Sunday, October 30, 2016

जीरो का सब्जी बाजार - हरी भरी सब्जियों की बहार

आप किसी शहर में घूमने जाते हैं तो क्या वहां के सब्जी बाजार में भी जाते हैं। हम जाते हैं। सब्जी बाजार हर जगह का अपने आप में अनूठा होता है। वहां कौन कौन सी हरी सब्जियां उगाई जाती हैं इसका पता चल जाता है। वहीं सब्जी बाजार में असली ग्रामीण परिवेश के दर्शन होते हैं। अगर पूर्वोत्तर की बात करें तो वहां इतने की किस्म की सब्जियां हैं कि उन्हें देखकर दिल खुश हो जाता है। सोचता हूं कि अपनी रसोई होती तो एक एक करके इन सब्जियों को आजमाते, यानी इनका स्वाद लेते।

जीरो बाजार के हापोली में एमजी रोड पर सब्जी बाजार स्थित है। ये सब्जी बाजार काफी व्यवस्थित है। इसमें सब्जियों के अलावा कपड़े, कास्मेटिक और जनरल स्टोर जैसी दुकानें भी हैं।

तो चलिए देखते हैं यहां कैसी कैसी सब्जियां मिलती हैं। सबसे पहले बात बंबू शूट की। सूमो से जीरो आते समय कुछ स्थानीय महिलाएं बस में चढ़ी थीं जिनके पास बड़ी बड़ी प्लास्टिक की बोतलों में बंबू शूट पड़ा था। दरअसल बांस यानी कोमल बांस की जड़ों को सब्जी बनाकर खाया जाता है। यह बाजार में दो तरह से मिलता है। एक छिला हुआ बंबू शूट तो दूसरा उसके छोटे छोटे टुकड़े करके  इन्हे प्रिजर्वेटिव में डालकर बोतलों में रखकर बेचा जाता है। बंबू शूट को लोग पूर्वोत्तर में कई तरीके से खाते हैं। सब्जी के अलावा इसका अचार भी बनाया जा सकता है। पूर्वोत्तर राज्यों से ऐसा बांस का अचार लेकर आप आ सकते हैं।
इसकोस को पौधे के साथ अनादि। 

इसकोस ( ISKUS ) पूर्वोत्तर की खास हरी सब्जी है। यह समझो की मिनी कद्दू है। हरा भरा मांसल इसकोस को आप अपनी सब्जी के पैकेज में बाकी हरी सब्जियों की तरह की बना सकते हैं। यह टिंडा से काफी बड़ा होता है। पूर्वोत्तर के हर राज्य में इसकोस मिलता  है। हमने इस बार इसकोस का पौधा भी देखा। यह नेनुआ की तरह लत्तर वाली सब्जी है। इसे नेपाल वाले इस्कुश भी कहते हैं।

सब्जी बाजार में इतने तरह की हरी सब्जियां मिलती  हैं कि इन्हें देखकर दिल खुश हो जाता  है। यहां एक और सब्जी नजर आई याखू अम्मा। इसमें हरी भरी लत्तरों के साथ पीले पीले फूल थे। कहा जाता है कि पूर्वोत्तर में कई सब्जियां बिना लगाए यूं ही हो जाती हैं। बस आप तोड़कर ले आए हैं। जीरो के रास्ते में जगह जगह हमें केले के विशाल पेड़ नजर आए। इससे लोग केले के फूल लेकर आते हैं उन्हें बाजार में बेचते हैं या फिर घर में केले के फूल से रायता सब्जियां आदि बनाते हैं।
ये भी एक किस्म का आलू ही है....

हमें बाजार में अनूठा आलू दिखाई दिया। यह गन्ने के जैसा होता है। जमीन के अंदर बैठने वाले इस आलू को स्थानीय भाषा में किसी और नाम से भी जानते  हैं। पर इसे बनाने का तरीका आलू की तरह ही है। इसका स्वाद आलू से भी बेहतर है। बाजार में यह 30 से 50 रुपये किलो तक बिकता है।

गुवाहाटी के बाजार में हमें कासरा दिखाई देता है। यह कासरा पीले रंग का  है। इसको कैसे बनाकर खाते हैं यह स्थानीय लोगों को ही बेहतर पता होगा।

हमें एक और सब्जी दिखाई देती है लोया। यह लोया हरे रंग की है। सिर्फ इतना ही नहीं बाजार में छोटे आकार के बैंगन और छोटे आकार के कद्दू समेत कई तरह की सब्जियां दिखाई देती हैं जो हमने दिल्ली में कभी नहीं देखीं। सब्जी बाजार को देखकर लगता है कि पूर्वोत्तर को प्रकृति ने हरियाली की नेमत दिल खोलकर बख्शी है। आप सालों भर ढेर सारी हरी सब्जियों का आनंद ले सकते हैं। 
अब पूर्वोत्तर राज्यों के बाजार में इतनी सारी हरी सब्जियां होती हैं फिर भी लोग पूर्वोत्तर में मांसाहार को प्राथमिकता क्यों देते हैं। यह बात हमारी समझ में नहीं आती।
जंगली चूहे भी आ गए हैं बिकने के लिए 

सिल्क वर्म और चूहे भी बिकते हैं –
जीरो के बाजार में और नहारलगून के सब्जी बाजार में भी नागालैंड की तरह सिल्क वर्म बिकता हुआ दिखाई देता है। यह सिल्क वर्म जिंदा होते हैं और टोकरी में चहलकदमी करते रहते  हैं। सबसे अचरज हुआ जब हमने जीरो के बाजार में चूहे बिकते हुए देखे। ये चूहे मरे हुए थे। बताया गया कि इन चूहों को जंगल से पकड़ कर लाया गया है। एक आपातानी भाई ने बताया कि ये जंगली चूहे भून कर खाने में काफी स्वादिष्ट लगते हैं।   

सूखी मछलियों की कई किस्में - किस्म किस्म की मछलियां तो बिकती  ही हैं पर पूर्वोत्तर के सब्जी बाजार में कई तरह की सूखी मछलियां भी बिकती  हैं। इन्हें सूकटी कहते  हैं। इन सूखी मछलियों की कई किस्में हैं लंबी लंबी बंगाली सूखी मछलियां। इन मछिलयों को स्थानीय लोग अपने तरीके से बनाकर खाते हैं। सरदी गरमी बरसात में ये सूखी मछलियां सदाबहार  हैं।
जीरो की सब्जी मंडी में किस्म किस्म की सूखी मछलियां...

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( ZIRO, GREEN VEGETABLE,  FISH, RAT, SILK WORM, PORK ) 

     

Friday, October 28, 2016

जीरो में कोई शाकाहारी होटल नहीं है....

