते हैं जब मां कामाख्या के दरबार में  बलि नहीं चढाई जाती।  आषाढ़ के महीने में मंदिर की देवी को माहवारी होती है। तब यहां अंबूमाची मेला लगता है। इस मेले के दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और कोई बलि नहीं चढ़ाई जाती। इसके इतर सालों भर यहां बलि देकर मां को प्रसन्न करने का क्रम जारी रहता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

 ( MAA KAMAKHYA TEMPLE, GUWAHATI, ASSAM, SECRIFICIAL , Pigeon, Buffalo, Goat, Ahom King, Indira Goswami ) 


Saturday, November 19, 2016

मां कामाख्या के दरबार में हाजिरी लगाई...

सुबह के छह बजे हैं। हमारी ट्रेन बिल्कुल समय पर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर पांच पर पहुंच चुकी है। हमारी होटल इंद्र में बुकिंग है मेक माई ट्रिप डॉट काम से। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के पलटन बाजार वाले साइड में बाहर निकलते ही बाईं तरफ केसी सेन रोड पर पुलिस स्टेशन के सामने होटल स्थित है। किसी भी ट्रेन से 24 घंटे कभी भी उतरिए और टहलते हुए होटल पहुंच जाइए। एक बार पहले भी यहां ठहर चुका हूं। इस बार वे हमें पांचवी मंजिल पर कमरा नंबर 387 देते हैं। स्नानादि से निवृत होकर हमारी कामाख्या देवी के दरबार में हाजिरी लगाने की योजना है।

सुबह के आठ बजे हमलोग निकल पड़ते हैं। पलटन बाजार में नेपाली मंदिर के पास से बस लेते हैं। जुलुकबाड़ी तक जाने वाली बस हमें रास्ते में कामाख्या देवी मंदिर के प्रवेश द्वार पर उतार देती है। यहां से मंदिर तीन किलोमीटर ऊपर चढ़ाई पर है। टैक्सी वाले खड़े हैं 20 रुपये प्रति सवारी। वैसे मंदिर तक बस भी जाती है 10 रुपये प्रति सवारी। आज दुर्गाअष्टमी है। मंदिर में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ है। हमारी टैक्सी में गुवाहाटी का एक मारवाड़ी परिवार बैठा है। मारवाड़ी भाई मूल रूप से तो सीकर राजस्थान के रहने वाले हैं। गुवाहाटी में इनकी हार्डवेयर की दुकान है। बताया कि आज इतनी भीड़ होगी कि 9 से 10 घंटे लाइन में लगने पर दर्शन के लिए नंबर आएगा। इसलिए बाहरी दीवार पर ही मत्था टेककर लौट आएंगे। मंदिर के करीब पहुंचते ही हमें भी भीड़ का अंदाजा लगने लगा। टैक्सी से उतरने के बाद हमलोग सुंदर सजे धजे बाजार के बीच से आगे बढ़ने लगे। विशाल कार पार्किंग के बाद मंदिर की ओर से संचालित निःशुल्क जूता घर आया। जूते चप्पल जमाकरा कर हमलोग आगे बढ़े।


