Saturday, October 8, 2016

हिंद मोटर्स, सिंगूर और श्रीरामपुर

सिंगूर, श्रीरामपुर और हिंद मोटर जैसे नाम सुनकर आपको जेहन में कुछ याद आता है। जरूर याद आता होगा। सिंगूर वही जगह है जो टाटा नैनो प्लांट को लेकर कई सालों तक चर्चा में रहा। जब हम हावड़ा रेलवे स्टेशन से तारकेश्वर वाली लाइन पर चलते हैं तो लिलुआ, बेलुर, बाली, उत्तरपाड़ा के बाद आता है हिंद मोटर रेलवे स्टेशन। जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि यहां हिंद मोटर्स का कार बनाने का प्लांट हुआ करता था। इसी के नाम पर यह स्टेशन बना है। कभी यहां हिंदुस्तान की शान एंबेस्डर कार का निर्माण हुआ करता था। पर अब सब कुछ शांत है। एंबेस्डर कार इतिहास के पन्नों में समा चुकी है। 1942 में स्थापित हिंद मोटर्स मारूति के आने से पहले देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी थी। पर 24 मई 2014 को इस फैक्टरी से उत्पादन हमेशा के लिए बंद हो गया। कंपनी की स्थापना बीएम बिरला ने की थी। अपने आखिरी दौर में यह फैक्टरी सीके बिरला समूह के पास थी। फैक्टरी बंद होने के बाद आखिरी दिन 400 मजदूर बेरोजगार हो गए। फैक्टरी कैंपस और स्टाफ क्वार्टर वीरान होते जा रहे हैं। कभी गुलजार रहने वाला छोटा सा रेलवे स्टेशन हिंद मोटर भी अब सूना-सूना सा लगता है।  


मेरी लोकल ट्रेन आगे बढ़ती है। कोननगर और रिसड़ा के बाद आता है श्रीरामपुर रेलवे स्टेशन। श्रीरामपुर किसी जमाने में बंगाल का प्रमुख औद्योगिक शहर हुआ करता था। खास तौर पर यह अपने जूट मिलों के लिए जाना जाता था। पर यहां की भी चिमनियां अब शांत है। ज्यादातर जूट मिलों  में तालाबंदी है। 
श्रीरामपुर ने उपनिवेशवाद का उत्थान और पतन देखा... 
श्रीरामपुर पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में आता है। यह एक नगरपालिका स्तर का शहर है। यह कोलकाता महानगरपालिका के अन्तर्गत आता है। हुगली नदी के पश्चिमी तट पर स्थित यह शहर उपनिवेशकाल के पूर्व से बसा हुआ है। हावड़ा से श्रीरामपुर की दूरी 20 किलोमीटर है।
कई सौ साल पुराना शहर श्रीरामपुर ने उपनिवेशवाद का उत्थान और पतन देखा है। मुगलकाल के बाद यह शहर सूती और सिल्क के कपड़ों के लिए जाना जाता था। 16वीं से 18वीं सदी के बीच यहां फ्रेंच, पुर्तगाली और डच लोगों ने इसे अपना व्यापारिक केंद्र बनाया। श्रीरामपुर से 4 किलोमीटर आगे का रेलवे स्टेशन शेवराफुल्ली भी ब्रिटिश काल में प्रमुख व्यापारिक  केंद्र हुआ करता था। सबसे पहले यहां डेनमार्क के व्यापारी आए। उन्होंने यहां बाजार बनाया जो टीन बाजार के नाम से जाना जाता है। 1845 में श्रीरामपुर हुगली जिले का सब डिविजन बना और ब्रिटिश शासन का हिस्सा बन गया। 1855 में रिसड़ा में पहले जूट मिल की और 1866 में श्रीरामपुर में दूसरे जूट मिल की स्थापना हुई। इसके साथ ही बिहार, आंध्र प्रदेश, यूपी, ओडिशा से यहां लोग जूट मिलों में मजदूरी करने के लिए आने लगे। 1854 में हावडा से बर्दवान के बीच श्रीरामपुर होते हुए रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। 1915 तक श्रीरामपुर के आसपास छह और जूट मिलें स्थापित हो चुकी थीं और श्रीरामपुर एक गुलजार औद्योगिक शहर बन चुका था। यहां ओडिया बस्ती, छपरा बस्ती का निर्माण हो चुका था। शहर का आबादी 1901 में 44 हजार से पार हो चुकी थी। साल 2011 में श्रीरामपुर की आबादी भले ही 1.81 लाख हो पर शहर की सभी जूट मिलें शांत हो चुकी हैं। अब श्रीरामपुर कोलकाता का एक सेटेलाइट टाउन भर रह गया है। श्रीरामपुर में स्थित श्रीरामपुर कॉलेज की स्थापना 1818 में हुई। यह देश का दूसरा सबसे पुराना कॉलेज है।


सिंगूर में नहीं बन सकी लखटकिया कार – श्रीरामपुर से शेवड़ाफुल्ली, दियारा, नसीबपुर रेलवे स्टेशन को पार करने के बाद आता है सिंगूर रेलवे स्टेशन। सिंगूर की हावड़ा से दूरी 33 किलोमीटर है। सिंगूर राष्ट्रीय फलक पर चर्चा में तब आया जब टाटा मोटर्स ने यहां अपनी लखटकिया कार  नैनो के प्लांट लगाने का फैसला किया। काम काफी आगे बढ़ा पर वाम दल की सरकार के समय विपक्ष में रही तृणमूल कांग्रेस पार्टी और उसके समर्थक किसान संगठनों ने इस प्लांट का विरोध किया। कई साल आंदोलन चलता रहा। अंत में टाटा समूह ने  2008 अपना नैनो प्लांट यहां से बंद करने का फैसला लिया।

 इस आंदोलन के कारण ड्रीम कार नैनो को सड़क पर आने में देर भी लगी। नैनो उत्तराखंड और गुजरात में बन रही है। पर सिंगूर शहर उदास है। आज नैनो का उत्पादन अगर सिंगूर से हो रहा होता तो सिंगूर की अपनी एक और पहचान होती। अब विरोध करने वाले कई किसान भी दुखी हैं।उन्हें लगता है कि गलती हो गई। वैसे सिंगूर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर कलात्मक म्यूरल दिखाई देते हैं। पर सिंगूर शहर में उसी तरह का रंग नहीं भरा जा सका। ऐसा लगता है कि ठगा गया सिंगूर।       
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

(BENGAL, HINDMOTER, SRIRAMPORE, SINGUR, TATA NANO ) 

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