Tuesday, August 23, 2016

ये रॉस है या फिर रास ((18))

सुंदर रॉस द्वीप पर कदम रखते ही मेरा सामना जापानी बंकर से होता है। द्वीप में प्रवेश का टिकट खरीदता हूं। काउंटर पर टिकट देने वाले नौ सेना के जवान हैं। फुटकर नहीं होने के क्रम में उनसे वार्ता होती है। एमके सिंह झारखंड के रहने वाले हैं। वैसे तो नेवी में रडार पर तैनात रहने वाले फौजी हैं पर अभी रॉस में पदस्थापित हैं। वे मुझसे मिलकर काफी खुश होते हैं। मुझे भी उनका आत्मीयता भरा व्यवहार देखकर खुशी होती है। आगे बढता हूं। नारियल पानी के साथ कुछ खाने पीने की चीजें मिल रही हैं।
आगे बढता हूं। रॉस घूमने के लिए मार्ग दर्शिका बनी हुई इसलिए घूमना आसान है। पहले रॉस का इतिहास बताती पट्टियां लगी हैं। इससे आगे बढ़ने पर पानी गर्म करने के लिए बनाए गए बड़े बड़े बायलर के अवशेष नजर आते हैं। अंगरेजों को यहां के पानी से बीमारियां हो रही थीं इसलिए उन्होंने पानी गर्म करने के लिए बडे बायलर स्थापित करवाए। आगे अधिकारियों के क्लब की टूटी फूटी बिल्डिंग नजर आती है। इसी बीच सड़क पर कई मोर नृत्य करते नजर आते हैं। वे हमारा रास्ता रोक लेते हैं। कभी रास्ते में खरगोश आ जाते हैं तो कभी हिरण। मानो उनके लिए रॉस नहीं बल्कि रास हो।

नारियल के पेड़ों से टपक कर नारियल गिर पड़ते हैं पर इन्हे आप काट कर खाएंगे कैसे। आगे प्रेसबिटिरियन चर्च की पुरानी इमारत नजर आती है। इसके आगे सीढ़ियां उतर कर मैं रॉस के समुद्र तट फेयरर बीच तक पहुंचता हूं। अचानक समंदर का अदभुत सौंदर्य प्रस्फुटित हो उठता है। इस नीरव सुंदरता के बीच सिर्फ मैं हूं और एक युगल दंपति। वह मुझे अपनी विभिन्न मुद्राओं में फोटो खींचने के लिए कहते हैं। मैं भी पूरी उदारता से उनकी ढेर सारी फोटो उतारता हूं। उनके लिए भी ये रॉस नहीं रास ही है।

इस सुंदर समुद्र तट को छोड़ने की इच्छा तो नहीं हो रही है पर हमारा समय होता जा रहा है। आगे बढ़ने पर एक कब्रिस्तान नजर आता है। इसके बगल में एक छोटा सा सुंदर तालाब। इसके बाद हम एक लंबे उद्यान में पहुंच जाते हैं। यहां बाहें फैलाए एक युवती की मूर्ति बनी है। उसका सौंदर्य अप्रतिम है।

रॉस द्वीप 18 अप्रैल 1979 में नौ सेना के हवाले किया गया। सामरिक दृष्टि से रॉस का काफी महत्व है। इसलिए नौ सेना इसे निगरानी स्थल के तौर पर इस्तेमाल करती है। कई साल बाद नौ सेना ने इसे आगंतुकों और सैलानियों के लिए खोला। पर नौ सेना इसका 
खास ख्याल रखती है कि इसके ऐतिहासिक महत्व के साथ कोई छेड़छाड़ न की जाए।

हर शाम लाइट एंड साउंड शो - हर शाम रॉस द्वीप पर भी लाइट एंड साउंड शो होता है सेल्युलर जेल की तरह। यहां रॉस का इतिहास दिखाया जाता है। यह शो थ्री डी में आधुनिक तकनीक से दिखाया जाता है। इसका टिकट एक दिन पहले पोर्ट ब्लेयर के टूरिज्म आफिस से लिया जा सकता है। शो के लिए खास फेरी दर्शकों को शाम को लेकर आती है। रॉस में रात को किसी को भी रुकने की अनुमति नहीं है।


सुनामी में ढाल बनकर खड़ा हुआ रॉस - 
साल 2004 में आए सुनामी में रॉस द्वीप पर भी अपना कहर ढाया। पर रॉस इस बार पोर्ट ब्लेयर शहर के लिए एक ढाल बनकर खड़ा रहा। रॉस के कई हिस्सों में दरारें आ गईं। इससे सुंदर फेयरर समुद्र तट का एक हिस्सा समंदर में समा गया। पर लहरों को अपनी छाती पर झेला रॉस ने और पोर्ट ब्लेयर शहर पर सुनामी का प्रभाव बहुत कम पड़ा। शुक्रिया रॉस।

रॉस पर एक सुंदर कैफेटेरिया भी है। यहां बैठ कर आप समंदर में आते जाते जहाजों का नजारा कर सकते हैं। साथ में चाय कॉफी की चुस्की। पर मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं बचा है।जाते हुए मैं नौ सेना के जवान एमके सिंह से एक बार फिर बातें करने लगता हूं। उन्होंने कहा था जाते हुए मिलते जाइएगा। पर यह क्या इसी बीच समय हो जाने पर हमारी फेरी सी क्रूज हमें छोड़कर चली जाती है। मैं देखता रह जाता हूं। पर एमके कहते हैं चिंता मत किजिए। इसके बाद आने वाली किसी फेरी में आपको भिजवा दूंगा। इसके बाद एमवी भद्रकाली आती है, मैं उसमें बैठकर अबरडीन जेट्टी पहुंच जाता हूं। अलविदा रास, रॉस।  
- vidyutp@gmail.com

(ANDAMAN, ROSS ISLAND, INDIAN NAVY , LIGHT AND SOUND SHOW ) 
ब्रिटिश काल में रास द्वीप कुछ इस तरह गुलजार रहता था। 
रॉस  द्वीप का फेयरर समुद्र तट- सुनामी झेलने का बाद भी बचा है सौंदर्य।  
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