जीरो के बाजार में समोसा औऱ मिठाइयों की एक दुकान। 
सुबह के 11 बजे थे। हमलोग जीरो के अपने होटल में व्यस्थित हो जाने के बाद खाने की तलाश में निकले। भूख अच्छी खासी लग रही थी क्योंकि सुबह में नास्ता नहीं किया था। जीरो के हापोली बाजार में स्टेट बैंक वाले चौराहे पर पहुंचने से पहले जितने भी होटल मिले सबके नाम के आगे बीफ होटल लगा था। मतलब साफ था कि सभी होटलों में बीफ मिलता है। हम बीफ नहीं खाते तो क्या करें। अनादि ने कुछ होटलों में पूछा वेज मोमोज...जवाब मिला कहीं भी वेज मोमोज नहीं बनता। इसके लिए तो आर्डर करना पड़ेगा। चिकेन मोमो और दूसरे तरह के मांसाहारी कंबिनेशन वाले ही मोमोज बिक रहे थे। 

हमलोग खाने की तलाश में और आगे बढ़े। ठीक उसी तरह जैसे – दो बेचारे बिना सहारे देखो पूछ पूछ हारे... स्टेट बैंक वाले चौक पर एक स्टेशनरी की दुकान मिली। दुकानदार से बात कर पता चला कि वे मुजफ्फरपुर बिहार के हैं। उनसे थोड़ी सलाह ली। उन्होंने बताया कि आगे जाकर गली में घोष होटल है। वह बंगाली होटल है। हालांकि वह भी शाकाहारी नहीं है पर आपको वहां अच्छा खाना मिल जाएगा। हमने घोष होटल ढूंढ निकाला. लकड़ी का भवन। लकड़ी की ही फर्श । हिलता डुलता होटल। पचास रुपये की खाने की थाली। चावल, दाल, सब्जी और भुजिया। चाहे जितना खाओ 50 रुपये में। अनादि को थाली शेयर करने की इजाजत भी देदी। खाना संतोष जनक था पर बहुत अच्छा भी नहीं। हल्की बारिश हो रही थी।

हमने पूछा शाम को क्या बनेगा। उन्होंने कहा होटल शाम को कभी नहीं खुलता. यही नहीं जीरो में कोई भी होटल शाम को नहीं खुलता। फिर रात का खाना या डिनर कहां होगा। उन्होंने कहा आप जिस होटल में ठहरे हैं वही आर्डर करके खाना होगा। जीरो की सारी खाने पीने की दुकानें शाम को 6 बजे तक बंद हो जाती हैं। हम रात को लेकर अलर्ट हो गए. अपने होटल में ही खाने का आर्डर कर दिया। शाम को चौक पर एक मिठाइयों की दुकान मिली। वहां समोसे, पूरी, मिठाइयां और पराठे मिल रहे थे. पर ये लोग पराठे मैदे का बना रहे हैं। फिर भी शाकाहारी के लिए यह मिठाई की दुकान बड़ा संबल थी। अगली सुबह जीरो की सड़क पर घूमते हुए गुप्ता स्वीट्स दिखाई दिया। यहां पूरी सब्जी मिल गई 20 रुपये की प्लेट। सुबह का नास्ता अच्छा रहा।

MADE IN ZIRO..PORK AND BAMBOOSHOOT PICLKLE 
गुप्ता स्वीट्स वाले समस्तीपुर बिहार के रहने वाले हैं। सारा स्टाफ भी समस्तीपुर से ही आया है। उन्होंने बताया कि अगर आप आर्डर करें तो वे रात का शाकाहारी खाना उपलब्ध करा सकते हैं। वही खाना जो होटल के स्टाफ के लिए बनता है। पर हमने अपने होटल में खाने केलिए बात  कर ली थी। पर हमारे जीरो प्रवास के दौरान गुप्ता स्वीट्स का नास्ता, मिठाइयां आदि हमारे रुटीन का हिस्सा बना रहा। क्योंकि ये स्वीट शॉप ही शाकाहारी रसोई वाले थे। पूरे जीरो के बाजार में हमें चार-पांच ऐसी मिठाइयों वाली दुकानें नजर आईं। अगर नागालैंड की राजधानी कोहिमा से तुलना करें तो जीरो में शाकाहारी अपना गुजारा चला सकते हैं।

-        -  विद्युत प्रकाश मौर्य

( ZIRO, VEGETARIAN FOOD, RICE, PURI, PLATE, MOMOS )  


Wednesday, October 26, 2016

अरुणाचल का सुहाना हिल स्टेशन- जीरो

सुबह के 11 बजे हम होटल में चेक इन कर चुके थे। ये होटल हमने स्टेजिला डाट काम से बुक किया था। उन्होंने हमें डबल बेडरुम के नाम पर जो कमरा दिया है वह 4 बेड वाला है। विशाल कमरा दिल्ली के किसी दो कमरे के फ्लैट जितना बड़ा है। बिस्तर गद्दे आदि अच्छे हैं। होटल एक मार्केट कांप्लेक्स में बना है। ऊपर इस भवन में सेंट्रल बैंक की शाखा है। होटल में भोजनालय भी है।

अब बात पहले जीरो की करें। जीरो ही हम क्यों आए। अरुणाचल में कहीं जाना हो तो जीरो आना सहज है। तवांग या परशुराम कुंड वाले इलाके अपेक्षाकृत दूर हैं। जीरो एक ऐसा हिल स्टेशन है जहां रेल के बाद तीन घंटे की टैक्सी यात्रा करके सहज ढंग से पहुंचा जा सकता है। इटानगर से 115 किलोमीटर के दायरे में जीरो एक सुंदर हिल स्टेशन है, जहां बहुत कम सैलानी पहुंचते हैं। जीरो लोअर सुबानसिरी जिले का मुख्यालय है। जिला प्रशासन के सारे दफ्तर जीरो बाजार के हापोली इलाके में है।

वास्तव में हापोली ही जीरो का मुख्य बाजार है। यहीं डीसी दफ्तर, जिला न्यायालय और दूसरे सरकारी दफ्तर हैं। शहर की आबादी 13 हजार के आसपास है। यह 1700 मीटर यानी 5600 फीट की ऊंचाई पर है। तापमान सालों भर मनोरम रहता है। बारिश खूब होती है। वैसे आप यहां सालों भर पहुंच सकते हैं। सर्दियों में दिसंबर से फरवरी के बीच यहां बर्फबारी भी हो जाती है। असम के लखीमपुर शहर से जीरो की दूरी 100 किलोमीटर है। लखीमपुर से भी जीरो के लिए शेयरिंग सूमो सेवा मिलती रहती है।

जीरो को अरुणाचल का राइस बॉउल यानी धान का कटोरा कहा जाता है। जाहिर है कि यहां धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। जीरो आपातानी और निसी दो जनजातीय लोगों के लिए जाना जाता है। पुरानी परंपरा में लिपटा शहर विश्व विरासत के शहरों की सूची में शामिल होने के लिए बड़ा दावेदार है।