 भीड़ जरूर है पर कहीं कोई अव्यवस्था नहीं दिखाई देती। लोग क्रमबद्ध ढंग से आगे बढ़ते जा रहे हैं। मुख्यद्वार से अंदर प्रवेश करने के बाद मां के मंदिर में मनोरम नजारा दिखाई देता है। ऊंचे पर्वत पर हरे भरे पेड़ों के बीच मां का मंदिर। परिसर में असंख्य श्रद्धालु। काफी लोग बायीं  तरफ बने परिसर में दीप दान में जुटे हैं। कुछ लोग परिसर में बैठकर  मां की आराधना में जुटे हैं। लाल वस्त्र में मंदिर के पंडे जगह जगह दिखाई दे रहे हैं। पर ये पंडे लोग किसी भी श्रद्धालु को दर्शन या कोई कर्मकांड कराने के लिए बाध्य करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। आपकी मर्जी आप जैसे पूजा करना चाहें। हमने पता दिया दर्शन में नौ घंटे लगने की उम्मीद है। मुख्य मंदिर की परिक्रमा कर डाली। बाहर से दीवारों का स्पर्श कर मां का आशीर्वाद लिया। उसके बाद मंदिर के दाहिनी तरफ सीढ़ियों पर बैठकर सुस्ताने लगे। भला मां के दरबार में आए हैं जाने की इतनी भी क्या जल्दी है। मां मंदिर के सौंदर्य को हर कोण से निहार लें तब चलें।
एक घंटे बाद निकलने की इच्छा तो नहीं हो रही पर बाहर निकल पड़े। मंदिर के मुख्यद्वार के दोनों तरफ बाजार सजा है। काशी के विश्ननाथ गली की तरह। थोड़ा मोलजोल और खरीददारी करते हुए हमलोग आगे बढ़े। एक दुकान से मंदिर का धागा खरीदा। इसमें स्वास्तिक की सुंदर कढ़ाई की गई है। एक जगह एक सज्जन अचार बेचते नजर आए। हमने बांस और आमड़ा का अचार खऱीदा। 
तो ये है रुद्राक्ष ..एक मुख,पंच मुखी या फिर माला बनवाएं...

थोड़ा आगे चलने पर एक रुद्राक्ष की दुकान दिखाई दे गई। दुकानदार महोदय ने हरे हरे रुद्राक्ष रखे हुए थे। आपके समाने इसको छीलकर उसके अंदर से रुद्राक्ष निकाल रहे थे। कितने मुख का निकल आए ये आपकी किस्मत। ताजे रुद्राक्ष बेच रहे थे 10 रुपये में एक। मुझे तुरंत एक रुद्राक्ष छीलकर दिखाया, पंचमुखी निकल आया। माधवी ने मणिपुरी ज्वेलरी तो अनादि ने खिलौने खरीदे। कुछ यादगारी लेकर तो जाना ही है ना...

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नील पर्वत वासिनी मां कामाख्या देवी 

-         विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ASSAM, MAA KAMAKHYA TEMPLE, GUWAHATI ) 


  

Friday, November 18, 2016

अगियाठोरी रेलवे स्टेशन - कभी यहां रहती थी रौनक

हम नहारलगून इंटरसिटी से गुवाहाटी जा रहे हैं। सुबह नींद खुली तो हमारी ट्रेन चांगसारी रेलवे स्टेशन पर थी। चांगसारी ब्रह्मपुत्र नदी के इस पार का बड़ा स्टेशन बन गया है। इसके आगे ब्रह्मपुत्र नदी पर सरायघाट पुल से पहले आगठोरी नामक एक हाल्ट आता है। यहां कोई एक्सप्रेस ट्रेन नहीं रुकती। पर किसी जमाने में आगठोरी बड़ा स्टेशन और बंदरगाह हुआ करता था। तब इस स्टेशन पर रौनक हुआ करती थी। स्टेशन का नाम AGTHORI  है इसका स्टेशन कोड AGT  है। कामख्या जंक्शन से 8 किलोमीटर पहले आता है आगठोरी। इस स्टेशन पर सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें रूकती हैं। कुछ लोग इस स्टेशन का नाम आज्ञाठोरी बुलाते हैं। हिंदी में रेलवे स्टेशन का नाम लिखा है आगियाठोरी।


अब रेलवे स्टेशन का कोई प्लेटफार्म यहां दिखाई नहीं देता। दोनों तरफ हरे भरे खेत नजर आते हैं। पर एक जमाना था जब न्यूजलपाईगुड़ी की ओर से आने वाली रेलगाड़ियां आगियाठोरी में ही रूक जाती थीं। क्योंकि तब ब्रह्मपुत्र पर रेल पुल नहीं था। सरायघाट पुल ब्रह्मपुत्र पर बना पहला रेल कम रोड ब्रिज है। 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस पुल का उदघाटन किया। साल 2012 में इस पुल ने अपना स्वर्ण जयंती ( 50 साल) मनाया। 10.6 करोड़ रुपये के लागात से तीन साल में इस पुल का निर्माण किया गया था। 31 अक्तूबर 1962 को पहली मालगाड़ी ने सरायघाट पुल से पार किया। यह डबल लाइन मीटर गेज रेल पुल था। पर अब सिंगल लाइन ब्राडगेज पुल है।

