Monday, September 5, 2016

सेल्युलर जेल में सावरकर और फांसी घर ((26))

क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर अंदमान के सेल्युलर जेल में 10 साल रहे। जब आप सेल्युलर जेल में पहुंचते हैं तो खास तौर पर आपको वह कक्ष देखने को मिलता है जहां सावरकर ने 10 साल गुजारे।

यह कक्ष जेल के तीसरी मंजिल पर बिल्कुल कोने में है। इस कक्ष से फांसी घर लगातार नजर आता रहता है। खास तौर पर सावरकर को इस कक्ष में इसलिए भी रखा गया था जिससे कि वे जेल में लगातार हो रही फांसी को देखकर अंदर से टूट जाएं।

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक के भंगूर में हुआ था। चाफेकर बंधुओं को फांसी देने के विरोध में 15 साल की आयु में सावरकर ने देश की आजादी के लिए संघर्ष करने का प्रण लिया। वे बीए पास करने के बाद बैरिस्टर की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए। वहां इंडिया हाउस में रहते हुए अपने संगठन अभिनव भारत के लिए काम करते रहे। उन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण 1910 में गिरफ्तार किया गया। 
उन पर क्रांतिकारियों को छिपे तरीके से पिस्तौल देने का आरोप था। उन्हें मोरिया जहाज से कैद कर कड़ी सुरक्षा में भारत लाया जा रहा था। पर फ्रांस के मार्सलेज बंदरगाह के पास जहाज के संडास के छेद से कूदकर फरार हो गए। बाद में उन्हें फ्रांस के सिपाहियों ने बंदरगाह पर पकड़ लिया। 

मुंबई में अदालत ने उन्हें राजद्रोह के आरोप में 50 साल की सजा सुनाई। सावरकर एस एस महाराजा जहाज में सवार होकर 4 जुलाई 1911 को पोर्ट ब्लेयर पहुंचे। तब सेल्युलर जेल के तत्कालीन जेलर डेविड बैरी ने सावरकर को चिढ़ाते हुए कहा था कि सावरकर तुम्हे तो 50 साल की सजा हुई है। क्या तुम आजादी देखने के लिए जिंदा रहोगे... तब सावरकर ने जवाब दिया था क्या तुम्हे लगता है कि तुम्हारी सरकार 50 साल हमारे देश में रहेगी। तकरीबन दस साल, सावरकर 21 मई 1921 तक सेल्युलर जेल में रहे।
विनायक दामोदर सावरकर की कोठरी से दिखाई देता फांसी घर। 

सावरकर ने सेल्युलर जेल में रहते हुए अपनी सजा माफी को लेकर ब्रिटिश सरकार को चार बार दया याचिकाएं लिखकर भेजीं। पहली याचिका 1911 में दूसरी याचिका 1913 में लिखी। 1920 में महात्मा गांधी, बिट्ठलभाई पटेल और तिलक ने भी उनकी रिहाई का समर्थन किया।
इसके बाद 1921 अंदमान की जेल से रिहा करके सावरकर महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में लाए गए। सावरकर की वीरता का चित्रण करने वाले लेखकर उनके मर्सी पेटिसंस को उनका चातुर्य बताते हैं ठीक उसी तरह जैसा शिवाजी ने औरंगजेब के साथ किया था। पर सावरकर के आलोचक उन पर सवाल भी उठाते हैं। बहरहाल सावरकर ने 10 साल सेल्युलर जेल में गुजारे ये ऐतिहासिक तथ्य है। पोर्ट ब्लेयर उन्हें याद करता है। यहां के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है।  


जेल और जुल्म की दास्तां – सेल्युलर जेल में क्रांतिकारियों को कठोर श्रम करना पड़ता था। इसमें मुख्य था कोल्हू से तेल निकालना। नारियल का छिलका कूटना। क्रांतिकारियों को कोल्हू में बैल की तरह जोतकर रोजाना 20 पौंड तेल निकालने का लक्ष्य दिया जाता था। लक्ष्य पूरा नहीं होने पर कोड़ों से पीटा जाता था। लक्ष्य पूरा करने के लिए कई कैदी रात में भी कोल्हू चलाते थे। तेल घानी चलाते हुए कई कैदी बेहोश होकर गिर जाते थे।आप सेल्युलर जेल का दौरा करते समय तेल का कोल्हू और जुल्म की ये दास्तां चित्रों के माध्यम से देख सकते हैं।  

अंदमान के सेल्युलर जेल में भाई परमानंद, बटुकेश्वर दत्त, फील्ड मार्शल संपादक लद्दाराम जी, सचिंद्रनाथ सन्याल जैसे महान क्रांतिकारियों को भी कठोर यातना झेलने के लिए भेजा गया था।

( ANDAMAN, PORT BLAIR, CELLULAR JAIL, SAVARKAR  ) 

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