जीरो में सन 2004 के बाद नया आकर्षण जुड़ा है 20 फीट का शिवलिंगम जिसे सिद्धेश्वर महादेव कहा जाता है। पुराने जीरो में आप धान के खेत, एयर स्ट्रिप देख सकते हैं। इसके अलावा जीरो में हाई एल्टीट्यूड फिश फार्म देखने जा सकते हैं। शहर के एक इलाके हिल टॉप में शिव, काली और मां गायत्री के सुंदर मंदिर बने हैं। बाकी हिल स्टेशनों से अलग जीरो का परिवेश ग्रामीण नजर आता है। सड़कों पर शिमला या ऊटी की तरह रौनक नहीं है, पर ग्रामीण परिवेश को करीब से देखने के लिए काफी अच्छी जगह है। लोगों का व्यवहार काफी भोला भाला है। कोई आपको यहां ठगी करने वाला नहीं मिलेगा। लौटते हुए आप ढेर सारी मधुर यादें लेकर जाएंगे। तो चलिए ना कुछ और करीब से महसूस करते हैं जीरो घाटी को हमारे साथ।
MG ROAD OF ZIRO, ARUNACHAL. 

जीरो में हर साल सितंबर महीने में एक हफ्ते चलने वाला जीरो म्युजिक फेस्टिवल का आयोजन होता है। इस दौरान यहां बड़ी संख्या में संगीत प्रेमी जुटते हैं। हमारे पहुंचने से थोड़ा पहले ही यह संगीत का आयोजन संपन्न हुआ है। अब शहर नवरात्र मना रहा है।

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 ( ZIRO, HAPOLI, HOTEL CITY PALACE, RICE FIELD , ARUNCHAL ) 

Monday, October 24, 2016

नहारलगून से जीरो की ओर – सूमो से सफर

इनर लाइन परमिट की जांच के बाद हमलोग नहारलगून स्टेशन के बाहर आ चुके थे। नया नवेला स्टेशन किसी विशाल घर जैसा लगता है। हमें सहयात्रियों ने पहले ही बता दिया था कि स्टेशन नहारलागून बाजार से 5 किलोमीटर बाहर है। स्टेशन के आसपास आबादी काफी कम है। रोज सुबह एक ट्रेन आती है। हफ्ते में एक दिन दिल्ली वाली ट्रेन आती है लिहाजा स्टेशन से बाजार तक जाने के लिए हमेशा वाहन नहीं मिलता। पर सुबह गुवाहाटी इंटरसिटी के आने के बाद अरुणाचल रोडवेज की दो बसें स्टेशन से चलती हैं। एक बस नहारलगून से बांदरदेवा की ओर जाती है दूसरी बस इटानगर जाती है।

इटानगर रेलवे स्टेशन से तकरीबन 15 किलोमीटर है। तो हमलोग बिना कोई देरी किए नहारलगून बस स्टैंड तक जाने वाली बस में बैठ गए। किराया 20 रुपये प्रति व्यक्ति है। 20 मिनट बाद हमलोग नहारलगून बस-सूमो स्टैंड पहुंच चुके थे। हमने बस के कंडक्टर को बताया कि हमें जीरो जाने वाली वाली सूमो बुक करानी है। उन्होंने हमारा सहारा सूमो सेवा के काउंटर पर पहुंचा दिया। नहारलगून से जीरो का एक व्यक्ति का किराया 350 रुपये है। हमने तीन सीटें बुक करा लीं।

सुबह का उजाला होने लगा है। सूमो वाले ने हमारा सारा सामान छत पर बांध दिया। उसे एक पन्नी से ढक भी दिया जिससे बारिश से बचाव हो सके। ड्राईवर महोदय फर्राटे से अंगरेजी बोलते हुए अपना परिचय दे रहे थे। वे अरुणाचल के सुदूर जिले के निवासी हैं। सूमो सुबह 6 बजे चल पड़ी। कुछ सवारी 5 किलोमीटर आगे निराजुली से उठाया। पर डेकरांग ब्रिज से पहले सूमो के रेडियेटर में खराबी आ गई। एक गैराज में 45 मिनट तक ठीक कराते रहे। फिर आगे का सफर आरंभ हुआ। नहारलगून से जीरो की दूरी कोई 120 किलोमीटर है।

पर कोई 30 किलोमीटर चलने पर गाड़ी का रेडियेटर फिर जवाब देने लगा। ड्राईवर ने गाड़ी के झरने के पास रोकी। इंजन में पानी डालना शुरू किया। थोड़ी देर में एक और ड्राईवर आए उन्होंने मदद की। यहां गाड़ी आधे घंटे खड़ी रही। हमने समय का सदुपयोग करते हुए झरने के जल ब्रश किया। हाथ मुंह धोए। हमारी बगल वाली सीट पर एक अरुणाचली बाला बैठी थी जो 12वीं कक्षा में पढ़ती है। वह याजुली में उतर गई।
तकरीबन 50 किलोमीटर चलने पर पोटीन नामक जगह आता है। यहां पर आते जाते सारे सूमो वाले आधे घंटे रुकते हैं। यहां खाने के कई होटल, फल आदि की दुकाने हैं।  हमने यहां खाया तो नहीं पर भात की थाली 80 रुपये की मिल रही थी। खाना अनलिमिटेड। हमने एक मुरुंडा का पैकेट खऱीदा। हमारा देसी फास्ट फूड जो हमारा सफर में साथ देता है। यह हमारे भोजपुरी क्षेत्र का दाना (फरही) है जिसे गुड़ की चासनी में लपेट कर गोला बनाया जाता है। इसे कहीं भी कभी भी खाना अच्छा रहता है। 

याजुली के बाद अब हमारे बगल में बैठे थे अरुणाचल के युवा सीवोह जो दिल्ली मेंरहकर एमबीए कर रहे हैं। यह सुनकर ही हम अरुणाचल घूमने आए हैं उन्हें काफी खुशी हुई। जीरो से पहले हापोली में सूमो रूकी। हम यहीं उतर गए। हमारी बुकिंग होटल सिटी पैलेस में है जो जीरो डिसी आफिस और कोर्ट के पास है। सीवोह ने हमें होटल तक पहुंचाया। सीवोह ने बताया कि वे संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता हैं। सफेद गुलाबी रंग के विशाल होटल के रिसेप्शन पर हमारा इंतजार हो रहा था।    


नहारलगून- जीरो मार्ग - ( दूरी -110 किलोमीटर )   निराजुली - डेकरांग ब्रिज - दोईमुख- सोपो- जांपा- होज – पोटीन – पोसा – याजाली – याचुली- जोरम – हापोली- जीरो।  
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IN ROUTE OF ZIRO.... A STOP AT POTIN. 