सुबह में गुवाहाटी की एक सड़क, रेल की खिड़की से 
पर 1962 से पहले क्या होता था। तब गुवाहाटीआने वाली रेलगाड़ियांऔर माल गाड़ियां आगियाठोरी में रुक जाती थीं। इसके बाद लोग फेरी से ब्रह्मपुत्र पारकर गुवाहाटी पहुंचते थे। वहां मालगाडियों के सामन को ट्रकों में लाद कर ब्रह्मपुत्र के तट पर लाया जाता था, वहां से फेरी के रास्ते माल गुवाहाटी शहर पहुंचता था।
तब अगियाठोरी असम का प्रमुख स्थल हुआ करता था। यहां पर कुलियों की भीड़ रहती थी। पुराने लोग जिन्होंने 1962 के पहले का दौर देखा है वे अगियाठोरी के महत्व और उसके रौनक को याद करते हैं। अगियाठोरी रेलवे स्टेशन के पास ही आईआईटी गुवाहाटी का परिसर स्थित है।

पर सरायघाट में रेल पुल बन जाने के बाद यह स्टेशन महज एक हाल्ट बनकर रह गया । आज 24 घंटे में  कुछ पैसेंजर गाड़ियां ही यहां रुकती हैं।

फिर लौटेगी रौनक - अब रेलवे की योजना अगियाठोरी में एक बड़ा पैसेंजर टर्मिनल बनाने की है।  साल 2016 के रेल बजट में 517 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जिससे अगियाठोरी को गुवाहाटी के सेटेलाइट स्टेशन के तौर पर विकसित किया जाएगा। यहां पर पैसेंजर टर्मिनल और इंटेग्रेटेड कोचिंग सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा।  ऐसा होने पर एक बार फिर अगियाठोरी के दिन बहुरेंगे। इसके साथ ही कामाख्या जंक्शन और गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से यात्री और सामान ढुलाई का बोझ भी कम हो सकेगा। योजना पूरी होने पर अगियाठोरी ही गुवाहाटी का प्रमुख रेलवे स्टेशन बन जाएगा।
जहां अगियाठोरी का स्टेशन है, 1671 में इसी स्थल पर प्रसिद्ध सरायघाट का युद्ध हुआ था। यह युद्ध मुगलों और अहोम राजाओं की सेना के बीच हुआ।  यह असम के निर्णायक युद्ध में गिना जाता है।
- vidyutp@gmail.com

( AGTHORI, SRAIGHAT BRIDGE, RAIL, KAMAKHYA JN , ASSAM ) 
आगे पढ़िए - मां कामाख्या के दरबार में 

Wednesday, November 16, 2016

नहारलगून रेलवे स्टेशन और गुवाहाटी का सफर

अरुणाचल प्रदेश की राजधानी का रेलवे स्टेशन है नहारलगून। फिलहाल रोज एक ट्रेन सुबह आती है और शाम को वापस जाती है। एक साप्ताहिक ट्रेन दिल्ली से पहुंचती है और दूसरे दिन दिल्ली वापस जाती है। राजधानी के रेलवे स्टेशन पर बस इतनी ही ट्रेनों की आवाजाही है। सफेद रंग का रेलवे स्टेशन भवन बाहर से किसी शाही बंगले का आभास देता है। नार्थ इस्ट फ्रंटियर रेलवे की और से साफ सफाई अच्छी है तो रेलगाड़ियां भी कम हैं, इसलिए स्टेशन साफ सुथरा चमचमाता हुआ नजर आता है।