( ZIRO, ARUNACHAL, SUMO, HAPOLI, POTIN ) 
    

Saturday, October 22, 2016

कभी था नेफा अब अरुणाचल प्रदेश

उत्तर पूर्व का राज्य अरुणाचल प्रदेश का अर्थ हिन्दी में उगते सूर्य का पर्वत है। अरुणाचल प्रदेश भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र का एक जादुईरहस्‍यमय और अत्यंत मनमोहक राज्य है।  यहां की मनोरम पहाडियां और घाटियां हमेशा ही सैलानियों को अपनी ओर आमंत्रित करती हैं।

अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में क्षेत्रफल के लिहाज से देखा जाए तो सबसे बड़ा राज्य है। इसकी राजधानी इटानगर है। अरुणाचल की सीमा असम, नागालैंड के अलावा , भूटान, तिब्बत, म्यानमार और चीन से लगती है। सबसे लंबी सीमा साझेदारी चीन के साथ है। राज्य में कुल 16 जिले हैं। कभी अरुणाचल का नाम नेफा, नार्थ इस्ट फ्रंटियर एजेंसी हुआ करता था। 


1972  तक नेफा नामक राज्य यानी नार्थ इस्ट फ्रंटियर एजेंसी अस्तित्व में था। 1972 में अरुणाचल प्रदेश नाम दिया गया और यह एक केंद्र शासित राज्य बना। हालांकि राजधानी शिलांग में ही रही। 1974 में इसकी राजधानी इटानगर में बनाई गई। और पीछे जाएं तो 1914 में ब्रिटिश शासन ने असम के कुछ जनजातीय हिस्सों को नार्थ इस्ट फ्रंटियर ट्रैक्ट्स नाम से अलग शासकीय क्षेत्र बनाया।  आजादी के बाद नेफ्ट के कई हिस्से असम में चले गए पर 1951 में कई हिस्सों को लेकर नेफा का गठन किया गया। दो दशक तक यह क्षेत्र नेफा नाम से जाना जाता था। कई गीतों में इस राज्य का नाम नेफा आया है।

24वां राज्य बना अरुणाचल -  प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासन काल में 20 फरवरी 1987 को यह भारतीय संघ का 24वां राज्य बनाया गया। गेंगाग अपांग 1980 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। वे 22 सालों तक अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनके नाम राज्य में सबसे लंबा शासन करने का रिकार्ड है। इसके अलावा पीके थुंगन, दोरजी खांडू राज्य की कमान संभाल चुके हैं।

अरुणाचल प्रदेश 27.06 डिग्री उत्‍तरी अक्षांश और 93.37 डिग्री पूर्वी देशान्‍तर के बीच स्थित है। इस प्रदेश का इतिहास काफी पुराना है  अरुणाचल में मिले निओलिथिक काल के उपकरणों से पता चलता है कि यहां 11 हजार साल पहले भी आबादी रहती थी। अरुणाचल प्रदेश का इतिहास परंपराओं और कल्पित कथाओं से समृद्ध है। राज्य का लिखित इतिहास केवल 16वीं शताब्दी के बाद ही उपलब्ध है। यह वह काल है, जब असम पर अहोम राजाओं ने शासन प्रारंभ किया था।

सबसे बड़ा जनजातीय राज्य-  राज्य की आबादी में 63 फीसदी से ज्यादा लोग जनजतीय समुदाय के हैं। यहां 19 प्रमुख जनजातियां और 85 अन्य जनजातियां हैं। इनमें से अधिकांश या तो तिब्बती-बर्मी या ताई-बर्मी मूल के हैं। राज्य में 'कामेंग', 'सुबनसिरी', 'सिआंग', 'लोहित' और 'तिरप' आदि प्रमुख नदियां है जो राज्य में अलग-अलग घाटियों का निर्माण करती हैं। हाल में काफी राजनीतिक उतारचढ़ाव देखने वाले राज्य  अरुणाचल प्रदेश में जुलाई 2016 में पेमा खांडु ने मुख्‍यमंत्री की कमान संभाली। वे पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू के बेटे हैं।

अरुणाचल में पर्यटन के लिहाज से महत्‍वपूर्ण स्‍थल : तवांग, दीरांग, बोमडिला,  इटानगर, जीरो, मलीनिथान, लिकाबाली, पासीघाट, एलोंग, तेजू, मिआओ, रोइंग, दापोरिजो नामदाफा, भीष्‍मकनगर, परशुराम कुंड और खोंसा।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

    ARUNACHAL PRADESH, TOURIST INNER LINE PERMIT,  NEFA   )  

Thursday, October 20, 2016

इनर लाइन परमिट के बिना अरुणाचल में प्रवेश नहीं

दिल्ली के कौटिल्य मार्ग स्थित अरुणाचल भवन 
पूर्वोत्तर के तीन ऐसे राज्य हैं जहां जाने के लिए किसी भी भारतीय नागरिक के लिए भी इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है। इससे पूर्व मैंने नागालैंड के लिए आईएलपी बनवाया था। मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में भी बिना आईएलपी के प्रवेश नहीं किया जा सकता है। इसलिए अरुणाचल जाने से पहले दिल्ली से ही मैंने आईएलपी बनवा लेना उचित समझा। दिल्ली में चाणक्यपुरी के कौटिल्य मार्ग पर स्थित अरुणाचल भवन से यह परमिट बनवाया जा सकता है। अरुणाचल भवन पहुंचने के लिए निकटतम मेट्रो स्टेशन लोककल्याण मार्ग (रेसकोर्स) है। यहां से अरुणाचल भवन एक किलोमीटर है। आप पैदल जा सकते हैं। या शेयरिंग आटो वाले 30 रुपये मांगते हैं। अरुणाचल भवन सम्राट होटल, त्रिपुरा भवन और गुजरात भवन के पास है।

अरुणाचल भवन जाने पर मालूम हुआ कि परमिट के लिए आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पैन कार्ड आदि में से कोई एक प्रमाण पत्र की छाया प्रति, दो फोटो सभी सदस्यों का चाहिए। परमिट बनवाने के लिए फीस 200 रुपये प्रति व्यक्ति है। अगर आपको परमिट उसी दिन तुरंत चाहिए तो यह फीस 400 रुपये है। आमतौर पर परमिट अरुणाचल के तीन टूरिस्ट सर्किट में से किसी एक सर्किट के लिए 15 दिनों की अवधि का बनता है। मुझे तीन लोगों का परमिट चाहिए था। इसलिए मैंने 1200 की जगह 600 रुपये खर्च के करने की सोची और परमिट प्राप्त करने के लिए अरुणाचल भवन का एक बार और चक्कर लगाया। दूसरे दिन पहुंचने पर तैयार परमिट मेरा इंतजार कर रहा था। 

अरुणाचल भवन के टूरिज्म दफ्तर में तैनात मीना जो अरुणाचल के पासीघाट की हैं, उन्होंने मुझे अरुणाचल पर एक पुस्तक और राज्य का एक मानचित्र भी दिया। वैसे ये आईएलपी आप कोलकाता, गुवाहाटी, जोरहाट, तेजपुर, ढिब्रूगढ़ और नार्थ लखीमपुर स्थित अरुणाचल प्रदेश के रेजिडेंट कमिश्नर के दफ्तरों से भी बनवा सकते हैं। जब से नहारलगून तक रेल चलनी शुरू हो गई है नहारलगून रेलवे स्टेशन पर भी आईएलपी के लिए दफ्तर खुल गया है। पर वहां पर फीस 400 रुपये ली जाती है। इसलिए बेहतर होगा कि आप परमिट पहले से बनवा कर ही अरुणाचल जाएं। इससे समय की बचत होगी। अरुणाचल में पदस्थापित सरकारी कर्मचारी के रिश्तेदारों को भी परमिट बनवाना पड़ता है।

जो लोग अरुणाचल के किसी शहर में रहकर कारोबार आदि कर रहे हैं। उन्हें भी इनर लाइन पास बनवाना पड़ता है। यह एक आईकार्ड की तरह होता है। इसकी फीस एक साल के लिए 150 रुपये है। यह हर साल नवीकृत कराना पड़ता है। अरुणाचल मेंघूमते हुए अपना आईएलपी हमेशा अपने साथ रखें। इसकी कहीं भी जांच हो सकती है। आईएलपी नहीं होने पर 1000 रुपये जुर्माना हो सकता है।

नहारलगून रेलवे स्टेशन पर उतरते समय रेल से आने वाले सारे यात्रियों के आईएलपी की जांच होती है। हालांकि जांच करने वाले पारा मिलिट्री फोर्स के जवान ने बताया कि पति पत्नी का आईएलपी ठीक है। 

दस साल के बच्चे का आईएलपी बनवाना जरूरी नहीं है। हालांकि बेटे अनादि अपने नाम और फोटो के साथ बने आईएलपी को देखकर काफी खुश थे। अरुणाचल आने वाले विदेशी सैलानियों को भी वीजा, पासपोर्ट के अलावा अलग से इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है। हमारा आईएलपी, इटानगर, जीरो, पासीघाट सर्किट का है। इसमें पांच जिलों में जाने के लिए मान्य बताया गया है। पूर्वी सिंयाग, लोअर सुबानसिरी, अपर सुबानसिरी, पंपापोर और पासीघाट।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य

-         ARUNACHAL PRADESH, TOURIST INNER LINE PERMIT, THREE CIRCUITS )        

Tuesday, October 18, 2016

अरुणाचल का प्रवेश द्वार है रंगिया जंक्शन

IT IS RANGIA JN, RAILWAY STATION 
अरुणाचल का प्रवेश द्वार रंगिया जंक्शन को कहें तो गलत नहीं होगा। वैसे तो रंगिया असम के कामरुप जिले का हिस्सा है। गुवाहाटी यहां से महज एक घंटे का रास्ता है। दूरी है 48 किलोमीटर। पर रंगिया जंक्शन रेलवे स्टेशन सिर्फ असम का ही नहीं देश के चंद सबसे खूबसूरत रेलवे स्टेशनों में से एक है। एक दो और तीन सभी प्लेटफार्म सुंदर साफ सुथरे चमचमाते हुए। स्टेशन का भवन शानदार है। प्लेटफार्म नंबर एक पर प्रथम श्रेणी और द्वितीय श्रेणी का प्रतीक्षालय चमचामाता हुआ है। प्रथम श्रेणी के प्रतीक्षालय में असम से जुड़े बिहू नृत्य और काजीरंगा के हाथियों के तस्वीरें लगी हैं। प्रतीक्षालय में विशाल सोफे लगे हैं। पर ट्रेन का इंतजार करने वाले कम लोग ही है। प्रतीक्षालय का शौचालय और स्नानागार भी बेहतर हाल में हैं।
इतना ही नहीं सेकेंड क्लास का भी प्रतीक्षालय अच्छे हाल में है। प्लेटफार्म नंबर एक पर एक वीआईपी लांज भी बना हुआ है। स्टेशन मैनेजर का दफ्तर भी काफी बड़ा है। यूं लगता है कि किसी जिले के डीसी का दफ्तर हो। इतना बेहतर क्यों। वास्तव मे रंगिया नार्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे का एक डिविजन है। यहां डीआरएम का दफ्तर है। शायद इसलिए स्टेशन को मॉडल स्टेशन के तौर पर विकसित किया गया है। स्टेशन के नए भवन का उदघाटन 2003 में तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार कर कमलों से किया गया। बस रेलवे स्टेशन का फुटओवर ब्रिज पुराना है जिसकी चौड़ाई कम है।
पर रंगिया जंक्शन पर यात्रियों की इतनी भीड़ भी नहीं होती। प्लेटफार्म नंबर एक पर एक भोजनालय है पर उन्होंने बताया कि खाना रात 8 बजे से मिलेगा। 40 रुपये की शाकाहारी चावल की थाली। हमें भूख लगी थी इसलिए हमलोग स्टेशन के बाहर खाने निकल गए। पर स्टेशन के बाहर पांच सात साधारण किस्म के होटल हैं। उनकी साफ सफाई अच्छी नहीं है। एक हिंदू होटल में खाया। पर खाना पसंद नहीं आया। माधवी और वंश को ठीक से खा भी नहीं सके। बाद में हमलोग प्लेटफार्म नंबर 2 पर पहुंचे। वहां एक दक्षिण भारतीय स्टाल नजर आया। यहां 20 रुपये में मसाला डोसा मिल रहा है। डोसा माधवी और वंश को पसंद आया। डोसा वाले दुकानदार ने बताया कि उनका ये स्टाल 48 साल पुराना है। मसाला डोसा इडली आदि की दरें 2011 से यही चली आ रही हैं। उनकी दुकान रात 9 बजे तक खुली रहती है। आजकल 20 रुपये में मसाला डोसा कहां मिलता है। लेकिन उनका डोसा आकार में छोटा पर स्वाद में अच्छा है।