 स्टेशन में प्रवेश करने पर टिकट काउंटर वाले क्षेत्र में ही एक छोटी सा फूड कोर्ट है। यहां पर शाम को पूरी सब्जी 30 रुपये की प्लेट मिल रही है। यानी आप शहर से कुछ खाकर नहीं आए हैं तो हल्की फुल्की पेट पूजा कर सकते हैं। इस फूड कोर्ट को एक महिला चला रही हैं। वे पकौड़े भी बना रही हैं। पानी, बिस्कुट समेत कुछ और जरूरत की चीजें उपलब्ध है। नए टाइम टेबल के अनुसार रात को 10 बजे गुवाहाटी इंटरसिटी एक्सप्रेस यहां से खुलती है। रात को नौ बजे रेलवे के टीटीई महोदय वर्दी में अवतरित हुए जो स्टेशन में प्रवेश करने वालों के टिकट चेक कर रहे थे। शहर के बाहर इस स्टेशन पर भला जिसे ट्रेन न पकड़नी हो रात में यहां क्यों आएगा।

स्टेशन बिल्डिंग के बाहर बड़े बड़े अक्षरों में नहारलगून और एक तरफ इटानगर लिखा गया है। 22411 नहारलगून दिल्ली एसी एक्सप्रेस यहां से हप्ते में एक दिन खुलती है जबकि
15617 गुवाहाटी नहारलगून इंटरसिटी एक्सप्रेस सप्ताह में सातों दिन चलती है। रात को गुवाहाटी से चलकर सुबह नहारलगून पहुंचती है तो डाउन ट्रेन रात को नहारलगून से चलकर सुबह गुवाहाटी पहुंचती है।
नहारलगून 138 मीटर (453 फीट) की ऊंचाई पर बसा एक एक शहर है जो चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा है। यह अरुणाचल प्रदेश के पापुमपारे जिले में आता है। रेलवे स्टेशन से इटानगर शहर का मुख्य केंद्र 15 किलोमीटर है। नहारलगून रेलवे स्टेशन पर समान्य और उच्च श्रेणी का प्रतीक्षालय के अलावा रिटायरिंग रूम भी बने हैं। प्रतीक्षालय काफी बेहतर स्थिति में और साफ सुथरा है।

1997 में हारमती से इटानगर को रेलवे से जोड़ने की योजना बनी। 15 अक्तूबर 2012 को हारमती-नहारलगून के बीच ब्राडगेज पर पहला इंजन दौड़ा। पर 7 अप्रैल 2014 से इस रेलवे स्टेशन से ट्रेनों का नियमित संचालन शुरू हुआ। 20 फरवरी 2015 को नहारलगून से दिल्ली के लिए सीधी साप्ताहिक ट्रेन का संचालन शुरू हुआ, इसके साथ ही अरुणाचल प्रदेश से देश की राजधानी दिल्ली से लिए सीधी ट्रेन सेवा आरंभ हो सकी। रात को 9.35 में इटानगर से खुलने वाली ट्रेन 32 घंटे का सफर करके दिल्ली पहुंचती है।

अभी अरुणाचल प्रदेश राज्य में सिर्फ दो रेलवे स्टेशन हैं। नहारलगून के बाद अगला स्टेशन गुमतो है तो हारमती दोईमुख मार्ग पर पड़ता है। इसके बाद ट्रेन असम में प्रवेश कर जाती है। हारमती जंक्शन है जो लखीमपुर जिले में पड़ता है।

गुवाहाटी इंटरसिटी पर सवार होने के लिए हमें दो घंटे नहारलगून रेलवे स्टेशन पर इंतजार करना पड़ा। रेलवे स्टेशन पर अरुणाचल आने वाले यात्रियों के लिए इनरलाइन परमिट बनवाने का दफ्तर भी बना हुआ है। परमिट के बिना प्रवेश करने पर जुर्माना और जेल की सजा भी हो सकती है। ट्रेन खुलने से पहले नहारलगून में मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। हमलोग यात्री शेड के नीचे थे इसलिए बचाव हो गया। हमारा डिब्बा भी शेड के सामने ही था इसलिए भिंगने की नौबत नहीं आई। नियत समय पर ट्रेन चल पड़ी। हमने अरुणाचल को अलविदा कहा और अपने बर्थ पर सोने की कोशिश में लग गए।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  

( NAHARLAGUN, ITANAGAR, GUMTO, NFR, RAIL, AC EXPRESS, ILP  )