गुवाहाटी नहारलागुन इंटरसिटी एक्सप्रेस ( 15617 ) समय पर चल रही है। ट्रेन 10.20 बजे प्लेटफार्म नंबर तीन पर आकर लग गई। हमलोगों ने एस 4 में अपनी सीट पर जगह ली।पर एक चौंकाने वाला नजारा हमारा इंतजार कर रहा था। हमारे बर्थ पर हमारी मुलाकात राष्ट्रीय युवा योजना के वरिष्ठ साथी नरेंद्र भाई से होती है। वे रंगापाड़ा जा रहे हैं। वहां से हरिभाई के साथ तवांग जाएंगे। तंवाग में 7 से 17 अक्तूबर के बीच एनवाईपी का शिविर लग रहा है। वे इसकी अग्रिम तैयारी में जा रहे हैं। नरेंद्र भाई के साथ तीन घंटे का साथ रहा। टांगला, उदलगुड़ी,  धेकाजुली रोड के बाद आए स्टेशन रंगापाड़ा नार्थ में वे उतर गए।
SURPRISE - With NARENDRA BHAI IN TRAIN.
इसके बाद आया विश्वनाथ चारआली रेलवे स्टेशन। यह असम के नए जिले विश्वनाथ का मुख्यालय भी है। 15 अगस्त 2015 को बिश्वनाथ असम का जिला बना। इस शहर का नाम यहां स्थित विश्वनाथ मंदिर के नाम पर रखा गया है। इसे गुप्तकाशी भी कहा जाता है। इसके बाद ट्रेन गोहपुर, तातीबहार में रुकी। हारमती जंक्शन में 10 मिनट का ठहराव है। हमारे बगल वाले बर्थ पर एक अकेली लड़की सफर कर रही है। जो सुबह के 3.30 बजे अपने स्टेशन हारमती में उतर गई। सुखद आश्चर्य हुआ हमारे उत्तर भारत में अकेली लड़कियां वह भी रात में कम सफर करती हैं।
हारमती जंक्शन है जो असम के लखीमपुर जिले में पड़ता है। यहां से एक लाइन लखीमपुर, मुरगांकसेक की ओर जाती है। कभी हारमती तक मीटर गेज ट्रैक हुआ करता था। कुछ साल पहले इसे  ब्राडगेज में बदला गया। यह सिंगल लाइन ट्रैक है। हारमती के बाद गुमतो अरुणाचल प्रदेश का पहला रेलवे स्टेशन है। हारमती से नहारलागून 19 किलोमीटर है। इस 19 किलोमीटर के ट्रैक के निर्माण के साथ ही पूर्वोत्तर का क्षेत्रफल में सबसे बड़ा राज्य अरुणाचल प्रदेश रेल नेटवर्क से जुड़ गया है।
AT NAHARLAGUN,  MORNING 4.45 AM 

सुबह के 4.45 हो रहे हैं। रेल की खिड़की से बाहर उजाला दिखाई दे रहा है। हमारी ट्रेन तय समय से पहले ही नहारलागून रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर रही है। हम उगते हुए सूरज के नाम पर बने राज्य अरुणाचल को नमस्कार कर रहे हैं। रेलवे स्टेशन पर भी एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है – अरुणाचल में आपका स्वागत है।
- vidyutp@gmail.com

( HARMUTI, LAKHIMPUR, RANGIA, VISHWANATH CHARALI, ASSAM, NAHARLAGUN, ARUNACHAL, RAIL, MASALA DOSA  )

     
  

Sunday, October 16, 2016

सुबह के सूरज के देस में - दिल्ली से इटानगर रेल से

अरुणाचल प्रदेश यानी उगते हुए सूरज का देस। वह देस जहां सूरज सबसे पहले आकर अपना डेरा डालता है। जी हां यहां दिलली से आधा घंटा पहले ही सुबह हो जाती है। कई साल से अरुणाचल जाने की हसरत थी। जो अब जाकर पूरी होने को आई है। पूर्वोत्तर का यह विशाल राज्य अब रेल नेटवर्क से जुड़ चुका है। अब दिल्ली से अरुणाचल की राजधानी के लिए दिल्ली नहारलागून एसी  एक्सप्रेस चलने लगी है। यह हफ्ते में एक ही दिन चलती है। इसका तारीख मुझे मुफीद नहीं बैठ रहा था इसलिए हमारी अरुणाचल यात्रा शुरू हुई देश की राजधानी से  नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस से।

 वैसे तो नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस से कई बार  सफर कर चुका हूं, पर गुवाहाटी तक इस ट्रेन से जाने का पहला मौका था . हमारी ट्रेन आनंद विहार से बिल्कुल समय पर चल पड़ी. हांलाकि हमारी पिछली यात्राओं का अनुभव अच्छा नहीं था.  एक बार पटना तक जाते वक्त तो यह 14 घंटे लेट खुली थी और कानपुर पहुंचते हुए 24 घंटे लेट हो गई थी। इस बार कानपुर, इलाहाबाद, मुगलसराय तक एक से डेढ़ घंटे लेट चल रही है। दानापुर ढाई घंटे लेट पहुंची. रात 12 बजे हमलोग पाटलिपुत्र रेलवे स्टेशन पर थे. यह पटना का नया स्टेशन है। थोड़ी देर बाद  हमारी रेल दीघा में बने नए रेल पुल से गुजर रही थी। यह हमारे लिए  गर्व का क्षण थाक्योंकि हम पटना में गंगा  को नए रेल पुल से पार कर रहे थे। 


अगस्त 2016 से नार्थ ईस्ट  इस नए मार्ग से चल रही है। तकरीबन दस मिनट बाद हम उत्तर बिहार में प्रवेश कर चुके थे। उत्तर बिहार का पहला रेलवे स्टेशन भरपुरा पहलेजा घाट जंक्शन आ गया। सारे यात्री सो रहे थे पर रेल से पुल के गुजरने के अनुभव से रूबरू होने के लिए  मैं  जाग रहा था। हांलाकि अभी पुल का एक ही ट्रैक चालू हो सका है। पर कई रेलें इस पुल से गुजरने लगी हैं। यह रेल कम रोड ब्रिज है पर रोड का पहुंच पथ तैयार नहीं हो सका है। हमारी ट्रेन सोनपुर और हाजीपुर में भी रूक गई है। हांलाकि यहां ठहराव नहीं है। इसके बाद मैं सो गया। एक बार नींद खुली तो बरौनी जंक्शन पर ट्रेन खड़ी थी।

हमारी अगली सुबह नवगछिया रेलवे स्टेशन पर होती है। ट्रैक के दोनों तरफ बाढ़ का असर अब भी दिखाई दे रहा है। पानी डूबी झोपड़ियां नजर आ रही हैं। एक महीने पहले यहीं पानी तांडव मचाया है । कटिहार स्टेशन पर हमलोग नास्ता लेते हैं। रेलवे प्लेटफार्म की दुकानों से पूरी और सब्जी। हमारी रेल तकरीबन 11 बजे रेल न्यू जलपाईगुड़ी पहुंची.  यहां हमने फूड प्लाजा से पुलाव लिया.  यह माधवी और वंश को खूब पसंद आया.  रात पेंट्री से खाना लिया था। वह भी संतोषजनक था.  पेंट्री कार वालों ने नास्ते में समोसे बनाए वह भी अच्छे थे.  हालांकि अगले दिन के समोसे का स्वाद बदल गया था। एनजेपी से ट्रेन आगे बढ़ने के साथ ही रेल में अलग अलग तरह के सामान बेचने वाले आने लगे.  एसी 3 में भी.  हमने ट्रैवेल चार्जर खरीदा. नारियल पानी पीया तो चने भी खाए।
 हमारे आसपास ज्यादातर फौज के लोग हैं. इनमें से दो लोग असम के पहले बड़े स्टेशन कोकराझार में उतर गए। हमलोग सफर में उनसे घुलमिल गए थे इसलिए छोड़ने के लिए  नीचे उतरे। हालांकि हमारा टिकट गुवाहाटी तक का है। पर ट्रेन लेट चल रही है तकरीबन तीन घंटे.  इसलिए हमलोगों ने रंगिया में उतरकर अरुणाचल के लिए  नहरालागुन इंटरसिटी एक्सप्रेस पकड़ना तय किया। नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस का सफर ठीक रहा पर कोच की मेनटेंनेंस घटिया है। एसी 3 के टायलेट का दरवाजा तक  खराब है। टायलेट के अंदर मकड़ी के जाले लगे हैं। हालांकि कोच महज एक साल पुराना है पर जाले देखकर लगता है कि इसकी नियमित सफाई तक नहीं  होती। कुछ ऐसा ही हाल पूर्वोत्तर जाने वाली सभी ट्रेनों का होता है। खैर रंगिया जंक्शन स्टेशन की सफाई व्यवस्था ने हमें खुश कर दिया. प्रथम श्रेणी के लिए बने शानदार वेटिंग हॉल में बैठकर इंतजार करते हुए शाही एहसास हो रहा है। हमें इंतजार है नहारलागून इंटरसिटी एक्सप्रेस का।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( RAIL, NORTH EAST EXPRESS, ARUNACHAL PRADESH, PATLIPUTRA JN, DIGHA BRIDGE , KATIHAR, KOKRAJHAR, RANGIA JN ) 


Friday, October 14, 2016

दीदी के दूरंतो एक्सप्रेस से दिल्ली

कोलकाता से दिल्ली के लिए दो दुरंतो एक्सप्रेस चलती है एक हावड़ा से तो दूसरी सियालदह से। मेरी ट्रेन सियालदह से थी। शाम को 6.30 बजे यह ट्रेन दिल्ली के लिए रवाना होती है। ट्रेन नंबर 12259 दूरंतो एक्सप्रेस सियालदह के बाद धनबाद फिर मुगलसराय और कानपुर में रूकती है। इसके नई दिल्ली  पहुंचने का तय समय 11.30 बजे है। यानी 17 घंटे में दिल्ली का सफर। सुनने में अच्छा लगता है। दोनों शहरों के बीच कुल दूरी 1453 किलोमीटर की है।
मैं सियालदह स्टेशन पर 6 बजे शाम को पहुंच जाता हूं। एक कुली से पूछता हूं दूरंतो कितने नंबर पर है। वह बताता है 13 नंबर पर। स्टेशन के मुख्यद्वार से प्लेटफार्म ज्यादा दूर नहीं था। पर हमारा कोच बी-2 काफी आगे था। इसलिए प्लेटफार्म पर ही लंबा चलना पड़ा। मेरा बर्थ नंबर 17 है लोअर बर्थ। सभी यात्री आ चुके हैं। पर 19 नंबर बर्थ अभी खाली है। धनबाद रेलवे स्टेशन पर दूरंतो समय पर पहुंची। 19 नंबर बर्थ की स्वामिनी मोहतरमा यहां पधारती हैं। वे दिल्ली के किसी कालेज में पढ़ती हैं। उनके मम्मी पापा उन्हें छोड़ने आए हैं।

मैडम का वजन समान्य लड़कियों सो ढाई गुना है।उसपर लगातार चाकलेट खाए जा रही हैं। टीटीई के आने पर उन्होंने अपने लिए लोअर बर्थ का अनुरोध किया। टीटीई ने असमर्थता जताई। आधे घंटे बाद मेरा सोने का विचार बना। मैंने उनसे पूछा आपको लोअर बर्थ चाहिए। उन्होंने कहा हां, मैंने कहा, आप मेरी बर्थ ले लिजिए मैं ऊपर चला जाता हूं। उनकी समस्या हल हो गई। उन्होंने अपनी मम्मी को फोन लगाकर कहा, मेरी समस्या हल हो गई। वे अपने शरीर के वजन के कारण ऊपर के बर्थ तक चढ़ पाने में असमर्थ थीं। हालांकि उन्होंने मुझे शिष्टाचारवश धन्यवाद भी नहीं कहा। खैर मैं इसकी परवाह भी नहीं करता। पर अकेले चलने पर मुझे सहयात्रियों की सुविधा के लिए बर्थ बदलने में कभी दिक्कत नहीं होती।
ट्रेन की पेंट्री व्यवस्था उम्दा है। प्रवेश करते ही जूस बाटल , पानी की बोतल मिली। विमान की तरह उदघोषणा तंत्र काम कर रहा है। दिल्ली की दूरी और ट्रेन की स्पीड बताई जा रही है। धनबार पहुंचने से पहले भी अगले स्टेशन के बारे  में एलान हुआ। पर अगले दिन ट्रेन लेट होने पर सारे एलान बंद हो गए। 

रात गुजरती रही। ट्रेन कब गया, सासाराम और मुगलसराय पार कर गई मुझे पता भी नहीं चला। सासाराम मेरा गृह नगर है जिससे मैं सोते हुए गुजर गया। ट्रेन जब इलाहाबाद क्रास कर रही थी तब पता चला। कानपुर आते हुए ट्रेन थोड़ी लेट हो चुकी थी। इसके बाद शुरू हुआ ट्रेन के धीरे धीरे रूक रूक कर चलने का सिलसिला। हमे पेंट्री की ओर से रातका खाना और सुबह का नास्ता मिला था। पर ट्रेन 12 बजे तो अलीगढ भी नहीं क्रास कर पाई है। अब पेंट्री की ओर से दोपहर के खाने में चावल दाल थोड़ी मात्रा में पेश किया गया। हालांकि ट्रेन समय पर दिल्ली पहुंचाती तो इसकी जरूरत नहीं थी। ट्रेन गाजियाबाद से पहले आउटर पर रुक गई। इसके बाद चलने पर साहिबाबाद में भी रुक गई। समय तीन बज रहे थे। ट्रेन तीन घंटे से ज्यादा लेट चल रही थी। मैं और एक और सहयात्री साहिबाबाद में ही उतर गए। वहां से पैदल चलकर साहिबाबाद गांव होते हुए हमलोग मोहन नगर वैशाली मुख्य मार्ग पर आ गए। मैं यहां से सीधा अपने आफिस नोएडा सेक्टर 63 को चल पड़ा।
 
साहिबाबाद रेलवे स्टेशन पर खड़ी दूरंतो एक्स. - आफिसियल स्टापेज नहीं है भाई...
यह ट्रेन दूरंतो एक्सप्रेस 18 सितंबर 2009 को पहली बार चली थी। तब रेल मंत्री ममता बनर्जी थीं। दूरंतो उनका मानस पुत्र है। बांग्ला में इसका मतलब होता है नटखट बच्चा। वास्तव में दूरंतो राजधानी एक्सप्रेस की ड्प्लिकेट कॉपी है। वही किराया, वैसा ही  खानपान बस नाम अलग है।
सियालदह दिल्ली दूरंतो एक्सप्रेस ट्रेन के सारे कोच एलएचबी हैं। ट्रेन की औसत स्पीड 85 किलोमीटर है। यह सियालदह से हमेशा समय पर खुलती है। पर यह औसतन हर रोज दिल्ली पहुंचते पहुंचते दो से तीन घंटे तक लेट हो जाती है। कभी कभी तो 4 से छह घंटे भी लेट हो जाती है। तो ऐसी है दूरंतो।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य
( DURANTO EXPRESS, SDAH-NDLS -12259, RAIL , BENGAL, KOLKATA ) 

Wednesday, October 12, 2016

सियालदह कोलकाता शहर का रेलवे स्टेशन

सियालदह रेलवे स्टेशन कोलकाता शहर सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन। यह स्टेशन हावड़ा से तकरीबन 6 किलोमीटर दूर है। दोनों रेलवे स्टेशनों को एमजी रोड नामक सड़क जोड़ती है। सियालदह तकनीकी रुप से कोलकाता शहर का स्टेशन है, क्योंकि हावड़ा कोलकाता जिले में नहीं पड़ता। हालांकि अब कोलकाता नामक एक नया रेलवे टर्मिनल भी बन चुका है, सियालदह रेलवे स्टेशन 24 घंटे गुलजार रहता है। लंबी दूरी की ट्रेनें हावड़ा के अलावा सियालदह से भी खुलती हैं। साथ ही सियालदह लोकल ट्रेनों का भी बड़ा पड़ाव है। दिल्ली की तरफ जाने वाली जो ट्रेनें सियालदह जाती हैं वे डानकुनी जंक्शन से अलग राह लेती हैं। ये ट्रेनें बाली ब्रिज पर हुगली नदी को पार कर कोलकाता शहर में प्रवेश करती हैं।

सियालदह (SEALDAH) का स्टेशन कोड SDAH है। यह रेलवे स्टेशन हावड़ा से कुछ साल बाद 1869 में आरंभ हुआ। 1978 तक यहां एक ट्राम डिपो भी हुआ करता था। अब ट्राम सियालदह के बगल में एमजी रोड से होकर गुजरती है। रेलवे स्टेशन के बगल में सियालदह फ्लाइओवर है। आजकल ट्राम इस फ्लाइओवर के ऊपर से गुजरती है। वैसे कोलकाता की पहली ट्राम सेवा सियालदह से आर्मेनिया घाट के बीच शुरू हुई थी, तब ट्राम को घोड़े खींचते थे।
सियालदह रेलवे स्टेशन तीन टर्मिनल में बंटा हुआ है। सियालदह मेन, सियालदह नार्थ और सियालदह साउथ। नार्थ और मेन सियालदह में कुल 13 प्लेटफार्म हैं। वहीं साउथ खंड में 7 प्लेटफार्म हैं। यानी कुल 20 प्लेटफार्म से यहां ट्रेनें खुलती हैं। सियालदह नार्थ से आमतौर पर लोकल ट्रेनें खुलती हैं। बनगांव, बांदेल, रानाघाट, शांतिपुर, कृष्णानगर, बहरामपुर, लालगोला और डानकुनी मार्ग के लिए लोकल ट्रेनें यहां से ली जा सकती हैं। आजादी से पहले बनगांव लाइन बांग्लादेश की ओर जाती थी।
सियालदह रेलवे स्टेशन का पास नारियल पानी, दस रुपये में 

वहीं सियालदह साउथ खंड से डायमंड हार्बर की तरफ जाने वाली लोकल ट्रेनें खुलती हैं। यहां से गंगासागर जाने के लिए काकद्वीप-नामखाना लाइन वाली ट्रेनें पकड़ी जा सकती हैं।
सियालदह से लंबी दूरी की ट्रेनों में सियालदह नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस, अमृतसर के लिए अकाल तख्त एक्सप्रेस, नई दिल्ली के लिए दूरंतो एक्सप्रेस गुवाहाटी के लिए कंचनजंगा एक्सप्रेस, न्यू जलपाईगुड़ी के लिए तिस्ता तोरसा एक्सप्रेस, दार्जिलिंग मेल, अजमेर के लिए अनन्या एक्सप्रेस जैसी प्रमुख ट्रेनें खुलती हैं।
सियालदह रेलवे स्टेशन की ररखाव रेलवे का सियालदह डिविजन करता है। रेलवे स्टेशन पर 24 घंटे आपको भीड़ नजर आएगी। स्टेशन के बाहर वाहनों की चिलपों सुनाई देती है। स्टेशन के सामने एजेसी बोस रोड पर बहुत ही घना बाजार है। इस बाजार में आपका सस्ता खाना और नास्ता से लेकर जरूरत की तमाम वस्तुएं मिल जाएंगी। इस रोड कुछ मध्यमवर्गीय भोजनालय और मिठाई की दुकानें भी हैं।  
हावड़ा से सियालदह को जोड़ती बस, छह रुपये में सफर। 

आप यहां सस्ते में नारियल पानी पी सकते हैं तो लिट्टी चोखा और सत्तू पीकर अपनी भूख प्यास को शांत कर सकते हैं। अब सियालदह रेलवे स्टेशन को मेट्रो नेटवर्क से जोड़ने की तैयारी चल रही है। अगर आप सियालदह रेलवे स्टेशन के आसपास ठहरना चाहते हैं तो सामने एमजी रोड, एजेसी बोस रोड पर उनकी गलियों में दर्जनों होटल विकल्प के तौर पर मौजूद हैं। बेहतर होगा आप एमजी रोड पर किसी होटल में ठहरें। वैसे रेलवे स्टेशन पर रिटायरिंग रूम भी उपलब्ध है।
- vidyutp@gmail.com

SEALDAH, KOLKATA, RAILWAY STATION, BENGAL )